शुक्रवार, 13 मई 2022

269. वर्षा-जल संग्रहण- मेरा आइडिया


 

       वर्षा-जल संग्रहण या रेन-वाटर हार्वेस्टिंग का अर्थ हुआ कि वर्षा-जल को नालियों में नहीं बहाना है, बल्कि ऐसी कोई व्यवस्था करनी है कि यह जल धरती के अन्दर रिस जाय। इसके तकनीकी पहलुओं की हमें जानकारी नहीं है। हमने बस अपनी कल्पना-शक्ति का इस्तेमाल करते हुए अपने 'उत्सव भवन' में इसकी व्यवस्था की है।

       छत का वर्षा-जल पाईप के माध्यम से नीचे आकर एक हौज में गिरता है। हौज कुएं से सटकर बना है। हौज के फर्श पर ईंटों की चिनाई जरूर है, मगर प्लास्तर नहीं है। इसलिए हौज में कितना भी पानी गिरे, कुछ घण्टों में वह जमीन में रिस जाता है। रिसने के बाद मिट्टी से छनते हुए इस जल को फिर कुएं में ही आना है।

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       विडियो में आप देखेंगे कि हौज में दो फौव्वारे लगे हुए हैं। ये भी मेरी कल्पना-शक्ति की उपज हैं। इस तकनीक के फौव्वारे हमने कहीं देखे नहीं हैं। छत पर पानी की एक टंकी से ये दोनों फौव्वारे जुड़े हुए हैं। चाबी खोलते ही फौव्वारे चालू हो जाते हैं। किसी 'मोटर' या 'पम्प' की जरुरत नहीं। इनका पानी इसी हौज में गिरता है। यह पानी फिर जमीन में रिसकर कुएं में पहुँच जाता होगा।

       फौव्वारे के निर्माण में साधारण पाईप और साधारण गमलों का इस्तेमाल हुआ है। कहीं हमने ऐसा देखा नहीं है, बस सोच-विचार कर इस तरह के फौव्वारे हमने बनवा दिये हैं।

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बुधवार, 27 अप्रैल 2022

268. कुछ नुस्खे (गर्मियों वाले)

 

       इन गर्मियों में मेरे द्वारा आजमाये जाने वाले कुछ नुस्खे इस प्रकार से हैं (ये सारे नुस्खे 'पर्यावरण-मित्रता' वाले हैं)-

 


       ठण्डा पानी। नीचे मिट्टी का घड़ा है और ऊपर 'कैण्डल' वाला फिल्टर। फिल्टर से साफ पानी घड़े में टपकता है और मिट्टी के घड़े में ठण्डा पानी रहता है। ज्यादा शुद्ध पानी चाहिए, तो मटके में ताम्बे की एक छोटी-सी लुटिया डुबाकर रखी जा सकती है। यह भी हमने किया था कभी, बेशक अभी यह किया हुआ नहीं है।

 


ठण्डा बिस्तर। यह खजूर के पत्तों की चटाई है। इससे बेहतर- बल्कि बेहतरीन- चटाई होती है बेंत के छिलकों से बनी चटाई, पर वह हमारे इलाके में मिलती नहीं है। (एक बार मिली थी।) रात सोने से पहले इसे पानी में भिंगोकर बिस्तर पर बिछा दिया जाता है। फिर इस पर सोने में आराम मिलता है। (हाँ, सिरहाने पर DC Fan है, यानि बैटरी से चलने वाला पंखा और बैटरी को- बिना बिजली के- सोलर-प्लेट से भी चार्ज किया जा सकता है- सब जानते ही हैं।)

 


कामचलाऊ बाथटब। बाथरूम को पहले ही हमने बड़े आकार का बनवाया था। उसके एक कोने में एक पक्का हौज बनवा लिया। अब गर्मियों में यह बाथटब का काम देता है। अभी इसकी जो डिजाइन है, उसके चलते इसमें ज्यादा पानी आता है। इसमें कुछ मॉडिफिकेशन करना है- राजमिस्त्री को समझा दिया गया है। तब इसमें जरा कम पानी आयेगा।

 


