बुधवार, 24 जून 2020

236. जामुन का पेड़


        घर के बगल के खाली प्लॉट पर जामुन का एक बड़ा-सा पेड़ है। हर साल बरसात में बच्चे यहाँ जामुन तोड़ने आते हैं। बरसात में यह जगह जंगल-झाड़ियों से भर जाती है, इसलिए हम खुद कभी नहीं गये थे जामुन तोड़ने। एक तरह से, यह सुरक्षित नहीं है।
       आज क्या मन में आया, जामुन तोड़ने चले गये। उसी के कुछ चित्र:
      
विडियो- 1: हमारा घर और जामुन का पेड़
https://youtu.be/kP_Lwx1aKZI

       विडियो- 1A: हमारा घर और जामुन का पेड़
https://youtu.be/LR46tuhrgC0

                विडियो- 2: जामुन के पेड़ की ओर बढ़ते हुए
https://youtu.be/dTt4of4anBY

       विडियो- 3: जामुन के पेड़ की स्थिति 
https://youtu.be/VRwE1PHfeOw

       चित्र- 4: एक पुरानी दीवार पर चढ़कर पके जामुनों तक पहुँच ही गये

       विडियो- 5: ...तो इतने जामुन तोड़े आज हमने
https://youtu.be/iGt4JtAUzl4

       चित्र- 6: एक तितली, ऐसी बहुत-सी तितलियाँ उड़ रही थीं वहाँ

       पुनश्च: यह खाली जगह श्री जयप्रकाश चौरासिया जी और उनके भाई की है। उम्मीद है, जब कभी यहाँ निर्माण-कार्य होगा, जामुन के इस विशाल पेड़ को "जीवनदान" दिया जायेगा...
***

सोमवार, 22 जून 2020

235. नौपाड़ा झील




       जयचाँद अक्सर एक झील का जिक्र करता था। नौपाड़ा गाँव में उसकी दीदी का घर है, वहीं है यह झील। हम समझते थे कि वह बंगाल के किसी गाँव की बात करता है। बाद में पता चला कि वह गाँव हमारे कस्बे के आस-पास का ही है- 15 किलोमीटर दूर।
       कई दिनों से बात हो रही थी कि वहाँ चला जाय। कल जाना हो ही गया- ऐन सूर्य-ग्रहण के दिन।
       जब हमलोग केलाबाड़ी और आतापुर होते हुए नौपाड़ा गाँव की ओर चले, तब आकाश में बादल होते हुए भी चटक धूप थी और गर्मी भी थी, लेकिन जैसे ही हम गाँव के सीमाने पर पहुँचे, आकाश के एक कोने में वर्षा वाले काले बादल नजर आने लगे। जयचाँद की दीदी के घर तक पहुँचते-पहुँचते वर्षा शुरू हो गयी। घण्टे भर पानी बरसा। वर्षा थमने पर हम झील की तरफ गये, तब बदली छायी हुई थी।
       घण्टे भर झील में नौका-विहार करके जब हम वापस दीदी के घर पहुँचे, तब चटक धूप निकली। 
       वापसी में जब हम अपने बरहरवा की सीमा पर पहुँचे, तब फिर फुहार पड़ने लगी।
       उसी नौका-विहार की कुछ तस्वीरें और चलचित्र प्रस्तुत है-  
रास्ते में एक तालाब पड़ा, जो कमल के फूलों से भरा हुआ था।

