रविवार, 13 मार्च 2016

160. सुहाने मौसम का फायदा


       कल दिन में कुछ ज्यादा ही गर्मी थी। रात ढलने तक गर्मी रही। उसके बाद तेज हवाओं का चलना शुरु हुआ, जो भोर होने तक जारी रहा। नतीजा, अगला दिन- यानि आज का दिन सुहाना हो गया। हम भी निकल पड़े।
       पहले बिन्दुवासिनी मन्दिर में जाकर हमने पूजा की। देखा, 108 सीढ़ियों पर टाईल्स बैठाते हुए उन्हें नया रुप दिया जा रहा है। कुछ दिनों बाद ही होने वाले रामनवमी महोत्सव में आने वाले श्रद्धालु नयी सीढ़ियाँ चढ़कर मन्दिर तक आयेंगे। फिर वहीं पहाड़ी में एक तरफ नाश्ता किया। श्रीमतीजी घर से परांठे ले आयी थीं और वहाँ माणिक'दा की दूकान से घुघनी ले लिया गया।





       इसके बाद हमलोग बिन्दुवासिनी पहाड़ के पीछे बोरना या घोड़ाघाटी पहाड़ की तरफ चले गये, जहाँ पत्थरों के खदान और क्रशर हैं। ये पहाड़ियाँ कभी हरे-भरे जंगलों से ढकी होती थी। खदान और क्रशर तब भी हुआ करते थे, पर एक तो उनकी संख्या कम थी और दूसरे, काम सिर्फ दिन में होता था। अब बड़े-बड़े डीजी सेट लगाकर रात-दिन काम होता है, खदानों-क्रशरों की संख्या अन्धाधुन्ध तरीके से बढ़ गयी हैं, लगभग सारे प्लाण्ट फुल्ली ऑटोमेटिक हो गये हैं, जेसीबी, पोकलेन मशीनों की मदद ली जाती है और जहाँ चार-छह पहियों वाले ट्रकों में पत्थरों की ढुलाई होती थी, वहाँ डम्पर और दस-बारह पहियों वाले ट्रक अब चलते हैं। कहने की जरुरत नहीं कि लगभग 80 से 90 प्रतिशत खनन अवैध तरीकों से होता है। हम-आप कुछ नहीं कर सकते क्योंकि झारखण्ड में मंतरी से संतरी तक सब अपना-अपना हिस्सा लूटने में लगे हुए हैं और लूट रहे हैं। यहाँ तक कि रेलवे और बैंक-जैसी संस्थायें भी इस बहती गंगा में हाथ धो रही हैं। कोढ़ में खाज के समान लकड़ी-माफिया अलग से इन पहाड़ियों में सक्रिय है। अगर आपने पिछले पन्द्रह वर्षों में हमारे झारखण्ड से जुड़ी कोई "सकारात्मक" या "अच्छी" खबर सुनी हो, तो जरुर बताईयेगा- मेरे तो कान तरस गये हैं ऐसी कोई खबर सुनने के लिए!

       खैर, इस तरह की बातें मैं अपने इस ब्लॉग में नहीं लिखता (इसके लिए अलग ब्लॉग है और वह भी फिलहाल बन्द है), फिर भी लिख दिया, क्योंकि है तो यें हमारे "आस-पास" की बातें ही।
       पहाड़ियों के तरफ जाते समय हमने सन्थालों की कुछ झोपड़ियों की तस्वीरें खींची। इन झोपड़ियों की प्रशंसा में हम क्या कहें, आप चित्र देखकर खुद ही समझ जाईये।





