रविवार, 26 जून 2011

गंगाजी पार करने के बहाने....

मनिहारी घाट... आषाढ़ के मेघ... गंगाजी...


फुहार में भींगते अभिमन्यु और अनिमेष


बरहरवा से अररिया आने-जाने के लिए मैं साहेबगंज तथा मनिहारी घाटों के बीच गंगाजी में चलने वाली स्टीमर सेवा को पसन्द करता हूँ। इसलिए नहीं कि यह (सैद्धान्तिक रूप से) सबसे छोटा तथा सस्ता रास्ता है, बल्कि इसलिए कि इस सफर में मैं- तमाम तरह की परेशानियों के बावजूद- एक अलग तरह के आनन्द का अनुभव करता हूँ, जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मैं खुद को भाग्यशाली समझता हूँ कि मेरी पत्नी (जो मेरठ की है, जिसने स्टीमर सिर्फ चित्रों में ही देखा होगा) तथा मेरा तेरहवर्षीय बेटा भी इस रास्ते तथा सफर को पसन्द करता है!
‘भद्रजन’ किस्म के लोग इस रास्ते पर कम ही चलते हैं- वे या तो भागलपुर में गंगाजी पर बने सड़क पुल से; या फिर, फरक्का में बने रेल-रोड पुल से गंगाजी को पार करना उचित मानते हैं। मैंने भी इन दोनों रास्तों को आजमाया, मगर सफर में हमेशा एक ‘परायेपन’ का अहसास पाया। इसके मुकाबले मनिहारी घाट पर पहुँचते ही जब गंगाजी के उस पार राजमहल की नीली पहाड़ियों की शृँखला दीखने लगती है, तब एक ‘अपनेपन’ का अहसास होता है। साहेबगंज घाट पर उतरने के बाद तो बरहरवा पहुँचने का अहसास होने लगता है...!
आम तौर पर जो दो स्टीमर चलते हैं- राजमहल तथा बृज- उन्हें एल.सी.टी. कहते हैं। ये ट्रकों को ढोने के लिए बने हैं। झारखण्ड से बोल्डरों, गिट्टियों से लदे ट्रकों को ये साहेबगंज घाट से मनिहारी घाट लाते हैं और फिर खाली ट्रकों को मनिहारी से साहेबगंज ले जाते हैं। सामने के खुले डेक पर एक बार में नौ ट्रकों को लेकर चलने में ये सक्षम हैं। अक्सर एक-दो ट्रकों के स्थान पर छोटे चौपहिया वाहनों को स्थान दिया जाता है। पिछले हिस्से में (इंजन कक्ष के ऊपर) दुमंजिले-तीनमंजिले पर यात्रियों के लिए स्थान है।
एक तीसरा स्टीमर भी है, जिसे अम्बा नाम दिया गया है। यह वास्तव में दो छोटे स्टीमरों को एक साथ बाँधकर बनाया गया है- इनमें से एक में छोटा डेक है, जिसपर छोटी गाड़ियाँ, गाय-भैंसें, ट्रैक्टर इत्यादि आ जाते हैं, तो दूसरे में सिर्फ यात्रियों को लेकर चलने की व्यवक्था है।
स्थानीय भाषा में इन तीनों स्टीमरों को लॉन्च या जहाज कहते हैं।
2008 में जब मैंने इस मार्ग पर चलना शुरु किया, तब स्टीमर का किराया प्रति व्यक्ति सात रूपया था; आज बीस रूपये हैं- महँगाई जो न कराये! 2008 से पहले भी 1985-90 के दौरान दो-चार बार मैंने इस मार्ग से यात्रा की थी- क्योंकि मेरी बड़ी दीदी का विवाह अररिया में हुआ है। (आज अररिया में मैं उनके घर के पास ही रहता हूँ।)
***
पिछले 18 जून को हमलोग बरहरवा जा रहे थे। (दरअसल मेरा भांजा ओमू अररिया आया हुआ था, उसी के साथ-साथ हमलोगों ने भी बरहरवा चलने का कार्यक्रम अचानक बना लिया।)
मनिहारी घाट पर वर्षा शुरु हो गयी- बचपन की बरसात याद आ गयी, जब हफ्तों तक बादल घिरे रहते थे- जब-तब वर्षा होते रहती थी- हवायें चलती थीं... । वैसा ही मौसम हो गया- सारा आकाश काले बादलों से ढक गया... जोरों की हवायें चलने लगीं... रह-रह कर वर्षा... स्टीमर पर भीड़... हमारे कपड़े कभी बर्षा की बूँदों से भींगते तो कभी हवायें उन्हें सुखा देतीं...
लो आ गया स्टीमर...
साहेबगंज में जब हम ट्रेन में बैठे, तब एक बुजुर्ग सहयात्री ने जानकारी दी- इधर तो पिछले तीन दिनों से ऐसा मौसम है... अगले चार दिनों तक रहेगा.... चक्रवात है।
