शुक्रवार, 23 मार्च 2012
गुरुवार, 15 मार्च 2012
स्वर्ग में जे.सी.बी.!
होली मनाने
अपने गाँव बरहरवा गया था।
'सम्मत' (होलिका-दहन) से एक रोज पहले मैं घर पहुँचा। दोस्तों से मिला। जयचाँद ने
कहा- चाँदनी रात है, कहीं चलेंगे; भाभीजी से कह दीजिये, रात करीब नौ बजे लौटेंगे।
(दरअसल, जयचाँद को पता है कि हमलोग रात का खाना साढ़े आठ बजे के लगभग खाते हैं और
इस मामले में अंशु सख्त है।) मैंने
पूछा- कहाँ चलना है? उसने कहा- "बरहरवा का स्वर्ग!" मैं समझा नहीं, और
मैंने समझना चाहा भी नहीं।
रात करीब आठ बजे जयचाँद का फोन आ गया कि
बाहर निकलिये- हम भी बाजार पहुँच रहे हैं। बाजार में मुझे मोटरसाइकिल पर बिठाकर वह
मेन रोड पर चल पड़ा। कस्बे से बाहर जहाँ सड़क पहाड़ी पर चढ़ती है, उसके कुछ पहले
दाहिनी ओर एक चर्च है, उसी के बगल से निकलकर हमने एक छोटे-मोटे जंगल में प्रवेश
किया। (कभी इस चर्च के बगल में विशाल "मिशन ग्राउण्ड" हुआ करता था- अब
उस पर कालोनी बस गयी है।) चाँदनी रोशनी में नहाया यह विरल जंगल वास्तव में सुन्दर
लग रहा था। फिर हम एक सन्थाली बस्ती से गुजरे और फिर अधबने नहर को हमने पार किया।
(करीब 40 साल पहले गुमानी नदी को गंगाजी से जोड़ने के लिए इस नहर का निर्माण शुरु
हुआ था, मगर तब से अबतक यह अधबना ही है!)
अब हम "राजमहल की पहाड़ियों" की
तलहटी में थे। कच्ची सड़क पर कुछ दूर चलने के बाद जयचाँद ने बाँयीं ओर एक टीले पर
मोटर साइकिल को चढ़ा दिया। टीले पर हम मोटरसाइकिल से उतरे। जयचाँद बोला- अब चारों
तरफ देखिये। प्रायः चारों तरफ पहाड़ियों से हम घिरे थे- सिर्फ एक कोना खाली था।
आस-पास छोटे-बड़े जंगल बिखरे पड़े थे और सबसे अद्भुत थी- इस निस्तब्ध चाँदनी रात में
चिड़ियों की अलग-अलग आवाजें! यही जयचाँद के शब्दों में "बरहरवा का
स्वर्ग" था। उसने कहा- कभी बरसात में यहाँ आईये, फिर देखिये जमीन पर हरियाली व
आकाश में काले बादलों का नजारा!
राजमहल की इन पहाड़ियों में मैं भटका तो हूँ,
मगर इस इलाके में पहली बार आया था और "चाँदनी रात" में पहाड़ी पर आने का
सपना भी बहुत दिनों बाद पूरा हुआ था!
ऐसा नहीं है कि हम बिलकुल
"प्राकृतिक" या "नैसर्गिक" वातावरण में थे। पश्चिम की पहाड़ियों
में जगह-जगह बिजली के बल्बों के समूह नजर आ रहे थे। कोई समझेगा, कालोनियाँ बसी हैं।
मगर हम जानते हैं कि वे पत्थर के खदान हैं, वहाँ भारी-भरकम "क्रैशर"
चलते हैं- रात और दिन! यहाँ से निकले "बोल्डर" और "चिप्स"
(कंक्रीट) दूर-दूर तक जाते हैं। ("पाकुड़ स्टोन" या "ब्लैक
स्टोन" का नाम शायद आपने भी सुना हो।) जयचाँद ने बताया कि अब तो सैकड़ों के.वी.
