गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

102. पैदल


       दोपहर 12 बजे पाकुड़ स्टेशन पर पूछा- बरहरवा के लिए ट्रेन कब है? जवाब मिला- 3 बजे
       मुझे लगा 3 घण्टे बैठना मुश्किल है। और क्या पता, ट्रेन 4 बजे आये। क्योंकि इधर सवारी रेलगाड़ियाँ ऐसे ही चलती हैं- मनमतंगी। कब कहाँ कितनी देर के लिए रुक जाय, भरोसा नहीं है।
       ...और मैं पैदल चल पड़ा- रेल लाईन के किनारे-किनारे। जहाँ बगल की जमीन चलने लायक थी, जमीन पर चलता रहा।
       1 बजे तिलभिटा स्टेशन पहुँचा- करीब 10 किमी होगा। वहाँ कुछ रुककर फिर चला, तो कोटालपोखर आते-आते 2 घण्टे लग गये। कुछ तो मैं धीरे चला और शायद दूरी भी 10 किमी से ज्यादा होगी।
       कोटालपोखर में चचेरे भाईयों से मिला। बड़ी माँ के हाथ का बना स्वादिष्ट खाना भरपेट खाया।
       तब तक ट्रेन भी आ गयी।
       ट्रेन में बैठकर फिर बरहरवा आया।
       पैदल चलने के दौरान कुछ तस्वीरें ली, वे ही यहाँ पेश हैं। कुछ तस्वीरें नहीं भी लीं।  
जरा बताईये तो "सी फा" "W L" का मतलब क्या है? 

ये पुल 19वीं सदी के हैं! 



ऐसी नीली जलराशि कम ही देखने को मिलती है. 

पटरी के नीचे 'स्लीपर' देवदार के हैं- 19वीं सदी के. 

पता नहीं चल रहा है- यहाँ कुछ सारस उड़ान भर रहे थे. 

छाँव 

पता नहीं चल रहा है- लोग मछलियाँ पकड़ रहे थे. 

1870 से 90 के बीच बिछी है यह रेल लाईन. 

अब कुछ वर्षों के बाद ये पुल देखने को नहीं मिलेंगे. 


बसन्त. 

"सी.फा"= सीटी बजाओ, फाटक आगे है. (W= Whistle L= Level Crossing Ahead)
अब शायद यह 'नया' निशान है- लेवल क्रॉसिंग का. 

बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

101. "फेलू'दा"...



       फेलू'दा सीरीज के (किशोर जासूसी) उपन्यासों के समग्र का मैंने पहले अँग्रेजी अनुवाद मँगवाया था- अभिमन्यु के लिए। वह बँगला नहीं जानता। उसने अँग्रेजी अनुवाद बड़े चाव से पढ़ा। मगर मैं सत्यजीत राय साहब की इस प्रसिद्ध रचना का स्वाद मूल बँगला में ही लेना चाहता था। तब बँगला समग्र की कीमत थी- सात सौ रुपये- फ्लिपकार्ट पर। कुछ समय बाद बढ्ते-बढ़ते यह एक हजार हो गयी। तब जाकर मैंने जल्दी से मँगवाना चाहा- पता चला, बरहरवा में इसकी डिलिवरी नहीं होगी। फ्लिपकार्ट से अन्य किताबें बरहरवा आ जाती हैं- इसके लिए मना किया गया।
       अन्ततः कोलकाता में रह रहे अपने भांजे के पते पर इसे मँगवाया। वह बीते रविवार को इसे ले आया।
       ***
       लगे हाथ, एक "टैबलेट" भी मँगवा लिया गया।
       25 जनवरी हमारी सालगिरह थी। श्रीमती जी को एक बड़े स्क्रीन वाले मोबाइल की चाह थी। उसके सस्ते विकल्प के रुप में टैबलेट मँगवाया गया। यह कोलकाता तो 25 जनवरी से पहले पहुँच गया था- मगर हमें मिला 2 फरवरी को। यह भी ठीक रहा। 1996 में 25 जनवरी के दिन बसन्त पँचमी थी। इस लिहाज से, बसन्त पंचमी हमारी सालगिरह है और टैबलेट उससे पहले मिल गया।  


मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

100. "कारवाँ": बीस साल बाद...