       वापस लौटते समय हमने नहर के पास सड़क के किनारे से "सेनवार" की झाड़ियों की कुछ फुनगियाँ तोड़ लीं। इन पत्तियों को गेहूँ और चावल के साथ रखने पर कीड़े- खासकर, "सूण्डा" कीड़ा, जो किसी भी स्थिति में पैदा हो ही जाता है- नहीं लगते। पिछले साल हमने यही किया था और अब तक हमारे अनाज कीड़ों से  सुरक्षित हैं। "सेनवार" का यह गुण राजन जी ने बताया था, वे बहुत सारे विषयों के जानकार हैं। उनसे पहले जब मैंने चौलिया के किसानों से पूछा था, तो तड़ाक् से उत्तर मिला था- "टैबलेट" डालकर रखो! मैंने जानना चाहा कि कौन-सा टैबलेट, तो पता चला, वे "सल्फाल" की गोलियों की बात कर रहे हैं! मैंने हैरान होकर कहा- वह तो जहर है! जवाब मिला- और कोई इलाज नहीं है। बताईये, जो चावल-गेहूँ उपजाते हैं, उनकी मानसिकता ऐसी है। इसी प्रकार, जैविक खाद की बातों पर वे हँसते हैं, कहते हैं- बिना रासायनिक खाद डाले कुछ उपजेगा ही नहीं! जी तो करता है, मैं खुद ही दो-एक साल खेती करके उनकी आँखें खोल दूँ, पर छोड़ देता हूँ।

       हाँ, नहर की बात पर एक संशोधन जरुरी है। बिहार-झारखण्ड में नहर की बात सुनकर किसी को भी चौंक जाना चाहिए! नहरें तो हमारे प्रथम प्रधानमंत्री महोदय ने पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में बनवायी थीं- पिछड़े इलाकों को तो राम-भरोसे छोड़ दिया गया था। दरअसल, 1980 के आस-पास राजमहल की गंगा को गुमानी नदी से जोड़ने की एक योजना बनी थी कभी, जो बाद में ठण्डे बस्ते में चली गयी। बिन्दुवासिनी पहाड़ी के पीछे दो-तीन किलोमीटर लम्बी नहर खुद गयी थी इसी योजना के तहत। अब उसमें बरसात का पानी जमा रहता है और लोगों के लिए जलाशय का काम देता है।

       ***    

159. शिवजी और हनुमानजी के गुण और हम

(इस आलेख को मैंने लिखा तो था शिवरात्रि के दिन, पर कुछ कारणों से पोस्ट नहीं कर पाया था.)

       शिवजी आडम्बर एवं विलासिता से रहित जीवन व्यतीत करते हैं- सादगी भरा। वे कभी कोई छल-प्रपंच नहीं रचते- न ही किसी के द्वारा रचे गये प्रपंच में स्वयं को शामिल करते हैं। उनका स्वभाव भोला है, सरल है। वे बहुत आसानी से और बहुत जल्दी किसी पर भी प्रसन्न हो जाते हैं। लेकिन... लेकिन... लेकिन...
       ...अगर किसी ने उन्हें क्रोध दिला दिया, तो फिर तीनों लोकों में किसी की मजाल नही है कि वह उनके सामने ठहर सके! उनके "ताण्डव" से सभी भय खाते हैं।
       अपने पौराणिक आख्यानों में मुझे शिवजी के ये गुण बहुत पसन्द हैं। मेरे विचार से, हर व्यक्ति, समाज या राष्ट्र को ऐसा ही होना चाहिए- आडम्बर एवं विलासिता से दूर, सादगी भरा जीवन: न कोई छल-प्रपंच रचना और न ही किसी के द्वारा रचे गये प्रपंच में स्वयं को शामिल करना; आम तौर पर स्वभाव से सरल, भोला और उदार होना- यानि जरुरतमन्दों की भलाई के लिए सदैव तत्पर रहना; किसी भी दूसरे व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के साथ प्रसन्नचित्त होकर एवं खुले मन से मिलना-जुलना; लेकिन... लेकिन... लेकिन...
       हर दूसरे व्यक्ति, समाज या राष्ट्र को यह अच्छी तरह से पता होना चाहिए कि अगर यह क्रोधित हो गया, तो फिर रक्षा नहीं है! यानि कोई दूसरा बेवजह छेड़ने, धौंस जमाने, हड़काने, डराने-धमकाने, या लड़ने-झगड़ने की हिम्मत न कर सके।
       सिर्फ और सिर्फ सरल, दयालु, उदार होना ठीक नहीं। मैंने कहीं पढ़ा कि पारसी समुदाय सिर्फ अत्याचार सहने में विश्वास रखता है, प्रतिरोध करने में नहीं। आज उनकी पहचान कुछ खास नहीं है। देश के अन्दर काश्मीरी पण्डितों ने भी संगठित होकर प्रतिरोध करने का हौसला नहीं दिखाया- परिणाम सामने है! ऐसा मैंने कहीं पढ़ा, सो जिक्र कर रहा हूँ। यहूदियों ने संगठित होकर अत्याचार का प्रतिरोध किया और आज उन्हें छेड़ने या हड़काने की हिम्मत किसी में नहीं है!
       ***
       कहते हैं कि रामायणकाल में शिवजी ने ही हनुमानजी का रुप धारण किया था। अब यह संयोग ही है कि मुझे हनुमानजी का चरित्र भी बहुत पसन्द है।
       सोचकर देखिये, कितनी शक्तियाँ प्राप्त हैं हनुमानजी को- वे क्या नहीं कर सकते! मगर उनकी विनम्रता तो देखिये... ओह, मन भर आता है। इतनी शक्तियाँ प्राप्त होते हुए भी इतनी विनम्रता!
       मुझे लगता है हर व्यक्ति, समाज या राष्ट्र को ऐसा ही होना चाहिए। वह शक्तिवान बने, मगर जरुरत पड़ने ही अपनी शक्तियों का उपयोग करे। शक्तियों का लेशमात्र भी अहंकार वह मन में न पाले।