उपवन नहीं वन। घर के आस-पास सजावटी उपवन बनाने के बजाय हमने छोटे-छोटे वन ही उगने दिये हैं। इससे उन स्थानों का तापमान- गर्मियों में- जरा कम रहता है और थोड़ी-सी राहत मिलती है। बेशक, थोड़ी-सी जगह बैंगन-टमाटर-भिण्डी आदि के लिए भी है- लेकिन दिक्कत यह है कि हमें बागवानी का शौक नहीं है।

 



छत पर छाँव। एक छोटी छत के ऊपर अस्बेस्टस की छावनी डाल दी गयी है, ताकि गर्मियों में छत ज्यादा गर्म न हो। मुख्य छत के ऊपर क्या बनेगा- इसका अन्तिम निर्णय अभी हुआ नहीं है, इसलिए फिलहाल इसे गर्मी से बचाने के लिए इस पर थर्मोकोल की शीट डाल दी गयी है। (आठ शीट कम पड़ गयी हैं- कभी डाल देंगे।)

 


 धूप से खाना पकाना। जब गर्मियों में धूप तेज होती है, तो क्यों न इस तेज धूप का उपयोग खाना पकाने में किया जाय? यानि "सोलर कुकर" का इस्तेमाल किया जा रहा है खाना पकाने के लिए।

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गुरुवार, 17 मार्च 2022

267. 'अर्जुन कुल्फी'

 


       पहली तस्वीर में अर्जुन जी हैं। इनकी कुल्फी हमारे बरहरवा में प्रसिद्ध है। सबसे बड़ी बात है कि इन्होंने कभी कुल्फी की गुणवत्ता- क्वालिटी से समझौता नहीं किया है। इलाके के आबाल-वृद्ध-वनिता सभी इनकी कुल्फी को पसन्द करते हैं और आज तक किसी को भी शिकायत का मौका इन्होंने नहीं दिया है। मेरे ख्याल से, तीस-चालीस सालों से वे कुल्फी बना रहे हैं और आज "अर्जुन कुल्फी" एक विश्वनीय ब्राण्ड के रूप में जाना जाता है हमारे बरहरवा में।

       पाँच साल पहले जब हमलोग माँ-पिताजी की हीरक जयन्ती- डायमण्ड जुबली मना रहे थे, तब सुबह घर में हवन हुआ था और शाम के समय छोटे-से प्रीतिभोज का आयोजन हुआ था। मई का महीना था, सबका कहना था कि आइस्क्रीम की व्यवस्था होनी चाहिए। तब हमने आइस्क्रीम की व्यवस्था करने के बजाय अर्जुन जी से कहा था कि वे शाम को अपना ठेला लेकर ही हमारे घर आ जायें और मेहमानों को कुल्फी खिला दें- जो जितना खाना चाहे। ऐसा ही हुआ था।  

       एक और बात- होली के दिन वे "भांग वाली कुल्फी" भी बनाते थे- अब बनाते हैं कि नहीं, पता नहीं- पूछना भूल गये। हो सकता है कल-परसों उनके पास भांग वाली होली स्पेशल कुल्फी भी मिले...

       (भांग का नशा बहुत बुरा होता है- सही बात है, पर जिन्दगी में एक बार अगर होली के दिन भांग का नशा नहीं चढ़ा, तो हमें नहीं लगता कि जिन्दगी को "सम्पूर्ण" माना जाना चाहिए। बस पूरी जिन्दगी में एक बार, दुबारा आजमाना मूर्खता होगी।)

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       दूसरी तस्वीर में जो नौजवान "अर्जुन कुल्फी" खा रहा है, वह अभिमन्यु है। पूरा नाम- अभिमन्यु शेखर।

       जहाँ आजकल के नौजवान कानों के ऊपर महीन बाल रखते हैं- मतलब ऐसा फैशन चला हुआ है, वहीं साहबजादे कानों के ऊपर लम्बे बाल रखना पसन्द करते हैं; 1970 के दशक में विनोद मेहरा, फारूक शेख-जैसे अभिनेता जैसे बाल रखा करते थे। (हालाँकि वह इन अभिनेताओं के नाम से भी परिचित नहीं होगा शायद।)

