मंगलवार, 28 अगस्त 2012

‘होम सिकनेस’



      कई महीने हो गये, मनिहारी घाट पर चने की सब्जी के साथ मैदे की गर्मा-गर्म नर्म कचौड़ियाँ खाये हुए, जो मेरे बेटे तथा श्रीमतीजी को खासतौर पर पसन्द है। घाट पर नाश्ते की ये दूकानें फूस की छोटी-बड़ी झोपड़ियों में चलती हैं, जिन्हें गंगाजी के घटते-बढ़ते जलस्तर के हिसाब से अक्सर आगे-पीछे खिसकाना पड़ता है। इस घाट पर आते ही- अगर मौसम साफ हुआ, तो- गंगाजी के उस पार राजमहल की नीली पहाड़ियों की एक शृँखला दीखने लगती है तथा उसपार के भोजपुरी बोलते लोग भी मिलने लगते हैं... और मुझे लगता है- हाँ, मैं बस अपने इलाके में पहुँचने ही वाला हूँ...!
      कई महीने हो गये, स्टीमर की छत पर खड़े होकर हवा खाते हुए गंगाजी की लहरों को पार किये हुए। इन स्टीमरों को यहाँ लॉन्च कहते हैं। दो बड़े स्टीमर भी हैं, जिन्हें एल.सी.टी. कहते हैं और जिनकी डेक पर एक-दो नहीं, नौ-नौ ट्रक सवार होते हैं- झारखण्ड से पत्थर लाने वाले। वैसे, इस डेक पर ट्रैक्टर, सूमो-बोलेरो, बाईक से लेकर गाय-भैंस तक को गंगा पार कराया जाता है।
      कई महीने हो गये, साहेबगंज रेलवे स्टेशन के फर्श पर अखबार बिछाकर बैठकर अपनी पैसेन्जर ट्रेन का घण्टों इन्तजार किये हुए। कभी-कभी पास के मन्दिर में हम जाते हैं- ताजे पानी के लिए। इस दौरान कभी छोले, कभी मसाला-मूढ़ी, कभी झूरी (यह गुड़ से बनी देहाती मिठाई है, सिर्फ मैं ही खाता हूँ- बेटा और श्रीमतीजी नहीं), तो कभी पपीते के मुरब्बे का दौर चलता रहता है; या फिर, बेमकसद हम प्लेटफार्म पर टहलते रहते हैं।
      कई महीने हो गये, अपने इलाके की सवारी रेलगाड़ियों में सफर किये हुए, जो 50-60 किलोमीटर की दूरी ढाई-तीन घण्टे में पूरा करती हैं- एकदम अलमस्त अन्दाज में- जब मन किया चल पड़ी, जहाँ मन किया ठहर गयी...!
      कई महीने हो गये, राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी पर बसे छोटे-छोटे स्टेशनों से गुजरे हुए, जिनके आस-पास सन्थालों, पहाड़िया लोगों तथा अन्य सीधे-सादे लोगों की बस्तियाँ बसी होती हैं और जहाँ से गुजरते वक्त मुझे अक्सर यह महसूस होता है कि काश, ऐसे किसी स्टेशन पर मैं एक पूरी दुपहर और शाम गुजारुँ- झोपड़ीनुमा दूकान की बेंच पर बैठकर मूढ़ी, आलूदम, चॉप, प्याँजी खाते हुए... और जब पहाड़ियों के पीछे सूरज डूबने लगे, तब कोई ट्रेन पकड़कर घर लौट जाऊँ। और हाँ, अभी बरसात के बाद वाले भादों के इस महीने में न केवल पहाड़ियाँ और तलहटी हरी-भरी हो रही होंगी, बल्कि खेत भी धान के पौधों से लहलहा रहे होंगे।
       कई महीने हो गये, अपने घर के आँगन तथा पिछवाड़े को देखे हुए, जिसका चप्पा-चप्पा अभी हरा-भरा हो रहा होगा...! अभी शायद गुड़ तथा तीसी न मिले, सो हो सकता है कि माँ खोये का ही पीठा बनाये किसी दिन मेरे लिए!
      कई महीने हो गये, अपने लंगोटिया दोस्त रंजीत की दूकान की सीढ़ियों पर फूँक से धूल साफ करके बैठे हुए और कभी-कभार उत्तम तथा कुछ अन्य दोस्तों और आस-पास के परिचितों के साथ गप्पे हाँके हुए।
      हिसाब लगाता हूँ, तो पाता हूँ कि पाँच महीने हो गये हैं। पिछली बार होली में घर गया था, जब आम के पेड़ ही नहीं, आदमी भी बौराये हुए होते हैं। हवाओं में मादक खुशबू और दिशाओं में अलमस्ती छाई हुई होती है। इसबार जयचाँद राजमहल की पहाड़ी के अपने पसन्दीदा ‘स्पॉट’ पर मुझे रात में ले गया था- चाँदनी रात थी बेशक। उसने कहा भी था- कभी बरसात में यहाँ आईये, फिर देखिये...!
      कहाँ, बरसात तो बीत चला! अब भी थोड़ा समय बचा है... मैं ‘होम-सिकनेस’ महसूस कर रहा हूँ... जल्दी ही घर जाने की योजना बनानी पड़ेगी..... 

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

स्याही वाला कलम




      बैंक में अपनी शाखा के काउण्टर पर मुझे स्याही वाले कलम से काम करते देख कई लोग आश्चर्य व्यक्त करते हैं- ‘आप अभी तक इस कलम का इस्तेमाल करते हैं?’ या फिर- ‘स्कूल के बाद पहली बार इस कलम को देख रहे हैं!’
      चार वर्षों में अब तक दो ही व्यक्तियों ने स्वीकार किया है कि वे भी स्याही वाला कलम चलाते हैं
      वायु सेना के दिनों में भी मैं एक स्याही वाला कलम हमेशा अपने साथ रखता था। वहाँ उन दिनों चूँकि ज्यादातर काम की ‘कार्बन प्रतिलिपियाँ’ बना करती थीं, इसलिए स्याही वाले कलम का इस्तेमाल कम होता था; फिर भी, मैं उसे रखता जरुर था।
      घर पर तो लिखने का काम मैं प्रायः स्याही वाले कलम से ही करता हूँ।
      लोग इस बात पर आश्चर्य करते हैं कि मैं आज भी स्याही वाला कलम चलाता हूँ; जबकि मुझे आश्चर्य इस बात का है कि लोग स्याही वाला कलम चलाते क्यों नहीं? कलम मिलता है, स्याही मिलती है, निब तथा ड्रॉपर भी मिलते हैं, फिर इसका इस्तेमाल हम क्यों न करें? यह किसी भी ‘रिफिल’ से सस्ता भी पड़ता है।
      ***
      कुछ महीनों पहले एक बुक डिपो के मालिक ने बैंक में मुझे सूचित किया- ‘कुछ नये फाउण्टेन पेन आये हुए हैं, आकर देख लीजियेगा।’ मैं बाद में कभी दूकान पर गया, तो पाया दक्षिण भारत की मशहूर कम्पनी ‘Chelpark’ ने दो नये स्याही वाले कलम बनाये हैं- एक का नाम था- ‘Commander’ और दूसरे का- ‘Terminator’। ‘कमाण्डर’ बड़ा कलम था, तो ‘टर्मिनेटर’ स्लिम। दोनों कलम आकर्षक थे। अब तक इस कम्पनी के स्याही का ही मैंने इस्तेमाल किया था।  
      मैंने दोनों मॉडल के एक-एक कलम लिये। ‘कमाण्डर’ के पैसे वाइजुल साहब (दूकान के मालिक, उनका अपना प्रेस भी है) ने नहीं लिये- बोले, ‘यह हमारी तरफ से है।’ यह शायद जनवरी माह की बात है। प्रायः डेढ़ महीने बाद जब मेरी पुस्तक नाज़-ए-हिन्द सुभाष छपी, तो इसी ‘कमाण्डर’ कलम से हस्ताक्षर करके मैंने वाइजुल साहब को पुस्तक की एक प्रति भेंट की।
      ‘टर्मिनेटर’ मैंने अभिमन्यु (मेरे बेटे) को दे दी।   
‘कमाण्डर’ ने कुछ दिनों तक तो परेशान किया- निब के पास से स्याही रिसती थी, मगर बाद में यह शिकायत दूर हो गयी। अब सोच रहा हूँ इस मॉडल के कुछ और कलम खरीद कर रख ही लूँ।
इसके पहले मैंने एक दूकान से ‘फ्लोरा’ के पाँच कलम खरीद कर रख लिये थे, एक जगह निब मिली, तो दर्जन भर निब ले लिया था। इसी प्रकार, चार-पाँच ड्रॉपर भी लेकर रख लिये हैं। हाँ स्याही जब खत्म होती है, तब दो दवात ले आता हूँ- वैसे आप समझ सकते हैं- स्याही खरीदने की नौबत भी बहुत दिनों के बाद ही आती है।  

