शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

129. "चन्द्रगौड़ा"

  
    चन्द्रगौड़ा एक छोटी-सी सन्थाली बस्ती का नाम है, मगर आजकल हमारे बरहरवा तथा आस-पास के क्षेत्रों में यह प्रसिद्ध हो गया है। कारण है- यहाँ इसाई मिशनरियों द्वारा संचालित एक अस्पताल, जो 2007 में यहाँ स्थापित हुआ था और अभी यह और भी बड़ा बनेगा।
बाकी बीमारियों के ईलाज के बारे में पता नहीं, मगर प्रसव के लिए जरुरी सारी सुविधायें यहाँ उपलब्ध हैं। डॉक्टर एवं नर्सों की संख्या भी पर्याप्त है। पूर्वोत्तर एवं दक्षिण भारत की नर्सों को यहाँ देखकर थोड़ा आश्चर्य भी हुआ- दूर-दराज के एक छोटे-से अस्पताल में रहते और काम करते हुए पता नहीं वे कैसा महसूस करती होंगी। देखने में तो सब खुश नजर आ रही थीं। जरुर इनके मन में बेबसों की "सेवा की भावना" भी होगी- सिर्फ "नौकरी" के लिए शहर/बाजार का कोई बासिन्दा शायद ऐसे पिछड़े स्थानों में रहना न चाहे।
बरहरवा से बरहेट जाते वक्त पहले "राजमहल की पहाड़ियों" की दो श्रेणियों को पार करना पड़ता है- दोनों आपस में जुड़ी हुई हैं। एक साँप-जैसी सड़क इन पहाड़ियों पर चढ़ती-उतरती है। उतरने के बाद यह सड़क चार-पाँच और भी श्रेणियों को पार करती हैं- मगर अगल-बगल से- पहाड़ियों पर बिना चढ़े। बीच में रांगा नामक एक कस्बा आता है, उसके बाद एक छोटी-सी बस्ती (नाम अभी ध्यान नहीं) के बाद एक अलग सड़क अस्पताल के लिए घूम जाती है- पहाड़ी की तलहटी से होती हुई।
पिछले दिनों कई बार वहाँ जाना हुआ। रास्ते में बहुत तस्वीरें खींची जा सकती थी, मगर मुझे लगा, इसके लिए बरसात का मौसम सही रहेगा। फिर भी, चन्द्रगौड़ा बस्ती के आस-पास में दो-चार तस्वीरें उतार ली थीं- वे ही यहाँ प्रस्तुत हैं। तस्वीर में "झोपड़ियों" की स्थिति को देखकर आप सहज ही अनुमान लगा सकेंगे हमारे देश के अन्दर दूर-दराज के इलाकों में लोग कैसा जीवन बिताते हैं... देश आजाद होने के प्रायः सात दशक बाद भी...
प्रसंगवश दो बातों का जिक्र जरुरी है।
पहली, बरहरवा भले छोटा-मोटा शहर है, मगर यहाँ चिकित्सा की कोई खास सुविधा उपलब्ध नहीं है- न सरकारी, न निजी। लोग आम तौर पर बंगाल के शहरों (मालदा, रामपुरहाट, बर्द्धमान इत्यादि) या बिहार के भागलपुर का रुख करते हैं- ईलाज के लिए। कहने को दो लेडी डॉक्टर हैं यहाँ, मगर उनकी 'ख्याति' के सामने 'सु' शब्द लगाने से लोग हिचकेंगे... । समझता हूँ, देश के ज्यादातर कस्बों-छोटे शहरों की यही कहानी होगी।

