मंगलवार, 26 जनवरी 2021

242. "उत्सव भवन" का पहला कार्यक्रम

 


       जिन्दगी एक रंगमंच है- सुख-दुःख के दृश्य आते-जाते रहते हैं। शो चलते रहता है और हम सब अपनी-अपनी भूमिका निभाते रहते हैं।

ऐसे तो अभी हमारे "उत्सव भवन एवं प्राँगण" में बहुत काम बाकी है, पर हमने सोचा कि जो कार्यक्रम अपने घर में मनाया जाना है, क्यों न उसे "उत्सव भवन" में ही मना लिया जाय।

       ...तो अपने घर में गायत्री-परिवार द्वारा सुबह सिर्फ हवन करवाया गया। शाम की पार्टी "उत्सव भवन" में ही आयोजित हुई (मकर-संक्रान्ति के दिन यहाँ पूजा हो चुकी थी)।

दरअसल, बीते कल- यानि 25 जनवरी को- को हमारे विवाह की पच्चीसवीं वर्षगाँठ थी। 

 


         यू-ट्युब पर विडियो अपलोड होने में समय लगता है, इसलिए फिलहाल तीन ही विडियो के लिंक साझा कर रहे हैं। बाकी बाद में देखा जायेगा।

1. जब लालू भैया ने हमें जोड़े में डान्स करने को कहा और शुभंकर ने कोई नया गाना बजाया, तो हमने कहा कि हम तो अपने जमाने के गाने पर ही डान्स कर सकते हैं- 


 

 


2. मेरी साली साहिबा ने इस अवसर पर हमारे परिवार की कुछ लड़कियों के साथ एक डान्स प्रस्तुत किया-

 



3. ये हैं पैन्थर्स! यानि मेरे क्लासमेट। जब गाना पूछा गया, तो हमारी ओर से कहा गया- बजाया जाय- रम्बा हो-


 


 और बहुत-सी तस्वीरें और विडियोज फेसबुक पर श्रीमतीजी के प्रोफाइल पर हैं। उनके अल्बम के लिंक दे रहे हैं: 

 

विडियोज का अल्बम 

 (सिर्फ Feed View में दिखा रहा है, Grid View में नहीं)

सभी विडियोज के सेक्शन का लिंक

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

241. मुनमुन

 


       विभिन्न कारणों से साल 2020 ज्यादातर लोगों के लिए दुःखदायी रहा। मेरे लिए यह इसलिए मनहूस रहा कि जाते-जाते यह मेरी प्यारी चचेरी बहन को हमसे छीन ले गया!

अब मुनमुन के ठहाके बस यादों में सुनायी पड़ेंगे। दरअसल, बात करते समय बीच-बीच में "हाः-हाः-हाः-हाः-" के जोरदार ठहाके लगाना उसकी आदत में शामिल था- तकिया-कलाम की तरह।

वह मुझसे तीन साल छोटी थी। दादाजी मुझे "मोनू" और उसे "मोनी" कहा करते थे। वह मुझे बहुत पसन्द करती थी और हम भी उसके प्रति बहुत लगाव महसूस करते थे।

जब हम छोटे हुआ करते थे, तो 9 जुलाई हमारे घर में एक उत्सव के समान होता था। चाचा-चाचीजी उसका जन्मदिन बहुत ही धूमधाम से मनाया करते थे।

अब 9 जुलाई के साथ-साथ हर साल 25 दिसम्बर को भी उसकी बहुत याद आया करेगी। इसी दिन वह हम सबसे विदा हुई- सदा के लिए।

अगले 25 जनवरी को हम अपनी वैवाहिक रजत-जयन्ती मनाने जा रहे हैं। इसके लिए कितनी तैयारियाँ कर रखी थी उसने। बेटे को जैकेट दिलवा दिलवा दिया था, रिजर्वेशन करवा लिया था, पति को भी साथ चलने के राजी कर लिया था, जाने कितने परिचितों से कह रखा था...

फोन पर अंशु से कह रखा था उसने- भाभीजी, मुझे दोसा बहुत पसन्द है, मेरे लिए प्लेन-दोसा जरूर बनवाईयेगा।  

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