रविवार, 28 दिसंबर 2014

123. हजार दरवाजों वाला महल

Hajardwari, Murshidabad
       
       "हजारदुआरी" (हजारद्वारी) नामक एक महल है बंगाल के मुर्शिदाबाद शहर में, जो आस-पास के इलाकों में काफी प्रसिद्ध है। इतावली शैली में बना यह महल 1829 से 1837 के बीच बना था। बनवाया था नवाब नाज़िम हुमायूँजा ने। तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड बेण्टिक आधारशिला रखने के कार्यक्रम में उपस्थित हुए थे। महल निर्माण में खर्च आया था- 16 लाख रुपये। तब एक मजदूर की मजदूरी 5 पैसे तथा एक राजमिस्त्री की मजदूरी 2 आना (12 पैसे) हुआ करती थी! कहा जाता है कि चिनाई के वक्त कत्थे और सौंफ के पानी तथा अण्डे की जर्दी का बड़ी मात्रा में इस्तेमाल हुआ था- दीवारों को मजबूती देने के लिए। दरवाजों एवं खिड़कियों की बड़ी संख्या के कारण ही इसे हजारद्वारी कहा जाता है।
आज यह महल एक शानदार संग्रहालय है। तलवार, भाले, बन्दूक से लेकर हाथी दाँत से बने सिंहासन, पालकी, हौदे, विशालकाय तैलचित्र (यूरोपीय चित्रकारों के- रैफेल, मार्शल-जैसे नामी चित्रकारों के भी) और रोमन शैली की संगमर्मर की मूर्तियाँ यहाँ के आकर्षण है। दुमंजिले का मुख्य दरबार हॉल में लटकता विशाल झूमर महारानी विक्टोरिया का तोहफा है। झूमर से याद आया, ग्वालियर में सिंधिया के महल में शायद इससे भी बड़ा झूमर छत (बेशक, गुम्बज) से लटक रहा है, जिसका वजन गाईड ने कई टन बताया था और कहा था कि बगल के महल की छत से इस गुम्बज पर पहले हाथी चलवाये गये थे, तब जाकर झूमर को छत से लटकाया गया था!
पहले मंजिल में सीढ़ियों के पास एक विशाल मगरमच्छ की "ममी" रखी है; उसके ऊपर बहुत ही मोटे एक बाँस का टुकड़ा रखा है, और उसी के दोनों कोनों पर दो (एक में चार दर्पण) दर्पण रखे हैं, जो काफी प्रसिद्ध हैं। दर्पण में दो दर्पणों को लगभग नब्बे डिग्री पर इस तरह जोड़ा गया है कि हर व्यक्ति को आस-पास खड़े सभी संगी-साथियों के चेहरे तो दीखते हैं, मगर खुद का चेहरा कभी नहीं दीखता!
खैर, हजारदुआरी में दुमंजिले का पुस्तकालय आम लोगों के लिए बन्द है और जैसा कि गाईड बुक से पता चला, यहाँ बहुत तरह की चिड़ियों की "ममी" की भी एक गैलरी है, जो शायद फिलहाल बन्द है। पटना म्यूजियम में इस तरह की गैलरी देखा था।
***
       यह मुर्शिदाबाद शहर हमारे बरहरवा से कोई ज्यादा दूर नहीं कहा जा सकता- ढाई-तीन घण्टों का रास्ता है एक तरफ से। फिर भी, मैं अभी तक नहीं जा पाया था। पूरब में बरहरवा के 20 किलोमीटर बाद से ही बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले की सीमा शुरु हो जाती है- पहला शहर फरक्का है।
       जो कोचिंग इंस्टीच्यूट हमारे घर (के एक हिस्से) में चलता है, उन्हीं का कार्यक्रम था, मुर्शिदाबाद का- बीते कल 27 दिसम्बर को। हम भी साथ हो लिये। सुबह 7 बजे से पहले तीन गाड़ियों में हमसब रवाना हुए।
       ***
       हजारद्वारी से पहले हम कटरा मस्जिद गये- रास्ते में यही पहले पड़ता था। इसे नवाब मुर्शिदकुली खाँ ने बनवाया था। मुर्शिदकुली खाँ हिन्दू (ब्राह्मण) परिवार में जन्मे थे। सम्भवतः गरीबी के कारण मुसलमान सौदागर हाजी इसपाहन के नौकर (गुलाम?) बने। वहीं उन्होंने ईस्लाम धर्म कबूला और मोहम्मद हादी बने। बाद के दिनों में उनकी योग्यता को देखते हुए बादशाह औरंगजेब ने उन्हें ढाका का दीवान नियुक्त किया- नाम दिया उनका- करतलब खाँ। राजस्व वसूली के मामले में उनका प्रदर्शन बहुत ही अच्छा था। मगर बंगाल (बिहार, उड़ीसा सहित) के गवर्नर औरंगजेब के पोते अजीमुस्सान के साथ कुछ मतभेद उभरने के कारण राजस्व विभाग के कर्मचारियों के साथ वे अपना दफ्तर 'मुकसुदाबाद' ले आये।