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

'काला धागा'


कल सुबह जब मैं दीदी के पास राखी बँधवाने बैठ गया, तब मेरा ध्यान गया कि मेरी दाहिनी कलाई पर एक काला धागा बँधा हुआ है। इस ‘काले’ धागे के रहते राखी बँधवाते मुझे ठीक नहीं लगा और मैंने भगनी से एक कैंची मँगवाकर उसे काट दिया।
      इस धागे को मैंने पिछले साल अगस्त में बाँधा था- अन्ना के आन्दोलन के दौरान। चूँकि मैं सक्रिय रुप से आन्दोलन में शामिल नहीं था, अतः मैं दिनभर का उपवास रखता था और ‘कु’व्यवस्था के प्रति विरोध के प्रतीक के रुप में मैंने एक काला धागा कलाई पर बाँध लिया था।
      अन्ना का अनशन समाप्त होने पर भी इस धागे को मैंने नहीं काटा था- सोचा, जब संसद लोकपाल का गठन कर देगी, तब इसे काटूँगा।
      इसके बाद मुम्बई में अन्ना का एक आन्दोलन हुआ, पर पता नहीं क्यों, मेरी अन्तरात्मा ने उन्हें ‘नैतिक समर्थन’ देने के लिए मुझे नहीं कहा। फिर राजघाट पर एक दिन का अनशन हुआ और अभी आज जन्तर-मन्तर पर अनशन-आन्दोलन समाप्त हुआ- मेरी अन्तरात्मा की तरफ से कोई आवाज नहीं आई कि मैं भी उपवास रखूँ या उन्हें नैतिक समर्थन देते हुए ब्लॉग/फेसबुक पर कुछ लिखूँ।
      अब मैं यह सोचकर आश्चर्य-चकित हो रहा हूँ कि जिस वक्त मैं अपनी कलाई के उस काले धागे को काट रहा था- ठीक उसी वक्त टीम अन्ना की कोर-कमिटी अनशन-आन्दोलन की राह छोड़कर ‘राजनीति में उतरने’ के लिए अन्तिम निर्णय ले रही होगी! यानि मेरी अन्तरात्मा ने बिलकुल सही समय पर उस काले धागे को हटवा दिया।
      आशा करता हूँ कि मेरी अन्तरात्मा या मेरी छठी इन्द्रिय आगे भी इसी प्रकार मुझे सही निर्णय लेने में सहायता करती रहेगी... 

बुधवार, 25 जुलाई 2012

“बोल बम”


शिवगादी गुफा, यानि 'गजेश्वरधाम' का तोरणद्वार 

      बरहरवा से राजमहल कोई 30 किलोमीटर दूर है। सावन के किसी एक सोमवार को हम वहाँ से गंगाजल लाकर बरहरवा के विन्दुवासिनी पहाड़ पर शिवलिंग पर जल चढ़ाते थे। यह रात की काँवड़-यात्रा होती थी। इसके लिए रविवार को शाम की ट्रेन से बरहरवा से बच्चों, किशोरों, युवाओं की टोलियाँ रवाना हो जाती थीं। राजमहल जाने के लिए तीनपहाड़ स्टेशन पर ट्रेन बदलनी पड़ती है। तीनपहाड़-राजमहल के बीच एक शटल ट्रेन चलती है।
      राजमहल पहुँचकर सभी रात होने तक इधर-उधर घूमते-फिरते थे और फिल्म देखते थे। चूँकि हमारा ननिहाल वहाँ है, इसलिए हम (यानि मैं और मेरे बड़े भाई) एकबार नानी से मिल आते थे।
      रात में गंगाजी में डुबकी लगाकर, काँवड़ में जल लेकर बोल-बम के नारों के साथ एक-के-बाद जत्थे रवाना होने लगते थे। अक्सर रात में बारिश या बूँदा-बाँदी होती रहती थी। मगर सभी लोग पूरे जोश के साथ भोले बाबा- पार करेगा, कांटा-कंकड़- पार करेगा-जैसे नारों के साथ आगे बढ़ते रहते थे। रास्ते में छह-सात छोटी-बड़ी बस्तियाँ पड़ती थीं, जहाँ हम सुस्ताते भी थे। मगर वे बस्तियाँ सुनसान रहती थीं, क्योंकि यह मध्यरात्रि का समय होता था। ज्यादातर समय सड़क के दोनों तरफ बस खेत होते थे, खेतों में पानी भरा होता था, उनमें धान के पौधे रोपे हुए होते थे और तरह-तरह की टर्र-टर्र की आवाजें- मेढ़कों की- उन खेतों से आती रहती थीं।
मुझे याद है, एक बार बिना रुके हम बरहरवा पहुँच गये थे- तब हम रामेश्वरजी के साथ थे।
      ***
शिवगादी गुफा के बाहर