के जेनरेटर तथा विशालकाय जे.सी.बी. यहाँ चलते हैं। वास्तव में जेनरेटरों के मद्धम
आवाज हमें भी सुनायी पड़ रही थी। (वैसे, बिजली विभाग वालों की भी पर्याप्त मेहरबानी
इनपर रहती है!) पर चूँकि पंछियों का कलरव हमारे निकट था, इसलिए हम खुद को स्वर्ग
में ही महसूस कर रहे थे।
करीब आधा-पौन घण्टा हुआ होगा हमें गपशप करते
हुए कि स्वर्ग का नैसर्गिक वातावरण मशीन की गड़गड़ाहट से भंग हो गया। देखा- जिस सड़क
से हम आये थे, उसपर एक जे.सी.बी. कछुए की रफ्तार से चलता हुआ आ रहा है। यह
जे.सी.बी. उस किस्म का था, जिसके पहिए टैंक के पहियों-जैसे होते हैं। यह मिट्टी
खोदने के लिए पहाड़ की खड़ी चोटियों पर भी चढ़ जाता है। उसके पीछे दूसरा जे.सी.बी. भी
था। दोनों पहाड़ी की ओर बढ़ रहे थे।
लगता है, यहाँ के पंछियों को इन मशीनी
आवाजों की आदत पड़ चुकी है- वे पहले की तरह ही चहचहाने में व्यस्त रहे। करीब साढ़े
नौ बजे हम भी उठ खड़े हुए- स्वर्गलोक से मृत्युलोक में लौटने के लिए।
***
होली के बाद अररिया लौटने पर एक समाचार मिला
कि मध्य प्रदेश के मुरैना इलाके में खनन माफियायों ने एक पुलिस एस.पी. को ही ट्रैक्टर
से कुचलकर मार डाला! हमारे झारख़ण्ड के साहेबगंज और पाकुड़ जिलों में भी पत्थरों का
खनन होता है और वह भी खासे बड़े पैमाने पर। जंगलों की कटाई भी बेतहाशा हुई है। मगर "माफिया"
शब्द का इस्तेमाल यहाँ नहीं होता, या ऐसी कोई वारदात यहाँ नहीं हुई। शायद यहाँ खनन
कायदे से होता हो, या फिर, पुलिस-प्रशासन ने पत्थर-व्यवसायियों से हाथ मिला रखा हो।
एक और बात- सारे झारखण्ड में बस यही दो जिले बचे हैं, जो "नक्सलवाद" से
अछूते हैं।
मगर मैं सोचता हूँ, जिस रफ्तार से यह खनन व्यवसाय
फल-फूल रहा है, उसे देखते हुए "माफिया" या "नक्सलवाद" शब्द और
कितनी दूर रह गये होंगे हमसे....?
पुनश्च: बहुत बाद में पता चला कि जिस मशीन को हमने उस रात देखा था, उसे जे.सी.बी. नहीं, बल्कि 'पोकलेन' कहते हैं!
पुनश्च: बहुत बाद में पता चला कि जिस मशीन को हमने उस रात देखा था, उसे जे.सी.बी. नहीं, बल्कि 'पोकलेन' कहते हैं!
मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012
"सोलहवाँ बसन्त"
मेरठ नगर
से कुछ दूर एक शहर है- गढ़ मुक्तेश्वर।
वहाँ कुछ बदमाशों ने एक लड़की को तेजाब से
बुरी तरह जला दिया था।
यह 1987 के अगस्त की बात है। लड़की ग्यारहवीं
की छात्रा थी।
बदमाशों ने पहले घर की बिजली काट दी। ऊमस से
परेशान होकर परिवार आँगन में सोने आ गया। लड़की की छठी इन्द्रिय ने खतरे की सूचना
दी, मगर माता-पिता ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया। लड़की एक मोटे चादर से खुद को सर
से पाँव तक ढाँपकर सो गयी।
बदमाश दीवार फाँदकर आँगन में आये, लड़की के
मुँह से चादर खींचकर उन लोगों ने ढेर सारा तेजाब लड़की के चेहरे पर डाला और भाग गये।
***
बाद के दिनों में उस लड़की के चेहरे तथा शरीर
पर दो-चार नहीं, कुल अट्ठारह ऑपरेशन होते हैं। ज्यादातर मेरठ मेडिकल में, कुछ
अलीगढ़ में और कुछ दिल्ली के 'एम्स' में (स्वर्गीय राजीव गाँधी के सौजन्य से)। लड़की
जीना चाहती थी, और उससे भी बड़ी बात, उसके पिता उसे हर हाल में बचाना चाहते थे।
उनका परिवार मेरठ मेडिकल के बरामदे पर ही रहने लगा था।
***
1987 में ही, एक लड़का "मनोहर कहानियाँ" पत्रिका
में इस खौफनाक हादसे के बारे में पढ़ता है। इसे एक सामान्य अपराध कथा समझ कर वह इसे
भूल भी जाता है।
***
1995 में "जनसत्ता" अखबार में वह लड़का फिर उस
लड़की के बारे में एक लेख पढ़ता है। उसके दिलो-दिमाग में बिजली-सी कौंधती है। दिमाग
उसे आठ साल पहले "मनोहर कहानियाँ" में पढ़ी उस खौफनाक हादसे की याद
दिलाता है, तो दिल उसी वक्त फैसला लेता है- अब तो शादी इसी लड़की से करनी है!
"जनसत्ता" के सम्पादक (स्वर्गीय प्रभाष जोशी) के
माध्यम से लड़के का पत्र लड़की के पिता तक पहुँचता है। लड़की के पिता को लगता है कि
उनकी अधूरे चेहरे वाली बेटी को 'देखने' के बाद शायद लड़का अपना विचार बदल ले, इसलिए
वे पहले मेरठ आकर लड़की को देख लेने की सलाह लड़के को देते हैं।
***
लड़का तब ग्वालियर में होता है। मेरठ जाकर वह लड़की से मिलता
है। लड़की भी उसे पसन्द कर बैठती है। लड़की के साथ हुए हादसे का पूरा वाकया अँग्रेजी
पत्रिका "सेवी" में 'कवर स्टोरी' के रुप में छपा होता है। इसका
फोटोस्टेट लड़का अपने पिता के पास भेज देता है और अपना निर्णय भी बता देता है।
घर से उत्तर आता है- परम्परा के नाते एकबार लड़की के पिता को
लड़के के पिता से आकर मिलना चाहिए। ऐसा ही होता है- लड़की के पिता लड़के के पिता से
जाकर मिलते हैं।
***
1996 की "बसन्त पँचमी" के रोज मेरठ में एक सादे
समारोह में दोनों का विवाह होता है। दो दिनों बाद लड़के के भी घर में भी एक सादा
समारोह होता है। इसके बाद दोनों आसाम की हरी-भरी वादियों में चले जाते हैं। हाँ,
तबतक लड़के का तबादला ग्वालियर से तेजपुर में हो चुका था।
***
इसके बाद कुछ प्यार, कुछ तकरार, कुछ कष्ट, कुछ खुशियों के
बीच दिन गुजरते हैं... और आज वे अपनी विवाह का "सोलहवाँ बसन्त" मना रहे
हैं... पन्द्रह साल का एक किशोर बेटा है उनका।
***
साथियों, वह लड़की है- अंशु और वह लड़का मैं खुद हूँ- जयदीप।