       दक्षिण की लड़ाईयों के बाद जब औरंगजेब का खजाना खाली हो गया था, तब करतलब खाँ ने एक करोड़ रुपये का राजस्व शाही खजाने में जमा करवाया। प्रसन्न होकर औरंगजेब ने करतलब खाँ को नाम दिया- 'मुर्शिदकुली खाँ' और बेशक, 'मुकसुदाबाद' का नया नामकरण हुआ- "मुर्शिदाबाद"! बंगाल के नवाब के रुप में उन्होंने बहुत ही योग्यतापूर्वक शासन किया- बिना किसी धार्मिक भेदभाव के।
       1725 में मृत्यु के बाद उनको उनके ही द्वारा बनवाये गये इस विशाल कटरा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे दफनाया गया- ताकि मस्जिद में नमाज पढ़ने आने वालों की पदधूलि से उनका परलौकिक जीवन धन्य हो। मृत्यु से पहले ही वे इस छोटी-सी कोठरी में रहने लगे थे। बाद के दिनों में उनकी बेटी अजिमुन्नेशा ने भी यही रास्ता अपनाया। हालाँकि अजीमुन्नेशा की बनवायी मस्जिद ध्वस्त हो गयी है- सिर्फ एक दीवार बची है। उनकी कब्र भी सीढ़ियों के नीचे ही है।
       ***
कटरा मस्जिद से हम हजारद्वारी गये। हजारद्वारी का संग्रहालय घूमने से पहले हम सबने नाश्ता किया और घूमने के बाद वहीं खाना भी खाया। गंगातट है- पिकनिक मनाने वालों की भी काफी संख्या मौजूद थी।
सामने इमामबाड़ा भी है। इसे नवाब फेरादुनजा ने 1847 में बनवाया- 6 लाख खर्च करके। हालाँकि यहाँ कभी नवाब सिराजुद्दौला ने इमामबाड़ा बनवाया था- मगर वह लकड़ी की थी और उसके ध्वस्त होने पर ही बाद में आज का इमामबाड़ा बना है। कहते हैं कि यहाँ पैगम्बर के पदचिह्न रखे हुए हैं।
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फिर हम सबने अजीमुन्नेशा की समाधि देखी। वहाँ से नशिपुर राजबाड़ी गये। यह राजपरिवार इतिहास में बदनाम रहा है- जबरन करवसूली के कारण। इनके महल का देखा, जीर्णोद्धार चल रहा है। एक हिस्से को संग्रहालय सह कला-दीर्घा बनाने की कोशिश की जा रही है। वहाँ दो कलाकृतियाँ देखने को मिली- एक नाव और एक पालकी- अगर ये हाथी दाँत की बनी हैं, तो वाकई नायाब हैं।
पास ही में इतिहास में बदनाम जगत सेठ का भी भवन था। वहाँ हमारा जाना नहीं हुआ। पलासी की लड़ाई भारतीय इतिहास की एक दुखती रग है और जगत सेठ तथा मीर जाफर (सिराजुद्दौला के सेनापति) भारतीय "दगाबाजी" के ज्वलन्त उदाहरण हैं।
***
यूँ तो मुर्शिदाबाद तथा इसके आस-पास के क्षेत्रों में 30 से ज्यादा ऐतिहासिक स्थल हैं- कर्ण-सुवर्ण में 6ठी-7वीं सदी में बने बौद्ध स्तूपों (इनका जिक्र ह्वेनसांग के लेखों में है) के अवशेषों से लेकर कासिमबाजार में वारेन हेस्टिंग्स की पत्नी मेरी तथा शिशु कन्या एलिजाबेथ की समाधियों तक; मगर एक दिन की सैर में सब देख पाना सम्भव ही नहीं है।
हमारा अन्तिम पड़ाव था- काठगोला का बागान। दुगर परिवार द्वारा निर्मित। वे सम्भवतः राजस्थान से आये थे। साज-सजावट में राजस्थानी शैली स्पष्ट है। वे भी जैन भी रहे होंगे। सो, बावली भी है, जिसमें न केवल सुन्दर मछलियाँ हैं, बल्कि कहीं (हम देख तो नहीं पाये) मछलियों की समाधियाँ भी हैं!
दिनभर की सैर के बाद अन्तिम पड़ाव के लिए यह उपयुक्त जगह है- छोटा-सा सुन्दर महल, खुले मैदान, सुन्दर बाग, एक जैन मन्दिर और भी बहुत कुछ। गुलाबों की किस्मों का तो कोई अन्त ही नहीं था।
***
वहीं से हमारी वापसी हुई- रात नौ बजे से पहले हम अपने-अपने घरों में थे।