वाकई ऐसा ही रहा। जमाने बाद महसूस हुआ कि आषाढ़ का महीना बरसात का होता है-  वर्ना जून तो जून, जुलाई का पहला-दूसरा हफ्ता भी आकाश में काले बादलों को ढूँढ़ते हुए बीत जाता है... ।
स्टीमर से उतरते ट्रक...
20 को हम फरक्का गये- जाफरगंज में मेरी छोटी दीदी रहती है- उनके पास।
बेटा अभिमन्यु गंगाजी में खूब नहाया। मैंने उसे तैराकी का पहला अध्याय- लेग बीट सिखाने की कोशिश की और खुद सिर्फ ‘लेग बीट’ के बल पर अच्छी स्पीड में तैर कर दिखाया।  मगर तैराकी कोई एक दिन में सीखने की चीज तो है नहीं। बेटे ने घर आकर माँ से शिकायत की- पापा ने तैरना नहीं सिखाया।
स्टीमर की खुली छत पर बरसाती हवाओं और फुहार का आनन्द...
2005 में जब मैं भारतीय वायु सेना से सेवामुक्ति लेकर घर आया था, तब अभिमन्यु की उम्र सात साल थी और मैं तभी उसे तैराकी सिखाना चाहता था। मगर वह बरहरवा के तालाबों के पानी में उतरने को तैयार नहीं था और मैं कुछ कारणों से घर पर एक छोटा-सा स्वीमिंग टैंक नहीं बनवा पाया! (मैं खुद तैराकी के चारों स्ट्रोक जानता हूँ- क्राउल स्ट्रोक (फ्रीस्टाईल) में तो मैं ‘परफेक्शन’ की हद तक माहिर हूँ! भारतीय वायु सेना का यह उपकार है मुझपर!) खैर।
जाफरगंज में ही मेरी (कोटालपोखर वाली) चचेरी बहन भी रहती है, उनसे मिलने गया, तो बोली- अच्छा हुआ तुमलोग आये, यहाँ आम खराब हो रहे हैं- कोई खाने वाला नहीं है! उनका आम का बाग है। स्वादिष्ट मालदाकिस्म के आम हमने खाये भी और घर भी लेकर आये!
उस पार... राजमहल की पहाड़ियाँ...
22 जून को जब भोर साढ़े तीन बजे ‘अपर इण्डिया’ से साहेबगंज के लिए रवाना हुए, तब ‘चक्रवात’ का असर खत्म हो गया था। (ट्रेन का नाम भले ‘वाराणसी-मुगलसराय एक्सप्रेस’ है, मगर पुराने लोग इसे अब भी अपर इण्डिया ही कहते हैं। एक जमाने में- 1987 से पहले- यह एक शानदार ट्रेन हुआ करती थी- बरहरवा होकर दिल्ली-कोलकाता को जोड़ने वाली यह एकमात्र ट्रेन थी! पता नहीं, इसे फिर कभी बनारस के बजाय मुगलसराय होते हुए दिल्ली तक चलाया जायेगा या नहीं!)
आ रहा है... साहेबगंज घाट...
हम साढ़े पाँच बजे ही साहेबगंज घाट पर थे। मगर पता चला कि पहला स्टीमर भोर चार बजे और दूसरा साढ़े चार बजे ट्रकों को लेकर (मनिहारी के लिए) खुल गया है। कम-से-कम एक स्टीमर को तो नियत समय पर- साढ़े छह बजे- खुलना चाहिए था। मगर क्या किया जाय- एल.सी.टी. को असली फायदा ट्रकों से ही होता है। अम्बा आजकल इस रास्ते पर नहीं है। पहला स्टीमर साढ़े सात बजे तक मनिहारी से लौटकर आयेगा। हम समझ गये कि अब हमें कटिहार से (अररिया के लिए) सुबह नौ बजे वाली ट्रेन नहीं मिलेगी, बल्कि अब बारह बजे वाली मिलेगी।
खैर, साढ़े सात बजे स्टीमर आया आया, आठ बजे करीब खुला और करीब डेढ़ घण्टे के सफर के बाद हम मनिहारी घाट पर उतरे। अभिमन्यु को मनिहारी घाट की कचौड़ियाँ बेहद पसन्द है। हमने नाश्ता किया। अब भी हमारे पास डेढ़ घण्टे का अतिरिक्त समय था।
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बरहरवा जाते समय... ट्रेन की खिड़की से...
मैंने सुझाव रखा- हर बार सोचते हैं कि मनिहारी में बनफूल के घर का पता लगायेंगे, मगर हर बार हड़बड़ी में ऐसा नहीं कर पाते, क्यों न इस बार इस काम को पूरा कर ही लें! दो-चार स्थानीय लोगों से पूछ्ताछ करने के बाद बनफूल के घर का पता चल गया। हम रिक्शा लेकर निकल पड़े।

