मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

262. छायाकारी का एक सबक

 

       हम पहले यह साफ कर दें कि छायाकारी की तकनीकी जानकारी हमें नहीं है, लेकिन एक कलाप्रेमी होने के नाते हमें थोड़ा-बहुत यह अन्दाजा हो जाता है कि कब किस तरह से तस्वीर खींचनी चाहिए।

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       कुछ दिनों पहले की बात है। हमने श्रीमतीजी को अपनी एक तस्वीर खींचने के लिए कहा। तब हम कुर्सी पर बैठे हुए थे। वे तस्वीर खींचने लगीं। हमने टोकना चाहा कि जब कोई कुर्सी पर बैठा हो, तब खड़े होकर तस्वीर खींचने से एक तरह बौनापन तस्वीर में नजर आता है; इसलिए कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की तस्वीर जमीन पर बैठकर खींचनी चाहिए, पर हमने टोका नहीं।

       कुछ दिनों बाद हमने 'प्रैक्टिकल' करके इस बात को बताया। पहले हमने उनकी तस्वीर खींची- वे कुर्सी पर बैठी थीं और हमने बैठकर तस्वीर ली। फिर हमने उनको इसी तरह से तस्वीर खींचने को कहा।

       दोनों के परिणाम इस प्रकार रहे-





       और भी कुछ दिनों के बाद हमने परीक्षा ली। इस बार भी हमने पहले तस्वीर खींची, फिर उनको खींचने के लिए कहा। इस बार के दोनों परिणाम-

      

         और हाँ, जहाँ से बात शुरू हुई थी, यानि जो तस्वीर उन्होंने खड़े होकर खींची थी, उसका परिणाम ऐसा था-

 

       एक अतिरिक्त परिणाम-

 

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जब बात निकलती है, तो थोड़ी दूर तलक जाती है।

घर से बाहर भी इस तकनीक को आजमाया जा सकता है। 2018 की दो तस्वीरें भी पेश हैं। मेरे मित्र ने खड़े होकर मेरी तस्वीर खींची थी और हमने बैठकर उसकी तस्वीर खींची थी, परिणाम में अन्तर साफ नजर आ रहा है।

 

शायद तकनीकी भाषा में इसे 'Low Angle Photography' कहते हैं।

 

शनिवार, 18 सितंबर 2021

261. 18 सितम्बर के बहाने एक याद...

 

       1995 के जिस दिन मैं मेरठ शहर पहुँचा था, उस दिन काका हाथरसी का देहावसान हुआ था। यानि वह 18 सितम्बर का दिन था- आज ही का दिन। हाथरस मेरठ से बहुत दूर नहीं है। इसलिए मेरठ शहर में भी काका के देहवसान की चर्चा फैली हुई थी। जिक्र हो रहा था कि उनकी शवयात्रा धूमधाम से निकलेगी। जी हाँ, धूमधाम से। यह काका हाथरसी की इच्छा थी कि उनकी शवयात्रा में लोग ठहाके और कहकहे लगाते हुए चलें। काका हाथरसी की हास्य-कविताएं उन दिनों बहुत लोकप्रिय हुआ करती थीं। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान-जैसी पत्रिकाओं के होली विशेषांक में उनकी रचनाएं जरूर हुआ करती थीं। मैंने बचपन में 'हास्य कवि सम्मेलन' नामक एक पुस्तक पढ़ी थी उनकी। एकबार एक पत्रिका में सभी नामी-गिरामी हास्य कवियों की पत्नियों का साक्षात्कार छपा था, जिसमें 'काकी' का कथन सबसे दमदार था- 'बीस वर्षों से इन्हें बर्दाश्त कर रही हूँ।' दरअसल, काका अक्सर कविताओं में 'काकी' को भी शामिल कर दिया करते थे- जैसे, "प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काकी को धर दे... वीणावादिनी वर दे...।" अभी फेसबुक की एक पोस्ट से पता चला कि उनका जन्म भी 18 सितम्बर को ही हुआ था- 1906 में।

       तो जब आज 18 सितम्बर है और आज काका के बहाने मेरे मेरठ जाने की बात याद आ गयी है, तो उस पुरानी याद को ताजा कर ही लूँ।

