शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

152. छुट्टी


       बैंकों में चार दिनों की छुट्टियाँ पड़ गयी हैं। एक सज्जन ने दैनिक अखबार 'प्रभात खबर' में पत्र लिखकर बाकायदे आवेदन किया है कि सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा न हो- बैंक प्रतिदिन खुलना चाहिए, कर्मचारियों को "रोटेशन" पर छुट्टियाँ देनी चाहिए। क्यों भाई? क्योंकि व्यवसायियों के गल्ले में रुपये ढेर जमा हो जाते हैं और यह उनके लिए परेशानी का सबब है। दूसरे और चौथे शनिवार की छुट्टियों के प्रति साहब की खास नाराजगी नजर आयी पत्र में।
       हद होती है। व्यवसायी स्वयं छुट्टियाँ क्यों नहीं ले लेते? कोई जरुरी है रोज सुबह सात बजे से रात ग्यारह बजे तक रुपये समेटना? बैंक बन्द है, और गल्ले में रुपये बढ़ने से आप परेशान हो जाते हैं (रुपये बढ़ने से परेशानी?!), तो आप भी छुट्टियाँ मनाईये। किसने रोका है? ऐसे तो न आपके पास बीबी के पास बैठने के लिए समय होता है, न बच्चों को कहीं घूमने ले जाने का। इन दिनों वही काम कीजिये। नाते-रिश्तेदारों से मिलिये, पुराने दोस्तों के साथ अड्डा जमाईये। सिर्फ पैसा कमाने के लिए तो ऊपरवाले ने आपको इन्सान नहीं बनाया है न!
       हालाँकि मेरे भी दोस्त व्यवसायी हैं- वे पागलों के तरह व्यवसाय नहीं करते। घर-परिवार के साथ समय भी बिताते हैं और छुट्टियाँ भी मनाते हैं। आज ही हमने देखा राजमंगल को- बच्चों को मोटरसाइकिल पर बैठाकर सैर पर निकला हुआ था। दरअसल, हम "84 बैच" वालों की बात औरों से जरा अलग है। (बरहरवा हाई स्कूल से 1984 में मैट्रिक देने वाले विद्यार्थियों का बैच बहुत विशाल था- इनमें से ज्यादातर अब भी मिलते-मिलाते रहते हैं, अपने-अपने क्षेत्र में प्रायः सभी सफल हैं और जिन्दगी को सही तरीके से जी रहे हैं... काम और फुर्सत के बीच तालमेल बिठाते हुए!)
       ***
       राज नारायण वर्मा जी की फेसबुक वाल की एक बात याद आ गयी। बैंकों की हड़ताल वाले दिन उन्होंने छत पर जाकर चारों तरफ देखा था और पाया था कि सबकुछ सामान्य है- सूरज पूरब से उग रहा है... चिड़ियाँ चहचहा रही हैं... हवा चल रही है... जबकि पिछले कुछ दिनों से अखबारों/समाचार चैनलों ने प्रलय कि आशंका जता रखी थी... बैंक कई दिन बन्द रहेंगे... आसमान टूट जायेगा... धरती फट जायेगी...
       ***
       खैर।
       हमने तो भई छुट्टी मनायी। पहले एक छोटी-सी पहाड़ी पर स्थित एक चर्च में गये। फिर उस पहाड़ी सड़क का आनन्द लेने गये, जो बरहेट की ओर जाती है। दरअसल, मेरा ख्याल था कि अभिमन्यु अभी तक उस रास्ते से नहीं गुजरा है। और टारजू (अभिमन्यु का हमउम्र- मेरा एक भांजा) चूँकि एक बाइकर है, इसलिए वह इस रास्ते को जरूर पसन्द करेगा। ऐसा हुआ भी। दोनों को उस ऊँची-नीची पहाड़ी रास्ते पर बाइक की सवारी में आनन्द आया।
       फिर एक झोपड़ीनुमा दूकान पर हमने नाश्ता किया और घर लौट आये।