वापसी... साहेबगंज घाट... स्टीमर का इन्तजार...

देखा- रिक्शा उसी रास्ते से गुजर रहा है, जिसपर बरहरवा में पेरे पड़ोस की एक बहन का घर है! चूँकि हमें मनिहारी चौक से कटिहार के लिए गाड़ी भी पकड़नी थी, इसलिए हमने सोचा- इस बार उसके घर पर नहीं उतरेंगे। मगर पड़ोसिनों ने पहचान लिया और आवाज देने लगीं- अरे, गलती से रिक्शा आगे जा रहा है... । (प्रसंगवश, कटिहार से मनिहारी तक छोटी लाईन को हटा कर बड़ी लाईन बिछा दी गयी है- सुना था, जनवरी में ही ट्रेन चलने लगेगी, मगर अब तक तो नहीं चली है। अतः अभी हमें मनिहारी से तिपहिया या चौपहिया पकड़कर कटिहार जाना होता है और कटिहार से जोगबनी जाने वाली ट्रेन पकड़नी होती है।)
हम उतरे। बहन भी नाराज हुई- बिना मिले जा रहे हो। (उसके खुद के भाई कभी यहाँ आते नहीं, इसलिए हमारे आने पर वह बहुत खुश होती है।) हमने समझाया- बनफूल का घर इस बार देखना है, समय कम है। वह मान गयी- लेकिन बहन के घर के पास से बिना पानी पीये आप गुजर रहे थे- यह अच्छी बात नहीं! हमने पानी पीया।
"बनफूल" का घर...
बँगला के सुप्रसिद्ध लेखक बनफूल का जन्म मनिहारी में हुआ था- यह जानकारी मुझे कुछ समय पहले ही मिली थी, वर्ना मैं समझता था कि उनका जन्म भागलपुर में ही हुआ होगा। बनफूलके सात या आठ छोटे भाई थे। अभी सिर्फ सबसे छोटे भाई श्री उज्जवल मुखर्जी यहाँ रहते हैं। मैंने बँगला में उन्हें अपना उद्देश्य बताया- हम बनफूल उस घर का फोटो खींचना चाहते हैं, जहाँ उनका जन्म हुआ था! हमारे अनुरोध पर उन्होंने घर में कार्यरत एक युवक (नाम मैं भूल रहा हूँ) को निर्देश दिया- चाभी लेकर जाओ, वह घर दिखा दो। थोड़ी दूरी पर ही वह घर था- जहाँ बनफूल का जन्म हुआ था तथा बचपन बीता था। पक्का घर है, छत टालियों की है। सामने खूबसूरत बाग है। मकान की दाहिनी ओर चबूतरा है- उधर से भी प्रवेश का रास्ता है। सम्भवतः यहीं बैठक जमती होगी। घर का बड़ा हिस्सा कभी जल गया था, उसे फिर से नहीं बनवाया गया है। सरकार (बिहार, बंगाल या केन्द्र) की ओर से इस घर को स्मारक बनाने की शायद कोई कोशिश नहीं की गयी है। हाँ सहरसा से कटिहार होकर कोलकाता जाने वाली एक ट्रेन का नाम जरूर बनफूल के एक प्रसिद्ध उपन्यास हाटे-बाजारे पर रख दिया गया है।
हम हिन्दी भाषी भी बनफूल को कम ही जानते हैं। मैंने थोड़ी जानकारी तथा कुछ कहानियों का हिन्दी अनुवाद अभी इण्टरनेट पर डाला है। आगे और भी डालने का इरादा है। लिंक है- http://bonofulstories.blogspot.in/ 
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ऐसा नहीं है कि इस छोटी-सी छुट्टी में सब कुछ अच्छा ही हुआ। फरक्का में मेरी चचेरी बहन ने बताया उनकी बड़ी बहन (जो पटना में रहती हैं) का छोटा बेटा कोटालपोखर में मोटरसाइकिल दुर्घटना का शिकार हो गया है। हालाँकि डरने की बात नहीं है, मगर पटना से बड़ी दीदी कोटालपोखर पहुँच चुकी है और फरक्का से यह दीदी भी आज ही दोपहर बाद कोटालपोखर के लिए रवाना होने जा रही थीं।
फरक्का से बरहरवा आने पर इससे भी दुःखद समाचार मिला- चौलिया में हमारे गुनू काकू ताड़ के पेड़ से कंक्रीट की सड़क पर आ गिरे और अपने कमर की हड्डियाँ तुड़वा बैठे! चौलिया हमारा पैतृक गाँव है और गुनू काकू रिश्ते में पिताजी के मौसेरे भाई होते हैं। उनकी उम्र पचपन-साठ से क्या कम होगी? हालाँकि ताड़ के पेड़ पर चढ़ने के लिए अब वे पाश का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि पेड़ों के साथ लम्बे-लम्बे बाँस बाँधकर उन्हीं के गाँठों पर निकली सीढ़ीदार छोटी ‘कमचियों’ के सहारे चढ़ते हैं; मगर देखा जाय तो यह उम्र नहीं है इस काम के लिए। खासकर तब, जब पिछले ही वर्ष उनका बेटा एक अर्द्धसैन्य बल में भर्ती हो चुका है। उन्हें पाकुड़ से राँची स्थानान्तरित करने की बात चल रही थी- बेहतर ईलाज के लिए।
न तो मैं बीस किलोमीटर दूर कोटालपोखर जा पाया और न ही सात किलोमीटर दूर चौलिया। क्योंकि मुझे बैंक से इस शर्त पर छुट्टी मिली थी कि हमारे खजाँची साहब किसी सेमिनार में भाग लेने राँची जाने वाले हैं और मुझे 23 जून को लौटना ही है! ...वायु सेना के दिन याद आ गये- साठ दिनों की वार्षिक तथा तीस दिनों की आकस्मिक- कुल नब्बे दिनों की छुट्टी एक साल में। आपात्कालीन परिस्थिति में टेलीग्राम भेजकर छुट्टी बढ़वाने की सुविधा... ।
"बनफूल" के घर के बाहर...
कटिहार से बारह बजे जो ट्रेन चली, वह दसेक मिनट चलकर ही खेतों के बीच घण्टे भर के लिए रूक गयी... मारे उमस और गर्मी के हम सब उबल गये! तीन बजे डेरे पर आकर- जैसाकि होता है- कुछ देर आराम करने के बजाय श्रीमतीजी साफ-सफाई में जुट गयीं और अगली सुबह बीमार पड़ गयीं।  
जीवन भी गंगाजी-जैसी एक नदी है, जिसके दो किनारे हैं- सुख और दुःख....
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शुक्रवार, 4 मार्च 2011