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मैं आधी रात में मेरठ पहुँच गया था। स्टेशन के बाहर एक लॉज में सोया। सुबह घण्टाघर आकर नाश्ता किया और टेम्पोवाले से बोला कि शास्त्रीनगर जाना है। उसने बैठने कहा, मैं बैठ गया। और भी बहुत से लोग बैठे थे टेम्पो में। कुछ देर बाद एक वीरान-से इलाके में टेम्पो रोककर ड्राइवर ने मुझसे कहा, "लो जी, आ गया शताब्दी नगर।"

शताब्दी नगर? मुझे तो शास्त्री नगर जाना था! खैर, सड़क के दूसरी तरफ जाकर एक दूसरा टेम्पो पकड़ कर वापस घण्टाघर लौटा। अब ठीक से शास्त्रीनगर वाला टेम्पो पकड़ा। शास्त्रीनगर उतर कर हमने दुकानों पर पूछ-ताछ शुरू की कि फलां मकान नम्बर कहाँ मिलेगा? पता चला, शास्त्रीनगर बहुत बड़ा रिहायशी इलाका है और बिना 'सेक्टर नम्बर' बताये मकान का पता नहीं चलेगा। मैंने कहा कि मैं तो इसी पते पर पत्र लिखता हूँ। खैर, दो-तीन दुकानों से एक-जैसा जवाब पाने के बाद मैंने पूछा कि पोस्ट ऑफिस किधर है? मेडिकल के कैम्पस में पोस्ट ऑफिस था। वहाँ जाकर पोस्टमैन से पूछने पर उन्होंने कहा, "पता ठीक है- सेक्टर 8 में फलां नम्बर का मकान।" दरअसल, तीन अंकों के मकान नम्बर के बाद 'बटे' के साथ 8 भी लिखा हुआ पते में। किसी दुकानदार का ध्यान इस पर नहीं जा रहा था। मैं तो खैर, जानता ही नहीं था इन नम्बरों के बारे में।

अब एक रिक्शेवाला मुझे उस सड़क पर ले गया, जिसकी बाँयी तरफ सेक्टर- 8 था और दाहिनी तरफ सेक्टर- 9। रिक्शेवाला मुझे कुछ ज्यादा ही आगे तक ले गया और उतार कर बोला, "दाहिनी तरफ सेक्टर- 8 है।" मैं उस कॉलोनी में जाकर वांछित मकान नम्बर खोजने लगा। एक लड़के ने मुझे बताया कि मैं सेक्टर- 9 में हूँ, सेक्टर- 8 सड़क की बाँयी तरफ है। वह अपनी साइकिल पर बैठा कर मुझे सही जगह ले आया और बोला, "आगे तीन-चार घरों के बाद ही वह घर है।"  

सही मकान नम्बर के सामने पहुँचा। अन्दर अंशु एक पड़ोसन के साथ गपशप कर रही थी। मैंने कहा कि मैं ग्वालियर से आ रहा हूँ।

"अच्छा, जयदीप जी। शेखर जी नहीं आये?" अंशु ने कहा।

मैं चक्कर में पड़ गया। 8-10 दिनों पहले मैंने अपनी तस्वीर भेज दी थी और लिखा था कि यही 'जयदीप' है और यही 'शेखर' है- दोनों एक ही व्यक्ति का नाम है- 'जयदीप शेखर।' यहाँ मुझे 'जयदीप' समझा जा रहा था। उस समय मैं चुप ही रहा और कहा कि हाँ, मैं जयदीप हूँ। सोचा, बाद में राज खुलनी ही है कि दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हैं।