Imambada, Murshidabad

Hajardwari, Murshidabad



Imambada, Murshidabad

Hajardwari, Murshidabad

Katra Masjid, Murshidabad

Katra Masjid, Murshidabad

Ajimunnesha's Tomb, Murshidabad

Ajimunnesha's Tomb, Murshidabad

Nashipur Rajbadi, Murshidabad

Nashipur Rajbadi, Murshidabad

Kathgola Bagan, Murshidabad



Kathgola Bagan, Murshidabad

Kathgola Bagan, Murshidabad

Kathgola Bagan, Murshidabad

Kathgola Bagan, Murshidabad

Kathgola Bagan, Murshidabad

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

122. "अट्ठारह साल की उम्र"


       सुकान्तो भट्टाचार्य की जो कवितायें प्रसिद्ध हैं, उनमें से दो 'तुकान्त' कवितायें हैं- 'रनर' और 'अट्ठारह साल की उम्र'। बाकी प्रसिद्ध कवितायें 'अतुकान्त' हैं, जैसे- 'दियासलाई की तीली', 'एक मुर्गे की कहानी', 'सिगरेट', 'सीढ़ी', इत्यादि। अतुकान्त (छह) कविताओं का हिन्दी अनुवाद मैंने बहुत पहले ही किया था। कुछ समय पहले 'रनर' के अनुवाद को मैंने एक चुनौती के रुप में लेकर उसे भी पूरा कर डाला- बेशक, तुक मिलाते हुए ही। लेकिन 'अट्ठारह साल की उम्र' कविता का अनुवाद करने के बारे में मैंने कभी नहीं सोचा- लगता था, यह नहीं हो पायेगा। पहली बात, यह तुकान्त तो है ही; दूसरी बात, इसकी कुछ पक्तियाँ मेरे सर के ऊपर से गुजर जाती हैं।
       फिर भी, कल रात मैंने इसका अनुवाद कर ही दिया। यह और बात है कि मैं खुद इससे संतुष्ट नहीं हूँ, क्योंकि कुछ पंक्तियों का अर्थ मैं अब भी नहीं पा रहा था:

       कितनी दुःसह है अट्ठारह साल की उम्र
       चुनौती स्वीकार करने के लिए उठाती है सर,
       अट्ठारह साल की उम्र में ही अहरह
       आते हैं विराट दुस्साहसीगण नजर।

       अट्ठारह साल की उम्र नहीं जानती कोई भय 
       पदाघात से तोड़ डालना चाहती हर बन्धन,
       इस उम्र में कोई झुकाता नहीं अपना सर
       अट्ठारह साल की उम्र नहीं जानती क्रन्दन।

       यह उम्र जानती है रक्तदान का पुण्य
       यूँ चलती है, जैसे वाष्पवेग से स्टीमर जल में,
       प्राण लेने-देने का थैला नहीं रहता खाली
       आत्मा को सौंप देती है शपथ के कोलाहल में।

       अट्ठारह साल की उम्र है भयंकर
       ताजे-ताजे प्राण में असह्य यंत्रणा,
       इस उम्र में प्राण तीव्र एवं प्रखर
       आती है कानों में कितनी मंत्रणा।

       अट्ठारह साल की उम्र है दुर्वार
       पथ-प्रान्तर में फैलाती जाती बहु तूफान,
       दुर्योग में हाल ठीक रखना हो जाता भार
       क्षत-विक्षत होते हैं सहस्र प्राण।

       अट्ठारह साल की उम्र में आते हैं आघात
       अविश्रान्त; जुड़ते रहते हैं एक-एक कर,
       यह उम्र काली लक्ष दीर्घश्वांस में
       यह उम्र काँपती है वेदना में थर-थर।

       फिर भी अट्ठारह का सुना है जयजयकार
       दुर्योग औ' आँधी में यह उम्र नहीं मरती है,
       विपत्ति के सम्मुख यह उम्र है अग्रणी
       यह उम्र फिर भी कुछ नया तो करती है।

       जान लो, यह उम्र भीरू, कापुरुष नहीं है
       रास्ता चलते यह उम्र नहीं जाती है ठहर,
       इस उम्र में इसलिए नहीं है कोई संशय
       इस देश के सीने पर भी अट्ठारह आये उतर।


       *****

दरअसल, 13 नवम्बर को अभिमन्यु का 17वाँ जन्मदिन था- अगले दिन से उसने 18वें साल में प्रवेश किया... इस उपलक्ष्य पर ही मैंने इस कविता का अनुवाद किया था


रविवार, 21 सितंबर 2014

121. "फेलू'दा" के प्रकाशन में देरी...