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सोमवार, 7 दिसंबर 2015

151. एक कॉल "नम्बर" से-

कल (रविवार) की घटना
"ट्रिन-ट्रिन- "
मैं घर में नहीं था। 'नम्बर से' एक कॉल आती है।
"हैलो- "श्रीमतीजी फोन उठाती है।
"जयदीप जी घर में हैं?" उधर से अपरिचित महिला की आवाज आती है
"नहीं, बाहर निकले हुए हैं। आप कौन?"
"यह जयदीप जी का ही फोन है न? नम्बर डायवर्ट होकर मिला है।"
       "हाँ, उन्हीं का है। क्य़ों?"
"जयदीप जी से बात करनी है। कब तक आयेंगे?"
"आप कहाँ से बोल रही हैं?"
"जी, मुझे उन्हीं से कुछ बात करनी है।"
कहने की जरुरत नहीं कि अब तक श्रीमतीजी का पारा चढ़ चुका था। दुनिया की- खासकर, भारत की किसी भी श्रीमतीजी की यही दशा होगी।
मजे कि बात यह है कि अभी दो-एक रोज पहले ही हमदोनों "भाभीजी घर पर हैं" का एक प्रकरण देखकर ठहाके लगा रहे थे, जिसमें अंगूरी भाभी को यह शक हो जाता है उनके "लड्डू के भैया" का चक्कर किसी परायी महिला से चल रहा है, जिसका 'कोडनेम' "साक्षी" है (जबकि यह सक्सेना जी का नम्बर था); या फिर उनका चक्कर उस महिला से चल रहा है, जिनसे तिवारी जी की सगाई होने वाली थी (जबकि उसने तिवारी जी औपचारिक बातचीत की थी फोन पर)। उधर अनीता भाभी को अपने "विभू" पर सन्देह हो रहा था कि उसका चक्कर "शीला" से चल रहा है, जो कॉलेज में विभू के साथ ही थी (जबकि यह एक सामान्य मित्रता थी)।
धारावाहिक में इस तरह के प्रकरण को देखने के दो-एक दिनों के अन्दर ही मोबाइल पर इस तरह का फोन आ जाय, तो समझ सकते हैं कि एक बड़ी दुर्घटना घटने ही वाली थी।
"देखिये, मैं उनकी वाईफ बोल रही हूँ। क्या बात करनी है आपको उनसे?" श्रीमतीजी ने कड़ाई से कहा होगा।
"मैं "डिश टीवी" से बोल रही हूँ। आपका पैक...... " और उधर से सेल्सगर्ल वाली बातें शुरु हो जाती हैं।
***
इस प्रकरण से इतना तो समझ में आता है कि उस डिश टीवी वाली लडकी से दो गलतियाँ हुईं- एक, 'हैलो' सुनने के बाद ही उसे अपना परिचय दे देना चाहिए था; और दो, घरों में टीवी पर कौन-से चैनल चलने हैं और कौन-से नहीं, यह फैसला श्रीमतियों के हाथ में होता है, फिर वह बेचारी "श्री" से ही बात करने पर क्यों तुली थी? ("श्री"जी आमतौर पर थोड़ी देर के लिए समाचार चैनल ही देखते हैं। बहुत हुआ, तो बच्चों के साथ-साथ कार्टून चैनल या डिस्कवरी-जैसे चैनल देख लेते हैं। मेरा तो यह भी बन्द है अभी- क्योंकि बेटा पढ़ाई के लिए बाहर है।)
लगे हाथों एक और शिष्टाचार की बात कर दूँ- जब कभी अनजान जगह पर फोन किया जाय, तो उधर से "हैलो- " का जवाब आने के बाद अपना परिचय तो देना ही चाहिए और इसके बाद जो बात कहनी चाहिए वह यह है कि- 'क्या मैं आपका दो-चार मिनट समय ले सकता/सकती हूँ?' इस प्रश्न को शालीनता के साथ कई तरह से पूछा जा सकता है।