अपनी बात

       अपनी किशोरावस्था एवं युवावस्था के दिनों में मैं कवितायें लिखा करता था। 'कविता' क्या, बस मनोभावों को सीधे-सादे ढंग से कागज पर शब्दचित्र के रुप में उतारने का प्रयास था। तब मैं अपना उपनाम "द्विरेफ" (भौंरा) लिखा करता था। भाव पहले रूमानी हुआ करते थे, बाद में धीरे-धीरे देश और समाज के प्रति सरोकार झलकने लगे थे।
       1995 में मुझे अहसास हुआ कि देश-समाज में इतनी समस्यायें हैं और मैं रूमानी कवितायें लिख रहा हूँ! यह अहसास जागने के बाद मैंने देश-समाज की समस्याओं का अध्ययन करते हुए उनके समाधानों के बारे में लिखना शुरु किया। तब मुझे लगा कि किसी को भी अलविदा कहने का एक खास सलीका तो होना ही चाहिए। और फिर, अपनी कविताओं को एकत्र कर मैंने उसे एक कविता संग्रह के रुप में छपवा लिया- बेशक, "कारवाँ" नाम से। उन दिनों मैं ग्वालियर में था। वहीं इसे प्रकाशित करवाया।  ...इस प्रकार रूमानी कल्पनालोक, "द्विरेफ" उपनाम तथा कविता को मैंने अलविदा कहा और यथार्थ के धरातल पर उतरकर "शेखर" उपनाम के साथ मैं खुशहाल भारत के निर्माण का खाका बनाने लगा। ("खुशहाल भारत" भी प्रकाशित है।)
       तब "कारवाँ" को मैंने अपने बचपन के दोस्त रंजीत को अर्पित किया था। उसकी भूमिका में मैंने मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शेर को उद्धृत किया था: "दर्दे-दिल लिखूँ कब तक, जाऊँ उनको दिखला दूँ; उँगलियाँ फिग़ार अपनी, ख़ामा खूंचकां अपना।" (फिगार- घायल, खामा- कलम, खूंचकां- जिससे खून टपकता हो)
       ***
       आज लगभग बीस वर्षों के बाद उसी "कारवाँ" को फिर से प्रकाशित करवा रहा हूँ। इस बार मैंने बँगला कवि सुकान्तो भट्टाचार्य की सात कविताओं के हिन्दी अनुवाद तथा मिर्ज़ा ग़ालिब के कुछ चुनिन्दा शेरों पर आधारित एक काल्पनिक कहानी को भी इसमें जोड़ दिया है। ये भी मेरी उन्हीं दिनों की रचनायें हैं।   
       कहते हैं कि किशोरावस्था ही वह कालखण्ड होता है, जब मनुष्य के मन में प्रेम या घृणा, दोनों में किसी एक भाव का अंकुरण होता है और उसके कदम सृजन या विध्वंस, दोनों में से किसी एक रास्ते पर चल पड़ते हैं। अगर किसी के मन में प्रेम का भाव अंकुरित करने और उसके कदमों को सृजन के रास्ते पर चला पाने में ये शब्दचित्र सफल होते हैं, तो मुझे सन्तोष होगा कि उन दिनों मैंने कुछ निरर्थक नहीं लिखा था!
       इति-

बसन्त पँचमी' 2014                                    जयदीप शेखर   
 *** 
उपर्युक्त आलेख दरअसल भूमिका है "कारवाँ" की. पुस्तक नेट पर यहाँ उपलब्ध है. 
*** 
"कारवाँ", 20 साल पहले- 



रविवार, 5 जनवरी 2014

99. "तन्वी"