सुना है कि हमारे पूर्वज बसन्त काल में
"मदनोत्सव" मनाया करते थे; यह भी सुना (और देखा भी) है कि
"फागुन" के महीने में अच्छे-अच्छे "बौरा" जाते हैं; और आजकल
सुना जा रहा है कि आज के दिन (14 फरवरी) को लोग "प्रेम की अभिव्यक्ति"
दिवस के रुप में मनाने लगे हैं... तो मैंने भी यह कहानी सुना दी।
क्योंकि मेरे लिए तो यही "प्रेम" है... यही मेरी
"प्रेम-कहानी" है... रविवार, 1 जनवरी 2012
नये साल का चिन्तन
एक अँधेरे कमरे से हम
अँधेरे को दूर नहीं कर सकते- अब अँधेरे को बोरे में भर-भर के तो बाहर ले जाकर नहीं
फेंक सकते न! हाँ, अँधेरे कमरे में हम प्रकाश को जरूर ला सकते हैं- तीली जलाकर,
तीली से दीपक जलाकर, या खिड़की-दरवाजे खोलकर, या फिर बिजली का बल्ब जलाकर।
"अँधेरे को दूर
करना" तथा "प्रकाश को लाना"- दोनों है तो एक ही बात, मगर
"सोच" या "प्रवृत्ति" बदल जाती है।
यह उदाहरण रजनीश का दिया
हुआ है।
***
जब से देश आजाद हुआ है,
तमाम योजनायें "नकारात्मक" प्रवृत्ति या सोच के साथ बनती आयी है- गरीबी
दूर करनी है, कुपोषण दूर करना है, अशिक्षा दूर करनी है, बेरोजगारी दूर करनी है, और
आजकल- भ्रष्टाचार दूर करना है! इसलिए शायद हमें सफलता नहीं के बराबर मिली है।
इन्हीं योजनाओं को अगर
"सकारात्मक" प्रवृत्ति या सोच के साथ लागू किया जाय- कि देश में खुशहाली
लानी है, लोगों को स्वस्थ बनाना है, हर किसी को शिक्षित बनान है, हर हाथ को रोजगार
देना है और देश में सदाचार लाना है... तो शायद परिणाम कुछ और ही दीखे।
कहने का तात्पर्य, पिछले
60-65 वर्षों से हम बोरे में भर-भर कर अँधेरे को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं,
अब हमें रोशनी जलाने का इन्तजाम करना होगा! इसकी शुरुआत 2012 में ही होनी चाहिए...
***
तो आईये, 2012 के नये साल
में हम सब मिलकर इस बार अपने महान देश भारतवर्ष, हिन्दुस्तान-ए-आज़म,
इण्डिया-दि-ग्रेट, के लिए शुभकामना व्यक्त करें- कि इसके पुनरूत्थान की शुरुआत इसी
साल हो...
आमीन! एवमस्तु!!
(ध्यान रहे- जब बहुत से लोग
अच्छा सोचते हैं, तभी कुछ अच्छा घटित होता है...)
रविवार, 4 दिसंबर 2011
जयचाँद के जलरंग...
सुन्दर, रंगीन जलरंगों को ('फोटोशॉप'
में) श्वेत-श्याम (ग्रे-स्केल) बनाते हुए बहुत दु:ख हो रहा था। मगर मैं जयचाँद दास के रंगीन चित्रों को ब्लैक एण्ड
व्हाईट बना रहा था और एक-एक करके "जंगल के फूल" ('पेजमेकर' में) के पन्नों में जोड़ रहा था। मुझे पता है कि पुस्तक के अन्दर के चित्रों को रंगीन
प्रिण्ट करना खर्चीला होता है, अतः अन्दर के चित्र तो सादे-काले ही छपेंगे।
मगर मैं इन खूबसूरत जलरंगों को गुमनाम भी नहीं रहने दे सकता।
अतः मैं इन्हें इण्टरनेट पर डाल रहा हूँ- बाकायदे "बनफूल" की उन चयनित
20 कहानियों के साथ, जो पुस्तक के रुप में छपने जा रही है।
कृपया इस लिंक को क्लिक करें और जयचाँद के चित्रों का आनन्द
लें कहानियों के साथ-साथ- http://jangal-ke-phool.webnode.com/
शनिवार, 26 नवंबर 2011
मेरी पसन्दीदा चार पुस्तकें
बँगला कथाकार "बनफूल" की एक कहानी है- 'पाठक की मृत्यु'