दूसरी, अक्सर सोचता हूँ, हमारे जो बड़े-बड़े तीर्थ हैं- तिरुपति, जगन्नाथपुरी, वैष्णों देवी, इत्यादि, जिनके पास अरबों-खरबों रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट पड़ी-पड़ी सड़ रही हैं, वे आखिर कब इस देश में इसाई-मिशनरियों को टक्कर देते हुए शिक्षण-संस्थानों एवं अस्पतालों की शृँखला कायम करेंगे? कभी करेंगे भी या नहीं? (ध्यान रहे- मैं दो-चार संस्थानों की बात नहीं कर रहा हूँ, एक शृँखला कायम करने की बात कर रहा हूँ।)
***
पुनश्च:
मुझे अपने स्कूटर के प्रति यहाँ आभार व्यक्त करना चाहिए- वह 'निर्जीव' है तो क्या?
यह बजाज का 4स्ट्रोक स्कूटर है- "लीजेण्ड"। नम्बर- PB56-8499पंजाब के रायकोट में रजिस्टर्ड। 1999 का स्कूटर है। उन दिनों मैं लुधियाना-रायकोट के बीच 'हलवारा' में था। (इसका नम्बर मैंने बताया न- 8499, इसे तारीख में बदलने पर बनेगा- 8-4-99 और इसे मैंने खरीदा था 5-4-1999 के दिन!) खैर। मैं इसे चलाता नहीं हूँ- पहले भी कम ही चलाता था। मगर चन्द्रगौड़ा जाते वक्त इसने आराम से पहाड़ियों को पार किया। जब मैं पीछे श्रीमतीजी और सामने अपनी भतीजी को लेकर गया था, तब भी इसने पहाड़ियों को आराम से पार किया। भले यह तेज न चलता हो, मगर वक्त पर इसने मेरा बहुत साथ निभाया। इसलिए यहाँ मैं उसके प्रति आभार व्यक्त करता हूँ... 







128. बसन्त: आस-पास




       मेरे घर के आस-पास तीन चीजें बहुत दिनों से "बसन्त" के आगमन की घोषणा कर रही थीं, मैं उन्हें देख रहा था, महसूस कर रहा रहा था, मगर कुछ कारणों से लिख नहीं पा रहा था। वे चीजें हैं- आम के मंजर, सहजन के फूल और शीशम के पत्ते।
       इस साल मंजर ज्यादा आये हैं। कहते हैं कि हर दूसरे साल ऐसा होता है। कुछ बड़े पेड़ों पर मैंने इतने मंजर देखे कि लगा पत्तियों से ज्यादा मंजर ही हैं! अभी तक दो-तीन बार बूँदा-बांदी जरुर हुई है, मगर आँधियाँ नहीं चली हैं, सो मंजर भी सारे टिके हुए हैं। अब देखा जाय, आम की पैदावार कैसी होती है।
       शाम के वक्त आम के पेड़ों के नीचे से गुजरते समर मंजर की खुशबू जब नथुनों में घुसती है, तब मैं अक्सर एक बात सोचता हूँ- कितने भाग्यशाली होंगे, जिनके नथुनों में यह खुशबू घुसती होगी? कितने ऐसे होंगे, जो घुसती हुई इस खुशबू को महसूस भी करते होंगे?
       अभी जबकि मैं यह लिख रहा हूँ, मंजरों का कैशोर्य एवं यौवन ढलान पर है, और वे परिपक्व हो रहे हैं- फल बनने के लिए...
       ***
       बहुत-से लोग शायद 'सहजन' से परिचित न हों। अँग्रेजी में जिस सब्जी का नाम Drumstick है, वही सहजन कहलाता है। अभी कुछ दिनों पहले तक सहजन के पेड़ सफेद फूलों से लदे हुए थे, अब वे भी कम हो रहे हैं- वहाँ भी फूल से फल बनने का सिलसिला शुरु हो गया है।
       एक नीम्बू का पेड़ भी है, हमारे घर के पिछवाड़े में- उसके फूल तो सारे झड़ हैं अब नन्हें-नन्हें फल दिख रहे हैं- ध्यान से देखने पर।
       ***

       शीशम के पेड़ों पर नये पत्ते आ रहे हैं.. पुराने झड़ रहे हैं...  
       इन सबके अलावे, कोयल की कूक और पपीहा की पीऊ-कहाँ भी सुनायी पड़ने लगी है... 