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शनिवार, 5 मार्च 2016

158. 'खेत देके'


       अपने बचपन में हम "खेत देके" स्कूल जाना पसन्द करते थे। "खेत देके" मतलब- खेत से होकर।
       पूरी बात इस तरह है कि हमारा घर जिस सड़क पर है, उसका नाम "बिन्दुधाम पथ" है और यह बरहरवा के "मेन रोड" यानि मुख्य सड़क के लगभग समानान्तर है। हमारा स्कूल यानि "श्री अरविन्द पाठशाला" मुख्य सड़क पर था। था मतलब अब भी है, अब भवन बदल गया है। इन दोनों समानान्तर सड़कों के बीच खेतों का एक बहुत बड़ा रकबा है, जहाँ धान की खेती होती थी- अब भी होती है। गेहूँ-जौ या दलहन-तेलहन की फसल कम ही लोग लगाते थे- अब तो खैर, कोई भी नहीं लगाता। यूँ तो हम सालभर ही खेत देके स्कूल जाना पसन्द करते थे, मगर बरसात में हमें मना किया जाता था। खेतों में पानी भरा होता था, जिसमें धान की फसल खड़ी रहती थी और मेड़- जिसे हम "आली" कहते थे- घास से ढकी होती थी। हम अक्सर घरवालों की अनसुनी करके कीचड़ वगैरह लाँघते-फलाँगते खेत देके ही स्कूल जाना पसन्द करते थे। नवम्बर में धान की फसल कटने के बाद तो बच्चे क्या, बड़े तक इस खेत वाले रास्ते को अपनाते थे। प्रायः हर खेत में टेढ़ी-मेढ़ी पगडण्डियाँ बन जाया करती थीं।
       ***
       जमाना बीता। इस खेत वाले रास्ते को मैं भूल ही गया था।
       पिछले कुछ दिनों से फिर इसी रास्ते से, यानि "खेत देके" जाना-आना कर रहा हूँ। अब हालाँकि एक छोटे-से हिस्से की "प्लॉटिंग" हो गयी है और कंक्रीट निर्माण शुरु हो गया है, फिर भी निन्यानबे फीसदी हिस्सा अब भी खेत ही है। बीच-बीच में जो तीन "बाड़ियाँ" थीं, वे अब भी हैं, मगर अब वहाँ पेड़ या जंगल कुछ कम नजर आ रहे हैं। एक तालाब था, वह अब भी है।
       अब बड़े होने के बाद इस छोटे रास्ते- शॉर्टकट- से गुजरते वक्त एक अलग किस्म का अहसास होता है। सड़क को छोड़कर किसी पतली या चौड़ी गली में कुछ कदम चलने के बाद हम अचानक एक खुली- विस्तृत- जगह पर आ जाते हैं... ऐसा लगता है, किसी अलग दुनिया में आ गये हैं!
       पता नहीं, कितने लोग होंगे, जो मेरे इस मनोभाव को ठीक-ठीक समझ सकेंगे... क्योंकि जिन्दगी की आपाधापी में हम अपने आस-पास के ऐसे इलाकों को अक्सर देखकर भी अनदेखा कर देते हैं... कुछ अहसास करना तो बहुत दूर की बात होती है...