रक्तदान (...और अभिमन्यु का जन्म)


पहला रक्तदान
      जहाँ तक याद है, यह 92-93 की सर्दियों की बात है। ग्वालियर के सेना अस्पताल में हम लगभग दस वायुसैनिक पहुँचे थे रक्तदान के लिए।
मध्यरात्रि का समय था।
पोद्दार को दिल्ली ले जाने के लिए ए.एन.-32 विमान आनेवाला था और विमान में भी उसे रक्त चढ़ाना जारी रखना था। मात्र तीन बोतल बी-पॉजीटिव रक्त की जरूरत थी, जबकि देने वाले दस पहुँच गये थे। वायु सेना के सिक क्वार्टर्स में चूँकि रक्त निकालने की सुविधा नहीं थी, इसलिए हमें एम.एच. (आर्मी अस्पताल) लाया गया था।
      दो वायुसैनिक रक्त देकर लौटे, तब तक मैं चुप बैठा था। मुझे खून देखकर डर लगता था और इस डर को मिटाने के लिए ही मैं रक्तदान के लिए आया था। जब तीसरे वायुसैनिक रक्तदान के लिए जाने लगे, तब मैंने उन्हें रोका और अपनी बात बतायी।
      वे हँसने लगे। वे एक सीनियर कॉर्पोरल थे- लम्बे, गोरे और स्मार्ट। बोले, भाई, मैं नौ बार रक्तदान कर चुका हूँ और आज इस संख्या को दहाई में पहुँचाने का मेरा इरादा था। लेकिन अब तुम ही जाओ।
      अन्दर जाकर मैंने आर्मी के मेडिकल असिस्टैण्ट को भी अपनी बात बतायी। वे बोले, डर लगता है तो छोड़िये। यहाँ तो कई लोग मौजूद हैं।
      मैंने कहा, मुझे इस डर को ही तो मिटाना है।
      खैर, रक्तदान के दौरान तो कुछ नहीं हुआ, मगर रक्तदान के बाद क्षण भर के लिए मुझे चक्कर जरूर आ गया। हुआ यूँ कि सूई निकालने के बाद मुझे हाथ को केहुनी से मोड़कर दबाकर रखने के लिए कहा गया, मगर मैंने इस निर्देश को गम्भीरता से नहीं लिया। हाथ मोड़कर हल्के-से मैंने कुछ देर दबाये रखा और फिर हाथ को सीधा कर दिया।
      फिर क्या था- जहाँ से खून लिया गया था, वहाँ से रक्त की एक धारा निकल पड़ी और खून बहता देख मैं क्षणभर के लिए लड़खड़ा गया।
      मुझे तुरन्त लिटाया गया, बेल्ट ढीली की गयी, जूते उतार दिये गये, बाद में एक ग्लास ग्लूकोज भी दिया गया। हालाँकि यह सब गैर-जरूरी था। एक-दो सेकेण्ड के बाद ही मैं सामान्य हो गया था।

दूसरा रक्तदान
      दूसरा रक्तदान भी मैंने ग्वालियर के सेना अस्पताल में ही जाकर किया, मगर यह आपातकालीन परिस्थिति नहीं थी।
यह कोई रक्तदान शिविर था।
      सुबह का खुशनुमा माहौल था। हम चार-पाँच वायुसैनिक साइकिल चलाते हुए शिविर तक आये थे और बहुत ही खुशी-खुशी हमने रक्तदान किया।
एक आर्मी अधिकारी ने टिप्पणी भी की- क्या बात है, ये एयर फोर्स वाले तो बड़े हँस-हँस कर ब्लड डोनेट कर रहे हैं...।
रक्तदान के बाद मजे से साइकिल चलाते हुए हम वापस लौटे थे।

तीसरा रक्तदान
      तीसरे रक्तदान का मौका 96-97 में मिला।
      मैं हलवारा (लुधियाना के पास) में था। एक एक्स-सार्जेण्ट की पत्नी का लुधियाना के कैन्सर अस्पताल में ऑपरेशन हुआ था, दो बोतल खून चढ़ाया जा चुका था, अब अगले दिन बदले में दो बोतल खून जमा करना था।
      हम दो वायुसैनिक (दूसरे वरिष्ठ थे- जे.डब्ल्यू.ओ.) उन एक्स-सार्जेण्ट के साथ कैन्सर अस्पताल पहुँचे।
      अब मैं विवाहित था और इस बार मुझे श्रीमतीजी का डर दूर करना था, सो उन्हें लेकर मैं गया था।
      दरवाजे में लगे शीशे से वे मुझे रक्तदान करते हुए देखती रहीं।
      बाहर आकर मैंने कहा, देखा, यह कुछ भी नहीं था।
***
      श्रीमतीजी ने अगली छुट्टियों में घर में इस बात का जिक्र कर दिया।
पता नहीं, माँ पर क्या असर हुआ, मगर पिताजी ने बुलाकर मुलामियत से कहा- ज्यादा रक्तदान मत करो।