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रविवार, 29 नवंबर 2015

150. भारतीय इतिहास: कहानियों के माध्यम से


       हम भारतीय- आम तौर पर- अपने इतिहास के बारे में वही जानते हैं, जो यूरोपीय इतिहासकारों ने तथा उनके द्वारा खींची लकीरों पर चलने वाले भारतीय इतिहासकारों ने पाठ्य-पुस्तकों में लिख रखा है। इस इतिहास को पढ़कर हम भारतीयों के मन में हीन-भावना ही जन्मती है, क्योंकि इसमें सिर्फ हमारी पराजयों का जिक्र है। वैसे, इतिहासकारों का एक दूसरा वर्ग भी है, जो टेली-विजन, हवाई-जहाज से लेकर परमाणु बम तक हर आधुनिक चीज का संकेत वेद-पुराणों में खोज निकालता है। मैं व्यक्तिगत रुप से इन दोनों ही प्रकार के इतिहासकारों को अतिवादी मानता हूँ।
       बहुत साल पहले मैंने एक दक्षिण भारतीय इतिहासकार (नाम याद नहीं- शायद के.एम. पणिक्कर या नीलकान्त शास्त्री नाम था) द्वारा लिखी एक पुस्तक पढ़ी थी (तब मैं मद्रास में था और अन्नामलाई विश्वविद्यालय से पढ़ाई कर रहा था), जो मुझे अच्छी लगी थी। फिर भी, मुझे ऐसी ऐतिहासिक कथाओं की जरुरत थी, जो हममें गर्व बोध जगाये।
       मेरी खोज पूरी हुई, जब मैंने कर्नल अजीत दत्त का एक कथा संग्रह पढ़ा। इसे पढ़ने के बाद मैंने अपनी बड़ी डायरी में तीन पन्नों का एक आलेख भी लिखा, मगर अफसोस कि चार-पाँच साल बीत गये- कभी इस आलेख को टाईप नहीं कर सका।
पिछले दिनों टीपू सुल्तान को हमारे देश/समाज का "नायक" मानने/न मानने को लेकर जब बहस हुई, तब मेरा ध्यान उस आलेख की तरफ गया। अफसोस, कि उस वक्त भी मैं टाईप नहीं कर सका।
आज इस वक्त मैं अपने उसी आलेख के कुछ अंश को टाईप कर रहा हूँ- पूरे आलेख को टाईप करना अब भी नहीं हो पा रहा है।
पता नहीं, हमारे इन नायकों को इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों से बाहर क्यों रखा गया है... सन्देह होता है कि कहीं यह षड्यंत्र तो नहीं?
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चित्र यहाँ से साभार
यह सही है कि बचपन में 'अमर चित्र कथा' में पढ़ी बाजीराव पेशवा (द्वितीय) की कुछ बातें मुझे याद थीं, मगर इस संग्रह में उनकी कहानी "एक बाजी बाकी सब पाजी" पढ़कर मुझे पता चला कि बाजीराव पेशवा ने दो-दो बार लालकिले पर कब्जा किया था- 1719 और 1722 (सम्भवतः) में। वे चाहते, तो मुगल सल्तनत का खात्मा कर सकते थे!
दूसरी बार मुगल बादशाह फर्रुखसियार ने बाजीराव के सम्मान में दरबार आयोजित किया था पूछा भी था कि वे खुद (बाजीराव) दिल्ली के सुल्तान क्यों नहीं बन जाते? बाजीराव ने बताया कि उन्होंने साहूजी (शिवाजी के पोते) को वचन दे रखा है कि मुगल बादशाहों को नुक्सान नहीं पहुँचाना है। अब सवाल है कि साहूजी ने बाजीराव से ऐसा वचन क्यों ले रखा था?
तो जवाब है कि साहूजी का जन्म औरंगजेब की छावनी में हुआ था और बादशाह औरंगजेब साहूजी को पसन्द किया करते थे। 'साहू' शब्द का अर्थ होता है- साफ दिलवाला और यह नाम औरंगजेब का ही दिया हुआ था।
ऐसे शूरवीर की कहानी- जहाँ तक मुझे याद है- मैंने इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में नहीं पढ़ी। हाँ, जैसा कि मैंने बताया- "अमर चित्र कथा" में मैंने पेशवा बाजीराव (द्वितीय) की कहानी पढ़ी थी और उसके कुछ चित्र और संवाद मेरे जेहन में छपे हुए हैं- खासकर, बाजीराव के दो बहादूर अंगरक्षक शिन्दे और होलकर वाला प्रसंग। (बाद में होलकर को इन्दौर और शिन्दे को ग्वालियर स्टेट ईनाम में मिले थे। शिन्दे परिवार ही 'सिन्धिया' बना शायद।)
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चित्र यहाँ से साभार
एक कहानी है- "राजधर्म"। यह बप्पा रावल की कहानी है।