गाँव का एक सामान्य दृश्य।

क्षितिज पर राजमहल की पहाड़ियाँ।

गाँवों में ऐसे कच्चे मकान अब कम ही रह गये हैं- यह भी जर्जर हो रहा है।

गाँव की ओर... ।

इमली की घनी छाँव।

झील पर नौका-विहार के लिए नाव निकालते हुए।

झील के बीच।

झील के बीच।

झील में खिले कमल के फूल।

नाव खेते हुए- 'शुभो'।

विडियो 1: झील में प्रवेश करते हुए

विडियो 2: झील के बीच

विडियो 3: झील के बीच

शुक्रवार, 29 मई 2020

234. कल पोखर


यह हमारे यहाँ रेलवे का तालाब है।
एक जमाना था, जब भाप के इंजन चलते थे, तब हमारे बरहरवा जंक्शन में हर इंजन में पानी भरा जाता था। क्या बड़े-बड़े नल हुआ करते थे !
तब हमलोग इसी तालाब में नहाने आया करते थे। वैसे, और भी तालाबों में नहाना होता था, पर मुख्य तालाब यही था।
इस तालाब को पाईप-लाईन के जरिये पड़ोस की 'गुमानी' नदी से जोड़ कर रखा गया था।
उन दिनों 'बहँगी' में दो टीन लटकाकर उसमें पानी भरकर सारे दूकानों में इस पानी की आपूर्ति होती थी। यानि इस तालाब के पानी को पीने योग्य माना जाता था।
तालाब की लम्बाई तो उतनी ही है, पर चौड़ाई अब घटकर आधी रह गयी है। आधे हिस्से को भरकर 4 नम्बर प्लेटफार्म बनाया गया है और कुछ हिस्सा यूँ ही परती पड़ा है।
हमलोगों ने अपने बचपन में इसी तालाब में तैरना सीखा था। याद है कि एकबार "रामकिशुन चाचा" ने हम बच्चों का उत्साह बढ़ाने के लिए कहा था- अगर उस पार जाकर वापस लौट आओ, तो तुमलोगों को एक किलो रसगुल्ला खिलायेंगे। बेशक, चौड़ाई को आर-पार करने की बात थी, लम्बाई को नहीं। फिर भी, चौड़ाई भी कोई कम नहीं थी तब। हमलोग राजी हो गये थे। हाँफते हुए हमलोग तैरते हुए उस पार चले गये थे और वापस भी लौट आये थे। उन्होंने खुशी-खुशी हमलोगों को एक किलो रसगुल्ला खरीदकर दे दिया था।
(बोल-चाल में रामकिशुन चाचा को 'किड़किड़वा" कहा जाता था। गाँवों अक्सर पहले हर व्यक्ति का "निक नेम" या "पुकार नाम" हुआ करता था। उन्हें 'किड़किड़वा' क्यों कहते थे लोग? क्योंकि उनकी मूँछें कड़क थीं!)
तालाब के किनारे जिस जगह से फोटोग्राफी/विडियोग्राफी की जा रही है, वहाँ अभी तो नया फुटओवर ब्रिज है, पर उन दिनों यहाँ एक "पम्प-हाउस" हुआ करता था। कोयले से संचालित पम्प-हाउस। अब उसका नामो-निशान नहीं है। वहीं से तालाब का पानी एक विशाल टंकी में चढ़ाया जाता था। टंकी 1921 में बनी हुई है। तब रेलवे "ईस्ट इण्डिया कम्पनी" की हुआ करती थी। यह टंकी आज भी है और यह हमारे बरहरवा का एक "लैण्डमार्क" है। 

पिछले 25-30 सालों से हमलोगों ने "सुखाड़" नहीं देखा है- पता नहीं क्यों, लेकिन याद है कि पहले सुखाड़ पड़ा करते थे। तालाब और कुएं सूख जाया करते थे। इस कल-पोखर में भी पानी घट जाता था। पानी गंदला हो जाता था। फिर भी, लोग नहाते थे इसमें। बाकी छोटे-मोटे तालाबों में पानी रहता ही नहीं था। क्या दिन थे वे भी!
गर्मियों में नहाते समय अक्सर हमें समय का ध्यान नहीं रहता था। कभी-कभी पिताजी को बुलाने आना पड़ता था- छड़ी हाथ में लेकर। क्या बचपना था!
***   
युट्युब पर हमने कुछ विडियो भी डाल रखे हैं- 
कल पोखर- 1
कल पोखर- 2 
कल पोखर- 3 
पानी टंकी