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रविवार, 14 फ़रवरी 2016

157. चण्डोला


       कुछ दिनों पहले छुट्टी के दिन घूमते हुए चण्डोला पहाड़ की तरफ निकल गया था।
       दरअसल, बरहरवा राजमहल की पहाड़ियों की जिस श्रेणी की तलहटी में बसा है, उसके अलग-अलग हिस्सों के अलग-अलग नाम हैं। बचपन में हमलोग बोरना और घोड़ाघाटी पहाड़ जाया करते थे- चकमक पत्थरों की खोज में। चण्डोला पहाड़ दिग्घी की तरफ है, जो बरहरवा से तीन किलोमीटर दूर है। नाम हमने बहुत सुना था उसका, पर कभी गये नहीं थे उस तरफ। उस जमाने में (तब झारखण्ड बिहार से अलग नहीं हुआ था) चण्डोला पहाड़ पर सरकारी खदान हुआ करता था- पत्थरों का। आज भी तीन-चार भवन, गोदाम इत्यादि वहाँ तलहटी में नजर आते हैं- खण्डहर के रुप में।
       दो साल पहले जयचाँद के साथ गया था चण्डोला पहाड़। काफी देर घूमे थे हम।
       पिछले दिनों अकेला ही गया। बड़ा दिग्घी गाँव से भी गुजरा, जो कि एक सन्थाली गाँव है। अभी कुछ रोज पहले 'मिट्टी की झोपड़ी' शीर्षक से एक पोस्ट लिखा था। उसी की अगली कड़ी के रुप में यह देखना चाहता था कि ये झोपड़ियाँ बनती कैसे हैं। वैसे, अपने इलाके में भी घोड़ाघाटी या बोरना पहाड़ की तरफ जाते हुए इसे देखा जा सकता था, पर क्या मन में आया, दिग्घी की तरफ ही निकल गया था।
       जो कुछ देखा, उसे आप भी तस्वीरों में देख सकते हैं, मगर पहाड़ियों की बिलकुल तलहटी में पहुँचने के बाद जो अनुभव होता है, उसका अनुभव आपको नहीं करा सकता। ऐसे इलाकों में एक अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ रहता है, जिसे सिर्फ चिड़ियों की आवाजें तोड़ती हैं। बाकी कहीं कोई ध्वनि नहीं होती। ऐसा लगता है, अपनी दुनिया से कहीं दूर निकल आये हैं हम! कभी-कभी तो ऐसा लगता है, इस सन्नाटे की भी अपनी तरंगे हैं, जो कानों से टकरा रही हैं...    
       पता नहीं, हममें से कितनों के नसीब में ऐसा सुख लिखा है कि अपने रिहायशी इलाके से थोड़ा-सा इधर-उधर जाते ही प्रकृति की गोद में पहुँचने का आनन्द मिल जाय...

       इस मामले में हम तो भाग्यशाली हैं, इसमें कोई शक नहीं है। अब जिन्हें प्रकृति से कोई मतलब ही नहीं है, जो ऋतु-परिवर्तन की गन्ध को महसूस ही नहीं कर सकते, उनकी बात अलग है।






















156. जो छूट गया था...

बीते दिसम्बर-जनवरी में दो पिकनिक स्पॉट में जाना हुआ था, जिनका जिक्र फेसबुक पर तो हो गया था, मगर सोचा कि ब्लॉग पर भी उनका जिक्र रहना चाहिए, सो अभी कुछ पोस्ट कर रहा हूँ.
मसानजोर
दुमका से कोई 40 किलोमीटर दूर यह बाँध है- सिउड़ी जाने वाले मार्ग पर. बहुत ही खूबसूरत जगह है. 
मैं यहाँ कुछ तस्वीरें पोस्ट कर रहा हूँ-