      इससे कठिन एक काँवड़-यात्रा थी- फरक्का से शिवगादी की। यह कोई 60 किलोमीटर की यात्रा थी। इसके लिए बरहरवा के काँवड़िये ट्रकों से लिफ्ट माँगकर पहले 25 किलोमीटर दूर फरक्का पहुँचते थे (अब टेम्पो वगैरह चलते हैं); शाम के समय ‘फरक्का बराज’ के किनारे एक घाट में डुबकी लगाकर जल लेकर लोग रवाना होते थे; बरहरवा में बोहरा शिव मन्दिर में काँवड़िये कुछ देर विश्राम करते थे और फिर रात में बरहेट की ओर रवाना हो जाते थे। (अब तो बरहरवा में काँवड़ियों के लिए बाकायदे टेण्ट वाले विश्रामगृह बनने लगे हैं।)
      बरहरवा और बरहेट के बीच राजमहल की पहाड़ियों की एक शाखा है- इसे रात में ही काँवड़िये पार करते थे। बरहेट बाजार से कोई सात किलोमीटर दूर पहाड़ी पर एक आश्चर्यजनक प्राकृतिक गुफा में शिवजी विराजमान हैं। बीच में गुमानी नदी पार करनी पड़ती थी। पानी ज्यादा होने पर नाव से नदी को पार किया जाता था, अन्यथा कमर भर तक पानी होने पर लोग चलकर ही नदी को पार करते थे।
      गुमानी के उस पार का रास्ता पहाड़ी था। कष्ट उठाकर लोग गुफा तक पहुँचते थे। गुफा के बाहर पानी के प्राकृतिक झरने बहते रहते थे- उसके स्पर्श से काँवड़ियों की सारी थकान दूर हो जाया करती थी।
      मैंने बचपन में एक ही बार यह यात्रा की है।
      अब तो बात ही कुछ और है- अब शिवगादी या शिवगद्दी बाकायदे गजेश्वरधाम बन गया है; गुमानी नदी पर पुल बन चुका है; सड़क पक्की हो गयी है; झारखण्ड सरकार की ओर से खूब सौन्दर्यीकरण किया गया है तथा जन-सुविधाओं की व्यवस्था की गयी है; चारपहिये वाहनों के लिए बाकायदे ‘पार्किंग’ है; सावनभर जबरदस्त मेला लगा रहता है; काँवड़िये भी अब पैदल के बजाय मोटरसाइकिलों में फरक्का से जल लाना पसन्द करने लगे हैं- खासकर, बंगाल के काँवड़ियों के लिए यह एक मनोरम यात्रा बन गयी है।
      ‘गजेश्वरधाम’ बनने के बाद एकबार कैलाश के साथ हम सपरिवार शिवगादी गये- चारपहिया वाहन से। मेले की भीड़ देखकर मैं दंग रह रह गया था- दूर-दूर से लोग आये हुए थे- इतना बदलाव!
      ***
'मोती झरना' 

      हमारे इलाके की तीसरी काँवड़ यात्रा है- महाराजपुर से मोती झरना की। यह तीनों में सबसे छोटी पर अच्छी-खासी कठिन एवं रोमांचक यात्रा हुआ करती थी। अब नहीं- अब तो पक्की सड़क बन गयी है और लोग बिना पहाड़ पर चढ़ाई किये घूम-घाम कर मोती झरना तक पहुँच जाते हैं। उन दिनों रात भर पहाड़ियों पर काँवड़िये चलते थे- फिसलते, गिरते-पड़ते और एक-दूसरे को सहारा देते। मैं एक ही बार इस यात्रा पर गया हूँ, पर बरहरवा के बहुत-से नौजवान हर साल यह यात्रा करते थे।
      इसके लिए बरहरवा वाले सावन के आखिरी सोमवार को चुनते थे। जहाँ तक मुझे याद है, महाराजपुर जाने के लिए काँवड़ियों के जत्थे आधी रात वाली सवारी गाड़ी (लास्ट लोकल) को पकड़ते थे। महाराजपुर के बाद सकरीगली स्टेशन पड़ता है और उसके बाद ही साहेबगंज है। साहेबगंज से महाराजपुर तक गंगाजी की एक धार आती है। आधी रात में इसी धार में डुबकी लगाकर लोग रवाना होते थे। रेल पटरी के एक तरफ गंगाजी है, तो दूसरी तरफ ही पहाड़ी है। दस-पन्द्रह मिनट के अन्दर पहाड़ी पर चढ़ाई शुरु हो जाती थी। बड़ी रोमांचक यात्रा के बाद भोर होते-होते लोग मोती झरना पर पहुँचते थे- यह एक प्राकृतिक जलप्रपात है। जलप्रपात के पीछे प्राकृतिक गुफा है और गुफा में शिवजी विराजमान हैं।
      किसी जमाने में महाराजपुर के स्वयंसेवक बरहरवा से आने वाले काँवड़ियों के लिए नाश्ते वगैरह का भी इन्तजाम करते थे। घाट पर रोशनी की व्यवस्था भी की जाती थी। अब शायद पहाड़ियों पर से यह काँवड़-यात्रा बन्द हो गयी है।
      मुझे याद है कि जल चढ़ाकर जब हम वापस महाराजपुर स्टेशन आये थे, तब स्टेशन  बरहरवा के काँवड़ियों से भरा हुआ था। हमारी टोली ट्रेन की छत पर बैठकर बरहरवा पहुँची थी- आशा है- जीवन में फिर कभी यह काम नहीं करूँगा, चाहे एक-एक करके कई ट्रेनों को छोड़ना ही क्यों न पड़ जाय!  
      अब मोती झरना एक पर्यटन स्थल है- खासकर, साहेबगंज वालों के लिए। सड़क बन ही गयी है। झरने के जल को रोक-रोक कर तीन स्वीमिंग टैंक भी बना दिये गये हैं।
      2005-06 में हमलोग सपरिवार गये थे वहाँ। तब निर्माण नये-नये थे- अब पता नहीं क्या स्थिति है।
      प्रसंगवश, 1970-75 के बीच कभी फरक्का बराज बनकर चालू हुआ था- उससे पहले लोग सकरीगली से गंगाजी पार किया करते थे। कभी-कभी महाराजपुर से भी स्टीमर चलते थे। बाद में साहेबगंज में घाट बना। उन दिनों रेलवे के स्टीमर चलते थे। साहेबगंज से आज भी मनिहारी के लिए स्टीमर चलते हैं।
      ***
मोती झरना के गुफा के बाहर कुछ ऐसा निर्माण किया गया है 