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

233. चीना राक्षस


https://jagprabhaebooks.blogspot.com/p/blog-page_62.html

  
      जब कोई लम्बा काम किया जाता है, तो बीच-बीच में विराम (ब्रेक) लिया जाता है। विराम के दौरान या तो आराम किया जाता है, या फिर, दिल-दिमाग को राहत पहुँचाने वाला कोई काम किया जाता है।
       जैसा कि जिक्र कर चुके हैं- 'डाना' नामक वृहत् बँगला उपन्यास के प्रथम खण्ड का हिन्दी अनुवाद पूरा हो चुका है और अब द्वितीय खण्ड के अनुवाद में हमें लगना चाहिए, मगर बीच में चाहिए एक विराम, यानि एक ऐसा काम, जो मन में खुशी और दिमाग को आराम दे।
       ऐसे में, बच्चों की कहानी से बेहतर क्या हो सकता है? ऐसे भी, हमारी हिन्दी में बाल-कहानियों का अभाव है। ...तो हमने फैसला किया कि क्यों न सुकुमार राय महोदय की एक बाल कहानी का हिन्दी अनुवाद कर लिया जाय? सुकुमार राय के बारे में बता दिया जाय कि आप सत्यजीत राय के पिता थे। बँगला भाषा की बाल-कहानियों में आपका बहुत बड़ा योगदान है। आपकी सारी बाल-रचनाओं को बाकायदे तीन खण्डों में संकलित किया गया है।
हमने जब सुकुमार राय के बारे में अध्ययन शुरु किया, तो पता चला कि उनकी तीन रचनाएं बहुत प्रसिद्ध हैं- 1. आबोल ताबोल, 2. ह-ज-ब-र-ल और 3. पागला दासू।
       'आबोल ताबोल' कविता संग्रह है; 'पागला दासू' बहुत बड़ी रचना है; जबकि 'ह-ज-ब-र-ल' छोटी कहानी है। स्वाभाविक रूप से, हमने इसे ही चुना। अँग्रेजी में इसे 'नॉनसेन्स स्टोरी' कहा जा रहा है। हिन्दी में क्या कहा जाय? हमने तय किया, इसे 'ऊट-पटाँग' कहानी कहेंगे! यह काफी कुछ 'एलिस इन वण्डरलैण्ड'-जैसी कहानी है।
       'विकिपीडिया' में इस कहानी का परिचय इस तरह से दिया गया है:
"HaJaBaRaLa (Bengali: হ য ব র ল) or HJBRL: A Nonsense Story is a children's novella by Sukumar Ray.[1] Ha Ja Ba Ra La is considered one of the best nonsense stories of Bengali literature. To point out its artistic merit, people frequently compare it to Alice In Wonderland though two are completely different in their plot organisation, tone, mood, and cultural setting."
 
       सबसे पहले सवाल उठा, हिन्दी में इस कहानी को क्या नाम दिया जाय? अँग्रेजी में तो 'Ha-Ja-Ba-Ra-La' ही कर दिया गया है, जबकि इसकी कहीं कोई व्याख्या नहीं है कि इसका अर्थ क्या है। इस शीर्षक का इस्तेमाल कहानी में भी नहीं हुआ है। यानि यह एक निरर्थक शीर्षक है। हमने सोच-विचार कर शीर्षक चुना- 'आ-ला-ल-लु'! मेरे पास इसकी व्याख्या है- 'आमड़ी-लामड़ी-लफा-लुफुस'। दरअसल, बचपन में हमने बच्चों के लिए बनी एक फिल्म देखी थी, जिसमें आठ-दस साल का बच्चा नायक होता है। जितेन्द्र उसके अभिभावक होते हैं। तिलस्मी कहानी थी। जो खलनायक था, उसका मंत्र या तकिया कलाम था- 'आमड़ी-लामड़ी-लफा-लुफुस'!  
आधी कहानी के बाद कई कविताएं हैं- बेशक, स्वयं सुकुमार राय द्वारा रची गयी बाल कविताएं। हमने क्या किया, कविताओं के अनुवाद करने के बजाय रामप्रिय मिश्र 'लालधुआं' रचित बाल-कविताओं का इस्तेमाल करने का फैसला किया, मगर अफसोस कि इण्टरनेट पर उनकी कविताएं मिली ही नहीं। दो-चार कविताएं याद थीं, उनका ही इस्तेमाल किया। अब आगे क्या करें?
       ...तो हमने कुछ छोटी-छोटी बाल-कविताएं रच ही डाली। उन्हीं को प्रदर्शित करने के लिए यह ब्लॉग पोस्ट है। एक कविता 'कोरोना' पर आधारित है! हमें याद आया कि आजकल के स्कूलों में बच्चों को जो यह कविता रटायी जाती है- 'रिंगा रिंगा रोजेज'- यह वास्तव में पिछली सदी में यूरोप में फैली महामारी पर ही आधारित है।   
       यह संयोग की ही बात है कि कहानी में जिस जगह पर मेरी इस बाल-कविता का इस्तेमाल हो रहा है, वहाँ पर सुकुमार राय साहब की बाल-कविता 'बीमारी' पर ही आधारित है- 'खुशखुशे कासी घुसघुसे ज्वर, फुसफुसे छेंदा बूड़ो तुई मर। माजराते व्यथा पाँजराते बात, आज राते बूड़ो होबि कूपोकात।'
       इस जगह पर हम गर्व के साथ अपनी स्वरचित बाल-कविता का इस्तेमाल करने जा रहे हैं, जो निम्न प्रकार से है:  