चौथा रक्तदान और अभिमन्यु का जन्म
      मेरा चौथा (और अब तक का अन्तिम) रक्तदान सिर्फ आधे बोतल खून का था, मगर यही रक्तदान सबसे महत्वपूर्ण रहा।
      श्रीमतीजी हलवारा में ही वायु सेना अस्पताल में भर्ती थीं।
97 के नवम्बर की बात है।
अचानक टेलीफोन द्वारा मुझे खबर दी जाती है कि ‘सीजेरियन’ ऑपरेशन करना होगा, ए-पॉजीटिव खून की व्यवस्था करनी है।
मैं सेक्शन से श्री एस. सिंह को साथ लेकर अस्पताल पहुँचा, उनका ब्लड ग्रुप ए-पॉजीटिव था।
      श्री एस. सिंह के खून की जाँच के लिए हम लैब में गये, वहाँ देखा, मेडिकल असिस्टैण्ट एक महिला का रक्त लेने की व्यवस्था कर रहे हैं। मैंने उस महिला को पहचाना- वे वार्ड में मेरी पत्नी के बगल वाले बेड पर थीं। उनका सात दिन का नवजात शिशु था, जिसे ‘इंक्युबेटर’ (ट्यूब-लाईट की रोशनी में) में रखा गया था। जन्म से पीलिया होने पर ऐसा करते हैं शायद।
      वे आर्मी के एक जवान की पत्नी थीं। जवान को छुट्टी नहीं मिली थी, मगर जवान की माँ, अर्थात् नवजात की दादी माँ जरूर अस्पताल में मौजूद थीं।
      मैंने कहा, इनका तो छोटा-सा बच्चा है न?
      हाँ, मेडिकल असिस्टैण्ट ने बताया, इन्हीं के बच्चे के लिए आधा बोतल खून लेना है, ...कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
      मगर मुझे फर्क पड़ा। 
कौन-सा ग्रुप चाहिए? मैंने पूछा।
      बी-पॉजीटिव।उत्तर आया
      मेरी जान-में-जान आयी। मैंने कहा, मेरा खून ले लीजिये- बी-पॉजीटिव है, इन्हें जाने दीजिये।
      क्या बात करते हैं, आप खुद अपनी पत्नी के ऑपरेशन को लेकर परेशान हैंमेडिकल असिस्टैण्ट का कहना था
      आधे बोतल खून से क्या फर्क पड़ता है... इस बार मैंने कहा
      इसके बाद के घटनाक्रम तेजी से घटे और बिलकुल अप्रत्याशित रहे।
      मेरा आधा बोतल खून उस सात दिनों के नन्हें बच्चे को चढ़ाया गया... बच्चे की दादी माँ ने गुरू नानकदेव जी का नाम लेकर मुझे आशीर्वाद देना शुरू कर दिया... अस्पताल का जेनरेटर खराब हो गया... मेरी पत्नी को ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकाला गया... मेरी सासु माँ और मेरी मौसेरी बहन ने उन्हें जमकर मेथी के पराँठे खिला दिये... जेनरेटर ठीक हुआ... अंशु (मेरी पत्नी का नाम) को फिर बुलाया गया... लेडी डॉक्टर ने पूछा- कुछ खाया तो नहीं?... जाहिर है, उसदिन ऑपरेशन रद्द हो गया... ।
      ...अगले दिन अस्पताल की कोई और तकनीकी चीज खराब हो गयी... डॉक्टर (शायद श्रीमती झा नाम था) ने मुझे बुलाकर कहा- कुछ सामान थैले में डालो, हम जालन्धर एम.एच. जा रहे हैं... देर करना ठीक नहीं, तुरन्त ऑपरेशन होना चाहिए...
      जालन्धर मिलिटरी हॉस्पिटल काफी दूर था... एम्बुलैन्स में हम वहाँ पहुँचे... डॉ. झा ने अंशु को भर्ती करवाया... शाम तीन बज गये थे शायद... मैं एम्बुलैन्स में ही हलवारा लौट आया... अगले दिन वहाँ पहुँच कर पाया- सुबह ग्यारह बजे मेरे बेटे अभिमन्यु का जन्म हो चुका था!... नॉर्मल डिलिवरी... सीजेरियन ऑपरेशन की जरूरत नहीं पड़ी; सम्भवतः एम्बुलैन्स की लम्बी यात्रा ने ‘लेबर पेन’ शुरू करने में मदद की।
      (बेटे का नाम पहले से तय था। अगर बेटी होती, तो उसका भी नाम तय था- उत्तरा।)
      यह नवम्बर की तेरह तारीख थी।
     वार्ड से बाहर आते वक्त देखा- एक स्थान पर श्रद्धाभाव के साथ कौव्वाली चल रही है- मिलीटरी हॉस्पिटल के अन्दर!
मैंने आश्चर्य से पूछा, यहाँ क्या है?
      उत्तर मिला, यह पीर बाबा का मजार है, और आज वृहस्पतिवार है न!...
      ***
      बिजली की तरह पिछले दिनों की कुछ बातें मेरे दिमाग में कौंध गयी-
...विवाह के बाद से ही अंशु का कहना कि उसने सपने में पीर बाबा के मजार को देखा है और उसे किसी मजार पर जाना है...
...विवाह के बाद हम डेढ़-पौने-दो साल तेजपुर (आसाम) में रहे, वहाँ किसी पीर बाबा के मजार का न होना...
...हलवारा में वायुसेना स्थल जाने के रास्ते में ही एक पीर बाबा के मजार का होना, मगर हमारा वहाँ न जा पाना...
...अंशु को साँस लेने में तकलीफ... कई घण्टों तक उसे कृत्रिम ऑक्सीजन पर रखना... और उस दिन का वृहस्पतिवार होना... (हम किराये के एक रोशनदान-विहीन कमरे में रहते थे... हमारा सामान तेजपुर से पहुँचा नहीं था... भीषण गर्मी थी... कुल-मिलाकर हम बहुत कष्ट में थे...)
...अंशु को रक्तस्राव की शिकायत... हफ्ते भर का बेडरेस्ट... और उस दिन का भी वृहस्पतिवार होना...
...फिर एक वृहस्पतिवार को हमारा पीर बाबा के मजार पर जाना और उस दिन के बाद से तकलीफों का अन्त हो जाना...
...और आज मेरे बेटे का जन्म जालन्धर के मिलीटरी हॉस्पिटल में हुआ, जहाँ कि पीर बाबा का मजार है... और आज वृहस्पतिवार है... जमकर भक्ति से ओत-प्रोत कौव्वालियाँ चल रही हैं...
मैंने जाकर मत्था टेका।
बाहर से लड्डू लाकर मजार पर चढ़ाया। वार्ड में भी बाँटा।
जालन्धर से लौटते समय मेरी बस जाम में फँसी। कोई धार्मिक जुलूस था। मैंने पूछा- आज क्या है?
गुरू नानकदेव जी का जन्मदिन! उत्तर मिला।
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हलवारा आने पर वृहस्पतिवार को हम अभिमन्यु को लेकर पीर बाबा के मजार पर गये। लोगों ने कहा- सात दिन के बच्चे को वहाँ मत ले जाओ, वह कब्रिस्तान है!
मगर हम लेकर गये... ठण्ड थी, अभिमन्यु को गर्म कपड़ों में हमने लपेट रखा था... उसे मजार के पायताने पर लिटाकर हमने प्रार्थना की- इसकी रक्षा तुम्हारे हाथों में है...
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जालन्धर से अंशु और अभिमन्यु को लाते समय मैं प्रसिद्ध लवली स्वीट्स से ढेर सारे लड्डू ले आया था।
वायु सेना अस्पताल में जब लड्डू देने गया, तो एम.एन.एस. की चीफ (मलयाली थीं) मुस्कुरा कर बोलीं, स्वीट्स तो हम नहीं ले सकते, और फिर, डिलीवरी भी तो यहाँ नहीं हुई।
मैंने कहा, मैडम, ये लवली स्वीट्स के लड्डू हैं।
लवली स्वीट्स? वे फिर मुस्कुराकर बोलीं, फिर तो हम 'ना' भी नहीं कर सकते
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बुधवार, 2 मार्च 2011