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

127. 'धूपची मेला'


       मेरे इस ब्लॉग में "टप्परगाड़ी" नाम का एक आलेख है, जिसमें कि "भूईंपाड़ा" मेले का जिक्र है- कि हम अपने बचपन में टप्परगाड़ी में बैठकर मेला जाया करते थे। असल में, उस गाँव का नाम भीमपाड़ा है और उस मेले का नाम "धूपची" मेला है। मेला लगता है माघ महीने के पहले रविवार को। यह सूर्य भगवान को समर्पित मेला है।
मेरा अनुमान कहता है कि माघ महीने के पहले रविवार से धूप में तेजी आती है और इस दिन के बाद से ही किसान धान को धूप दिखाना शुरु करते हैं। धूप में दो-चार दिन रखने के बाद उस धान से चावल बढ़िया बनता है- दाने टूटते नहीं हैं। तो इसलिए यह दिन सूर्य को अर्घ्य देने का एक पर्व बन गया। पर्व को मेला बनते देर नहीं लगा होगा, क्योंकि धान की फसल कटने के बाद किसानों के हाथ में थोड़े पैसे आ जाते हैं। यहाँ मेले में वे अपनी जरुरत की बहुत सारी चीजें खरीद सकते हैं।   
       इस साल 18 जनवरी को यह मेला लगा था। संयोगवश, मैं और जयचाँद वहाँ पहुँच गये। हम असल में चौलिया गाँव गये थे- लौटते वक्त मेला भी घूम लिये।
       आप भी कल्पना कीजिये एक सीधे-सादे ग्रामीण मेले में घूमने का।

       जो एक तस्वीर नहीं ले पाये, वह थी मिट्टी के अनगढ़ खिलौनों की। मैंने जयचाँद को बताया भी, पर उसने कहा कि लौटते वक्त लेंगे, फिर वह रह ही गयी। 

ये बन रहे हैं पत्थर के "सिल", जिनपर मसाला पीसा जाता है. 

मेले का केन्द्रीय हिस्सा. 

जहाँ पीपल के पेड़ पर शोले का एक मुकुट टाँगकर फलों का अर्घ्य चढ़ाया जाता है- भगवान सूर्य को. 



लकड़ी के घरेलू सामान. 

लोहे के सामान- खासकर कृषि औजार.

तफरी के लिए- चावल की शराब या ताड़ी- चखने के साथ. 

जुआ. 

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

126. बचपन




       आज का बचपन मोबाइल की भेंट चढ़ गया है। ऐसे में, जब घर के सामने कुछ बच्चे आकर खेलते और शोर मचाते हैं, तो बहुत अच्छा लगता है- कम-से-कम मुझे।
       हमारे बचपन में खेलने-कूदने का स्थान बहुत ज्यादा होता था। कभी-कभी तो चोर-सिपाही खेलने के लिए एकाध किलोमीटर खेत-खलिहान-बगान की जरुरत पड़ जाती थी। जाड़े में धान कटने के बाद खुद कुदाल उठाकर "गद्दी" के लिए मैदान बनाना हमलोगों का हर साल का काम होता था। (गद्दी चुस्ती-फुर्ती और दम-खम का जबर्दस्त खेल हुआ करता था- टीम वाला।)
       हमलोग एक तरफ क्रिकेट, वॉलीबॉल, बैडमिण्टन खेलते थे, तो दूसरी तरफ डेंगा-पानी, सतमी ताली, लुका-छिपी, बुढ़िया-कबड्डी-जैसे देशी खेल भी बहुत खेलते थे। इसके अलावे, कभी पतंग का दौर चलता था, तो कभी लट्टू का। तब न टीवी हुआ करता था, न कम्प्यूटर न मोबाइल। सो, शाम को- और छुट्टी के दिन दिन में भी- घ्रर से बाहर निकल कर खेलने के अलावे और कोई उपाय ही नहीं था समय बिताने का। हाँ, पत्र-पत्रिकायें और पुस्तकें बहुत मिला करती थीं हमें पढ़ने के लिए- नन्दन, चम्पक, बालक, बाल-भारती, पराग, मेला, चन्दामामा, गुड़िया, कुटकुट, लोटपोट, मधु मुस्कान, अमर चित्र कथायें, इन्द्रजाल कॉमिक्स, राजन-इकबाल के कारनामे वगैरह-वगैरह...
       खैर। ज्यादातर देशी खेल तो खो गये हैं। उनके बारे में लिखना भी चाहूँ, तो शायद न लिख पाऊँ। जैसे कि "ओक्का-बोक्का" ही पूरा याद नहीं आ रहा- 'ओक्का-बोक्का तीन-तिरोक्का, लोहा-लाठी चन्दन काठी, बाग में बगवन डोले, सावन में करैला फूटे..... " बाकी याद ही नहीं रहा...
       देखता हूँ कि कुछ नये खेल बच्चे खेलते हैं। यानि अगर पुराने खेल अगर खत्म हो रहे हैं, तो कुछ नये खेलों का जन्म भी हो रहा है...