       छायाचित्र में मेरी यह साइकिल पुरानी ही है- करीब 17 साल पुरानी। 'हीरो-एस.एल.आर.' है। वायुसेना स्थल, हलवारा में रहते हुए इसे खरीदा था। साइकिल खरीदी लुधियाना में और नयी साइकिल को चलाकर ही 30 या 40 किमी दूर हलवारा आ गया था। (दरअसल 'पोस्टिंग रन' का सिविलियन एम.टी.डी. साइकिल को गाड़ी में रखने के अनुरोध पर भाव खा रहा था, जो मुझे पसन्द नहीं आया था।)
       पिछले साल इसे रंग करवाया था- अररिया में। अभी पिछले हफ्ते इसका कायाकल्प करवाया। ('कायाकल्प' बोले तो 'ओवरहॉलिंग'। साइकिल-मैकेनिकों की बोली में- 'वॉयलिंग'।) अब इसकी चाल मस्त हो गयी है। पिछले करीब दो महीनों से रोज 20 किमी साइकिल चला रहा हूँ- 10 किमी सुबह, 10 शाम।*
इस साइकिल को कोई नाम मैंने नहीं दिया है; अगर दिया होता, तो वह बेशक, "तन्वी-2" होता। ...
       ***
       ...क्योंकि "तन्वी" मेरी पहली साइकिल का नाम था। यह 1987 की बात है- तब मैं वायुसेना स्थल, आवडी में था- पहली पोस्टिंग पर। वहीं सी.एस.डी. कैण्टीन से इस 'बी.एस.ए.-एस.एल.आर.' साइकिल को खरीदा था। बेचारी परित्यक्ता की तरह पड़ी थी- कोई इसे खरीदने वाला नहीं था- क्योंकि इसका रंग सिल्वर था। एक तो मुझे यह साइकिल पसन्द आयी, दूसरी बात, कैण्टीन में उस वक्त कोई और साइकिल थी भी नहीं। सो, मैंने इसे लिया और इसका नाम रखा- "तन्वी"। पूरे परिसर में यह अकेली सिल्वर रंग की साइकिल थी और ज्यादातर लोग जान गये थे कि इसका नाम "तन्वी" है- जो इसके चैन-कवर पर मैंने लिख रखा था!
मैं कभी-कभी शाम को साइकिल चलाकर 7 किमी दूर आवडी जाया करता था और वहाँ 'उडुपी श्रीनिवासन' में एक चाय पीकर लौट आता था। स्टील की कटोरी में स्टील का गिलास होता था और गिलास में चाय। इसे कटोरी में डालकर पहले थोड़ा मिलाना होता था- चीनी को घोलने के लिए। कईबार दोसा खाया करता था वहाँ- बाल्टियों में साँबर और चटनी रखी होती थी- जितना भी माँग लो!
कोई पूछता कि चाय पीने के लिए 7 किलोमीटर-?, तो मेरा जवाब होता- मकसद या मंजिल 'चाय' नहीं, बल्कि 7-7 किमी का 'सफर' है।   
       "तन्वी" मेरे साथ-साथ पूना, ग्वालियर, इलाहाबाद, तेजपुर और हलवारा में भी रही। पूना और इलाहाबाद में मैं तैराकी के शिविरों में जाता था और साइकिल भी बुक करवा लेता था। ग्वालियर, तेजपुर और हलवारा में मैं पोस्टेड रहा।
ग्वालियर में मैं शाम को साइकिल चलाकर मोरार जाया करता था- चाय पीने। ठीक से याद नहीं, पर यह भी 7 किमी ही दूर है शायद वायुसेना स्थल (महाराजपुर) से। कुछ महीनों तक मैं 14 किमी दूर ठाटीपुर भी गया- वायलिन सीखने के लिए।
ग्वालियर में ही मैंने तन्वी को दुबारा रँगवा लिया था- लाल रंग में। (बताया गया कि साइकिल में दूसरी बार दो ही रंग हो सकते हैं- काला या लाल।) इसी साइकिल से मैंने 8 दिनों की साइकिल यात्रा भी की थी- ग्वालियर से खजुराहो तक की- इसकी पूरी डायरी मैंने लिख रखी है: http://ek-cycle-yatra.webnode.com/
तेजपुर (आसाम) से हलवारा (पंजाब) मेरा घरेलू सामान देर से पहुँचा था, सो गृहस्थी के दूसरे सामान के साथ नयी साइकिल भी लेनी पड़ी थी। इस प्रकार, हलवारा में मेरे पास दो साइकिल हो गयी। अक्सर मैं और अंशु एक-एक साइकिल लेकर निकल पड़ते थे।
       बाद में मैं "तन्वी" को घर ले आया था। यहाँ ठीक से उसकी कद्र नहीं हो पायी और फिलहाल एक कबाड़ के रुप में वह स्टोर के टाँड पर उल्टी पड़ी हुई है।
       लगे हाथ, "तन्वी" की भी एक तस्वीर साझा कर ही दूँ। इस तस्वीर में मुझे खाकी वर्दी में देखकर कोई चौंक सकता है, सो, बता दूँ कि पहले भारतीय वायु सेना की वर्दी खाकी ही हुआ करती थी।