भतीजी 'छोटी' उर्फ सन्तोषिनी 


मैं 

श्रीमतीजी 


अभिमन्यु कजिन टारजू (शन्तनु) के साथ 

पतौड़ा झील 
हमारे बरहरवा से कोई 15 किमी दूर एक कस्बा है- उधवा (मोकामा-फरक्का NH-80 पर). 
बरहरवा से राजमहल जाते वक्त यह कस्बा करीब बीच में पड़ता है. 
कस्बे से कुछ पहले ही मुख्य सड़क से जरा हटकर एक झील है, जिसे "पतौड़ा" झील कहते हैं. 
शीत ऋतु में यहाँ प्रवासी पक्षियों का आगमन होता है. सो, इसे पक्षी-अभयारण्य का रुप दे दिया है. 
यह और बात है इस इलाके में न कोई पर्यावरणप्रेमी बसता है, न ही पक्षीप्रेमी. न किसी के पास टेली-लेन्स वाला कैमरा है, न दूरबीन. 
ऊपर से, स्थानीय निवासियों के लिए झील में मत्स्याखेट और किनारों पर खेती ज्यादा मायने रखता है. 
जो "पिकनिक" मनाने आते हैं, वे आस-पास की वादियों में गन्दगी फैलाकर चले जाते हैं- हमने भी यही किया. मन तो कर रहा था कि अकेले ही सफाई में जुट जाऊँ, पर लगा यह कुछ अटपटा लगेगा... सो मन मारकर रह गया. 
खैर, कुछ तस्वीरें प्रस्तुत कर रहा हूँ- शायद आपको अच्छी लगे. हालाँकि हल्के कोहरे के कारण क्षितिज की पहाड़ियाँ स्पष्ट नहीं नजर आ रहीं...








सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

155. जीवाश्म!


       दोनों चित्रों में जो पत्थर दिख रहा है, वह सम्भवतः "जीवाश्म" है। जीवाश्म भी ऐसा-वैसा नहीं, किसी डायनासोर की हड्डी का!
       यह पत्थर मेरे पास सालभर से ज्यादा समय से रखा हुआ है; ये दोनों चित्र भी कम्प्यूटर के मेरे 'ड्राइव' में लम्बे समय से पड़े हैं; मगर इनपर लिखने का मुहुर्त निकल ही नहीं रहा था। आज पता नहीं कैसे, इस पर लिख रहा हूँ।
       आप सोचेंगे यह भला मुझे कैसे मिल गया? थोड़ा-सा धीरज रखिये, सिरे से बताता हूँ।
       हमारे सन्थाल-परगना में जो राजमहल की पहाड़ियाँ हैं, उनके बारे में कहा जाता है कि ये "जुरासिक काल" की हैं- यानि करोड़ों साल पुरानी। जाहिर है, यहाँ कभी डायनासोर या उस-जैसे  विशालकाय प्राणी भी रहते होंगे। आज उन प्राणियों की बची-खुची हड्डियाँ पत्थरों में तब्दील हो चुकी होंगी। अँग्रेजों के जमाने से ही यहाँ पत्थर-खनन का व्यवसाय चल रहा है। पिछले कुछ दशकों में खनन का यह व्यवसाय अन्धाधुन्ध तरीके से चल रहा है। इस लूट में सभी शामिल हैं- ऊपर से नीचे तक। एक न्यायाधीश महोदय ने थोड़ी-सी रुची क्या दिखायी इस अवैध व्यवसाय को नियंत्रित करने में, उनका तबादला ही हो गया!
       खैर, तो ज्यादातर जीवाश्म पत्थरों के रुप में यहाँ से निकलते जा रहे हैं; फिर भी, साहेबगंज जिले के मँडरो नामक स्थान में एक इलाके को जीवाश्म (फ़ॉसिल) पार्क के रुप में चिह्नित कर दिया गया है। मैंने उस मँडरो नामक स्थान से मात्र पाँच किलोमीटर इधर एक कस्बे में प्रायः दो साल तक जाना-आना किया, मगर अफसोस, कि उस फॉसिल पार्क को देखने कभी नहीं गया!
       मैं जहाँ जाता था, उस स्थान का नाम भगैया है। यहाँ तशर (रेशम) के कपड़े की बुनायी का काम अच्छे-खासे पैमाने पर होता है। कभी इस पर भी लिखने का मुहुर्त निकलेगा- क्योंकि इस कुटीर उद्योग से जुड़ी कई तस्वीरें मेरे पास पड़ी हुई हैं।
       खैर, तो भगैया के ही प्रवीण जी ने एक रोज दफ्तर में अचानक पत्थर का यह टुकड़ा मेरे सामने रख दिया था और मुस्कुराते हुए पूछा था, "बताईये तो यह क्या है?"
       मैंने कई बार अखबारों में मँडरो के फॉसिल पार्क के बारे में पढ़ा था। सो, मैंने अनुमान लगाया कि जरुर यह उसी पार्क से लाया गया पत्थर होगा और मैंने इत्मीनान से उत्तर दिया- "डायनासोर की हड्डी!"
       प्रवीण जी ने समर्थन किया और बताया कि अब वहाँ घेरेबन्दी कर दी गयी है और अब वहाँ से कोई ऐसे पत्थर उठाकर नहीं ला सकता।
       पत्थर बहुत दिनों तक मेरे पास पड़ा रहा। एक दिन मैंने अभिमन्यु से तस्वीर खींचने को कहा। उसने कहा क्या करना है इस पत्थर की तस्वीर का। तब मैंने उसे बताया कि यह पत्थर किसी डायनासोर का जीवाश्म हो सकता है... । वह रोमांचित हो गया। फिर उसने गहराई से निरीक्षण किया और समर्थन किया कि हाँ, यह जीवाश्म ही है!