       फेलू'दा के पहले कारनामे का हिन्दी अनुवाद तैयार है, कवर जयचाँद ने बना दिया है, सम्बन्धित सरकारी विभाग से कवर को ISBN भी हाल में मिल गया है। फिर भी, इसे टाईप करके पूरा करने में मन नहीं लग रहा है। क्यों भला? क्योंकि सन्दीप राय साहब (सत्यजीत राय के सुपुत्र) से अभी तक अनुवाद की अनुमति नहीं मिली है। (समय की कमी कोई बड़ी बात नहीं है। एक-दो रविवार को ही टाइपिंग का काम पूरा कर सकता हूँ, बाकी डिजायनिंग अभिमन्यु कर ही देगा।) पोथी डॉट के संचालकों से भी बात हुई- वे "पॉकेट बुक" साईज की शुरुआत तो नहीं कर सकते (जैसा कि हमारे जमाने में "राजन-इकबाल" सीरीज के उपन्यास हुआ करते थे), मगर 5" गुणा 7" का साईज दे सकते हैं।
       कई दिनों से सोच रहा था कि आखिर उनका जवाब क्यों नहीं आ रहा है। क्या वे मेरे द्वारा भेजे गये "जंगल के फूल" और "नाज़-ए-हिन्द" को पढ़ने लगे हैं? इन्हें मैंने अपने अनुरोध के साथ ही भेजा है कि वे मेरी अनुवाद एवं लेखन क्षमता को तौल सकें- फिर चाहे वे "फेलू'दा" सीरीज के अनुवाद की अनुमति दें या न दें।
       आज क्या मन में हुआ- फेसबुक पर उनके पेज को खोला। खोलते ही समझ में आ गया कि उत्तर में देरी क्यों हो रही है! वे "बादशाही अँगूठी" की शूटिंग में व्यस्त हैं। यह फेलू'दा सीरीज के दूसरे नम्बर का उपन्यास है।
       शूटिंग की दूसरी तस्वीर देखकर मेरी आँखें फटी रह गयीं! उपन्यास में सत्यजीत राय ने जंगल के बीच जैसी झोपड़ी का रेखाचित्र बनाया है, ठीक वैसी ही झोपड़ी फिल्म की शूटिंग के लिए (वास्तव में) बनवायी गयी है! मैं यहाँ क्म्प्यूटर स्क्रीन तथा पुस्तक का पृष्ठ- दोनों की इकट्ठी तस्वीर पेश कर रहा हूँ- आप खुद ही देख लीजिये...

       (झोपड़ी से मैं अनुमान लगा रहा हूँ कि फिल्म के 'क्लाइमेक्स' की शूटिंग चल रही है। यानि अगले दो महीने में मुझे उनका उत्तर मिल सकता है... )


पुनश्च/16-10-2014: 

पुस्तक प्रकाशित हो गयी. देखने/मँगवाने के लिए यहाँ क्लिक किया जा सकता है. 

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

120. अभिमन्यु की अँग्रेजी


       'हिन्दी माह' में अँग्रेजी का जिक्र करने के लिए माफी चाहता हूँ। (किसी फिल्म में विदेश में रह रहे अनुपम खेर कहते हैं- 'साहब, हम तो हिन्दुस्तान को दिल में लिए फिरते हैं!' वैसे ही, हिन्दी तो मेरे नस-नस में समायी हुई है; दिवस, हफ्ता, पखवाड़ा या माह मनाने वालों में से हम नहीं हैं!)
       कुछ दिनों पहले मैंने "नाज़-ए-हिन्द सुभाष" के अध्याय 5.1 को संशोधित किया। उसी दौरान (इस दूसरे संस्करण को) ISBN भी मिल गया। सो, pothi.com (जो इसे प्रिण्ट ऑन डिमाण्ड के तहत इसे छापती है) के माध्यम से मैंने इसे Flipkart, Amazon तथा Infibeam पर उपलब्ध कराना चाहा। पता चला, "About the Book" को "रोमन" में ही लिखना है। मैंने प्रथम संस्करण की प्रस्तावना अभिमन्यु को दिखायी और कहा कि इसका अँग्रेजी में अनुवाद कर दो- पूरी आजादी के साथ। बता दूँ कि मैं अँग्रेजी में गलतियाँ करता हूँ और मेरा अँग्रेजी ज्ञान बहुत ही सामान्य है- आवेदन वगैरह लिखने लायक। मैं अक्सर अपनी अँग्रेजी अभिमन्यु से ही "चेक" करवाता हूँ।
       उसने कुछ ही देर में अनुवाद कर दिया। मैं तो दंग रहा गया। उसे कुछ कहा तो नहीं, पर मैं समझ गया कि ऊँचे दर्जे की ऐसी अँग्रेजी लिखने में अँग्रेजी के धाकड़ भी शायद मात खा जायें!
       अभिमन्यु को मेरे बहुत-से साथी जानते हैं। जो नहीं जानते, उनके लिए बता दूँ कि वह 12वीं का विद्यार्थी है- मेरा बेटा है, बरहरवा के स्थानीय कॉलेज में ही है। जहाँ लोग छोटे-छोटे बच्चों को बड़े शहर के नामी-गिरामी स्कूलों में भेजते हैं कि बच्चों की अँग्रेजी अच्छी हो जाय, वहीं अभिमन्यु साधारण स्कूलों में पढ़कर ही इतनी अच्छी अँग्रेजी लिख सकता है- यह बात अपने साथियों को बताने के लिए ही यह मैं लिख रहा हूँ।
       खैर, यह रहा अभिमन्यु का अँग्रेजी अनुवाद:

       Description of "Naz-E-Hind Subhash"

There's been a thorny issue making each Indian uncomfortable from 18th August 1945. Three generations have grown since that day, but that pain still bleeds into one's conscience, because each generation inherits this pain from their predecessors.

What happened on 18 August 1945 in Taipei? Did the plane carrying Netaji really brace a fatal accident and silenced our beloved hero? If that's the truth, then what's the point behind keeping documents related to Netaji under heavy scrutiny, enclosed in top-secret directories by the Indian-Japanese-Russian regimes?

The book doesn't just try to find out a reasonable solution to this sophisticated query. Fundamentally, the book is centred on the international footprints and movements of Netaji from 1941 through 1945.