       ***
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बात निकलती है, तो...
*      सही है कि साइकिल चलाना मेरा शौक है; 'फ्री हैण्ड एक्सरसाइज' करना भी मेरा शौक है, जो जाड़ों में बन्द हो जाता है। ऐसे में, जाड़े में अगर मुझे 20 किमी रोज साइकिल चलाना पड़े, तो मेरे लिए यह एक्सरसाइज ही हुआ। मगर यहाँ मैं सिर्फ शौक या वर्जिश के लिए साइकिल नहीं चला रहा हूँ।
संक्षेप में बता दूँ कि वायुसेना से रिटायर होने के बाद मैं एक अर्द्धसरकारी संस्था में हूँ। 5 साल मैंने बिहार के अररिया शहर में बिताया। अब 'घर की पोस्टिंग' के नाम पर मेरा तबादला बरहरवा से 80 किमी दूर एक स्थान में हुआ है। सुबह 7 बजे रवाना होता हूँ और रात 8 बजे के बाद घर लौटता हूँ- यानि सोने के लिए घर आता हूँ! 70 किमी की दूरी ट्रेन से तय करता हूँ। जाहिर है, सुबह 7 बजे से पहले मैं तैयार हो जाता हूँ ट्रेन का यह सफर 'राजमहल की पहाड़ियों' के किनारे-किनारे से गुजरता है। चूँकि बचपन से मुझे शौक था ट्रेन की खिड़की से इन पहाड़ियों को निहारने का, शायद इसीलिए मेरी संस्था ने मुझे ऐसी जगह पोस्टिंग दी- कि लो बेटे, जी भर के निहारो, अपनी पहाड़ियों को! खैर, बाकी 10 किमी सड़क का सफर है, जिसमें से 4 किमी सड़क के किनारे पत्थर के खदानों तथा 'क्रशरों' की भरमार है। रोज सैकड़ों 'ओवरलोडेड' ट्रक पत्थर लेकर यहाँ से रवाना होते हैं। सैकड़ों ट्रैक्टर भी इधर-उधर भागते रहते हैं। व्यवसाय का ज्यादातर हिस्सा अवैध है- 'हफ्ते' के बल पर चलता है- इसलिए 24 में 12 घण्टे इस जगह 'जाम' लगा ही रहता है। जाम की समस्या बीते नवम्बर से विकराल हुई, जब एक अतिरिक्त रास्ते को उधर के गाँववालों ने बन्द कर दिया। एक महिला की मृत्यु ट्रक के टक्कर से हो गयी थी। जाम में एक दिन फँसते ही अगले दिन मैं अपनी साइकिल को यहाँ (ट्रेन में बुक करके) ले आया था। कई बार साइकिल के कारण ही मैं जाम से सकुशल निकल पाया हूँ। दुःख तो तब होता है, जब देखता हूँ कि स्थानीय लोग इस जाम से प्रसन्न होते हैं कि हाँ, धन्धा अच्छा चल रहा है। जाम न लगे, तो लोग दुःखी हो जाते हैं कि मन्दी चल रही है- जैसा कि बरसात में हुआ था!
       ***** 