      चौथी काँवड़ यात्रा के बारे में लोग बहुत कम जानते हैं- मैं भी नहीं जानता था- यह है राजमहल से शिवगादी की यात्रा। राजमहल से जल लेकर पहले लोग तीनपहाड़ आते हैं और फिर तीनपहाड़ से सड़क छोड़कर राजमहल की पहाड़ियों पर से यात्रा प्रारम्भ कर देते हैं।
      कुछ साल पहले मेरे दोस्त आनन्द के छोटे भाई ने बरहरवा, शिवगादी, कन्हैया स्थान (राजमहल के निकट) और मोती झरना पर एक सी.डी. बनवायी थी- उसमें राजमहल से शिवगादी तक की इस पहाड़ी काँवड़-यात्रा की विडियोग्राफी दर्ज थी- तभी मैंने इस यात्रा के बारे में जाना था।
      ***
      सुल्तानगंज से देवघर की काँवड़ यात्रा तो खैर, विश्वप्रसिद्ध है। मैंने भी एकबार यह यात्रा करने की कोशिश की थी, मगर मैं सफल नहीं रहा था- यह 1993 या 94 की बात है शायद। आमतौर पर लोग समूह में यह यात्रा करते हैं और रुकते हुए तीन दिनों में यात्रा पूरी करते हैं। यह सौ से कुछ ज्यादा किलोमीटर लम्बी यात्रा है। जो काँवड़िये बिना रुके यह यात्रा करते हैं, उन्हें डाक बम कहते हैं और उनका सुल्तानगंज घाट पर पंजीकरण होता है। ये लोग शाम को जल उठाते हैं और लगभग दौड़ते हुए सुबह देवघर तक पहुँचते हैं- बेशक, इसके लिए लोग बाकायदे अभ्यास भी करते होंगे।
      सुल्तानगंज जाने से पहले नंगे पैर चलने का अभ्यास करने के लिए मैं एक शाम पेट्रोल टंकी वाली सड़क पर टहलने निकला- सोचा, दिग्घी से लौट आऊँगा। दिग्घी बस्ती तीन किलोमीटर दूर है। मगर पता नहीं क्या हुआ, मैं आगे बढ़ता चला गया। 15 किलोमीटर दूर उधवा पहुँचने पर जवाहर भैया से भेंट हुई- उनका बरहरवा में पहले गैरेज हुआ करता था। उन्होंने कहा- अब बरहरवा लौटने से तो अच्छा है कि आगे राजमहल चले जाओ- अपने नानीघर। और इस प्रकार, प्रायः 30 किलोमीटर टहलते हुए मैं अपने नानीघर पहुँच गया। रात वहीं रुका और सुबह बस से वापस लौटा। घर में पिताजी को अन्दाजा हो गया था कि मैं शायद राजमहल पहुँच गया हूँ।
      सुतानगंज में मेरी मौसी का घर है। मैं वहीं रुका। रविवार की सुबह दस बजे करीब गंगाजी में डुबकी लगाकर मैं जल लेकर चल पड़ा। बरहरवा से मैं अकेला आया था- जबकि अन्य लोग समूह में आते हैं। इसबार मेरे कन्धे पर काँवड़ नहीं था, बल्कि प्लास्टिक की दो बोतलों में गंगाजल लेकर मैंने कमर पर बाँध लिया था।
      नाममात्र के लिए रुकते हुए मैं रात होने तक चलता रहा। रात सात-आठ बजे करीब मैं एक ऐसी जगह पर पहुँचा, जहाँ बहुत सारी दुकानें सजी थीं- चाय-नाश्ते की। तब झारखण्ड राज्य नहीं बना था। अब कह सकता हूँ कि मैं बिहार-झारखण्ड की सीमा पर था। मैंने शायद आधी से ज्यादा यात्रा पूरी कर ली थी। वहाँ तैनात होमगार्ड के जवान ने मुझे अकेले आगे जाने से रोक दिया- बोला, आगे जंगली रास्ता है- आधी रात के वक्त डाक बम वाले गुजरेंगे, उन्हीं के साथ चले जाना।
      मैं एक दूकान की चौकी पर लेट गया। दिनभर आकाश में बादलों का नामो-निशान नहीं था- वर्षा या बूँदा-बाँदी तो दूर की बात थी। मैं थका हुआ तो था ही- नीन्द आ गयी। आधी रात के वक्त बोल-बम के नारों से आँखें खुलीं- डाक बम वालों की टोलियाँ करीब-करीब दौड़ते हुए गुजर रहीं थीं। जो दूकानदार दूसरे काँवड़ियों से कमाई करते हैं, वे डाक बम वालों की सेवा करते हुए धन्य हो रहे थे। कोई उनके पैरों पर गुनगुना पानी डाल रहा था, कोई साथ-साथ दौड़ते हुए उन्हें शर्बत या चाय पिला रहा था, कोई-कोई तो उन्हें सिगरेट पिलाने के लिए साथ-साथ दौड़ रहा था!
      मैंने उठना चाहा, तो पता चला, मेरी जाँघों की मांसपेशियाँ अकड़ गयी हैं। मैं फिर लेट गया और फिर मेरी आँख लग गयी। दावा तो नहीं कर सकता, पर लगता है कि अगर होमगार्ड ने मुझे नहीं रोका होता और मैं लगातार चलता रहता, तो शायद मैं देवघर पहुँचकर ही दम लेता।
सुबह बस की छत पर बैठकर मैं देवघर पहुँचा। सावन का आखिरी सोमवार था- मन्दिर परिसर में इतनी भीड़ थी कि मन्दिर के गर्भगृह में प्रवेश करना मुझे असम्भव लगा। मन्दिर के द्वार पर ही एक बोतल जल चढ़ाकर मैं बाहर आ गया। बाबा वैद्यनाथ के दर्शन मैं पहले कभी एकबार कर चुका हूँ- वह सावन का महीना नहीं था- सन्ध्या के शृँगार का समय था।
देवघर में मेरी (रिश्ते की) एक बुआ का घर है- करहनीबाग में। पता लगाते हुए मैं वहाँ पहुँचा। बाद में, बुआ के घर से मैं बासुकीनाथ गया- वहाँ भी एक प्रसिद्ध शिवमन्दिर है- देवघर से कोई चालीस किलोमीटर दूर। बेशक, मैं छोटी बस से ही गया था। वहाँ भीड़-भाड़ नहीं थी। दूसरे बोतल का जल वहाँ शान्ति से मैंने शिव पर अर्पित किया।
बुआ के घर में तीन-चार दिन रुका। दरअसल, मैं एक फुलपैण्ट और शर्ट बैग में लेकर चला था- हाँ, चप्पल नहीं लिया था। मैं नंगे पैर ही बरहरवा के लिए रवाना हुआ- बस से। पहले देवघर से दुमका आया, और फिर दुमका से अमरापाड़ा-लिटिपाड़ा-हिरणपुर-बरहेट होते हुए बरहरवा पहुँचा।   

बुधवार, 18 जुलाई 2012

आज मिला बारिश में नहाने का मौका...




      इस साल सारा आषाढ़ सूखा बीत गया; जबकि पिछ्ले साल आषाढ़ में बरहरवा के इलाके में जम कर बारिश हुई थी- बंगाल की खाड़ी में उठे चक्रवात का असर था। संयोग से, मैं भी उसी वक्त बरहरवा पहुँचा था।
      इस साल सावन के साथ बरसात की शुरुआत तो हुई, मगर मुझे बारिश में नहाने का मौका नहीं मिल रहा था। सुबह जो बारिश होती थी, वह इतनी धीमी होती थी कि नहाते नहीं बनता; दोपहर में कई दिन जमकर बारिश हुई, मगर तब मैं दफ्तर में होता। पिछले रविवार को तो मैंने सुबह से शाम तक बारिश का इन्तजार किया था- बदली छाई रही, मगर बारिश नहीं हुई। शाम हुई भी तो एक-दो मिनट के लिए।
      खैर, रात भर की बूँदा-बांदी के बाद आज सुबह आठ बजे से अच्छी बारिश शुरु हुई। मैं भी आधा घण्टा नहाया।
      अब देखा जाय, अगला मौका कब मिलता है... 