हुआ यह था कि खुद अपनी ही शादी की बात करते हुए मुझे अटपटा लगा था, इसलिए 'जनसत्ता' को लिखे पत्र में मैंने यह लिखा था कि मैं 'जयदीप' हूँ और मेरा मित्र 'शेखर' अंशु से विवाह करना चाहता है। यह अगस्त महीने की बात थी। अपने 'जयदीप' नाम के साथ 'शेखर' उपनाम का प्रयोग मैं शुरू कर ही चुका था। जनसत्ता में अंशु की कहानी छपी थी और उस कहानी को पढ़ने के बाद उससे शादी करने का फैसला मैंने पलक झपकते ले लिया था। वैसे, यह कहानी विस्तार से मैं 1987 में भी पढ़ चुका था- जब यह घटना घटी थी। शायद 'मनोहर कहानियाँ' में। तब मैं आवडी (मद्रास) में था, उम्र कम थी। देश में तेजाब से हमले की पहली वारदातों में से एक यह वारदात थी। 'जनसत्ता' ने दिल्ली से मेरे पत्र को मेरठ पहुँचाया था, मेरठ कार्यालय से एक पत्रकार उस पत्र को अंशु के पिताजी तक पहुँचा गया था। उन दिनों प्रभाष जोशी जनसत्ता के सम्पादक हुआ करते थे, समाचार लिखने वाले पत्रकार भी धाकड़ हुआ करते थे और 'जनसत्ता' को हिन्दी का दमदार अखबार माना जाता था।

खैर, घर में पता चला कि अंशु के माता-पिताजी मुरादाबाद गये हुए हैं- अंशु के नानीघर और वे तीन दिनों बाद आयेंगे। इस प्रकार, मैं अपने भावी ससुराल में तीन-चार दिनों तक ठहरा। दोपहर में बबीता और शानू (अंशु की बहन और भाई) भी घर आये।

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21 सितम्बर के दिन मैं वहीं था। सुबह-सुबह खबर फैली कि गणेशजी दूध पी रहे हैं। लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा मन्दिरों की ओर। दोपहर तक पता चला कि मामला भारत तक सीमित नहीं है, विदेशों तक में गणेशजी दूध पी रहे थे।

हमलोग घर के बाहर ही बैठे हुए थे। दोपहर में डी.ए.वी. स्कूल का एक विद्यार्थी वहाँ से गुजरा। वह दूध पिलाकर आ रहा था। हम लोगों ने कहा कि यह तो अफवाह है, तो वह लगभग नाराज हो गया। उसने कहा कि वह भी विज्ञान का विद्यार्थी है, पर यह सच है। तो उसकी बातों से प्रभावित होकर हमलोग भी गणेशजी को दूध पिलाने गये थे।

तीन दिनों बाद अंशु के माता-पिता आये, हमने 'जयदीप शेखर' के रूप में अपना परिचय दिया। उनके पिता ने मुझे अपने माता-पिता से अनुमति लेने के लिए कहा। मैंने अनुमति ली। पिताजी ने कहा कि शिष्टाचारवश अंशु के पिताजी को एक बार हमारे घर आना चाहिए। वे गये। और इस तरह से अगले साल हमारी शादी हुई।

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 मेरठ/ससुराल की कुछ पुरानी यादें अल्बम से- 

 


रविवार, 22 अगस्त 2021

260. अथ तस्वीर कथा

 


       नयी पीढ़ी वाले विश्वास करें या न करें, मगर यह सच है कि एक जमाने में हमलोगों के हाथों में "स्मार्टफोन" नहीं हुआ करते थे, फिर भी हम जिन्दा रहते थे, घूमते-फिरते थे, दुनिया भर की जानकारियाँ रखते थे और चाहने वालों के साथ सम्पर्क भी हमारा बना रहता था!

और हाँ, चूँकि हाथों में स्मार्टफोन नहीं होते थे, इसलिए किसी घूमने वाली जगह पर जाने के बाद दे-दनादन फोटोग्राफी करने या तथाकथित "सेल्फी" लेने की प्रथा भी नहीं थी।

कुछेक के हाथों में कैमरे हुआ करते थे और वे गिन-चुनकर तस्वीरें लिया करते थे। कैमरे में आग्फा, कोडक, कोनिका, साकुरा की फिल्में हुआ करते थीं, जो 36 तस्वीरों के लिए बनी होती थी। जो इनसे 39 तक तस्वीरें ले लिया करते थे, उन्हें तारीफ मिलती थी।

