बुधवार, 21 अगस्त 2013

66. रक्षाबन्धन' 2013


लाल बरामदे पर "आल्पना" बनाकर, आसन बिछाकर रक्षाबन्धन बनाया जाता है; मगर इस बार सुबह से ही वर्षा हो रही थी, छोटी दीदी को आज ही लौटना था और 'छोटी' को भी कहीं जाना था, सो, थोड़े शॉर्टकट के साथ रक्षाबन्धन मना...  







पिछले रक्षाबन्धन पर मैंने फेसबुक पर कुछ विचार लिखे थे, उन्हें अभी खोजकर निकाला:


जितना प्यार माँ अपने बेटे से, या पत्नी अपने पति से करती है, उससे कहीं ज्यादा प्यार एक बहन अपने भाई से करती है- हाँ, वह कभी प्रकट नहीं करती. 

मैंने अनुभव किया है कि अगर बहन की दिली दुआयें (वे बोलकर दुआयें नहीं देतीं) किसी के साथ हों, तो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. 

बड़े बदनसीन होते हैं वे भाई, जो जाने-अनजाने में अपनी बहन के मन को चोट पहुँचा देते हैं. 

बहन अपने भाई से छोटा-सा उपहार पाकर कितना खुश होती है, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती. 

मैं नहीं जानता, आज की पीढ़ी के भाई-बहनों के साथ ये बातें फिट बैठती हैं या नहीं, मगर मैं अपने बारे में जानता हूँ कि मेरी दोनों दीदीयों का मेरे प्रति जो प्यार है, वह मेरा "रक्षा कवच" है!

रविवार, 18 अगस्त 2013

65. "कृष्ण-सुन्दरी"



       पिछले-से-पिछले हफ्ते साहेबगंज स्टेशन पर ढाई बजे वाली हमारी पैसेन्जर ट्रेन छूट गयी थी। अब ढाई घण्टे बाद अगली ट्रेन थी। मैंने इस समय का सदुपयोग किया- "कृष्णसुन्दरी" की छायाकारी करते हुए।
       कृष्णसुन्दरी आज परित्यक्ता है... बेचारी एक तरफ चुपचाप अकेली खड़ी रहती है.. हुंकार भरते गर्वीले डीजल इंजनों को देखते हुए... उसपर बरसाती लतायें चढ़ आयी हैं...
       हालाँकि पता चला कि 17 सितम्बर को कृष्णसुन्दरी को सजाया-संवारा जाता है- विश्वकर्मा पूजा के दिन।
       एक जमाना था, जब रेलगाड़ी या छुक-छुक गाड़ी में सफर का मतलब ही होता था- कृष्णसुन्दरी का साथ!
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       मुझे यह देखकर खुशी हुई कि कुछ किशोर भी कृष्णसुन्दरी के प्रति आकर्षित होकर उसके चारों तरफ चक्कर काट रहे हैं। मैंने उन्हें बताया कि यह अपने साथ कोयले तथा पानी का स्टॉक लेकर चलती थी। पानी के लिए कुछ बड़े स्टेशनों पर विशालकाय नल लगे होते थे। एक बड़ी-सी टंकी होती थी और एक विशाल तालाब हुआ करता था स्टेशन के पास में ही। बरहरवा में जो विशाल "कल पोखर" है, उसे बाकायदे पाइप-लाईन के माध्यम से गुमानी नदी से जोड़ा गया था। अब इस पोखर का करीब एक तिहाई हिस्सा (लम्बाई में) भर दिया गया है- चौथा प्लेटफार्म बनाने के लिए।
       ***
       खैर, भूमिका लम्बी हो गयी। देखिये "कृष्णसुन्दरी" के कुछ चित्र... ये जंगली लतायें ही आज इसका शृंगार हैं।
       छायाचित्रों के साथ मैंने एक रेखाचित्र भी जोड़ दिया है, ताकि नयी पीढ़ी वाले समझ सकें कि वह "नल" कैसा होता था, जिससे भाप वाले इंजन में पानी भरा जाता था! (कहने की जरुरत नहीं- रेखाचित्र मैंने खुद बनाये हैं- शायद आपको पता हो, मेरे तीन ही शौक हैं- "शब्दचित्र", "छायाचित्र" और "रेखाचित्र"!) 










शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

64. आया सावन झूम के...

आजकल आमतौर पर झमाझम बारिश का नजारा देखने को नहीं मिलता. कल, यानि 15 अगस्त को ही, दोपहर तक गर्मी और उमस का मौसम रहा... उसके बाद जो बारिश शुरु हुई... कि क्या बताया जाय... 









गुरुवार, 15 अगस्त 2013

63. 15 अगस्त 2013





       बचपन से हम देखते आये हैं- हमारे घर की छत पर हरेक 26 जनवरी और 15 अगस्त को तिरंगा फहराया जाता है। "घर" में तिरंगा फहराने का रिवाज यहाँ नहीं है- फिर भी हमारे घर में यह परम्परा चली आ रही है- बिना किसी ताम-झाम, आडम्बर के। सुबह झण्डा फहराया जाता है और सूर्यास्त के समय उसे उतार लिया जाता है।
       पहले पिताजी और चाचाजी फहराते थे, बाद मेरे बड़े भाई और मैं इसे करते थे और अब यह जिम्मेवारी मेरे बेटे और भतीजे पर आयेगी।
       आज पिताजी ने ही झण्डा फहराया। भतीजा और भतीजी स्कूल में थे, सिर्फ मैं और अभिमन्यु ही उपस्थित थे। अभिमन्यु अपने कोचिंग के झण्डोत्तोलन में भाग लेकर आ चुका था। अंशु अरविन्द पाठशाला गयी हुई थी- इसी कार्यक्रम में भाग लेने।
       बात तिरंगा लहराने की थी,,, तो थोड़ी देर के लिए मैंने भारतीय वायु सेना की अपनी वर्दी निकाल कर धारण कर ही ली!
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पुनश्च: 
बाद में पूछने पर पिताजी ने बताया कि मेरे दादाजी बड़ी श्रद्धा के साथ तिरंगा फहराया करते थे... तब से यह परम्परा चली आ रही है.
जिक्र करना चाहिए था- मेरे छोटे भाई बबलू (अंशुमान) तथा मेरे भांजे ओमू (अनिमेष) ने भी तिरंगा फहराने की जिम्मेवारी निभायी है. 


रविवार, 11 अगस्त 2013

62. कागज की कश्ती, बारिश का पानी...




मैंने बेटे को दो विकल्प दिये- या तो नाव तैराओ, मैं फोटो खींचता हूँ; 

या फिर, तुम फोटो खींचो, मैं नाव तैराता हूँ. 

जैसा मैंने सोचा था- वह फोटो खींचने के लिए राजी हुआ- नाव तैराने के लिए नहीं. 

शायद उसे कागज की कश्ती बनानी भी नहीं आती. 

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अगर उसने 'टच स्क्रीन' पाया है, तो कुछ खोया भी है- 

कागज की कश्ती बनाना... और उसे पानी में तैराना... 

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पता नहीं, इस पोस्ट को पढ़कर वह क्या सोचेगा. 

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रविवार, 28 जुलाई 2013

61. "सिगरेट" बनाम "धूम्रवर्तिका"