मैट्रिक तक हम सबने इतिहास पढ़ा है। मैं सबसे पूछता हूँ- बप्पा रावल के बारे में आप कितना जानते हैं? बहुतों को ऐसा लगेगा कि यह नाम वे पहली बार सुन रहे हैं।
8वीं सदी से ही गजनी के लुटेरे शासकों ने भारत में लूट-पाट मचाना शुरु कर दिया था। भारत में सोने-चाँदी का भण्डार था, मगर देश की रक्षा की जिम्मेवारी सिर्फ 20 प्रतिशत क्षत्रियों पर थी- कोई और हथियार उठाता ही नहीं था! गजनी के लुटेरों के लिए यह फायदे का सौदा था- बस क्षत्रियों को मार डालो- कोई दूसरा आगे नहीं आयेगा लड़ने के लिए... ।
बप्पा रावल के राजा बनने की कहानी किसी परिकथा या फिल्म के नायक के समान रोमांचक है। राजा बनने के बाद उसने दर्जनों उपजातियों में बँटे सभी क्षत्रियों को "राजपुत्र" (राजस्थान के पुत्र, बाद में ये 'राजपूत' कहलाये) के रुप में संगठित किया और गजनी पर आक्रमण किया। वहाँ का शासक सलीम भाग खड़ा हुआ। पूरे गजनी को तुर्कों एवं अरबों से खाली करा लिया गया था। कन्धार, ईरान, ईस्पहान, तूदान, खोरासन तक बप्पा रावल का एकलिंगी झण्डा लहराने लगा था।
आगे चलकर जब तक देशद्रोही राजा जयचन्द ने मोहम्मद गोरी को भारत आने का निमंत्रण नहीं दिया, तब तक- यानि करीब 200 वर्षों तक- गजनी के शासक बप्पा रावल की वीरता के ख्याल मात्र से भारत की ओर देखना भूल गये थे!
जयचन्द ने गोरी को निमंत्रण दिया था- पृथ्वीराज को हराने के लिए। गद्दार!
अब सोचिये कि क्या सोचकर बप्पा रावल की कथा को भारतीय इतिहास के पन्नों से गायब किया गया है?
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एक और शूरवीर की कहानी है- महामात्य आनन्द वाशेक की। ये गजब के सेनानायक थे! आनन्द वाशेक ने सुल्तानों की बड़ी से बड़ी फौज को अपनी बुद्धीमता एवं रण-कौशल से पानी पिला दिया था। यह तेरहवीं सदी की बात है। बाद के दिनों में जब तक आनन्द वाशेक जिन्दा रहे, दिल्ली के सुल्तानों ने चन्देल राजाओं को छेड़ने की हिम्मत नहीं की।
कभी किसी ने इतिहास की पाठ्य-पुस्तक में महामात्य आनन्द वाशेक नाम पढ़ा हो तो बताये।
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इस प्रकार, इस कथा संग्रह में 19 कहानियाँ हैं
"छह हाथों वाली मूर्ति" में विजयनगर साम्राज्य के पतन की दर्दनाक एवं मार्मिक कहानी है और "कालाचाँद"- कहानी है एक उच्च कुल के ब्राह्मण युवक के मुसलमान बनने की, जो आगे चलक पुरी के जगन्नाथ मन्दिर का ध्वंस करता है। ये कहानियाँ काफी कुछ सोचने को मजबूर करती हैं।
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मेरा डायरी वाला वह आलेख और भी लम्बा है, मगर मैं यहीं समाप्त करता हूँ। कर्नल अजीत दत्त की उस पुस्तक का नाम "कथा-कशिका' है। वे फारबिसगंज के रहने वाले हैं। मैं तब पास के शहर अररिया में रहता था, जब मुझे उनकी यह पुस्तक मिली थी।
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सुना है कि बाजीराव पर फिल्म बन रही है। शायद बप्पा रावल और आनन्द वाशेक पर भी कभी फिल्में बनें। शायद इस देश में कोई ऐसा नायक पैदा हो, जो "हम्पी के खण्डहरों" के स्थान पर फिर से "विजयनगर" नामक एक सुन्दर नगर बसाये। शायद कभी हमारी इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में ऐसी बातें शामिल की जायें, जिनमें हमारी जयगाथाओं का वर्णन हो। शायद चौथी कक्षा का कोई बच्चा कभी मराठी सेनानायक आंग्रेजी के बारे में पढ़े, जिसकी जलसेना ने फ्राँसीसी जलसेना को पराजित किया था...
शास्त्रीजी ऐसा बदलाव ला सकते थे, मगर एक युद्ध और कुछ गद्दारों ने उन्हें कुछ करने का समय ही नहीं दिया... अफसोस!
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पुनश्च: प्राचीन इतिहास पर भी मेरा एक आलेख है, जिसे आप मेरे दूसरे ब्लॉग पर यहाँ पढ़ सकते हैं।