       ... यानि दुनिया अभी कायम रहेगी, क्यों? जब तक इस पृथ्वी पर बच्चे खेलते-कूदते, हँसते-चहकते रहेंगे, तब तक भला कौन दुनिया को मिटा सकता है-? 
 

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

125. हिन्दी हमारी- 4



       अपने ब्लॉग के शुरुआती दिनों में मैंने "हिन्दी हमारी" शीर्षक से तीन पोस्ट लिखे थे (पोस्ट क्रमांक 8, 9 और 10)
       आज उसी में एक और कड़ी जोड़ने जा रहा हूँ। 'प्रभात खबर' के साप्ताहिक परिशिष्ट "अवसर" में आज "सुधारें हिन्दी" स्तम्भ के अन्तर्गत रवीन्द्र कुमार जी ने इसे लिखा है।
       दो उपसर्ग हैं- "अन्तर्" और "अन्तर"। अब तक मैं जानता ही नहीं था कि दोनों अलग-अलग अर्थ देते हैं! अन्तर् उपसर्ग का समानार्थी है "Intra" (इण्ट्रा), जबकि अन्तर का समानार्थी है- "Inter" (इण्टर)।  
       जब हम "अन्तर्राष्ट्रीय" लिखते हैं, तो इसका मतलब होता है- Intra-national, यानि अन्तर्देशीय, यानि देश के अन्दर! मुझे लगता है, ज्यादातर हिन्दीभाषी यह नहीं जानते हैं और इस शब्द का प्रयोग Inter-national के रुप में करते हैं
       ...जबकि International के लिए हमें लिखना है- "अन्तरराष्ट्रीय", यानि देश के बाहर
       इस प्रकार, दो अलग-अलग शब्द हैं: "अन्तर्राष्ट्रीय" और "अन्तरराष्ट्रीय"। पहले शब्द के बदले में हम चूँकि "अन्तर्देशीय" शब्द का प्रयोग कर लेते हैं, इसलिए कोई बात नहीं, मगर देश के बाहर के मामलों के लिए हमें "अन्तरराष्ट्रीय" शब्द का प्रयोग करना चाहिए, न कि "अन्तर्राष्ट्रीय" शब्द का।
       आज तक मैं भी यही गलती करता आ रहा था।

       रवीन्द्र कुमार जी तथा "प्रभात खबर" के प्रति मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।

सोमवार, 26 जनवरी 2015

124. अरे, हम तो अब भी स्मार्ट हैं(!?)


      अपनी ज्यादातर तस्वीरों में मैं बेवकूफ नजर आता हूँ, मगर फिर भी, कभी-कभी किसी तस्वीर में मैं स्मार्ट नजर आने लगता हूँ। अब इसमें कसूर पृष्ठभूमि का होता है, या पहनावे का, या फिर, छायाकार की उँगलियों का, यह नहीं पता।

       ताजमहल की पृष्ठभूमि वाली तस्वीर 1994 के आसपास की है। इसे बिनय ने खींची थी। बिनय बचपन का दोस्त है- उसे फोटोग्राफी का शौक बिलकुल नहीं है- फिर भी, उसने ऐसी शानदार और यादगार तस्वीर खींची! जाहिर है कि उन दिनों हम वाकई युवा हुआ करते थे। भारी-भरकम एक रूसी कैमरे की तस्वीर है, जिसका नाम अभी याद नहीं- कभी बक्सा खोलकर कैमरे का नाम देख लेंगे!