       सबसे पहले एक फेसबुक पेज 'मुझे चाहिए पूर्ण स्वराज' से "सिगरेट" पर एक सामग्री उद्धृत करता हूँ:  
हमारे देश में विदेशी कंपनी ITC प्रतिवर्ष लगभग 1800 करोड़ रुपये का सिगरेट का कारोबार करती है। हमारे देश में प्रतिवर्ष 3000 करोड़ रुपये से ज्यादा की सिगरेट पी जाती है। मुनाफे की दरअगर 20% भी मानी जाए तो ITC तकरीबन 360 करोड़ रुपया प्रतिवर्ष ... मुनाफा कमा ले जाती है।
500 सिगरेट बनाने में जितना कागज लगता है वो एक पेड़ काटने पर मिलता है, इस प्रकार ITC कंपनी सिगरेट बनाने के लिए हर साल भारत में '14 करोड़' पेड़ काटती है लेकिन अगर कोई गरीब घर का चूल्हा जलाने के लिए पेड़ काटे तो उसे वन विभाग सजा दे देता है। ऐसे हैं भारत में चल रहे अँग्रेजी कानून स्वास्थ्य भी खराब, पर्यावरण भी खराब और देश का पैसा भी विदेश में जाता हैं। ये सिगरेट कंपनियां इतनी पैसे वाली हैं की सरकारों को भी खरीद लेती हैं...... इसी कारण भारत में गुटखा बंद हो जाता है लेकिन गुटखे से ज्यादा तम्बाकू वाला उत्पाद सिगरेट बिकती रहती हैं।
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इसके बाद अपने एक ब्लॉग 'मेरी चयनिका' से एक सामग्री:
प्राचीन भारत में धूम्रपान
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प्राचीनकाल में प्रियंगु, बड़ी इलायची, नागकेसर. चन्दन, सुगन्धबाला, तेजपत्र, जटामांसी, गुग्गुल, अगरू, पीपल की छाल इत्यादि से धूमवर्तिका बनायी जाती थी और इससे धूमपान किया जाता था।
      इससे सिरदर्द, श्वास-कास के रोग, दंतशूल, दाँतों की दुर्बलता, बालों का गिरना, तन्द्रा, अतिनिद्रा, वातकफज रोग मिट जाते हैं।
      धूमपान के लिए दिनभर में आठ समय बताये गये हैं, जिन्हें नियमित रूप से करने के बाद कोई रोग नहीं सताता।
      आज का धूमपान तो उसका अतिविकृत स्वरूप है।
     'अखण्ड ज्योतिअक्तूबर'2006 अंक से साभार  (लेखमाला: आयुर्वेद- 41कैसी हो हमारी दिनचर्या- 1)  
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       तीसरे स्थान पर मैं अपने "घोषणापत्र" से एक विन्दु उद्धृत करता हूँ, जो 'चयनिका' वाली सामग्री पर ही आधारित है:
       22.6      तम्बाकू के स्थान पर प्रियंगु, बड़ी इलायची, नागकेसर, चन्दन, सुगन्धबाला, तेजपत्र, जटामांसी, गुग्गुल, अगरू, पीपल की छाल इत्यादि लाभदायक जड़ी-बूटियों तथा कागज के स्थान पर किसी पत्ते का इस्तेमाल करते हुए'धूम्र-वर्तिका' (जैसा कि प्राचीन काल में बनता था) बनाने का आदेश सिगरेट कम्पनियों को दिया जायेगा और इस आदेश के 100 दिनों बाद तम्बाकू तथा कागज से बनने वाली सिगरेट का भारत में उत्पादन एवं आयात बन्द कर दिया जायेगा (बीड़ी के सम्बन्ध में भी ऐसी ही व्यवस्था की जायेगी।)
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अब अन्त में मैं एक छायाचित्र जोड़ता हूँ, जो "निर्दोष" नामक एक सिगरेट (आप फिल्टर वाली बीड़ी भी कह सकते हैं इसे) का है। इसके 10 पैकेट मैंने 550/- रुपये में डाक द्वारा मँगवाये।

इसके सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी यहाँ मिल जायेगी:
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60. मिली-जुली