शनिवार, 30 जून 2012

औराही हिंगना- "रेणु" जी की जन्मस्थली



आज सुबह-सुबह मैं "औराही हिंगना" नामक छोटे-से गाँव में था... फणीश्वर नाथ रेणु जी की जन्मस्थली के सामने

दरअसल, कल बरहरवा से आनन्द (फागु) के छोटे भाई की बारात "सिमराहा" आयी थी, जो अररिया से प्रायः 20 किलोमीटर दूर है और सिमराहा से "औराही हिंगना" प्रायः 4 किलोमीटर दूर है

कल शाम मैं अपने 1999 मॉडल लीजेण्ड स्कूटर से सिमराहा पहुँचा- नयी-नवेली फोरलेन NH-57 पर चलने का अपना ही मजा है (आमतौर पर मैं साइकिल चलाता हूँ- महीने में दो-तीन दिन स्कूटर चला लेता हूँ कि यह कबाड़ न बन जाय मुझे लगता है, अब भी यह 55 के आस-पास ही माइलेज देता होगा- यह 4स्ट्रोक है)

खैर, मुहल्ले के कुछ बड़े-बुजुर्गों को प्रणाम किया, अशोक तथा कुछ अन्य दोस्तों से भेंट हुई, कुछ पुरानी मस्तियाँ हुईं उत्तम बदमाश नहीं आया था चन्द्रशेखर चाचा (नूनू चाचा) भी नहीं आ पाये थे शादी का जश्न शानदार रहा- खासकर, "मयूर" वाली पालकी में बैठकर वधू का आना- "वरमाला" के लिए रात थोड़ी-बहुत नीन्द आयी सुबह 5 बजे से पहले मैं निकल पड़ा

सिमाराहा से औराही तक का आधा रास्ता तो ठीक है, बाकी आधा शायद निर्माणाधीन है- ऊबड़-खाबड़ ध्यान रहे, रेणु जी के सुपुत्र अभी यहाँ के माननीय विधायक हैं और वे उसी घर में रहते हैं

सामने फूस का बड़ा-सा हॉलनुमा कमरा है- पीछे पक्के मकान की झलक मिल रही थी कुछ तस्वीरें मैंने खींची जरुर, मगर वे सुन्दर नहीं हैं- क्योंकि मैं नोकिया-5310 नहीं लेकर गया था, जिसकी तस्वीर अच्छी आती है मैं एक साधारण मोबाइल साथ रखता हूँ, सो उसी का साधारण चित्र साझा कर रहा हूँ
रेणु के गाँव में मैंने पाया कि हर ग्रामीण "रेणु" की महानता एवं प्रसिद्धि से भली-भांति वाकिफ है और उनकी जन्मस्थली देखने आनेवालों के प्रति उनका व्यवहार दोस्ताना है। एक बात पर मेरा ध्यान गया कि यहाँ हर घर (या झोपड़ी) के सामने आँगन है और "तोरण" के रुप में एक प्रवेशद्वार है- कोई फर्क नहीं पड़ता कि घरवाले कितने गरीब या पैसेवाले हैं