यह तो हुई हमारे जमाने की बात। इससे भी पहले का जमाना सफेद-काली तस्वीरों का था। तब विदेशी फिल्मों के साथ 'इन्दु' नाम की एक भारतीय फिल्म भी आया करती थी। इन फिल्मों में 12 तस्वीरें आती थीं।

बीच में अग्फा ने 24 तस्वीरों के लायक एक 'कार्ट्रिज' उतारी थी, पर वह चली नहीं थी, उसमें तस्वीरें साफ भी नहीं आती थीं।

हम-जैसे आम लोग 'ऑटो फोकस' पर फोटोग्राफी किया करते थे और उस्ताद लोग एपर्चर, शटर स्पीड इत्यादि सेट करके तस्वीरें लेते थे।

हाँ, तो बहुत-से लोग ऐसे होते थे, जिनके पास कैमरे नहीं होते थे। ऐसे लोगों के लिए पेशेवर छायाकार घूमने वाली जगहों पर घूमा करते थे। वे तस्वीरें खींचते थे, पैसे ले लेते थे और नाम-पता लिख लिया करते थे। बाद में डाक से वे तस्वीरें भेज दिया करते थे।

अभी 5-7 साल पहले तक हमने नैनीताल और पुरी में ऐसे फोटोग्राफरों को देखा था। वे शाम तक होटलों में- जहाँ आप ठहरे हैं- तस्वीरें पहुँचा दिया करते थे।

अब इस तस्वीर की बात, जो पोस्ट में है।

1991 की तस्वीर है। हम एक लम्बी यात्रा से आगरा आकर ठहरे थे। चले थे बंगलोर से, पहला पड़ाव हैदराबाद था, दूसरा नासिक। नासिक में रात्रि-विश्राम था। वहाँ से चण्डीगढ़, फिर कानपुर, इलाहाबाद होते हुए आगरा में उतरे थे। यह वायु मार्ग की यात्रा थी (वायु सेना का काम था)। अब आगरा से सड़क मार्ग से हमें ग्वालियर जाना था (इसी यात्रा में सड़क चम्बल के बीहड़ों से गुजरती है- क्या रोमांच था!)। तो आगरा में जब रूकने का अवसर मिला, तो स्वाभाविक रूप से हम ताजमहल घूमने पहुँच गये। कैमरा साथ था नहीं और ताजमहल का भव्य रूप देखकर (एक गेट को पार करते ही अचानक ताज का जो रूप नीले आकाश की पृष्ठभूमि पर नजर आता है- वह भव्य रूप!) होश उड़ा हुआ था।

एक फोटोग्राफर से तस्वीर खिंचवाये, उसे पैसे दिये और नाम-पता लिखवा दिया। बाद में उसने तस्वीर भेज दी। हमने तस्वीर देखी और वापस लिफाफे में तस्वीर रख दी। बाद में भूल गया। कुछ वर्षों के बाद वह लिफाफ बक्से के किसी कोने में चला गया।

बाद में STD का जमाना आया, पत्रलेखन कम हुआ। 2004-05 में कभी मोबाइल फोन आया, तो पत्रलेखन लगभग बन्द हो गया। पुरानी चिट्ठियों को गट्ठर बाँध-बाँध कर रख दिया। इसके पहले दो बार पुरानी चिट्ठियों की ढेर को जला चुका था। तीसरी बार, जाने क्या मन में आया, नहीं जलाया कि निशानी रह जायेगी- पत्रलेखन की।

तो चिट्ठियों के बण्डल घर आ गये। कहीं टाँण्ड पर रखे रहते थे। हाल की सफाई-पुताई में बाहर निकले थे, बाहर ही पड़े रह गये। फिर वर्षा आयी, ये भींग गये। बण्डल खोलकर सुखाया, सुखाने के बाद जब फिर बण्डल बना रहे थे, तब किसी-किसी चिट्ठी को खोलकर देख भी रहे थे।

...उसी दौरान यह तस्वीर मिल गयी। यानि लगभग 30 वर्षों के बाद हम इस तस्वीर को देख रहे थे!

  इस तस्वीर से यह साबित होता है कि हम एक समय में काले रंग के अलावे किसी दूसरे रंग की पैण्ट भी पहना करते थे।