A handful people only know that Netaji donned the name of "Jiauddin" when leaving the country in 1941; that he embraced the title of "His Excellence Majotta" in Germany; that his code-name was "Mastuda" during his submarine voyage; and that he was popularly titled "Chandra Bose" in Japan.

Moreover, Netaji designed a potential military in Germany; his submarine voyage lasted a significant 90 days; he transferred from German to Japanese submarine near Madagascar; and that Rasbehari Bose organised the INA in Singapore. These aren't facts generally known to the common people.

Accordingly, this book logically classifies as a "must-read" for younger citizens because of multiple reasons.
One of them is the fact that our textbooks lack of any substantial amount of knowledge regarding Netaji's international movements and his heroic persona reflected in the Imphal-Kohima war. In fact, Netaji's image is of someone who led a mighty military revolution against “the empire." Considering his revolution was for freedom and his ideals and personal character were of higher ground, yet the rulers are rulers, British or Indian: why would they want to preach their next generation about a reactionary, military-backed person who led a magnificent revolution against them?
In fact, the book houses an array of happenings that have fantastic possibilities of their inclusion in the textbooks.

The book raises another question: did our "non-violence policies" really plant emotional changes in British minds and persuaded them to an extent that they would abandon their rule on Indian soil? Or, in contrast, did Netaji's military activity, coupled with the surfacing of public agitation and military mutiny after the court-martial of INA soldiers made the British think that it might finally be the time to pack?
Now it's time to frame an open and logical debate on this question!

The book, in its entirety, seamlessly showcases a majestic personality of Netaji, so majestic that the characters of Hitler, Mussolini, Tojo, Stalin, Churchill, Roosevelt, etc. feel rather plain comparatively.
The book also successfully frustrates everyone on the hardships of Netaji's personl life and how his "Dilli chalo" urging never materialised.

India would've been totally different if destiny chose to make Netaji the first ruler of independent India instead of a tragic hero.

Today, after six decades of independence, what does India look like? An ocean of poverty, malnutrition, illiteracy, and unemployment with certain islands of richness and development, where selfish deeds lead to giant corruptions each day. In this scheme of present, the book suggests that we adopt a dictatorial pattern of democracy where only people of "Netaji-like" characteristics can administer, at least for a few years!

There'll be no surprise in any resurrection or recreational revamping of the nation after 2012, even if remotely affected by this book.


(नोट- जल्दीबाजी के कारण एक-दो शब्दों के लिए उपयुक्त शब्द नहीं लिखे जा सके थे, जैसे- handful के स्थान पर few ही ठीक रहता और richness के स्थान पर prosperity ठीक रहता)

       ***** 

बुधवार, 13 अगस्त 2014

119. एण्टीबायोटिक, संगीत शिक्षक तथा अभिमन्यु



       "जयदीप, ये जो एण्टीबायोटिक दवायें हैं न, ये एक दिन बेकार साबित होने जा रही हैं These Antibiotic medicines are going to be failed." –ये बातें जिन्होंने मुझसे कही थी, वे न तो कोई डॉक्टर थे, न विज्ञान की किसी शाखा के जानकार थे। वे संगीत शिक्षक थे। एक दृष्टिहीन संगीत शिक्षक।
       बात 1989 के शुरु की है। कानपुर के लाल बंगला में एक छोटे-से संगीत विद्यालय में मैं (यूँ ही) शामिल हो गया- दरअसल मेरे पास अतिरिक्त समय था। गुरुजी भी समझ ही गये होंगे कि संगीत इसके बस का रोग नहीं है!
       खैर, जब कभी अखबार में ऐसी रपटें देखता हूँ, जिनमें कि एण्टीबायोटिक दवाओं के भविष्य में असफल साबित होने का जिक्र होता है, तब मुझे उन गुरुजी की बात याद आती है और इसी बहाने श्रद्धा के साथ मैं उन्हें नमन कर लेता हूँ।
       ***
       जब बात निकल ही गयी है, तो.....
उनकी श्रवण शक्ति गजब की थी- यह तो मैं समझ गया था, मगर "कण्ठध्वनि" से वे किसी के चरित्र, स्वभाव इत्यादि का भी अनुमान लगा सकते हैं- यह मैं नहीं समझा था। उनसे मेरी व्यक्तिगत बातचीत कम ही हुई होगी, पर पता नहीं कैसे, उन्होंने मेरे बारे में कुछ अनुमान लगाया था और एक दिन अचानक बोल बैठे थे, "जयदीप, तुम्हारी जो सन्तान होगी, वह काफी प्रतिभाशाली होगी..."
मैं झेंप गया था- मेरी उम्र उस वक्त 20 के आस-पास थी- शादी दूर की बात थी।
'97 में अभिमन्यु का जन्म हुआ- जालन्धर छावनी के सेना अस्पताल में। जब अंशु को स्ट्रेचर पर लेबर रूम से वार्ड लाया जा रहा था, तब मैं गलियारे में ही था। अभिमन्यु माँ के बगल में लेटा सो रहा था। उसके चेहरे को देखकर पता नहीं क्यों, मुझे पिताजी की याद आयी। नजदीक आने पर उसकी उँगलियों पर नजर गयी- ऐसी सुन्दर उँगलियाँ कम ही देखने को मिलती हैं... और तब अचानक संगीत के गुरुजी की बात याद आ गयी- जयदीप, तुम्हारी सन्तान जो है, वह काफी प्रतिभाशाली होगी...
मैं उनकी इस बात को भविष्यवाणी तो नहीं, पर "आशीर्वाद" के रुप में ग्रहण करता हूँ।  