'अथ मोबाइल काण्ड'


रविकान्त और शशीकान्त दोनों भाई हैं रविकान्त बरहरवा में ही रहकर अपना व्यवसाय करता है, जबकि शशीकान्त बैंक ऑव इण्डिया में है
जब हम अरविन्द पाठशाला में पढ़ते थे, तब बिहार सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किये गये कुछ नवीण प्रयोगों तथा उन्हें वापस लिये जाने के कारण दो कक्षायें मिलकर एक हो गयीं थीं, जिसके कारण रविकान्त और शशीकान्त एक ही कक्षा में आ गये और दोनों हमारे दोस्त बन गये
2005 से 08 के बीच जब मैं बरहरवा में आजाद पंछी की तरह रह रहा था (वायु सेना से अवकाश लेने तथा स्टेट बैंक में शामिल होने के बीच का समय), तब मुन्शी पोखर की नुक्कड़ पर राजेश की चाय-दूकान और बिहारी की पान-दूकान के बीच जो बेंच पड़ी रहती है, वहाँ मैं सुबह-शाम कुछ देर के लिए जरूर पाया जाता था वहीं रविकान्त (दोस्तों की जुबान में बोले तो- ‘रबिया’) से अक्सर मुलाकात होती थी
आपबीती सुनाने का उसका अन्दाज इतना दिलचस्प है कि सुननेवाला घण्टों मंत्रमुग्ध होकर सुनता रह जाय कई किस्से मैंने उसके मुँह से सुने एक किस्से को मैंने लिख डाला मैंने ‘उत्तम पुरूष’ में लिखा था- खुद को रविकान्त मानते हुए उसे पढ़ाया उसने सहमति दी और मैंने उसे मन मयूर के एक अंक में उसी के नाम से छाप दिया
(उन दिनों डी.टी.पी. मेरा पेशा और त्रैमासिक पत्रिका (मन मयूर) निकालना मेरा नेशा (नशा का बँगला उच्चारण) हुआ करता था)
तो उसी रचना को आज मैं आप के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ:-