     बदरीनाथ की पृष्ठभूमि वाली तस्वीर प्रायः अट्ठारह साल बाद- 2012 की है। छायाकार मेरा बेटा ही है। इसी का 'क्रॉप' किया हुआ फोटो अब तक फेसबुक का प्रोफाइल फोटो बना हुआ है। यह तस्वीर 'नोकिया-5310' मॉडल की है। अब यह मोबाइल पुराना हो गया है और साफ तस्वीरें नहीं खींच पाता, मगर उन दिनों 300 रिजॉल्यूशन की बहुत ही सुन्दर तस्वीरें यह खींचता था।  


      और अब आज- 26 जनवरी 2015 की तस्वीर पेशे-खिदमत है- सरसों के खेतों के बीच की, जिसके छायाकार हैं, मित्र जयचाँद। इसी तस्वीर को देखकर मुझे अहसास हुआ कि अरे, हम तो अब भी स्मार्ट नजर आते हैं- कभी-कभार ही सही। हो सकता है, भारतीय वायु सेना वाले काले चश्मे के कारण शायद ऐसा लग रहा हो, या फिर, मुझे ही गलतफहमी हो रही हो... क्योंकि श्रीमतीजी और बेटे (18वें वर्ष में है वह) को जब यह तस्वीर दिखाकर अपने (अब भी) स्मार्ट लगने वाली बात उन्हें बतायी, तो दोनों खूब हँसे! यह तस्वीर 'HCL-ME' टैबलेट की है। यह 72 रिजॉल्यूशन की बड़ी तस्वीरें खींचता है। कभी-कभी इसकी तस्वीरों में "बारीकियाँ" नहीं उभरती- कोई कारण होगा। खैर, अब चाहे जो हो, हम तो इसी फोटो को 'क्रॉप' करके फेसबुक का प्रोफाइल फोटो बनाने जा रहे हैं,,,
...कई दिनों से इस बारे में सोच ही रहे थे हम, क्योंकि अब 2015 से फेसबुक पर राजनीतिक टीका-टिप्पणियाँ करनी नहीं हैं, तो उसी हिसाब से इसका प्रोफाइल फोटो भी बदलना चाहिए...