रविवार, 15 दिसंबर 2013

98. चौलिया



       पिछले- नवान्न वाले पोस्ट में- नये चावल का जिक्र आया था। यह नया चावल हमारे घर में चौलिया गाँव से आता है। यह हमारा पैतृक गाँव है। बरहरवा से कुछ ही किलोमीटर दूर है।
आज क्या मन में आया, हम सबने चौलिया चलने का कार्यक्रम बना लिया
       एक जुगाड़ किराये पर लेकर हम रवाना भी हो गये। 'जुगाड़' को यहाँ 'भुटभुटिया' कहते हैं।
       बरहरवा से बाहर निकलते ही सुन्दर तालाब दीखने लगे।
एक खलिहान में धान की पिटाई का कार्य चल रहा था- पिटाई हो चुकी थी- उसके बाद का कार्य चल रहा था। एक व्यक्ति एक परात-जैसे सूफ में पिटा हुआ धान बीच में लहरा कर फेंक रहा था और उस ढेर के चारों तरफ खड़ी 7-8 महिलायें तुरन्त सूफ से हवा करके धान में से 'पतान' (धान के साथ आ जाने वाले 'पुआल' और बिना चावल वाले धान को) को उड़ाकर अलग कर रही थीं। ऐसा करते हुए वे दो-तीन कदम चलते भी थे- यानि धान की ढेर के चारों तरफ वे परिक्रमा कर रहे थे। थोड़ी धूल भी साथ में उड़ती थी- इसलिए महिलाओं ने आधे चेहरे को कपड़े से ढाँप रखा था- ताकि नाक में धूल न जाये। दृश्य जबर्दस्त था- तस्वीर खींचने के लिहाज से- खासकर, विडियोग्राफी के लिहाज से। मगर भुटभुटिया रुकवाकर मैं फोटो खींचने लगूँ- यह एक अटपटी बात होती। खैर। किसी जमाने में हमारे घर के आस-पास ही तीन-चार खलिहान बना करते थे- बचपन में हमलोग बैठकर पूरी प्रक्रिया देखते थे। अब कहाँ?
सड़क फिर से निर्माणाधीन है- इस बार चौड़ी सड़क बन रही है। हिचकोले खाते हुए हम आधे घण्टे में चौलिया पहुँच गये।
 करीब तीन घण्टे गाँव में बिताकर, परिचितों, रिश्तेदारों, भागीदारों से मिलकर और चाची के यहाँ खाना खाकर हमलोग करीब साढ़े तीन बजे गाँव से निकले। (इस ब्लॉग के 2रे पोस्ट 'चरक मेला' तथा 5वे पोस्ट 'टप्परगाड़ी' में चाची का जिक्र है।)
कच्ची सड़क छोड़कर हम खेतों से चलते हुए रेलवे के 'लूप लिंक केबिन' की ओर बढ़ गये। खेतों के ज्यादातर धान कट चुके थे। यहाँ रेल ट्रैक का एक लूप बनता है- यह लूप बरहरवा से फरक्का और पाकुड़ जाने वाले रेल ट्रैक को जोड़ता है। इस केबिन पर कुछ सवारी रेलगाड़ियाँ रुकती हैं- हमें 'अप बरौनी पैसेन्जर' पकड़नी थी।
चालीस मिनट चलकर हम केबिन पहुँचे। यहाँ भी करीब चालिस मिनट इन्तजार करने के बाद ट्रेन आयी। कुल पाँच मिनट की यात्रा के बाद हम बरहरवा में थे!     


















गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

97. नवान्न


       पंजाब में गेहूँ की फसल कटने के बाद "बैशाखी" (बैशाख महीने में) मनाया जाता है- यह तो सब जानते हैं; मगर बंगाल में धान की फसल कटने के बाद "नवान्न" मनाया जाता है (अग्रहायण- मार्गशीर्ष- अगहन महीने में)- यह बहुतों को नहीं पता होगा
हमारा परिवार बँगलाभाषी है- भले अगली पीढ़ी हिन्दीभाषी बन चुकी है- इसलिए आज भी हमारे यहाँ नवान्न मनाया जाता है
थोड़े-से नये धान को ओखली में कूटकर चावल बनाया जा चुका है- इसका प्रसाद बनेगा- इसमें केला, गुड़ इत्यादि मिलाकर
एक दूसरा प्रसाद भी बनेगा- नये चावल के आटे का पहले यह आटा भी हमलोग खुद बनाते थे- ओखली में कूटकर- इसमें समय लगता था सुबह 8-9 बजे से ही प्रक्रिया शुरु हो जाती थी अब मिल से नये चावल का आटा बनवा लिया जाता है ओखली भी पुरानी हो गयी है उस आटे में दूध, केला, गुड़, किशमिश, नारियल गिरी इत्यादि मिलाकर प्रसाद बनाया जा रहा है बबलू (छोटा भाई) इस काम में लगा है माँ बैठी है पास में
अब नये चावल का चूड़ा खाया जायेगा दही और गुड़ के साथ- बेशक, केले के पत्ते पर
हालाँकि अब गुड़ में पहले वाला स्वाद नहीं है
रात नये चावल का भात बनेगा और बनेगी 7 तरह की सब्जियाँ! कभी 14 सब्जियाँ भी बना करती थीं- जब पहाड़ (बिन्दुवासिनी पहाड़) के "झाजी काकू" आया करते थे वे गिन-गिन कर सब्जियाँ खाते थे
मिट्टी की छोटी-सी कोठी में थोड़ा-सा नया चावल रखा जायेगा, जो अब अगले नवान्न में ही निकलेगा और भी कुछ रिवाज होंगे, तो मैं ठीक से नहीं जानता हमें तो बस दही-चूड़ा खाने से मतलब है
यह और बात है कि अब हमारे बच्चे दही-चूड़ा खाने में रुची नहीं दिखाते...







शनिवार, 7 दिसंबर 2013

96. हाथ के बुने स्वेटर





       दो साल पहले यह हाफ स्वेटर बुना था श्रीमतीजी, यानि अंशु ने। कोटालपोखर के चचेरे भाई की शादी में इसी हाफ स्वेटर को मैंने पहन रखा था। पिताजी ने इसकी प्रशंसा की थी और बधाई देने के अन्दाज में अंशु से पूछा था- तुमने बुना है यह स्वेटर?
       आज इसे पहनकर दफ्तर गया था। ट्रेन से उतरकर जहाँ चाय पीता हूँ, वहाँ दो लोगों ने इसकी तारीफ की। दफ्तर में बॉस ने तारीफ की। बाद में तीन-चार और लोगों ने तारीफ की। मेरी समझ में नहीं आया कि इस स्वेटर में खास क्या है?
       घर लौटकर पूछा- इसमें खास क्या है? अंशु का कहना था इसका रंग-संयोजन बढ़िया है और अपनी मर्जी से जो डिजाइन मैंने बना दी है, वह भी बढ़िया है। मैंने कहा- बाद में मुँह-हाथ धोया जायेगा- पहले एक तस्वीर खींच ली जाय!
       ***
       सच पूछिये, तो मैं अपने-आप को भाग्यशाली मानता हूँ कि होश सम्भालने से लेकर अब तक मैं हाथ के बुने स्वेटर ही पहनता आया हूँ। पहले माँ बुनती थी, फिर दोनों दीदी और अब पत्नी। कुछ स्वेटर चाची ने भी बुने थे। मेरा मानना है कि हाथ के बुने स्वेटर पहनने का मतलब है- दुनिया में कोई तो है, जो आपकी परवाह करता है! यह सिर्फ ऊन का वस्त्र नहीं होता, इसमें किसी की ममता, किसी का अपनापन, किसी का प्यार, किसी की शुभकामना रची-बसी होती है...
       अंशु ने मेरे लिए जो स्वेटर बुने हैं, उनमें से कुछ के डिजाइन लीक से हटकर हैं और उन्हें प्रशंसा भी बहुत मिली है।
      