 
बात कोई डेढ़ साल पहले की है। सोते समय मैं अपना मोबाइल दो तकियों के बीच में रखता था। ऑफनहीं करता था- कि क्या पता कब किसका इमर्जेंसी फोन आ जाय। की-पैडभी मैं लॉक नहीं रखता था- इस तरफ मैंने कभी ध्यान ही नहीं दिया था।
      उस रात कोई डेढ़-दो बजे किसी प्रकार से मेरे मोबाइल का एक नम्बर बटन दब गया और इस नम्बर बटन ने फास्ट डायलिंगके तहत मेरे छोटे भाई शशीकान्त के फोन में घण्टी बजा दी। मेरा भाई भागलपुर में रहता है। डेढ़-दो बजे रात मोबाइल की घण्टी से उसकी आँखें खुलीं। फोन उठाकर देखा तो पाया- घर से भैया (यानि मेरा) का फोन आ रहा है। इतनी रात गये घर से फोन आने का मतलब है जरुर कोई गम्भीर बात है- सोचकर उसने फोन रिसीव किया। वह ‘‘हैलो भैया, हैलो-हैलो-’’ करता रहा। इधर मैं तो गहरी नीन्द में था। मैं कहाँ से जवाब देता!
      उधर फोन पर कोई जवाब न पाकर शशी चिन्तित हो गया। एक तो भैया फोन काट नहीं रहा है, ऊपर से जवाब नहीं दे रहा है- बात क्या है? इसी बीच फोन पर उसे कुछ ऐसी आवाज सुनाई पड़ी कि मानों कोई किसी का गला दबा रहा हो। दरअसल सोते समय मेरी थोड़ी नाक बजती है। तो नाक बजने की और साँस चलने की आवाजों को मेरे मोबाइल ने तकिये के नीचे से कुछ इस प्रकार ग्रहण किया कि मेरे भाई को मेरे दम घुटने का आभास हो गया।
      शशी के दिमाग ने तुरन्त अनुमान लगाया- हो-न-हो, जरुर किसी बदमाश ने घर में घुसकर भैया का गला दबा रखा है और भैया ने मुझे खतरे की सूचना देने के लिए बस किसी तरह फास्ट-डायलिंगसे फोन कर दिया है! हो सकता है- कई बदमाश हों। घर में लूट-पाट चल रही हो। भैया ने विरोध किया होगा तो एक उनका गला दबाकर सीने पर बैठ गया होगा! ...ऐसे मौकों पर इस तरह के ख्याल आते ही हैं।
      शशी ने अपनी पत्नी को जगाया। अपने अनुमानित खतरे के बारे में उसे बताकर उसने दूसरे फोन से घर के बेसिक टेलीफोन पर फोन करने के लिए कहा। खुद उसने मोबाइल नहीं छोड़ा- क्या पता भैया कब कुछ बोले!
      उसकी पत्नी ने हमारे घर के बेसिक टेलीफोन पर फोन किया। डेढ़-दो बजे रात में फोन की घण्टी बजे तो कभी-कभी फोन उठाने में आलस होता ही है। मेरी मम्मी ने भी एक-दो बार फोन नहीं उठाया। इससे मेरे भाई की चिन्ता और बढ़ गयी कि नीचे भी घर में कोई फोन क्यों नहीं उठा रहा है?
      खैर, वे लोग फोन करते रहे और अन्त में मेरी मम्मी ने फोन उठाया। शशी ने तुरन्त उनसे पूछा, ‘‘ऊपर कमरे में क्या चल रहा है?’’
      ‘‘क्यों क्या हुआ?’’ मम्मी ने पूछा।
      ‘‘भैया ने यहाँ मेरे मोबाइल पर फोन किया है, मगर कुछ बोल नहीं रहे हैं। सिर्फ गला घोंटने की-सी आवाज आ रही है। फोन काट भी नहीं रहे हैं। एक बार जाकर देखो- ऊपर सब ठीक तो है?’’ शशी ने बताया।
      ऐसी परिस्थिति का वर्णन सुनकर किसी को भी डर लग सकता है। मेरी मम्मी ने नीचे से ही मुझे आवाज देना शुरु किया। मेरी नीन्द है गहरी। वो तो मेरी पत्नी ने मुझे जगाया कि नीचे से मेरी मम्मी आवाज दे रही है। मैंने बिस्तर से ही पूछा, ‘‘क्या बात है मम्मी?’’
      ‘‘एकबार नीचे आओ तुम।’’ मम्मी का कहना था।
      ‘‘मैं इस वक्त नीचे नहीं आ सकता।’’ मैंने नीन्द की खुमारी में ही जवाब दिया।
      मेरे इस जवाब का कुछ और ही असर हुआ। सबने समझ लिया कि जरुर कुछ गड़बड़ है। मम्मी घबराहट में आवाज देकर बार-बार यह कहने लगी कि बस एक बार नीचे आओ।
      आखिर मैं नीचे आया।
      ‘‘क्या बात है- इतनी रात गये-?’’ मैंने पूछा।
      जवाब में मेरी मम्मी ने मुझे मेरे भाई का फोन मुझे पकड़ा दिया।
      ‘‘सब ठीक तो है- इतनी रात में फोन कर रहे हो?’’ मैंने भाई से पूछा।
      ‘‘फोन तो तुमने मुझे कर रखा है।’’ कहकर मेरे भाई ने सारी बात बताई। ऊपर से अपना मोबाइल लाकर मैंने देखा, सचमुच मेरे मोबाइल का मीटर ऑन था।
      अब मैंने समझाया कि भाई गलती से कोई बटन दब गया होगा, जिससे तुम्हें फोन लग गया। रही-सही कसर मेरी नाक बजने की आवाज ने पूरी कर दी होगी। ऐसी-वैसी कोई बात नहीं है।
      सबको समझा-बुझा कर कि सब ठीक है- मैं फिर सोने आ गया। भोर का उजाला होते ही भाई का फिर फोन आया। उसका कहना था, ‘‘रात में मुझे परेशानी से बचाने के लिए तो तुमने बोल दिया होगा कि कोई बात नहीं। अब तो सच-सच बता दो...’’
      वो दिन था और आज का दिन है- मैं अपने मोबाइल का की-पैडहमेशा लॉकरखता हूँ, ताकि फिर कभी गलती से कोई नम्बर न दब जाए.....