रविवार, 28 दिसंबर 2014

123. हजार दरवाजों वाला महल

Hajardwari, Murshidabad
       
       "हजारदुआरी" (हजारद्वारी) नामक एक महल है बंगाल के मुर्शिदाबाद शहर में, जो आस-पास के इलाकों में काफी प्रसिद्ध है। इतावली शैली में बना यह महल 1829 से 1837 के बीच बना था। बनवाया था नवाब नाज़िम हुमायूँजा ने। तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड बेण्टिक आधारशिला रखने के कार्यक्रम में उपस्थित हुए थे। महल निर्माण में खर्च आया था- 16 लाख रुपये। तब एक मजदूर की मजदूरी 5 पैसे तथा एक राजमिस्त्री की मजदूरी 2 आना (12 पैसे) हुआ करती थी! कहा जाता है कि चिनाई के वक्त कत्थे और सौंफ के पानी तथा अण्डे की जर्दी का बड़ी मात्रा में इस्तेमाल हुआ था- दीवारों को मजबूती देने के लिए। दरवाजों एवं खिड़कियों की बड़ी संख्या के कारण ही इसे हजारद्वारी कहा जाता है।
आज यह महल एक शानदार संग्रहालय है। तलवार, भाले, बन्दूक से लेकर हाथी दाँत से बने सिंहासन, पालकी, हौदे, विशालकाय तैलचित्र (यूरोपीय चित्रकारों के- रैफेल, मार्शल-जैसे नामी चित्रकारों के भी) और रोमन शैली की संगमर्मर की मूर्तियाँ यहाँ के आकर्षण है। दुमंजिले का मुख्य दरबार हॉल में लटकता विशाल झूमर महारानी विक्टोरिया का तोहफा है। झूमर से याद आया, ग्वालियर में सिंधिया के महल में शायद इससे भी बड़ा झूमर छत (बेशक, गुम्बज) से लटक रहा है, जिसका वजन गाईड ने कई टन बताया था और कहा था कि बगल के महल की छत से इस गुम्बज पर पहले हाथी चलवाये गये थे, तब जाकर झूमर को छत से लटकाया गया था!
पहले मंजिल में सीढ़ियों के पास एक विशाल मगरमच्छ की "ममी" रखी है; उसके ऊपर बहुत ही मोटे एक बाँस का टुकड़ा रखा है, और उसी के दोनों कोनों पर दो (एक में चार दर्पण) दर्पण रखे हैं, जो काफी प्रसिद्ध हैं। दर्पण में दो दर्पणों को लगभग नब्बे डिग्री पर इस तरह जोड़ा गया है कि हर व्यक्ति को आस-पास खड़े सभी संगी-साथियों के चेहरे तो दीखते हैं, मगर खुद का चेहरा कभी नहीं दीखता!
खैर, हजारदुआरी में दुमंजिले का पुस्तकालय आम लोगों के लिए बन्द है और जैसा कि गाईड बुक से पता चला, यहाँ बहुत तरह की चिड़ियों की "ममी" की भी एक गैलरी है, जो शायद फिलहाल बन्द है। पटना म्यूजियम में इस तरह की गैलरी देखा था।
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       यह मुर्शिदाबाद शहर हमारे बरहरवा से कोई ज्यादा दूर नहीं कहा जा सकता- ढाई-तीन घण्टों का रास्ता है एक तरफ से। फिर भी, मैं अभी तक नहीं जा पाया था। पूरब में बरहरवा के 20 किलोमीटर बाद से ही बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले की सीमा शुरु हो जाती है- पहला शहर फरक्का है।
       जो कोचिंग इंस्टीच्यूट हमारे घर (के एक हिस्से) में चलता है, उन्हीं का कार्यक्रम था, मुर्शिदाबाद का- बीते कल 27 दिसम्बर को। हम भी साथ हो लिये। सुबह 7 बजे से पहले तीन गाड़ियों में हमसब रवाना हुए।
       ***
       हजारद्वारी से पहले हम कटरा मस्जिद गये- रास्ते में यही पहले पड़ता था। इसे नवाब मुर्शिदकुली खाँ ने बनवाया था। मुर्शिदकुली खाँ हिन्दू (ब्राह्मण) परिवार में जन्मे थे। सम्भवतः गरीबी के कारण मुसलमान सौदागर हाजी इसपाहन के नौकर (गुलाम?) बने। वहीं उन्होंने ईस्लाम धर्म कबूला और मोहम्मद हादी बने। बाद के दिनों में उनकी योग्यता को देखते हुए बादशाह औरंगजेब ने उन्हें ढाका का दीवान नियुक्त किया- नाम दिया उनका- करतलब खाँ। राजस्व वसूली के मामले में उनका प्रदर्शन बहुत ही अच्छा था। मगर बंगाल (बिहार, उड़ीसा सहित) के गवर्नर औरंगजेब के पोते अजीमुस्सान के साथ कुछ मतभेद उभरने के कारण राजस्व विभाग के कर्मचारियों के साथ वे अपना दफ्तर 'मुकसुदाबाद' ले आये।