शुक्रवार, 18 मई 2012

एक यात्रा "धरती पर बैकुण्ठ", अर्थात् श्री बदरीनाथ धाम की



श्री बदरीनाथ धाम को "धरती पर बैकुण्ठ" कहा जाता है। इस साल (2012 में) 29 अप्रैल को बदरीनाथ के कपाट खुले।
पता नहीं क्यों और कैसे इस बार मेरे मन में इच्छा जागी कि बदरीनाथ की यात्रा की जाय! irctc.co.in की वेबसाइट पर जब टिकट बनाने बैठा, तो पाया कि सिर्फ 6 और 7 मई को अररिया से दिल्ली के लिए आरक्षित टिकट उपलब्ध थे- बाकी पहली मई से जून-जुलाई तक तक हाउसफुल चल रहा था। इसी प्रकार, वापसी के लिए कोशिश किया, तो पाया कि सिर्फ 16 और 17 मई को (बेशक, 3एसी में) स्थान उपलब्ध थे- बाकी दिनों में वेटिंग लिस्ट सैकड़ॉं में चल रही थी- क्या स्लीपर और क्या एसी! जाहिर है- तीर्थ के देवता को मेरी प्रार्थना स्वीकार थी और वे हमें बुला रहे थे! वर्ना 6-7 मई को जाने के लिए और 16-17 मई को वापसी के लिए ट्रेन में स्थान उपलब्ध रहने का कोई तुक कम-से-कम मुझे तो नजर नहीं आता, जबकि मई-जून-जुलाई में जाने-आने की सारे टिकटें बुक हो चुकी हों!
(प्रसंगवश, अररिया से दिल्ली के लिए एक ही ट्रेन है- 'सीमांचल एक्सप्रेस'। लगभग 6 साल हुए, जब यहाँ की मीटरगेज लाईन ब्रॉडगेज तब्दील हुई है। सम्भवतः यह ट्रेन पहले सीतामढ़ी तक 
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चलती थी, जिसे अब जोगबनी- नेपाल की सीमा- तक बढ़ा दिया गया है।)
खैर, इण्टरनेट पर पहले मैंने वापसी की टिकटें बनायी, फिर जाने की और तब माँ-पिताजी को खबर किया कि बदरीनाथ चलना है। अगले दिन पिताजी ने लम्बी यात्रा करने से मना कर दिया और कहा- अपनी चाची को ले जाओ। फिर मैंने पिताजी की टिकटें कैन्सल कर चाचीजी की टिकटें बनवा लीं। अंशु (मेरी श्रीमती) की माताजी भी हमारे साथ ही थीं- उनकी टिकट भी बनवा चुका था। हलाँकि चलने-फिरने में उन्हें दिक्कत है- फिर भी, बदरीनाथ यात्रा के लिए वे तैयार थीं। बाकी रहा- अंशु की दोनों बहनों को सूचित करना। बड़ी बहन करनाल (हरियाणा) में हैं, तो छोटी बहन मुरादाबाद (उ.प्र.) के
निकट। दोनों तैयार हो गयीं। हालाँकि दोनों के पति-परमेश्वरों को, लगता है- तीर्थ के देवता ने नहीं बुलाया- दोनों के काम निकल आये।
खैर, 4 मई को मेरे भांजे ओमू ने माँ और चाची को अररिया पहुँचा दिया और 6 मई, रविवार को हमलोग अररिया से रवाना हो गये। 7 की रात दस बजे हम गाजियाबाद स्टेशन पर उतर गये। 8 मई की सुबह सवा छह बजे 'हरिद्वार मेल' में हमारी आगे की टिकटें बुक थीं। इन्दिरापुरम में रह रहे अशोक जैन साहब ने हमें सुझाव दिया कि हम रात उनके घर ठहर जायें और वे सुबह हमें स्टेशन छोड़ देंगे। एकबार हम तैयार भी हुए, पर अन्त में हमने तय किया,  लौटते समय- 15 मई को उनके घर पर रुकेंगे- फिलहाल स्टेशन पर रात गुजार कर हरिद्वार की ट्रेन पकड़ ली जाय- और हमने ऐसा ही किया।
जब 'हरिद्वार मेल' मेरठ से गुजर रही थी, तब हमने बबीता- अंशु की छोटी
बहन- को फोन लगाया, पता चला उसकी बस भी मेरठ से गुजर रही है... वह मुरादाबाद से अपने छोटे बेटे को साथ लेकर मेरठ आयी थी और मेरठ से अपने सोलहवर्षीय बेटे आशु को (उसकी बुआ के घर से) साथ लेकर करनाल जा रही थी। अगर मुझे पहले पता होता कि गाजियाबाद से हरिद्वार जानेवाली ट्रेन मेरठ होकर जाती है, तो उनलोगों को खबर करके हम मेरठ में उन्हें अपनी ट्रेन में बैठा लेते।
खैर, दोपहर में हरिद्वार पहुँचकर हमने श्री जाट धर्मशाला में शरण ली। इस धर्मशाला के बारे में करनाल वाली जीजी ने जानकारी दे
दी थी। रात नौ बजे करीब करनाल से वे दोनों बहनें भी धर्मशाला में पहुँच गयीं। बड़ी जीजी की छोटी बेटी भी साथ थीं। हमारा बेटा अभिमन्यु तो था ही। इस प्रकार, हमारा दल 11 सदस्यों का बन गया- 3 किशोर, 1 युवती, 3 महिलायें, 3 बुजुर्ग महिलायें और 1 मैं खुद।
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8 मई की सन्ध्या को "हर की पौड़ी" पर गंगाजी की आरती हम देख चुके थे- तब अंशु की दोनों बहनें हरिद्वार नहीं पहुँची थीं। 9 की सुबह सूर्योदय से काफी पहले हम गंगाजी में डुबकी लगाने पहुँच
गये। डुबकी लगाने के बाद हम सबने सुबह की भी आरती देखी। फिर हमसब प्रसिद्ध "मनसा देवी" के मन्दिर में गये। शाम को फिर हम सब हर की पौड़ी पर गये- आरती देखने।
गंगाजी की तीव्र धारा को देखकर कितना आनन्द मिलता है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता। जब चुल्लू में भरकर इस जल को हम पीते हैं, तो ऐसा लगता है, साक्षात देवताओं के चरणों से बहकर आते "चरणामृत" का हम पान कर रहे हैं! जल इतना मीठा हो सकता है- इसका अहसास यहीं आकर होगा।
हाँ, इस बीच दिन भर अंशु पेट के तेज दर्द से कराहती रही, कई
उल्टियाँ भी हुईं। उसे धर्मशाला के सामने डॉ. गोयल के पास मैं ले गया। उन्होंने सूई देने को कहा- कम्पाउण्डर से। सूई से हमदोनों पति-पत्नी खूब डरते हैं। हमने कहा- दवा से काम नहीं चलेगा? डॉक्टर बोले- पानी तक तो हजम हो नहीं रहा, दवा कैसे हजम होगी? कलाई के पास नस में इंजेक्शन दिया गया।
हुआ यह था कि अंशु ने अपनी करनाल वाली जीजी को चने-उड़द की दाल के साथ चावल बनाकर लाने की फर्माइश कर दी थी। 8 की दुपहर मैं जो खाना लाया था- उसमें भी दाल चने-उड़द की थी। चने की दाल अंशु को हजम नहीं होती। सुबह से ही उसके पेट
में दर्द शुरु हो गया था और इसी स्थिति में ही वह "मनसा देवी" की 850 सीढ़ियाँ चढ़ गयी थी। हालाँकि वापसी में मैं उसे "रज्जु मार्ग" (Rope Way) से लेकर आया, फिर भी, दर्द और उल्टियों से उसका बुरा हाल हो चुका था। खटका भी लगा- क्या बद्रीनाथ रूठ गये... ?
खैर, इंजेक्शन लगने के दो-चार मिनट बाद ही अंशु की तबीयत ठीक होने लगी और क्लिनिक से बाहर आकर बोली- लस्सी पिला दो। हमने डॉक्टर साहब को मन-ही-मन ढेरों धन्यवाद दिया।
अंशु की तबीयत ठीक देखकर हमने बद्रीनाथ जाने के लिए बस में
सीट बुक किये- धर्मशाला के सामने एक एजेण्ट से। एजेण्ट साहब ने हमें बेवकूफ बनाया- बोले 42सीटर बस है और आपकी सीट 18 से 28 तक है- हमने सोचा, ये सीटें बस के बीच में पड़ेंगी। यूँ तो हम उस एजेण्ट से "ट्रैवेलर" की बात करके गये थे, पर रसीद आधा भरकर फिर फोन करके उन्होंने सूचित किया- ट्रैवेलर बुक हो गया है।
खैर, सुबह 7:30 पर बस चलनी थी- स्टैण्ड पर पहुँचकर देखा- यह 28सीटर बस थी- यानि हमारी सीटें सबसे पीछे थीं! दुर्भाग्य से, हमारे ड्राइवर साहब भी ऐसे निकले, जो स्पीड ब्रेकर और खराब
सड़क पर बस की गति को कम करना अपनी शान के खिलाफ समझते थे! मत पूछिये कि सारे रास्ते में झटके खाते-खाते और उछलते-कूदते हमारी क्या हालत हुई थी! ड्राइवर पर हमारी किसी भी बात का बिलकुल असर नहीं हो रहा था। बस रुकने पर वह बड़े अच्छे से हमसब से बातें करता था, मगर 5-7 मिनट बस चलाने के बाद वह अपने खड़ूस स्वभाव पर आ जाता था। मुझे भी मात्र एक या दो बार ही गुस्सा आया- वह भी हल्का-सा। पता नहीं कैसे, हमलोग हँसी-मजाक में इतना झेल गये! जबकि हमारे दल के तीन बच्चे उल्टियाँ कर-कर के परेशान हो रहे थे! मैं होम्योपैथिक दवा
साथ लेकर चला था- पर दो बच्चों को इसकी गन्ध पसन्द नहीं आयी, तीसरे पर असर नहीं हुआ। असर हुआ अभिमन्यु पर- उसे एक भी उल्टी नहीं हुई। अंशु का एकबार जी घबराया- उसपर भी दवा ने काम किया।  
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बदरीनाथ के यात्रामार्ग के बारे में सब जानते ही होंगे, फिर भी बता दूँ। हरिद्वार से यह 320 किलोमीटर लम्बा मार्ग है। हिमालय की शुरुआत हालाँकि हरिद्वार से ही हो जाती है, पर चूँकि हरिद्वार में कंक्रीट निर्माण, गाड़ियों की संख्या और जनसंख्या काफी बढ़ गयी