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गुरुवार, 10 मार्च 2022

खजुराहो की प्रस्तर प्रतिमाओं के रेखाचित्र

घर के किसी कोने में रखा एक पैकेट मिला, जिसमें कुछ कतरन वगैरह रखे हुए थे। 
उसी में 15 रेखाचित्र भी मिले। 
ये रेखाचित्र हमने करीब 30 साल पहले बनाये थे। तब हम ग्वालियर में थे और वहाँ से खजुराहो घूमने जाने की योजना बना रहे थे। लाइब्रेरी से खजुराहो पर एक मोटी-सी अँग्रेजी पुस्तक उठा लाये- जानकारी हासिल करने के लिए। उसमें बहुत सारी प्रस्तर प्रतिमाओं के छायाचित्र भी थे। लगे हाथ हमने छायाचित्रों को देख-देख कर इन रेखाचित्रों को बनाया था। 
रेखाचित्रों पर कुछ नम्बर भी पड़े हुए नजर आये, जिससे हम अनुमान लगा रहे हैं कि हमने शायद 50 के लगभग चित्र बनाये थे। 
अन्त में- सफाई दे दी जाय कि हमने न तो विधिवत चित्रकारी सीखी है और न ही कभी अभ्यास किया है। बस एक नैसर्गिक गुण है कि थोड़ी-बहुत चित्रकारी कर सकते हैं।
 
 












 

 
 

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2022

266. मिर्जाचौकी स्टेशन पर

 

       बीते नवम्बर महीने की बात है। उसी समय लिख देते, तो बढ़िया रहता। कुछ-कुछ भूलने भी लगे हैं।

       हमारे इलाके में (मालदा डिविजन, ईस्टर्न रेलवे) सवारी रेलगाड़ियाँ अलमस्त तरीके से चलती हैं। लॉकडाउन के बाद से कुछ ज्यादा ही अलमस्त हो गयी हैं- वैसे, हाल-फिलहाल की स्थिति नहीं पता।

       नवम्बर में अंशु को (पड़ोस की एक महिला के साथ) साहेबगंज जाना था 'गायत्री परिवार' के एक शिविर में भाग लेने और हमें उससे भी आगे मिर्जाचौकी जाना था- 'क्रीम' लेने।

क्रीम वाली बात को थोड़ा स्पष्ट किया जाय। 2014-15 में हम नियमित रूप से मिर्जाचौकी जाया करते थे नौकरी के सिलसिले में। वहाँ एक नाश्ता दूकान में मेरी साइकिल खड़ी रहती थी, उससे दस किलोमीटर दूर भगैया जाया करते थे। वहीं की शाखा में मेरी पोस्टिंग थी तब। जीप, बस अक्सर जाम में फँस जाती थी और खूब गुस्सा आता था, इसलिए साइकिल की व्यवस्था कर ली थी हमने। पत्थर लदे ट्रकों की भयंकर आवाजाही है उस इलाके में। खैर, तो प्लेटफार्म के किनारे एक शम्भू यादव जी दूध से क्रीम निकालने का काम करते थे- अब भी करते हैं। उनसे हम दो-चार किलो क्रीम ले आया करते थे, फिर घर में उसी क्रीम से घी बनता था।

जब मेरा स्थानान्तरण मेरे गृहनगर में हो गया, तब भी बीच-बीच में जाया करते थे क्रीम लाने। फिर ऐसा हुआ कि शम्भू यादव का जो आदमी क्रीम लेकर ट्रेन से पाकुड़ जाया करता था, उसी से लेने लगे- फोन पर पहले सम्पर्क कर लेते थे। फिर आया मनहूस लॉकडाउन, सब कुछ ठप्प हो गया। इधर-उधर से एक-दो बार घी लेकर देखा, पसन्द नहीं आया। ब्राण्डेड कम्पनी तक के घी में धोखाधड़ी थी- सिर्फ ऊपर-ऊपर बढ़िया घी था, नीचे मिलावटी। फिर फोन किया शम्भू यादव जी को, पता चला, ट्रेनों की दुर्गति के कारण अब उनका आदमी पाकुड़ नहीं जाता, इसलिए हमें ही मिर्जाचौकी जाना होगा। ...इस प्रकार, मेरा मिर्जाचौकी जाना हो रहा था।