सावन



      आषाढ़ का दूसरा पखवारा सूखा बीता था हमारे इलाके में। उल्टे गर्मी तेज हो गयी थी।
रोपे गये धान के पौधे पीले पड़ने लगे थे, बिजड़े मुर्झाने लगे थे और कहीं-कहीं खेत में दरारें पड़ने लगी थीं। जहाँ जलाशय था, जिनके पास साधन था, वे तो पम्प सेट चला रहे थे... साधनहीन किसान इन्द्रदेव से प्रार्थना कर रहे होंगे...
हालाँकि इन दिनों दिल्ली-मुम्बई में खूब बारिश हो रही थी।
       सावन काली घटायें लेकर आया, तब जाकर लोगों की जान में जान आयी। अब फिर बची-खुची धनरोपनी शुरु हो गयी है।
       आशा है, अभी कुछ दिन अच्छी बारिश होगी, ताकि धान के खेतों में टखने भर पानी भर जाय...
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बड़हर
       चित्र में टोकरी में जो टेढ़ा-मेढ़ा फल दीख रहा है, उसका नाम "बड़हर" है। पहले हम सोचते थे कि यह हमारे इलाके का ही जंगली फल है, मगर बाद के दिनों में श्रीमतीजी ने बताया कि उत्तर प्रदेश में भी उसने इस फल को खाया है। वहाँ इसे "भद" कहते हैं। एकदम सटीक नाम है, क्यों? इस फल का आकार है ही भद्दा-सा।
       खैर, यहाँ इसके जिक्र का मकसद यह है कि अपने गृहनगर के नामकरण से जुड़ी वह किंवदन्ती या चुटकुला सुना दूँ, जो बचपन में हम सुनते थे। बहुत-से शहरों के नामकरण के बारे में ऐसे चुटकुले पाये जाते हैं।
       सर्वेक्षण के दौरान अँग्रेज अधिकारी एक ग्रामीण महिला से अँग्रेजी में पूछता है कि इस जगह का नाम क्या है? बुढ़िया के सिर पर "बड़हर" से भरी टोकरी होती है। सोचती है, इसी के बारे में पूछा जा रहा है कि टोकरी में क्या है? वह जवाब देती है- "बड़हर बा।" (भोजपुरी में "है" के लिए "बा" (या "बाटे") का इस्तेमाल होता है और हमारे इस इलाके में हिन्दी के अलावे भोजपुरी, बँगला और सन्थाली तीनों भाषाओं का प्रचलन है।)
       फिर क्या था, सर्वे में हमारे गाँव का नाम दर्ज हो गया- "बड़हरवा"!
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टिप्पणी: हालाँकि आस-पास के बँगलाभाषी देहातों में बरहरवा को "बोहेला" कहते हैं, जो सम्भवतः साँपों की देवी "बेहुला" से उत्पन्न हुआ है. हो सकता है, कभी यहाँ देवी बेहुला का प्रसिद्ध मन्दिर रहा हो.
प्रसंगवश, यह भी बता दिया जाय बेहुला-लखिन्दर का बाकायदे एक "पुराण" है, जिसका पाठ आज भी गाँवों में बहुत-से लोग करते हैं.
इसके अलावे गाँवों में कई रातों तक चलने वाला एक धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित कराया जाता है, जो इसी देवी को समर्पित होता है. सावन में ही इसका आयोजन होता है.
(मेरी जानकारी इस सम्बन्ध में कम है, सो मैं शर्मिन्दा हूँ. कभी ज्यादा जानकारी हासिल करके फिर लिखूँगा.)
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लम्बे पैर
       चित्र में जो लम्बा व्यक्ति दीख रहा है, वह बाँस या लकड़ी के पैरों पर चल रहा है। लम्बे पजामे में लकड़ी के पैर छुप गये हैं।
हमने सोचा था कि प्रचार या विज्ञापन का तरीका अब विलुप्त हो गया है।
मगर पिछले दिनों देखा एक व्यक्ति किसी दर्द-निवारक तेल का विज्ञापन इसी शैली में कर रहा है। छोटे-से लाउडस्पीकर से बोलते हुए और पर्चे बाँटते हुए।  
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