       खैर, बढ़िया आलेख तो नहीं ही बन सका, जैसा भी बना, उसे लिखकर आज प्रस्तुत कर रहा हूँ। 

रविवार, 24 जनवरी 2016

154. मलूटी

       मलूटी एक छोटा-सा गाँव है। पड़ता तो यह है झारखण्ड के दुमका जिले में, मगर यह बंगाल के रामपुरहाट से नजदीक है।
       गाँव पुराना है। गाँव के बीच-बीच में छोटे-छोटे बहुत सारे मन्दिर बने हुए हैं, जो ढाई-तीन सौ साल पुराने हैं। मन्दिरों की खासियत है- सामने की दीवार पर जो नक्काशियाँ की गयी हैं और माँ दुर्गा तथा भगवान राम की कथाओं से जो चित्र उत्कीर्ण किये गये हैं, वे “टेराकोटा” शैली के हैं। यानि इन्हें मिट्टी पर अंकित कर मिट्टी को पकाया गया है और फिर मन्दिर की दीवार पर चिपकाया गया है।
       ज्यादातर मन्दिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। कुछ तो ध्वस्त हो रहे हैं। फिर भी, एक अच्छी-खासी संख्या सही-सलामत है। बताया जाता है कि किसी जमाने में 108 मन्दिर थे, अब लगभग 75 मन्दिर बचे हुए हैं। 50 से ज्यादा मन्दिर भगवान शिव को समर्पित हैं, जिनके गर्भगृह में काले ग्रेनाइट पत्थर के छोटे-बड़े शिवलिंग स्थापित हैं। ज्यादातर शिवलिंग भी टूट-फूट रहे हैं। जो ठीक हैं, उनकी पूजा-अर्चना होती है।
       ये मन्दिर बंगाल की प्रसिद्ध स्थापत्य शैली “शिखर” या “चाला” शैली के हैं, जो देखने में “कुटिया”-जैसे लगते हैं। कुछ मन्दिर उड़ीसा के “रेखा” शैली के भी हैं। एक मन्दिर पर तो यूरोपीय शैली की छाप है और एक चारों तरफ से खुले “रासमंच” शैली की है- दोनों जीर्ण अवस्था में हैं।
       ***
       इतिहास कुछ यूँ है कि जमीन्दार “बाज बसन्त” के वंशजों ने इन मन्दिरों का निर्माण करवाया था।
“बाज बसन्त” की किंवदन्ति हमें 15वीं सदी के अन्तिम वर्षों में ले जाती है। बसन्त राय निर्धन युवक थे। एक बार पशु चराने के क्रम में वे पेड़ की छाया में सो रहे थे। छाया हटने के बाद एक नाग ने अपना फन फैलाकर उनके चेहरे पर छाया कर दी, ताकि बसन्त राय की तन्द्रा न टूटे। काशी के सुमेरू मठ के महन्त दण्डिस्वामी निगमानन्द तीर्थयात्रा के क्रम में वहाँ से गुजर रहे थे। यह दृश्य देखकर वे समझ गये कि युवक असाधारण है। युवक की विधवा माँ से मिलकर उन्होंने यह बात बतायी। फिर वे अपनी तीर्थयात्रा पर आगे बढ़ गये।   
उधर, गौड़ (बंगाल के मालदा टाउन के निकट तत्कालीन बंगाल प्रान्त की राजधानी) के बादशाह हुसैन शाह उड़ीसा से लौट रहे थे। मयूराक्षी नदी के किनारे उनका शाही शिविर लगा था- हफ्तेभर के लिए। अन्तिम दिन उनकी बेगम का पालतू बाज पिंजड़े से निकलकर उड़ गया। बादशाह ने मुनादी करवायी कि बाज को लाने वाले को समुचित ईनाम दिया जायेगा। इस मुनादी को सुनकर स्वामी निगमानन्द फिर युवक बसन्त राय के घर आये। आकर देखा कि सही में बसन्त राय ने ही उस बाज को पकड़ रखा है। युवक तथा बाज के साथ वे बादशाह के शिविर में पहुँचे। युवक की निर्धनता की बात कहकर उन्होंने युवक के लिए जमीन्दारी की माँग की। बादशाह ने भी प्रसन्न होकर करमुक्त जमीन्दारी युवक को दे दी।
तब से बसन्त राय को “बाज बसन्त” कहा जाने लगा। बाज बसन्त ने बंगाल के बीरभूम जिले के डामरा गाँव को अपनी राजधानी बनायी।
आगे चलकर- 17वीं सदी के मध्य में- “बाज बसन्त” के वंशज राजनगर के राजा से युद्ध में हार गये और “बाज बसन्त” के ये वंशज डामरा छोड़कर मलूटी गाँव में आकर बस गये।    