जिस ट्रेन को सुबह साढ़े नौ बजे आना था, वह आयी ग्यारह बजे के बाद। उसे आते ही वापसी की यात्रा करनी थी, पर वह खड़ी रही कोई डेढ़ घण्टे तक। 70 किलोमीटर के सफर को उस ट्रेन ने तय किया कोई तीन घण्टों में। यानि शाम चार बजे के आस-पास हम शम्भू यादव जी सामने थे। वे बोले, "खाना हुआ है?" वे समझ गये थे कि मेरा दोपहर का खाना छूट ही गया होगा। हमने कहा, "नहीं।" वे बोले, "बगल में लिट्टी बन रही होगी, बढ़िया लिट्टी बनती है- आग में सेंकी हुई, जाकर खा लीजिए।" 


 

क्रीम लेकर हम बगल में चले गये। लिट्टी-चोखा खाने लगे। बता दें कि मिर्जाचौकी झारखण्ड का अन्तिम स्टेशन है, इसके बाद बिहार शुरू हो जाता है, इसलिए यहाँ की संस्कृति बिहार-जैसी ही है। मेरे बगल में बैठे सज्जन ने हमें कहीं दूर का आदमी समझा, जानना चाहा कि मेरा घर कहाँ है? हमने बताया कि हम पास के ही हैं- बरहरवा के।

उन्होंने दो रिश्तेदारों के नाम लिये, जो बरहरवा में हैं, यह भी बताया कि एकबार वे बरहरवा के 'रामनवमी मेले' में गये थे और फिर कहा कि बचपन में वे अपनी माँ की दादी के साथ बरहरवा में "जोगेन डाक्टर" के यहाँ जाते थे दवा लाने। उनकी माँ का दादीघर तालझारी में है।

हमने कहा कि "जोगेन डाक्टर" मेरे दादाजी थे। इस पर और भी कुछ बातें उन्होंने मेरे दादाजी के बारे में बतायीं- कहा, "आपके घर में "गन्धभजिला" नाम की लता हुआ करती थी, मेरी माँ की दादी उनकी पत्तियाँ तोड़कर लाती थीं फिर उनके पकौड़े बनाकर हम लोगों को खिलाती थीं, पेट के इसे अच्छा माना जाता था, लेकिन पीसते समय इन पत्तियों से बदबू आती थी।"

हमें भी "गन्धभजिला" की याद है। जब इनकी पत्तियों को पीसा जाता था, बहुत बदबू फैलती थी। हम बच्चे इसके पकौड़ों को खाना नहीं चाहते थे, पर हमें खाने के लिए कहा जाता था।

एक और बात बतायी उन्होंने कि मेरे दादाजी अपने खेत के चावल दिया करते थे उनकी माँ की दादी को कि ले जाओ, खीर बनाकर खाना। यह मेरे लिए बिलकुल नयी जानकारी थी। अभी तक बहुत-से पुराने लोगों ने हमसे यह कहा कि वे लोग बचपन में मेरे दादाजी के पास आते थे दवा लेने, लेकिन दादाजी घर का चावल भी दे दिया करते थे- ऐसा जिक्र किसी से हमने अब तक नहीं सुना था।

अभी हमलोगों का जो चावल खेतों से आता है, उसमें एक सुगन्धित चावल भी आता है, जिसे हमारे भागीदार लोग "खिस्सापाति" चावल कहते हैं। इस चावल का इस्तेमाल आम तौर पर खीर बनाने में होता है, पर अंशु इसे रोज के खाने में इस्तेमाल करती है। इसलिए खास हमारे लिए यह चावल गाँव से थोड़ी ज्यादा मात्रा में आता है। हमने अंशु से कह रखा था कि इस चावल के आने के बाद मुहल्ले के कुछ घरों में (खासकर, जिनका अपना खेत नहीं है) में थोड़ा-थोड़ा दे दिया करो और कहो कि कभी-कभी खीर और पुलाव बनाकर खाईएगा। इसके अलावे, आषाढ़ पूर्णिमा और कार्तिक पूर्णिमा के दिन यह चावल हम बिन्दुवासिनी पहाड़ में दे आते हैं- खिचड़ी या/और खीर बनाने के लिए। उन दो दिनों यही प्रसाद होता है। इस बार भी बाकायदे अंशु ने चावल कुछ घरों में दिये हैं। सरस्वती पूजा के विसर्जन वाले दिन खिचड़ी बनाने के लिए भी यह चावल दिया गया। मेरा कहना था कि इस तरह थोड़ा-बहुत चावल बाँटने से चावल कभी कम नहीं पड़ेगा, उल्टे "बरकत" होगी। उस दिन मिर्जाचौकी में उन सज्जन के मुँह से दादाजी द्वारा अपने मरीजों को घर का चावल दिये जाने की बात सुनकर हमें समझ में आया कि मेरे स्वभाव में यह धारणा कहाँ से आयी!  