       "चीन से आया कोरोना वायरस, सर्दी बुखार गले में खसखस,

गला दबाकर जान से मारे, चिंग चांग चुंग चेंग चीना राक्षस।



चमगादड़ से बाहर निकाला, लैब में इसको पोसा-पाला,

दुनिया भर में इसे फैलाकर, बनता है वह भोला-भाला।"


बाकी बाल-कविताएं निम्न प्रकार से हैं:

       बादुर बोला ओ साही राम 
       साही राम करम का खोटा
       आज रात को खेल एक देखना
       उल्लू लेकर भागेगा लोटा
       आमड़ी लामड़ी लफा लुफुस।

       चमगादड़ भी नाच करेगा
       चूहा थर-थर काँपेगा
       मेंढ़क-मेंढ़की डर जायेंगे
       छुछुन्दर बगलें झाँकेगा
       आमड़ी लामड़ी लफा लुफुस।

       कहाँ छुप गया साही राम
       कनिया के पल्लू में सो रहा है
       उल्लू और चमगादड़ की चीख से
       सुबक-सुबककर रो रहा है
       आमड़ी लामड़ी लफा लुफुस।

       अभी उठेगा साही राम
       लाठी लेकर दौड़ेगा
       उल्लू चमगादड़ की पीठ पर
       अपनी लाठी तोड़ेगा
       आमड़ी लामड़ी लफा लुफुस।

       बादुर बोला गीदड़ भभकी रहने दो
       बीवि के पल्लू में ओ सोने वाले
       क्या खाकर लाठी भाँजोगे
       ओ सुबक-सुबककर रोने वाले
       आमड़ी लामड़ी लफा लुफुस।“
       (कनिया- पत्नी या दुल्हन)
       ***

एक पर एक ग्यारह
       नौ और दो ग्यारह
       छह और पाँच भी ग्यारह।
       खाट खड़ी और पौव्वा ढीला
       महँगाई में आटा गीला
       गेन्दा फूल है पीला पीला।
       जीवन में है पाना खोना
       महँगाई का काहे को रोना
       खाट बिछाकर चैन से सोना।
       *** 

चाँदनी रात है पीपल की छाँव है चुड़ैल भी साथ है
       भोज की बात है हड्डियों का भोजन है भूतों की बारात है
       बिना सिर का भूत है बिना धड़ का प्रेत है किसकी यह करतूत है
       चुड़ैल के दाँत हैं प्रेत के सींग हैं और भूतों की आँत है।

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दही चूड़ा सरपट, लिट्टी चोखा लटपट, गुरू चेला झटपट, सास बहू खटपट
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नहीं समझ आती एक बात, जब आँखें खुलतीं आधी रात, उछल कूद कर क्यों मचाते, पेट में चूहे उत्पात
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रामभजन की कनिया, पैरों तले दुनिया, बर्तन खड़काये झमाझम, कपड़े धोये दमादम!
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तो बताईये, कैसी रही?  
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