***
बीरभूम जिले का यह पश्चिमी अंचल जंगलों से भरा था। यहाँ बौद्ध तांत्रिकों ने अपनी एक गुप्त साधना स्थली बना रखी थी। बाज बसन्त के वंशजों ने यहाँ आकर जब जंगलों की सफाई करवायी, तो बौद्ध तांत्रिक यहाँ से तारापीठ चले गये। उनके द्वारा परित्यक्त उपासना स्थली में बाज बसन्त के वंशजों ने अपनी कुलदेवी की स्थापना की। देवी का नाम दिया- “मौलीक्षा” (“मौली”- मस्तक, “ईक्षा”- दर्शन। प्रतिमा त्रिनयनी देवी के मस्तक की है।)
इस वंश में राखड़चन्द्र राय हुए, जो तंत्र साधना करते थे। पूजा के लिए वे 15 किलोमीटर दूर तारापीठ जाया करते थे। तारापीठ आज भी प्रसिद्ध शक्तिपीठ एवं तांत्रिक सधनापीठ है। एकबार तारापीठ के सन्यासियों से उनकी अनबन हुई कि वे उनके अवधूत की पूजा से पहले पूजा नहीं कर सकते। पूजा को अधूरा छोड वे नदी (द्वारका नदी, जो तारापीठ के बगल से बहती है) की दूसरी तरफ आये, जो उनकी जमीन्दारी में पड़ता था। थोड़ी-सी जगह साफ करवाकर उन्होंने घट स्थापित किया और अपनी अधूरी पूजा को सम्पन्न किया। माँ तारा उनपर प्रसन्न हुईं और तारापीठ मन्दिर में स्थापित उनकी प्रतिमा का मुंह उत्तर से घूमकर पश्चिम की ओर हो गया- जिधर राखड़चन्द्र पूजा कर रहे थे! यह तिथि थी- आश्विन माह की शुक्ल चतुर्दशी।
अब इस किंवदन्ति में कितनी सच्चाई है, पता नहीं, पर कहते हैं कि आज भी प्रतिवर्ष आश्विन माह के शुक्ल चतुर्दशी के दिन तारा माँ की प्रतिमा को गर्भगृह से निकाल कर सामने बरामदे में लाया जाता है और उनका मुँह पश्चिम की ओर रखा जाता है- उस करीब 300 साल पुरानी घटना या चमत्कार की याद में! उस दिन उसी स्थल से मलूटी की तरफ से तारा माँ की पूजा पहले की जाती है, जिस स्थल पर राखड़चन्द्र ने घट स्थापित किया था; इसके बाद ही विधिवत् पूजा शुरु होती है।
राखड़चन्द्र ने उस घट को मलूटी लाकर माँ मौलीक्षा के मन्दिर में ही स्थापित कर दिया था।
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साधक बामाखेपा पहले दो साल मलूटी में इसी मन्दिर में रहे थे। यहीं उन्हें सिद्धि प्राप्त हुई थी। यहाँ से वे तारापीठ गये थे। कहते हैं कि बामाखेपा का त्रिशूल अब भी यहीं स्थापित है।
***
मलूटी के मन्दिर गाँव के घरों, गलियों, चौराहों से इस तरह घुले-मिले हैं कि लम्बे समय तक बाहर के लोग इनके बारे में जानते नहीं थे। 1978-79 में किसी तरह से इनका प्रचार हुआ। अब झारखण्ड सरकार इस स्थल को “मन्दिरों के गाँव” के रुप में पर्यटक स्थल बनाना चाहती है। इस तरह के बयान भी आते रहते हैं- झारखण्डी राजनेताओं के मुँह से। मगर मलूटी गाँव घूमते वक्त महसूस होता है कि- इन बयानों को चरितार्थ करने की “इच्छाशक्ति” एक रत्ती भी नहीं है! हाँ, एक जगह चार-छह मन्दिरों के जीर्णोद्धार का काम चल रहा है।
एक मन्दिर के द्वार के मुख्य पैनल पर महिषासुर मर्दिनी की सुन्दर कलाकृति बनी नजर आयी, मगर पता चला, उस मन्दिर के सामने जाने का कोई रास्ता ही नहीं बचा है। एक ही रास्ता है, उसे भी बबूल के काँटों और झाड़ से बन्द कर दिया गया है- पता नहीं क्यों!
...बस यही एक उदाहरण काफी है यह जतलाने के लिए हम झारखण्डी अपने इतिहास, अपनी विरासत को लेकर कितना सचेत हैं...