 

खैर, थोड़ा समय इधर-उधर बिताकर, जिस नाश्ता दूकान में साइकिल रखते थे, उससे भेंट करके जब हम वापस प्लेटफार्म पर आये- वापसी की ट्रेन पकड़ने के लिए, तब रात हो गयी थी। प्लेटफार्म पर बैठे एक सज्जन ने बँगला में टोका, "और चल दिये बरहरवा?" हमने 'हाँ' में जवाब दिया और रूककर पूछा कि क्या आप हमें पहचानते हैं? वे बोले, "अरे अभी तो शाम को बातचीत कर रहे थे लिट्टी खाते समय।" ये वही सज्जन थे, अभी ट्रैक-सूट में थे। वे साथ हो लिए। ट्रेन में देर थी। एक लम्बी कुर्सी पर बैठकर वे अपने बारे में बताने लगे।

दो साल पहले वे रेलवे से रिटायर हुए थे, यहीं पैतृक जमीन पर 2200 वर्गफीट का (शायद इतना ही बताया था उन्होंने) दोमंजिला मकान बनवाया था लाखों खर्च करके, आठ-नौ लाख रुपये (शायद इतना ही कहा था उन्होंने) देकर बेटे का एजुकेशन लोन चुकाया था और इस प्रकार, रिटायरमेण्ट में मिले पैसे खर्च हो गये थे। अब गुजारा पेन्शन से हो रहा था।

फिर वे मोबाइल में बेटे की तस्वीरें दिखाने लगे- स्मार्ट युवक था। कई तस्वीरें दिखायीं उन्होंने- यह जब UNO में था, यह जब इजरायल में नेशनल सिक्युरिटी की पढ़ाई कर रहा था, यह दिल्ली में NSO के अपने ऑफिस में...। बताया कि इसकी माँ इस पढ़ाई को नहीं समझ सकी थी, जबकि वे प्रिंसिपल हैं- पाकुड़ में, उन्होंने समझा और बेटे का हौसला बढ़ाया। इसी पढ़ाई के लिए एजुकेशन लोन लेना पड़ा था।

हमने मन में सोचा कि कितने भाग्यशाली व्यक्ति हैं ये! बेटा इतनी अच्छी पोजीशन में है, पिता का नाम रोशन कर रहा है। हमने प्रशंसा करते हुए कहा कि बहुत अच्छा लड़का है।

वे पल भर चुप रहे, फिर आह भरकर बोले, "क्या फायदा... आज दो साल से बेटे से बातचीत बन्द है... कोई सम्बन्ध नहीं रखता हमसे... "

मेरा चौंकना स्वाभाविक था, "यह क्या बात हुई?"

उनका कहना था, "दो साल पहले जब रिटायर हुए, तो अपनी पैतृक जमीन पर बसने का फैसला किये। पत्नी से झगड़ा हो गया। वे पाकुड़ की हैं, बड़े घर कीं, बढ़िया सरकारी नौकरी है और वे मुझे पाकुड़ में ही बसाना चाह रही थीं। बेटा भी माँ की तरफ हो गया और उन दोनों से सम्बन्ध खत्म हो गया।"

"फिर भी आपने बेटे का एजुकेशन लोन चुकाया... जबकि वह अच्छी नौकरी करने लगा था- ?" मेरा सवाल था।

"पिता का फर्ज निभाया हमने। वादा भी कर रखा था।" निराश और हताश स्वर में वे बोले, "अब तबियत भी ठीक नहीं रहती, दिल की बीमारी हो गयी है।"

मेरे पास सही में कहने के लिए कुछ नहीं था। चुपचाप बैठे रहे हम।

ट्रेन आने की घोषणा हुई, हमने कहा कि मिलकर अच्छा लगा, फिर कभी आने पर भेंट करेंगे।

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