आज शशीकान्त (दोस्तों का ‘शशिया’) हाँग-काँग में पदस्थापित है पिछले साल हाँग-काँग जाने से पहले उसकी इच्छा हुई कि वह पुराने साथियों के साथ जमकर होली मनाये क्योंकि वह तीन वर्षों के लिए सपरिवार विदेश जा रहा था
फिर क्या था- हम बीस-पच्चीस दोस्त जुट गये होली के दिन- प्रमोद (चीकू, उर्फ ‘चिकुआ’) की दूकान पर इतने दोस्तों के पहुँचने का अनुमान प्रमोद को नहीं था मैंने ही बहुतों को फोन कर दिया था सॉफ्ट-ड्रिंक कम पड़ गया मिल-बाँट कर हमने खाया-पीया
हाटपाड़ा से दिलीप (सपन) तो कोलकाता से आये हुए मनोजीत को ले आया था, जिससे हम ’84 के बाद  पहली बार मिल रहे थे! (1984 में हमने मैट्रिक दिया था और बरहरवा में हमारा बहुत बड़ा सर्कल है- याद कीजिये, दो कक्षायें मिलकर एक हो गयी थीं)
एक जुगाड़ गाड़ी किराये पर ली गयी. उसी पर हो-हल्ला करते हुए हमने बरहरवा का चक्कर लगाया पता चला- बी.डी.ओ. साहब के यहाँ जबर्दस्त तैयारियाँ हैं होली की मस्ती थी ही, हम वहाँ भी पहुँच गये बहाना- सर, आपने भी ’84 में मैट्रिक दी है और हम सब भी वही हैं बरहरवा के इस धाकड़ समूह से मिलकर मिलकर बी.डी.ओ. साहब को अच्छा ही लगा 
अन्त में मेरे घर डेरा डला पकवानों के दौर के साथ गाना-बजाना और हँसी-ठिठोली हुई दोपहर बाद वहाँ से स्टेशन चौक आकर हम एक-दूसरे से विदा हुए
शाम को हम सबको बड़ा पछतावा हुआ कि जुगाड़ लेकर हम बी.डी.ओ. के पास तो गये, मगर अपने पुराने शिक्षकों- हजारी बाबू, गोपाल बाबू, इत्यादि के पास जाने की याद नहीं रही! यहाँ तक कि नन्दकिशोर सर (जो फिलहाल दुमका में रहते हैं और इस बार होली-मिलन समारोह में भाग लेने खास तौर पर आये हुए थे) से भी मिलने का ध्यान नहीं रहा, जिनका कि घर मेरे घर के बगल में ही है! अगर हम कुछ किलोमीटर दूर तीनपहाड़ जाकर अपने प्रधानाध्यापक कुमुद बाबू से मिल आते, तो यह सोने पे सुहागा हो जाता! खैर, फिर कभी। ईश्वर हमारे शिक्षकों को अच्छा स्वास्थ्य तथा लम्बी आयु प्रदान करे।
अभी फरवरी में घर गया था, तो घनश्याम (लिलिपुट) ने बताया कि वह इस बार होली में बरहरवा में नहीं रहेगा। मेरे ऊपर भी करनाल जाने का दवाब है। (पिछली दुर्गापूजा में ट्रेन रद्द होने के कारण जाना नहीं हो पाया था। इस बार अपना छोड़कर परिवार का मैंने रिजर्वेशन करा रखा है। मेरे जाने- न जाने का फैसला अन्तिम घड़ी में ही होगा।) बैंक से छुट्टी मिलेगी या नहीं, पता नहीं। उधर कोलकाता से कैलाश का फोन आ गया चुका है कि इस साल वह खास तौर पर होली मनाने बरहरवा आ रहा है- और मुझे हर हाल में होली वाले दिन बरहरवा में ही रहना है।
अब देखिये, क्या होता है...
ईति।