मंगलवार, 17 नवंबर 2015

149. आल्पना- 3


       इस ब्लॉग में आल्पना पर पहले से मेरे दो आलेख हैं (क्रमांक- 89 और 91)। उनमें जिक्र है कि मेरी मँझली और छोटी फुआ (बुआ) इस कला में सिद्धहस्त हैं; दूसरी पीढ़ी में मेरी दोनों दीदी इस कला में पारंगत है और तीसरी पीढ़ी में छोटी दीदी की बेटी को तो इस कला में महारत हासिल है। इस बार यह भी बता दूँ कि मेरी भतीजी अभी यह कला सीख रही है- वह भी अच्छा आल्पना बनाती है।
       खैर।

मेरी मँझली फुआ घर आयी हुई है। घर में "छठ" उत्सव की तैयारियाँ चल रही हैं। फुआ ने इस अवसर पर जो आल्पना बनायी हैं, उनके चित्र यहाँ प्रस्तुत है- 




यह डिजाइन मुझे खास तौर पर पसन्द है- बचपन से ही.
जहाँ कहीं भी बेलबूटे की जरुरत पड़ती है- मैं यही डिजाइन बनाने की कोशिश करता हूँ.

सोमवार, 16 नवंबर 2015

148. कबाड़ में "टप्पर"


       25 नवम्बर 2010 का मेरा एक आलेख है- "टप्परगाड़ी" (आलेख क्रमांक- 5), जिसमें साल 1998 में हमारे "टप्परगाड़ी" में बैठने का जिक्र है। उस आलेख में मैंने ऐसा लिखा है कि एक बाढ़ में मिट्टी की दीवार के नीचे दबकर वह "टप्पर" नष्ट हो गया।
       यह जानकारी गलत है। चौलिया गाँव में तीन चार दिनों के लिए आयी उस बाढ़ में भी वह "टप्पर" बच गया था। बाद के वर्षों में कई बार मैंने उस "टप्पर" को अपने उस दादाजी (पिताजी के मामाजी) के आँगन में इधर से उधर पड़े देखा। मगर तस्वीर खींचने या अपनी भूल सुधारने की सुध नहीं आयी।
       बीते 14 नवम्बर को जब हमारा चौलिया गाँव जाना हुआ, तो इस बार मैंने दादी से पूछ ही लिया- वह "टप्पर" कहाँ गया?
       उन्होंने ईशारा किया- एक छप्पर की तरफ, जहाँ ज्यादातर बेकार चीजें पड़ी थीं। वहीं वह "टप्पर"- जो कभी आन-बान-शान का प्रतीक, बहू-बेटियों का पर्दा हुआ करता था- आँसू बहा रहा था।
       मैंने उसकी एक तस्वीर ले ली। उसे ही यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। उस आलेख को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक किया जा सकता है।

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बुधवार, 11 नवंबर 2015

147. दीवाली (2015)