है, इसलिए यहाँ का मौसम मैदानी इलाकों-जैसा हो गया है। किसी जमाने में (60-70 साल पहले) हरिद्वार से ही "देवभूमि" का अहसास होने लगता होगा.... आज की तारीख में 275 किमी दूर जोशीमठ पहुँचने के बाद जाकर यह अहसास होता है कि हम "देवताओं की भूमि" पर हैं!
देवप्रयाग तक रास्ता गंगाजी के किनारे-किनारे चलता है। यहाँ गंगोत्री से आने वाली भागीरथी में दाहिनी ओर से अलकनन्दा नदी आकर मिलती है। यमुनोत्री-गंगोत्री जाने वाले तीर्थयात्री भागीरथी के किनारे चल पड़ते हैं और केदार-बदरी जाने वाले अलकनन्दा के
किनारे। एक ओर ऊँचे-ऊँचे पर्वत तो दूसरी ओर अलकनन्दा की गहरी घाटी। एक रोमांचक यात्रा! 
रूद्रप्रयाग में बाँयी ओर से मन्दाकिनी नदी आकर अलकनन्दा से मिलती है। यहाँ मन्दाकिनी के किनारे वाली सड़क केदारनाथ को जाती है, तो बदरीनाथ के यात्री अलकनन्दा के किनारे-किनारे अपनी यात्रा जारी रखते हैं। इसके बाद कर्णप्रयाग तथा नन्दप्रयाग नामक दो और छोटे-छोटे संगम आते हैं, मगर मुख्य नदी अलकनन्दा ही बनी रहती है। रूद्रप्रयाग तथा चमोली अच्छे-खासे शहर हैं रास्ते के।
जोशीमठ 6,105 फीट की ऊँचाई पर है। हरिद्वार से सुबह 7:30 पर
चलने वाली बसें यहीं रात्रि विश्राम के लिए रुकती हैं। कुछ बसें थोड़ा पहले पीपलकोटी में ही रुक जाती हैं। जो बसें सुबह 5:30 पर (हरिद्वार से) चलती हैं, वे यहाँ बिना रुके बदरीनाथ पहुँच सकती हैं। मगर मेरे विचार से, एक रात जोशीमठ (या पीपलकोटी) में रुकना अच्छा है। क्योंकि यहाँ के बाद मौसम ठण्डा हो जाता है। एक रात यहाँ रुकने से हमारा शरीर ठण्डे मौसम के अनुकूल हो जाता होगा। 
हमलोग भी जोशीमठ में रुके। चार में से एक शंकराचार्य की पवित्र पीठ यहीं है। हमने कमरे खोजने में कुछ ज्यादा ही समय ले लिया, जिस कारण जब हम पीठ पर पहुँचे, द्वार बन्द हो चुके थे। बाहर से ही हमने प्रणाम किया।
हरिद्वार में धर्मशाला में जिस प्रकार आई'कार्ड का फोटोस्टेट माँगा गया था, उस लिहाज से मैंने तीन अतिरिक्त फोटोस्टेट करवा लिए थे कि जोशीमठ
तथा बदरीनाथ में माँगे जायेंगे। मगर यहाँ ऐसा कुछ न हुआ। जिन दो कमरों में हम ठहरे, उनका आज ही उद्घाटन हुआ था- हम पहले यात्री थे- उन्होंने रजिस्टर तक नहीं शुरु किया था। सुबह 5 बजे वे देखने तक नहीं आये कि उनके नये-नये साजो-सामान सही-सलामत हम छोड़कर जा रहे हैं या नहीं!
जोशीमठ के बाद पर्वतों के आकार-प्रकार और भी भव्य एवं विशाल हो जाते हैं.. घाटियाँ और भी गहरी हो जाती हैं। रास्ते सँकरे तथा ज्यादा घुमावदार हो जाते हैं। वनस्पति के नाम पर अब सिर्फ चीड़ दीख रहे हैं- जो इस बात की घोषणा करते हैं कि महीने भर पहले तक यह इलाका सफेद बर्फ से ढका हुआ था... और बर्फ पिघलने के कुछ ही दिनों बाद इस रास्ते पर लोगों का आवागमन शुरु हुआ है। यहाँ से अलकनन्दा का नाम "विष्णुगंगा" हो जाता है। एक स्थान पर साइनबोर्ड पर हमने "पातालगंगा"लिखा देखा, जो विष्णुगंगा / अलकनन्दा की बहुत ही गहरी खाई को देखते हुए सही प्रतीत हो रहा था।
आखिरी 45 किलोमीटर सड़क अपेक्षाकृत खराब थी- शायद 'सीमा सड़क संगठन' वालों को इसे ठीक करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाया और यात्रा मार्ग खोल दिया गया।
रास्ते में हमें कई ग्लेशियर दीखे- ऊपर से बर्फ जमी थी, तो नीचे से पानी बह रहा था। विश्वास नहीं हो रहा था कि हम इतनी ऊँचाई पर हैं, जहाँ बर्फ जमी हुई है! हालाँकि इन ग्लेशियरों के बर्फ रूई-जैसे सफेद नहीं थे, बल्कि पहाड़ी मिट्टी के अंश मिले होने के कारण कुछ मटमैले-से थे। बर्फ भी "घन" (क्यूब) के आकार में जमे हुए थे। एक ग्लेशियर तो इतने पास से गुजरा कि लगा बस की खिड़की से हाथ बढ़ाकर बर्फ को छू सकते हैं!  
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बदरीनाथ 10,159 फीट की ऊँचाई पर है। समुद्रतल से लगभग सवा तीन किलोमीटर की ऊँचाई पर। (ध्यान रहे- सगरमाथा (माउण्ट एवरेस्ट) लगभग पौने नौ किलोमीटर ऊँचा है।) यहाँ पहुँचकर हमें वास्तव में ऐसा लगा- हम दूसरे लोक में हैं! देवलोक में! जिधर देखो, उधर ही बर्फ से ढकी चोटियाँ! विशेषकर, "नीलकण्ठ" चोटी का दृश्य तो नयनाभिराम था। इन दृश्यों का वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता, यह तो आप भी समझ गये होंगे... ।
खैर। एक हॉल कमरे में सामान रखकर हम बद्री विशाल के दर्शन के लिए चल पड़े। टैक्सी स्टैण्ड से 10-11 बजे का 'कूपन' लिया और कुछ कदम चलते ही नदी के उस पार मन्दिर दीखने लगा। दूसरों की नहीं जानता, मैं तो भाव-विभोर हो गया- दूर से बदरीनारायण का मन्दिर देखकर! लगा- अब गर्भगृह में न भी जाऊँ, तो कोई हर्ज नहीं।
विष्णुगंगा पर बने पुल को पार करके हम सबने "तप्त कुण्ड" में स्नान किया। कई कुण्ड हैं- महिलाओं के लिए अलग हैं- घिरे हुए। पता नहीं कितने हजार वर्षों से गर्म पानी का यह स्रोत यहाँ बना हुआ है। पुराणों तक में इस कुण्ड का जिक्र है! इन हजारों-लाखों वर्षों में न तो पानी का बहाव घटा है और न ही इसकी गर्मी! (मुझे राजगीर के गर्म कुण्डों की याद आयी- वहाँ का पानी भी ऐसा ही गर्म था। हाँ, वहाँ कुण्ड विशालकाय बनाये गये हैं और कुण्डों की संख्या भी ज्यादा है। हम तीन परिवार 2004 में वायु सेना, बिहटा से वहाँ गये थे। तब कुण्डों के बाहर फैली गन्दगी से मन बहुत दुःखी हुआ था। आशा करता हूँ, अब वहाँ गन्दगी का साम्राज्य नहीं होगा।)
स्नान के बाद हम दर्शन के लिए पंक्ति में लगे। करीब आधे घण्टे बाद हम मन्दिर में थे। 5-7 सेकेण्ड से ज्यादा गर्भगृह में ठहरने का उपाय नहीं था। बहुत मैंने चाहा कि बदरीनारायण की छवि को हृदय एवं मस्तिष्क में उतार लूँ- मगर बस धुँधली-सी छवि ही उकेर पाया। मेरी माँ और अंशु तो दुबारा गर्भगृह में घुसी, ताकि बद्रीनारायण की छवि को भली-भाँति देख सके। (मुझे तिरुपति बालाजी के दर्शन की याद आयी। 1991 में एक दोस्त के साथ (वायु सेना, आवडी से) मैं वहाँ गया था। लगता है- 2-4 सेकेण्ड ही हम बालाजी की भव्य प्रतिमा के सामने खड़े रह पाये थे! उनकी भी धुँधली-सी छवि मेरे मन-मस्तिष्क में अंकित है।)
दर्शन के बाद एक दूकान पर बैठकर हमने चाय-नाश्ता किया। थोड़ी खरीदारी भी हुई। अपने होटल में जब तक हम लौटे, तब तक बदली छा चुकी थी और बूँदा-बाँदी होने लगी थी। इसी के साथ पड़ने लगी थी- कड़ाके की ठण्ड! सम्भवतः दोपहर के बाद यहाँ मौसम ऐसा हो जाना सामान्य बात है।
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ठण्ड के मारे एक बार जो सब रजाईयों के अन्दर घुसे, कि फिर किसी ने "माना" गाँव जाने का नाम नहीं लिया; जबकि बदरीनाथ आनेवाले 3 किलोमीटर दूर माना गाँव जरुर जाते हैं, जहाँ "व्यास एवं गणेश गुफाएं" तथा सरस्वती नदी का मुहाना है। यह तिब्बत की सीमा पर आखिरी भारतीय गाँव है। मेरी जाने की इच्छा थी, मगर मेरे पेट में भी दर्द शुरु हो गया था। जोशीमठ से खाली पेट बस में सफर करना लगता है, ठीक नहीं रहा। मैं भी रजाई ओढ़कर लेट गया।
देर शाम बूँदा-बाँदी समाप्त होने पर मैं अंशु के साथ बाजार का चक्कर लगा आया- पेट दर्द की दवा भी ली। दूर से ही जगमगाते बदरीनाथ मन्दिर को प्रणाम किया। गर्म कपड़े के नाम पर मेरे शरीर पर बस एक ऊनी "नेक" था, जो गर्दन और सीने को ठण्ड से बचा सकता था। फुल शर्ट तक मैंने अपने बैग में से निकाल दिया था (जो अंशु ने मुझसे छुपाकर बैग में रख दिये थे), ताकि मेरा बैग हल्का रहे। मुझे ठिठुरते देख अंशु ने फिर मेरे लिए एक हल्का जैकेट खरीदा।
रात तीनों बहनें एकसाथ फिर बाजार गयीं। भोर में भी तीनों बदरीनाथ के दर्शन कर आयीं- बस में सवार होने से पहले।
होटल के बगल वाली चाय दूकान पर आन्ध्र प्रदेश के एक हट्टे-कट्टे व्यक्ति ने टूटी-फूटी हिन्दी में बताया कि वह केदारनाथ में एक घण्टे के लिए बेहोश हो गया था- ठण्ड के मारे। फिर उसे "कस्तूरी" सुँघाकर होश में लाया गया। वह अब भी "कस्तूरी" सूँघ रहा था।