       दक्षिण की लड़ाईयों के बाद जब औरंगजेब का खजाना खाली हो गया था, तब करतलब खाँ ने एक करोड़ रुपये का राजस्व शाही खजाने में जमा करवाया। प्रसन्न होकर औरंगजेब ने करतलब खाँ को नाम दिया- 'मुर्शिदकुली खाँ' और बेशक, 'मुकसुदाबाद' का नया नामकरण हुआ- "मुर्शिदाबाद"! बंगाल के नवाब के रुप में उन्होंने बहुत ही योग्यतापूर्वक शासन किया- बिना किसी धार्मिक भेदभाव के।
       1725 में मृत्यु के बाद उनको उनके ही द्वारा बनवाये गये इस विशाल कटरा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे दफनाया गया- ताकि मस्जिद में नमाज पढ़ने आने वालों की पदधूलि से उनका परलौकिक जीवन धन्य हो। मृत्यु से पहले ही वे इस छोटी-सी कोठरी में रहने लगे थे। बाद के दिनों में उनकी बेटी अजिमुन्नेशा ने भी यही रास्ता अपनाया। हालाँकि अजीमुन्नेशा की बनवायी मस्जिद ध्वस्त हो गयी है- सिर्फ एक दीवार बची है। उनकी कब्र भी सीढ़ियों के नीचे ही है।
       ***
कटरा मस्जिद से हम हजारद्वारी गये। हजारद्वारी का संग्रहालय घूमने से पहले हम सबने नाश्ता किया और घूमने के बाद वहीं खाना भी खाया। गंगातट है- पिकनिक मनाने वालों की भी काफी संख्या मौजूद थी।
सामने इमामबाड़ा भी है। इसे नवाब फेरादुनजा ने 1847 में बनवाया- 6 लाख खर्च करके। हालाँकि यहाँ कभी नवाब सिराजुद्दौला ने इमामबाड़ा बनवाया था- मगर वह लकड़ी की थी और उसके ध्वस्त होने पर ही बाद में आज का इमामबाड़ा बना है। कहते हैं कि यहाँ पैगम्बर के पदचिह्न रखे हुए हैं।
***
फिर हम सबने अजीमुन्नेशा की समाधि देखी। वहाँ से नशिपुर राजबाड़ी गये। यह राजपरिवार इतिहास में बदनाम रहा है- जबरन करवसूली के कारण। इनके महल का देखा, जीर्णोद्धार चल रहा है। एक हिस्से को संग्रहालय सह कला-दीर्घा बनाने की कोशिश की जा रही है। वहाँ दो कलाकृतियाँ देखने को मिली- एक नाव और एक पालकी- अगर ये हाथी दाँत की बनी हैं, तो वाकई नायाब हैं।
पास ही में इतिहास में बदनाम जगत सेठ का भी भवन था। वहाँ हमारा जाना नहीं हुआ। पलासी की लड़ाई भारतीय इतिहास की एक दुखती रग है और जगत सेठ तथा मीर जाफर (सिराजुद्दौला के सेनापति) भारतीय "दगाबाजी" के ज्वलन्त उदाहरण हैं।
***
यूँ तो मुर्शिदाबाद तथा इसके आस-पास के क्षेत्रों में 30 से ज्यादा ऐतिहासिक स्थल हैं- कर्ण-सुवर्ण में 6ठी-7वीं सदी में बने बौद्ध स्तूपों (इनका जिक्र ह्वेनसांग के लेखों में है) के अवशेषों से लेकर कासिमबाजार में वारेन हेस्टिंग्स की पत्नी मेरी तथा शिशु कन्या एलिजाबेथ की समाधियों तक; मगर एक दिन की सैर में सब देख पाना सम्भव ही नहीं है।
हमारा अन्तिम पड़ाव था- काठगोला का बागान। दुगर परिवार द्वारा निर्मित। वे सम्भवतः राजस्थान से आये थे। साज-सजावट में राजस्थानी शैली स्पष्ट है। वे भी जैन भी रहे होंगे। सो, बावली भी है, जिसमें न केवल सुन्दर मछलियाँ हैं, बल्कि कहीं (हम देख तो नहीं पाये) मछलियों की समाधियाँ भी हैं!
दिनभर की सैर के बाद अन्तिम पड़ाव के लिए यह उपयुक्त जगह है- छोटा-सा सुन्दर महल, खुले मैदान, सुन्दर बाग, एक जैन मन्दिर और भी बहुत कुछ। गुलाबों की किस्मों का तो कोई अन्त ही नहीं था।
***
वहीं से हमारी वापसी हुई- रात नौ बजे से पहले हम अपने-अपने घरों में थे।

Imambada, Murshidabad

Hajardwari, Murshidabad



Imambada, Murshidabad

Hajardwari, Murshidabad

Katra Masjid, Murshidabad

Katra Masjid, Murshidabad

Ajimunnesha's Tomb, Murshidabad

Ajimunnesha's Tomb, Murshidabad

Nashipur Rajbadi, Murshidabad

Nashipur Rajbadi, Murshidabad

Kathgola Bagan, Murshidabad



Kathgola Bagan, Murshidabad

Kathgola Bagan, Murshidabad

Kathgola Bagan, Murshidabad

Kathgola Bagan, Murshidabad

Kathgola Bagan, Murshidabad