       अररिया (नेपाल की सीमा पर, बिहार) में रहते वक्त जब दीवाली पर घर लौटता था, तब कटिहार से मनिहारी के बीच पड़ने वाले गाँवों में देखता था- हर घर के बाहर एक लम्बे बाँस से एक "कन्दील" लटक रही है। गंगा के इस पार आने के बाद यह दृश्य नहीं दीखता था। शहरों में तो बस ग्रिटिंग कार्ड़्स पर ही कन्दील नजर आती हैं। हालाँकि अररिया में दीवाली की सुबह कन्दील बिकते हुए देखा था और खरीद कर घर में टाँगा था।
खुद कन्दील बनाने की हिम्मत अब नहीं रही। बचपन में एक ही बार कन्दील बनाया था- अपने से। दरअसल, हमारे बरहरवा में कन्दील टाँगने की परम्परा नहीं के बराबर है। जो इक्के-दुक्के टाँगते भी हैं, वे "मेड इन चायना" वाली कन्दील टाँग लेते हैं, जिनमें बिजली का बल्ब जलता है- दीपक के स्थान पर। 
***
       एक और परम्परा बरहरवा में नहीं है- "घरौंदा" बनाने की। इक्के-दुक्के लोग ही इसका पालन करते हैं। अब यह परम्परा नहीं है, तो "चीनी के खिलौने" भी यहाँ नहीं बिकते। हालाँकि पड़ोसी शहर राजमहल में इनकी परम्परा कायम है।
       प्रसंगवश, इस साल हमारी "छोटी" का घरौंदा सुन्दर बना है- चित्र देखिये। घरौंदे के लिए "खील" तो मिल गयी, (चीनी के) "खिलौने" नहीं मिले। उसके स्थान पर बताशे की व्यवस्था है।


       एक और बात याद आयी। बचपन में स्कूली पाठ्य-पुस्तक की जो दीवाली वाली कविता थी ("दीप जलाओ दीप जलाओ आज दीवाली रे"), उसमें "मैं तो लूँगा खील-खिलौने तुम भी लेना भाई" को हम ठीक से नहीं समझते थे। सोचते थे, यहाँ "खेल-खिलौने" होना चाहिए। अब घरौंदा बनाने और उसे खील-खिलौने से भरने की जब परम्परा ही नहीं थी, तो हम भला इसे समझते कैसे?  
       ***
       हाँ, एक परम्परा बरहरवा में काफी पुरानी है- वह है, दीवाली की रात "काली पूजा" की। बंगाल में इसे "श्यामा पूजा" कहते हैं। यहाँ के "सार्वजनिक मन्दिर" में दशकों से दीवाली की रात "काली पूजा" होती आ रही है।






       काली पूजा पर एक दृश्य की याद आ रही है। पिछले साल दीवाली के बाद किसी एक दिन भागलपुर में था। उस रोज काली की प्रतिमाओं का विसर्जन होना था। ओह, ऐसा विसर्जन जुलूस मैंने कभी नहीं देखा था! भागलपुर की सारी प्रतिमायें एक साथ विसर्जन के लिए जा रही थीं। सम्भवतः एक सौ से ज्यादा प्रतिमायें होंगी! भारी भीड़। गाजे-बाजों की भरमार। इन सबके बीच पारम्परिक हथियारों की प्रदर्शनी! हर दो-एक प्रतिमा के बाद एक गाड़ी में खास ढंग से बना एक बड़ा-सा 'फ्रेम' था और उस फ्रेम में करीने से तलवार, भाले, कटार, बर्छी इत्यादि सजे हुए थे। माँ काली की प्रतिमायें तो देखने लायक थीं ही।


       भागलपुर से लौटते वक्त साहेबगंज में उतरा- रात ढल चुकी थी। यहाँ भी यही दृश्य- छोटे पैमाने पर। पता चला, शहर की सारी प्रतिमाओं का विसर्जन तो हो चुका है- आज "बम काली" का विसर्जन है। "बम काली" मैं ठीक से समझा नहीं- सम्भवतः शहर की सबसे विशाल और रौद्र रुप वाली काली प्रतिमा को "बम काली" कहा जाता होगा।
       खैर, अभी इतना ही, दीवाली की शुभकामनायें...
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रविवार, 8 नवंबर 2015

146. कल्याणचक का कायाकल्प

कल्याणचक स्टेशन की वह झोपड़ीनुमा चाय-दूकान... पता नहीं, अब यह है भी है या नहीं. 