***

      मगर हर कोई इनका महत्व नहीं समझता। अभी बीते नवम्बर के तीसरे हफ्ते में मैं करनाल में था। एक खुले रिसोर्ट में विवाह समारोह था। बहुत ही सुन्दर और नया एक फुल स्वेटर मैंने पहन रखा था- क्रीम रंग का। बेशक, अंशु का बुना हुआ। दो-ढाई बजे रात के आस-पास ठण्ड के कारण मैंने एक ऊनी टोपी पहन ली थी। बेशक टोपी रेडीमेड थी और अच्छी थी।
       शादियों में लोग 'सूट' पहनते ही हैं। एक सूटधारी मेहमान ने मुझे स्वेटर में देखकर रिसोर्ट का कोई स्टाफ समझने की भूल की। मैंने हँसकर उन्हें समझा दिया। मुझे जरा भी बुरा नहीं लगा। मुझे लगा, आडम्बर से परहेज करने वालों के साथ ऐसा होना स्वाभाविक है।
       मुझे महापुरुषों के दो प्रसंग याद आ गये। एक पार्टी में पहुँचे जॉर्ज बरनार्ड शॉ को मेजबान ने 'पार्टी वियर' में आने को कहा। दुबारा पार्टी में आने के बाद शॉ खाने की चीजों को सूट पर लगाने लगे। पूछने पर बताया- मुझे नहीं, मेरे कपड़ों को पार्टी में आमंत्रित किया गया है, इसलिए....
       दूसरी घटना जरा मार्मिक है। रात डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इलाहाबाद के आनन्द भवन में पहुँचे। आजादी से पहले की बात है। नेहरूजी सो चुके थे। सीधे-सरल डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को नौकरों ने मामूली गँवई समझा और बरामदे पर रात गुजारने को कह दिया। दमा की शिकायत थी। बड़े कष्ट से उन्होंने बरामदे पर जाड़े की वह रात बिताई। सुबह नेहरूजी उन्हें देखकर अवाक् रह गये- सोचिये कितना शर्मिन्दा हुए होंगे वे...
       ***
       एक और बात बाद में याद आयी। अगाथा क्रिस्टी ने अपनी आत्मकथा में जिक्र किया है। क्रिस्टी को सम्मानित करने के लिए एक आयोजन किया गया था। जब क्रिस्टी वहाँ पहुँची, तो गेट पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने "आमंत्रणपत्र" दिखाने को कहा। क्रिस्टी आमंत्रणपत्र साथ लाना भूल गयी थीं। वे शर्मिन्दा होकर इधर-उधर टहलने लगीं। कुछ देर बाद किसी ने उन्हें देखा, तब उन्हें सम्मान के साथ अन्दर ले जाया गया। इस घटना का जिक्र सुनकर अगाथा की बेटी ने कहा- आखिर आपने क्यों नहीं कहा कि आपही अगाथा क्रिस्टी हैं और आपही को सम्मानित करने के लिए यह आयोजन किया जा रहा है? बेटी का कहना था- अगर मैं होती, तो जोर-शोर से प्रचार करती कि मैं ही अगाथा क्रिस्टी हूँ जासूसी उपन्यासों की महान लेखिका!
       मगर क्रिस्टी ऐसा नहीं कर पायीं। सोचिये, कि अगर क्रिस्टी ने अपना परिचय दे दिया होता और जवाब में सुरक्षाकर्मी व्यंग्य से मुस्कुरा देता, तो उनपर क्या गुजरती?
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अन्त में एक दूसरी बात।
अँग्रेजी में "sweat" माने पसीना होता है और हिन्दी (संस्कृत) में "स्वेद" माने पसीना होता है। शरीर से पसीना निकालने की क्षमता रखने वाले वस्त्र को अगर अँग्रेजी में अगर "sweater" कह सकते हैं, तो हिन्दी में इसे "स्वेदर" क्यों नहीं कहा जा सकता?
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दिसम्बर'2015
यह अंशु की नवीनतम कृति है-   हालाँकि पिछले साल की-