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

118. "आँखापालोनी"



       दिनभर घर से बाहर रहने के कारण चूल्हे की तस्वीर नहीं खींच पाया था। अभी रात घर आकर किसी तरह अभिमन्यु को राजी किया तस्वीर खींचने के लिए। अब तक सफेद अड़हुल के फूल कुम्हला चुके थे दरअसल, आज हमारे घर में चूल्हों की पूजा हुई है।
       यूँ तो चूल्हे को बँगला में "उनून" भी कहते हैं; पर हमारे घर में इसे "आँखा" कहते हैं। चूल्हे की पूजा को "आँखापालोनी" कहते हैं। श्रावण के किसी एक सोमवार को यह पूजा होती है। इस दिन चूल्हा नहीं जलता। आज वही दिन था। कल ही अतिरिक्त भोजन सामग्री तथा पकवान्न पका लिये गये थे।
       इस घरेलू पर्व को साँपों से भी जोड़ दिया गया है। पहले जब कोयले तथा लकड़ी के चूल्हे हुआ करते थे, तब सुबह चूल्हे की राख निकालते समय साँप निकल आया करता था- दादी के जमाने में। तब चूल्हे की पूजा की परम्परा शुरु हुई। अब मानते हैं कि इस पूजा के बाद आँगन-पिछ्वाड़े में साँप दीखने बन्द हो जायेंगे। वैसे भी, आजकल साँप कम ही दीखते हैं- हर खाली पुरानी जगह पर तो मकान बन चुके हैं। "हरहरिया" साँप तक देखे जमाना हो गया- जब कि बरसात में इनका आँगन में इधर-उधर गुजरना आम हुआ करता था!     
       ***
       जो भी हो, एक दिन चूल्हे को आराम मिलने पर घर की महिलाओं को भी आराम मिल ही जाता है। मैंने अंशु को सुझाव दिया- माँ से कहो, हर महीने के किसी एक सोमवार को आँखापालोनी मनाया जाय! 

रविवार, 22 जून 2014

117. ढेलाकण्टा (फल)



       ढेलाकण्टा के फूल के बारे में मैंने 31 मार्च को लिखा था- चित्र के साथ। आज उसके फल की भी तस्वीरें दिखा दूँ।

       पिछले हफ्ते जब मैं जाफरगंज में था (दीदी के घर), तो वहाँ देखा, घर के पिछवाड़े में बहुत सारे पेड़ हैं ढेलाकण्टा के- फलों से लदे हुए। कोई नहीं खाता इन्हें। वैसे भी, जैसा कि मैंने बताया था, इसका स्वाद कुछ खास नहीं होता। बीज भी बड़ा होता है- गूदा कम ही होता है। फिर भी, हम तो अपने बचपन में इसे खाते ही थे। 

मंगलवार, 17 जून 2014

116. फीफा फीवर-2: मैसी, तुम वाकई लाजवाब हो!



       आर्जेण्टिना बनाम बोस्निया-हर्जेगोविना का मैच देखा तो रवि-सोमवार की रात (बल्कि भोर) में था, मगर कुछ लिखने का समय नहीं मिल पा रहा था
       मैसी के तीन गुणों का जिक्र मैंने सुन रखा था, जिनके कारण उन्हें मारादोना का वारिस माना जाता है। इस मैच में मैसी ने एक-एक बार तीनों गुणों का प्रदर्शन किया।
       परफेक्ट पास: मैदान के एक किनारे से मैसी ने पास दिया और पलक झपकते एक साथी खिलाड़ी ने उसे गोल में बदल दिया- एकबारगी पता ही नहीं चला कि यह हुआ कैसे? गोली भी शायद नहीं समझ पाया होगा।
       रेशमी गति: मैदान के बीच से, बल्कि उसके भी पीछे से एकबार मैसी गेन्द लेकर विरोधी के गोलपोस्ट तक आये, कोई उन्हें छू भी नहीं सका! हालाँकि इसबार गोल नहीं हुआ।
       रक्षकों को छकाना: विरोधी गोलपोस्ट के बिल्कुल सामने रक्षकों को छकाते हुए गोली के सामने से मैसी ने गोल दाग दिया! मैं समझता हूँ, इस गोल को देखने के बाद टीवी पर विश्वकप देखने वालों का 'रतजगा' सफल हो गया होगा!
       मैसी, तुम वाकई लाजवाब हो! बढ़े चलो!!    


सोमवार, 16 जून 2014

115. ओ गंगा, तू बहती क्यों नहीं...?