       जब हरी दूब के स्थान पर कंक्रीट के फर्श बनने लगे, पेड़ों के स्थान पर टावर बनने लगे, पगडण्डियों के स्थान पर फ्लाइओवर या फुट ओवर ब्रिज बनने लगे, गुमटियों के स्थान पर मॉल बनने लगे, तो इसे "विकास" कहते हैं। मैं विकास का मजाक नहीं उड़ा रहा हूँ। विकास न होता, तो कम्प्यूटर पर यह ब्लॉग कैसे लिखता! बस, मैं अपने मनोभाव को व्यक्त कर रहा हूँ कि मुझे हरी दूब, पेड़ों के छाँव, कच्ची पगडण्डियाँ, गुमटी या झोपड़ीनुमा छोटी-छोटी दूकानें अच्छी लगती हैं। आडम्बर, बनावटीपन से दूर यहाँ अपनापन, सरलता का अहसास होता है। चकाचौंध, भागम-भाग और "फॉर्मलिटी" वाले माहौल में मुझे घुटन-सी महसूस होती है। इसमें मैं कुछ कर भी नहीं सकता, क्योंकि बनाने वाले ने मुझे स्वभाव ही ऐसा दिया है!
       ***
       ट्रेन से बरहरवा से साहेबगंज जाते समय एक छोटा-सा स्टेशन आता है- कल्याणचक। दो-ढाई साल पहले यहाँ प्लेटफार्म के नाम पर हरी दूब से ढकी पटरी से हाथ भर ऊँची जमीन हुआ करती थी। 2012 में इस रूट पर तिनसुकिया मेल दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थी। तब अचानक रेलवे के मुख्यालयों में बैठे बड़े साहबों का ध्यान गया कि- अरे, यहाँ तो दस साल पहले पटरियों का "दोहरीकरण" हो जाना चाहिए था! इतनी देर कैसे हुई। (बता दूँ कि यह रेल-लाईन 1860 में बिछी थी और अभी तक "सिंगल" लाईन ही थी। सिर्फ बरहरवा से तीनपहाड़ तक दोहरीकरण हुआ था, उसके बाद काम रुक गया था।)
       खैर, युद्धस्तर पर "दोहरीकरण" का काम शुरु हुआ और मैं यह देखकर चकित रह गया कि सबसे ज्यादा कायाकल्प इस "कल्याणचक" स्टेशन का ही हो रहा था। कारण का मुझे अब तक पता नहीं। उन दिनों मैं "डेली-पैसेन्जरी" करता था- रोज सुबह ट्रेन से जाता था और रात को लौटता था। मेरी आँखों के सामने कल्याण्चक एक सीधे-सादे स्टेशन से लम्बा-चौड़ा स्टेशन बन गया!
       ***
2013 में जिस जगह खड़े होकर मैंने बाँयी तरफ वाली तस्वीरें खींची थीं,
2015 में उसी जगह खड़े होकर उन्हीं कोणों से मैंने दाहिनी तरफ वाली तस्वीरें खींचने की कोशिश की है. 

       कल्याणचक का पुराना स्टेशन-भवन तो खैर, कायम रह गया- नयी पी.आई. बिल्डिंग बगल में बनी थी- काफी पहले। नयी पटरियाँ बिछाने के लिए विपरीत दिशा की जमीन ली गयी-दस-बारह झोपड़ियों वाली एक बस्ती को पीछे हटाकर, मगर सभी स्टेशनों का ऐसा सौभाग्य नहीं था। तालझारी, करणपुरातो, महाराजपुर, मिर्जाचौकी स्टेशनों के पुराने भवनों को तोड़ना पड़ा।  
       ये पुराने भवन सोचिये कि उन्नीसवीं सदी के बने हुए थे और इनकी एक खासियत यह भी होती थी कि हर स्टेशन के भवन की बनावट अलग-अलग थी। इलाके के अशिक्षित लोग रात के अन्धेरे में भी स्टेशन भवन की एक झलक देखकर समझ जाते थे कि ट्रेन किस स्टेशन पर है।
       अब जो रेलवे वाले "पी.आई. बिल्डिंग" बना रहे हैं, उनकी बनावट हर स्टेशन पर बिलकुल एक-जैसी होती है- खड़ूस किस्म की डिजाइन। "कला" और "रचना" से कोई वास्ता नहीं! उनकी अपनी कोई पहचान नहीं होती।  
       बचपन में मैं भी सोचता था कि स्टेशनों के भवन एक-जैसे क्यों नहीं होते, मगर बाद में समझा- इनका अलग-अलग होना बेहद जरूरी है। हर स्टेशन-भवन की अपनी एक पहचान होती है, जो उस शहर के साथ जुड़ जाती है।
       यहाँ तक ध्यान रखा जाता था कि उस शहर की संस्कृति की छाप स्टेशन भवन में झलके!
       लगता है रेलवे ने इस खूबसूरत नीति का परित्याग कर दिया है....
       अफसोस!