बदरीनाथ तथा गंगोत्री तक बसें चलती हैं- यह मैं जानता था। अतः मेरी योजना में बद्रीनाथ के बाद "गंगोत्री"-यात्रा शामिल थी, मगर केदारनाथ और यमुनोत्री के बारे में मैंने सोचा तक नहीं था। केदार में 14 किलोमीटर तथा यमुनोत्री में 3 किलोमीटर की पैदल यात्रा करके फिर वापस आना पड़ता है। यह हमारे दल के सदस्यों के बस की बात नहीं थी। दूसरी बात, अपनी किशोरावस्था में मैंने शंकु महाराज का बँगला उपन्यास "विगलित करूणा जाह्नवी जमुना" पढ़ा था- इसने मुझे कुछ ज्यादा ही प्रभावित कर दिया था। कहने को तो यह एक यात्रा-वृतान्त है, मगर इसकी नायिका सुमन गोमुख से गंगोत्री लौटने के क्रम में बर्फ के नीचे बह रही जलधारा में समा गयी थी... और यह वृतान्त एक 'उपन्यास' बन गया था! वह ताजा बर्फ चुनने के लिए उस तरफ बढ़ गयी थी, जिधर जाने से मार्गदर्शक सन्यासी ने मना किया था... और लेखक की आँखों के 
सामने वह बर्फ में समा गयी थी। नायिका बस एक सहयात्री थी, जो जिद करके गंगोत्री से गोमुख की कठिन यात्रा में लेखक के साथ हो गयी थी। यह उपन्यास उनदिनों का है, जब सिर्फ धरासु तक बस चलती थी- बाकी सारी यात्रायें पैदल तय की जाती थीं। बँगला में इसपर फिल्म भी बन चुकी है। यह बात कभी मैंने अंशु से बतायी थी- सो वह भी गंगोत्री यात्रा के पक्ष में थी।
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मगर हमारी वापसी की यात्रा इतनी थकान भरी रही कि हरिद्वार लौटकर फिर किसी ने गंगोत्री यात्रा का नाम नहीं लिया। यह भी सुना गया कि वहाँ बर्फ जमी हुई है। हमारी तैयारियाँ उस लायक नहीं थीं।
बदरीनाथ से सुबह की आरती देखने के बाद 7:30 पर चलना चाहिए और रूद्रप्रयाग में रात्रि विश्राम करना चाहिए। मगर हमारी बस सुबह 5:30 पर चलकर सीधे हरिद्वार आ गयी। हरिद्वार शहर में प्रवेश कर जाम में रेंगते हुए हम करीब नौ बजे स्टैण्ड पर पहुँचे। फिर एकबार हम श्री जाट धर्मशाला की शरण में गये। अगली सुबह करनाल की बस पकड़कर हम सब करनाल आ गये। जो दो दिन गंगोत्री यात्रा के लिए थे- वे दो दिन हमने करनाल में अंशु की जीजी के घर बिताये।
15 मई को भोर ढाई बजे की ट्रेन पकड़कर बबीता अपने दोनों बच्चों के साथ मुरादाबाद के लिए रवाना हो गयी। अंशु की मम्मी जीजी के पास ही रुक गयीं। दोपहर डेढ़ बजे हम भी ई.एम.यू. पकड़कर दिल्ली आये। दिल्ली से गाजियाबाद गये, वहाँ स्टेशन से अशोक जैन साहब हमें इन्दिरापुरम में अपने घर ले गये। अगली सुबह यानि 16 को हम आनन्द विहार टर्मिनल से सीमांचल में सवार हो गये- अररिया आने के लिए।
17 की सुबह अररिया स्टेशन पर आकर पता चला- नगरपालिका का चुनाव चल रहा है, सो टेम्पो, रिक्शा शहर में प्रवेश नहीं करेंगे। हम पैदल चलने के लिए जब तैयार हो गये, तब एक तांगा हमें मिला, जिसने हमें घर तक छोड़ा।   
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"पुनश्च" के रुप में एक बात का जिक्र करना चाहूँगा। रूद्रप्रयाग से गुजरते वक्त मैंने अभिमन्यु से कहा था- यही वे पहाड़ियाँ हैं, जहाँ 1926 में जिम कॉर्बेट महीनों भटके थे उस आदमखोर बाघ की खोज में, जो हर बार जिम को धोखा दे जाता था और जिसके बारे में लोगों ने कहना शुरु कर दिया था कि यह "मायावी" बाघ है! इस बाघ ने 1918 से 1926 के बीच इस इलाके के 125 लोगों को मार खाया था!
बस से नीचे की ओर अलकनन्दा पर बने उस पुल को देखकर मैं वास्तव में रोमांचित हो गया था, जिसके बुर्ज पर जिम कॉर्बेट ने
उस बाघ के इन्तजार में बीस रातें बितायी थीं....!  
जिम कॉर्बेट की पुस्तक "रूद्रप्रयाग का आदमखोर बाघ" मेरी पसन्दीदा पुस्तकों में एक है। ऐसी रोमांचक पुस्तक मैंने दूसरी नहीं पढ़ी!
इति।
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