       भूपेन हाजारिका ने गंगा से पूछा था- ओ गंगा, तू बहती क्यों है? गीत के बोल तो याद नहीं, पर ऐसे ही कुछ थे कि तेरे तटों पर बसने वाले इतना कष्ट, इतना दुःख, इतना दर्द सहते हैं और तू है कि इन सबसे बेखबर, चुपचाप अपनी ही धुन में अविरल बहती रहती है... क्यों?
       आज मैं गंगा से उल्टा सवाल पूछना चाहता हूँ- ओ गंगा, तू बहती क्यों नहीं?
       ***
       बीते सप्ताहान्त (शनि, रविवार) मैं फरक्का से करीब छ्ह किलोमीटर दूर जाफरगंज में था- छोटी दीदी के घर। अभिमन्यु की भी इच्छा थी गंगा में नहाने की। गंगा के जिस घाट पर हम नहाने गये, वहाँ से फरक्का बराज एक क्षितिज की तरह नजर आ रहा था- करीबन 5 किलोमीटर दूर। गंगा क्या थी, बस पानी की पतली-सी धार थी, जिसमें कोई प्रवाह नहीं था। बाकी सारा हिस्सा- कोई दो किलोमीटर चौड़ा- सफेद बालू का रेगिस्तान था।
       गंगा की यह निश्चल स्थिति, जो कि फरक्का बाँध के कारण हुई है, देखकर ही मेरा मन आज अभी कहना चाहता है- गंगा, तू बहती क्यों नहीं?
       तू इस वर्षा ऋतु में अविरल बह; उन्मुक्त होकर बह; उन्मत्त, उत्ताल होकर बह; उद्दण्ड, उच्छृंखल होकर बह; बहा ले जा इस बार तू कंक्रीट और लोहे के इन बाँधों को...
       याद कर, तेरी छोटी बहन अलकनन्दा गत वर्ष कैसे बहा ले गयी थी कंक्रीट तथा लोहे के निर्माणों को...
        ओ गंगा, अब और सहनशील मत रह... तेरी सन्तान तेरा दम घोंटने की योजना बना रही है... उत्तराखण्ड में तुझपर और तेरी सखियों पर 100 से ज्यादा बाँध बनने वाले हैं... तुझे मार डालेंगे ये दोपाये... तू और बर्दाश्त मत कर गंगा... तेरी बहन यमुना को तो इनलोगों ने मार ही डाला है... तू मत मर गंगा, तू बर्दाश्त मत कर, विद्रोहिनी बन जा, विपाशा बन जा, तू इस साल प्रलय बन जा, रौद्र रुप धारण कर ले इस साल तू गंगा... 
       इस बरसात में तू उत्ताल हो जा, उद्दण्ड हो जा, बहा ले जा इन बाँधों को.. टिहरी से लेकर फरक्का तक हर बाँध को बहाकर समुद्र में मिला दे... इसी के साथ बह जायेगी सारी गाद, जो इन बाँधों के कारण जमा हो गयी है तेरे पेट में, इसी के साथ बह जायेगा सैकड़ों नगरों का मल-जल, जो तुझमें घुल गया है, इसी के साथ बह जायेंगे हजारों फैक्ट्रियों के रासायनिक कचरे, जो तेरे अन्दर विष भर रहे हैं...
       एकबार, बस एकबार इन बाँधों को तू तोड़ दे गंगा, फिर तू वैसे ही बहने लगेगी, जैसे सहस्राब्दियों से बहती आयी है.. कल-कल, अविरल, निश्छल... फिर तुझमें कभी कोई प्रदूषण ठहरेगा ही नहीं...

       गंगा, तू सुन रही है न.. वर्षा ऋतु बस आने ही वाली है.. सोच ले, इस साल तुझे बहाकर ले जाना ही होगा इन बाँधों को... मोह-माया त्याग दे, सहनशीलता त्याग दे, माँ की ममता भी त्याग दे... 

रविवार, 15 जून 2014

114. फीफा फीवर (के बहाने)

 