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(ऐतिहासिक जानकारियों का स्रोत: श्री गोपालदास मुखर्जी रचित पुस्तिका "गुप्तकाशी मलुटी"। यह पुस्तिका माँ मौलीक्षा मन्दिर परिसर स्थित दूकानों पर उपलब्ध है।) 


माँ मौलीक्षा 

मौलीक्षा मन्दिर के प्राँगण में एक टेराकोटा मन्दिर 

मोलीक्षा मन्दिर के सामने हम 

मलूटी गाँव में प्रवेश 

मन्दिर 

मन्दिर 

मन्दिरों का एक समूह 

मन्दिर के मुख्यद्वार पर कलाकृति: राम-रावण युद्ध  

मन्दिर के अन्दर शिवलिंग




गाँव का एक कच्चा मकान- दुमंजिला और विशाल  

"दौनी" 

"रासमंच" शैली के एक मन्दिर का भग्नावशेष 



ध्वस्त होते मन्दिर 

एक स्थानीय व्यक्ति जानकारी देते हुए 


एक मन्दिर काफी अच्छी स्थिति में 

मन्दिरों का जीर्णोद्धार 

कलाकृति- महिषासुरमर्दिनी 

एक और समूह 





एक मन्दिर यूरोपीय शैली में 



मलूटी गाँव से प्रस्थान 

रामपुरहाट स्टेशन के प्रवेशद्वार को भी शिखर मन्दिर का रुप दिया गया है- यहीं से तारापीठ और मलूटी जाया जाता है 

'द फिनिशिंग स्नैप'- रामपुरहाट स्टेशन के प्लेटफार्म पर