(बँगला में- 'पाठकेर मृत्यु')। इस कहानी में उन्होंने यह दिखाया
है कि एक समय जो पुस्तक हमें अच्छी लगती है, कोई जरूरी नहीं है कि एक अन्तराल के
बाद वही पुस्तक हमें फिर अच्छी ही लगे। बल्कि कई बार तो आश्चर्य होता है
कि इस पुस्तक को एक समय में मैंने पसन्द कैसे किया था? अर्थात् उस 'पाठक' की
मृत्यु हो जाती है, जिसने कभी इस पुस्तक को पसन्द किया था।
खैर, अपनी
चारों पसन्दीदा पुस्तकों को मैंने अपने जीवन के अलग-अलग कालखण्डो में पढ़ा है और अब
भी इन्हें मैं पसन्द करता हूँ।
1. "योगी कथामृत"
इस पुस्तक को मैंने 12-14
वर्ष की आयु में पढ़ा था। इसने मुझे
आध्यात्मिक बनाया। वर्ना मैं नास्तिक हुआ करता था। नास्तिकों की तरह बहस भी
कभी-कभार किया करता था। मगर इस पुस्तक ने जीवन के प्रति मेरा दृष्टिकोण ही बदल
दिया। मेरे अन्दर आस्था तथा विश्वास की एक शक्ति पैदा कर दी इस पुस्तक ने। जबकि
इसे मैंने 'समय बिताने' के उद्देश्य से हाथ में लिया था।
दर-असल, "गुरू पूर्णिमा" में मैं बिन्दुवासिनी
पहाड़ पर साथियों के साथ स्वयंसेवक के रुप में महाप्रसाद (खिचड़ी, मिली-जुली सब्जी
और आमड़े की चटनी) खिलाने में जुटा था। भोज समाप्त होने पर हमलोगों ने भी खाया और
उसके बाद भारी वर्षा शुरु हो गयी। हमें रुकना पड़ा। मैंने "झाजी काकू"
(पहाड़ के एक सन्यासी "बिल्ल्ट झा जी") से कुछ पढ़ने को माँगा और उन्होंने
यही किताब झाड़-पोंछ कर थमा दी।
जब पढ़ने में अच्छी लगी, तो इसे मैं घर ले आया। पिताजी ने भी
पढ़ा। उन्होंने कुछ ऐसा प्रचार किया कि बहुत-से लोग इसे मँगवाकर पढ़ने लगे।
हालाँकि सब पर एक जैसा असर नहीं होता। मेरे एक परिचित ने
मुझसे सुनकर इस पुस्तक को खरीदा, पर उन्हें अच्छा नहीं लगा। खैर। मुझे तो यह पसन्द
है। बाद में, यानि दो साल पहले मैंने 'फ्लिपकार्ट' (Flipcart.com)
से इसे फिर मँगवाया। और जब कभी
मन होता है कोई एक अध्याय पढ़ लेता हूँ- हृदय में आस्था-विश्वास की भावना और मजबूत
हो जाती है।
यह परमहँस योगानन्द की आत्मकथा है, जिसके अँग्रेजी संस्करण "Autobiography of a Yogi" की गिनती विश्वप्रसिद्ध पुस्तकों में होती है।
2. "उत्सव आमार जाति, आनन्द आमार गोत्र"
पुणे में रजनीश का आश्रम देखने गया था मैं। (तब मैं पुणे
में था- वायु सेना के लोहेगाँव स्थित यूनिट में- तैराकी के लिए।) हम कुछ भारतीय
दर्शनार्थियों को एक सन्यासी अन्दर ले गये और एक गाईड के रुप में सारा आश्रम
उन्होंने घुमाया। विदा करने से ठीक पहले, एक बुक स्टॉल पर हमें खड़ा किया गया, वहीं
मैंने इस पुस्तक को खरीदा था। यह 1988 की बात है। (पुस्तक पर पड़ी तारीख से दिन भी
बता सकता हूँ- 28 अगस्त।)
इस पुस्तक में रजनीश द्वारा 1 जून से 10 जून 1979 के दौरान
पुणे में दिये गये प्रवचन संकलित हैं, जो उन्होंने भक्तों द्वारा पूछे गये
प्रश्नों के उत्तर के रुप में दिये हैं। एक मानव के दिमाग में जितने तरह के प्रश्न
उठ सकते हैं, लगभग उन सबका उत्तर इसमें मिल जाता है। बीच-बीच में मुल्ला
नसीरूद्दीन के तथा कुछ अन्य चुटकुले इतना हँसाते हैं कि पेट में बल पड़ जाय!