12 जून 14
       मैं भाग्यशाली मानता हूँ कि खुद को कि 1986 के वर्ल्ड कप मे मैंने मारादोना को टीवी पर "लाइव" खेलते हुए देखा है! वे बीच में हुआ करते थे, उनके एक तरफ होते थे दुबले-पतले कनीजिया और दूसरी तरफ दाढ़ी वाले बतिस्ता। जहाँ बाकी किसी एक खिलाड़ी को विपक्षी दल का एक ही खिलाड़ी 'कवर' करता था, वहीं मारादोना को विरोधी दल के दो-तीन या चार खिलाड़ी मिलकर कवर करते थे! मौका मिलने पर मारादोना को लंगड़ी मारकर गिराया भी जाता था। फिर भी, मारादोना आगे बढ़कर ऐसा पास देते थे कि उसपर गोल किया जा सके, या फिर खुद ही गोल दाग देते थे।
       '86 में पहला मैच (कैमरून के हाथों) हारकर भी आर्जेण्टिना ने वर्ल्ड कप जीत लिया था। एक पेनाल्टी शूट आउट में मारादोना ने इतने आराम से, इतने धीरे से और इतना सरल गोल किया था कि मुझे ताज्जुब हुआ था।
       क्या दिन (बल्कि रातें) थे वो भी, जब रात देर तक जागकर हमलोग विश्वकप फुटबॉल के मैच देखा करते थे! '86, '90 और '94 तक... उसके बाद तो बस समाचारों में ही मैच देखकर संतुष्ट हो जाता हूँ। इसबार भी शायद न देख पाऊँ। सुबह सात बजे की ट्रेन से मुझे जाना होता है और रात आठ बजे लौटना हो पाता है। वायु सेना के दिनों की बात अलग थी। सुबह साढ़े सात से दोपहर डेढ़ बजे तक का वर्किंग आवर हुआ करता था, दोपहर बाद अक्सर सोने का समय मिल ही जाता था।  
       मारादोना के बाद किसी और खिलाड़ी को मैं पसन्द नहीं कर पाया था। मगर कुछ समय पहले कोलकाता में खेलते हुए मैसी को देखा- टीवी पर। वही रेशमी गति, नपा-तुला पास.. जैसा मारादोना का हुआ करता था।
       फिलहाल वर्तमान विश्वकप का आनन्द उठाया जाय...
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13 जून 14
       12 जून को विश्वकप का पहला मैच था- मेजबान ब्राजील और क्रोशिया के बीच- भारत में डेढ़ बजे रात उसका सीधा प्रसारण होना था। टीवी चैनल का पता हमने पहले ही लगा रखा था- सोनी सिक्स। रात सोने से पहले अभिमन्यु ने पूछा- मैच देखना है? मैंने कहा- अगर डेढ़ बजे आँख खुल गयी, तो देखना है, नहीं तो छोड़ो। तुम्हें अलार्म लगाना है तो लगा लो। पर उसने अलार्म नहीं लगाया, मैंने भी नहीं।
       आधी रात मेरी आँख खुल गयी। मैंने उत्सुकता के साथ समय देखना चाहा कि क्या वाकई रात के डेढ़ बज रहे हैं? सही में, 1:32 का समय हो रहा था। कहने की आवश्यकता नहीं, हमदोनों ने मैच देखा। हालाँकि मुझे सुबह साढ़े पाँच बजे उठकर रोज की तरह तैयार भी होना था- दफ्तर जाने के लिए।
       बहुत पहले मैंने दो-तीन बार इस प्रयोग को आजमाया है- रात ठीक तभी मेरी नीन्द खुल जाती थी, जब जागने का मैंने सोच रखा होता था। कहते हैं कि गाँधीजी में यह शक्ति थी- वे जितने बजे चाहे, उतने ही बजे रात में उठ सकते थे!
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       लगे हाथ, यह भी बता दूँ कि मैं सिर्फ 'खेलप्रेमी' नहीं हूँ, बल्कि खिलाड़ी रह चुका हूँ। वायु सेना में मैं तैराकी प्रतियोगिताओं में भाग लेता था। '87 से '90 तक हर साल मैंने भाग लिया था और अन्तिम बार '95 में भाग लिया था। तैराकी की सबसे कठिन मानी जाने वाली दो इवेण्ट- 1500 मीटर की फ्री स्टाइल तथा 200 मीटर की बटरफ्लाइ स्ट्रोक में कोच मुझे जरूर उतारते थे। अन्तिम बार तो मेरे शरीर के लचीलेपन को देखते हुए कोच (उस बार कोच एक डाइवर थे) ने मुझे डाइविंग में भी उतार दिया था। जबकि मेरी उम्र उस वक्त 30 से कुछ ही कम थी। वाटर पोलो का हर मैच मैं खेलता था, प्रतियोगिताओं के दौरान और चारों क्वार्टर खेलता था- कभी एक मिनट के लिए भी मुझे रेस्ट नहीं लेने देते थे कोच- पता नहीं, मेरी स्टामिना पर उन्हें कितना भरोसा था! हम एक बार चैम्पियन और एक बार रनर्स-अप भी रहे थे। यह और बात है कि चैम्पियनशिप या रनर्स-अप का खिताब जीतने में मुख्य भूमिका सीनियर खिलाड़ियों की थी- मेरी भूमिका नगण्य थी।
       हमारी पीढ़ी के कस्बाई लोग तालाबों में नहाते हुए ही तैरना सीख चुके होते हैं। मगर वायु सेना के स्वीमिंग पूल में (पूना में एक ऑफ सीजन कैम्प में) जब मैं उतरा, तो कोच की टिप्पणी थी- दिस इज नॉट एट-ऑल स्वीमिंग... दिस इज "कॉण्ट्री" स्टाइल। इस प्रकार, फ्री स्टाइल स्वीमिंग का सही तरीका सीखने में ही मुझे लगभग दो महीने लग गये! तब मेरी उम्र 20 के करीब थी। सोचता हूँ, काश तैराकी का यह गुर सीखने का अवसर मुझे 10 की उम्र में मिला होता...! आज भी सोचता हूँ, काश, हमारे आस-पास इतनी सुविधा होती कि मैं आज कुछ बच्चों को तैराकी के गुर सीखा पाता....
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       रही बात क्रिकेट की, तो बचपन में कभी रुचि रखता था, अब मेरे दिल में इस खेल के प्रति जरा भी सम्मान नहीं है! बल्कि कुछ हद तक नफरत ही है।
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