पुस्तक का शीर्षक किसी बँगला कविता की एक पंक्ति है।
सम्भवतः रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता है।
आज भी, कभी-कभार पुस्तक को खोलकर कोई एक अध्याय पढ़ता हूँ और
पाता हूँ कि मस्तिष्क तरोताजा हो गया है।
3. "बसेरे से दूर"
इसे मैंने 28-30 की उम्र में पढ़ा था। इसमें लगता है,
'बनफूल' की 'पाठक की मृत्यु' का सिद्धान्त काम कर रहा है। अभी हाल में इसे मँगवाकर
जब मैंने इसके पन्ने पलटे, तो उतना रुचिकर नहीं लगा; जबकि पहली बार पढ़ते समय इसने
मेरे अन्दर विपरीत से विपरीत परिस्थियों में भी डटे रहने की भावना को बल दिया था। फिलहाल,
दो-चार दिनों का फुर्सत मिलते ही मैं इसे फिर से जरूर पढ़ूँगा।
यह "बच्चन" की आत्मकथा का तीसरा भाग है। पहले
मुझे यही पढ़ने का मौका मिला था, पहला भाग ('क्या भूलूँ क्या याद करूँ') पढ़ने का
मौका बाद में मिला।
वायु सेना में रहते हुए वहाँ के पुस्तकालयों से लेकर मैंने
ढेरों पुस्तकें पढ़ी थीं। मैं खुद को भाग्यशाली समझता हूँ कि मुझे यह अवसर मिला और
मैं आज भारतीय वायु सेना के प्रति हृदय से कृतज्ञता प्रकट करता हूँ।
4. "रूद्रप्रयाग का आदमखोर बाघ"
यह अब तक की आखिरी पुस्तक है, जो मुझे पसन्द है। जिम
कॉर्बेट की एक अमर रचना। 2003 या 04 में मैंने इसे पढ़ा। पढ़कर रख दिया। दो-चार
दिनों बाद जब पन्ने पलटा, तो फिर पढ़ने का मन करने लगा और मैं इसे दुबारा पढ़ गया।
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि एक पुस्तक को मैंने दुबारा पढ़ा हो, वह भी उसी चाव से।
इस पुस्तक के रोमांच के बारे में अब क्या बताया जाय! बस
इतना जान लीजिये कि एक रात हम कुछ वायुसैनिक ड्यूटी पर थे- एक एकान्त-से भवन में,
हल्के-फुल्के जंगलों के बीच। मेरे एक साथी ने मुझसे यह पुस्तक माँगी- पढ़ने के लिए।
पढ़ना शुरु भी किया, मगर 10-15 पन्ने भी शायद वे नहीं पढ़ पाये। रोमांच से सिहरकर
उन्होंने पुस्तक मुझे वापस कर दी। कहा- आप जब लौटा दोगे, तब पुस्तकालय से लेकर मैं
इसे पढ़ूँगा- दिन में!
जहाँ तक मेरी बात है, मैं इस पुस्तक के रोमांच से तो प्रभावित
हूँ ही। मैंने और भी कुछ सीखा है इससे, (यूँ कहा जाय- जिम कॉर्बेट से) जैसे-
1. जिस विषय को मैंने हाथ में लिया है, उससे सम्बन्धित
ज्यादा-से-ज्यादा जानकारियाँ प्राप्त करने की कोशिश करूँ।
2. जिस काम को जिस ढंग से किया जाना है, उसी ढंग से करूँ-
शॉर्टकट न अपनाऊँ।
3. 'सतर्कता' को अपने स्वभाव में लाने की कोशिश करूँ।
4. शरीर को आरामपसन्द न बनने दूँ।
5. अनुमान लगाने, विश्लेषण करने, आकलन करने में पारंगत बनने
की कोशिश करूँ।
6. मामूली-से-मामूली बातों, चीजों को भी नजरअन्दाज न करूँ।
इत्यादि-इत्यादि।
जिम कॉर्बेट की और भी रचनायें मैंने पढ़ी, मगर यह तो अद्भुत
रचना है!
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