       ***** 

145. जीवन के पाँच दशक...


शनिवार, 7 नवंबर 2015

144. 'चालीसा'



एक कहावत होती है- "चालीसा", यानि चालीस की उम्र के बाद आँखों की रोशनी कम होना 2006 में चालीस का होने के बाद अगले साल मैंने आँखों की जाँच करवायी थी- मेरठ में ये 6/6 थीं चार-पाँच साल के बाद महसूस होना शुरु हुआ कि कम रोशनी में छोटे अक्षर पढ़ने में परेशानी हो रही है इस सच्चाई को हजम करने में और एक-डेढ़ साल बीते अब एक चश्मा- मामूली-सा ही- ले ही लिया है- छोटे अक्षरों को पढ़ने के लिए- खासकर, जब प्राकृतिक रोशनी पर्याप्त न हो वैसे, इसका ज्यादातर इस्तेमाल अभी तक तो सिर्फ दफ्तर में ही हो रहा है
तरसों सुबह दफ्तर को निकलने से पहले वही चश्मा लगाये मैं...
(नोट- फोटो में थोड़ी कलाकारी की गयी है)

रविवार, 25 अक्तूबर 2015

143. दुर्गा पूजा और मुहर्रम


       महालया के दिन माँ दुर्गा सपरिवार अपने मायके आती है और विजयादशमी के दिन लौट जाती है। इसी अवसर पर दुर्गा-पूजा मनाया जाता है। देश के पूर्वी प्रान्तों में माँ दुर्गा की प्रतिमा महिषासुर का वध करती हुई स्थापित होती है। उनके अगल-बगल गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती और कार्तिक की प्रतिमायें होती हैं। छठी पूजा के दिन माँ दर्शन देती है; सप्तमी, अष्टमी, नवमी के रोज लोग खूब घूमते हैं और दशमी के दिन इन प्रतिमाओं का जल में विसर्जन करते हुए माँ को सपरिवार विदा कर दिया जाता है। बंगाल में तरह-तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि की धूम रहती है।
देश के पश्चिमी प्रान्तों के लोग, जिन्होंने ऐसी पूजा नहीं देखी है, वे आश्चर्य करेंगे कि इतनी सुन्दर प्रतिमाओं का जल में विसर्जन कर दिया जाता है! (ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मेरी श्रीमतीजी, जो को देश के पश्चिमी हिस्से की है, वह शुरु-शुरु में बहुत अफसोस किया करती थी कि इन प्रतिमाओं को विसर्जित क्यों करते हैं? सजाकर रखते क्यों नहीं?)
दरअसल, पश्चिमी प्रान्तों में दुर्गा पूजा को नवरात्र के रुप में मनाया जाता है, जहाँ घरों में महिलायें आठ या नौ दिनों के लिए कलश की स्थापना करती हैं। ग्वालियर में रहते हुए मैंने माँ दुर्गा की प्रतिमायें देखी जरुर थीं, मगर वे सिंहवाहिनी दुर्गा की एक ही प्रतिमा होती थीं, जो पूरे नौ या दस दिनों तक स्थापित रहती थीं। वैसे, अगर सुन्दरता की बात की जाय, तो पूर्वी प्रान्तों की प्रतिमायें ही ज्यादा सुन्दर होती हैं। सबसे बड़ी बात, इधर चूँकि माँ दुर्गा के साथ गणेश, कार्तिक, लक्ष्मी, सरस्वती की भी प्रतिमायें होती हैं, इसलिए पूरा दृश्य और भी सुन्दर हो जाता है।
यह भी एक तथ्य है कि देश के किसी भी शहर में अगर बंगवासियों की संख्या पर्याप्त है, तो लोगों को वहाँ माँ दुर्गा की "सपरिवार" प्रतिमायें देखने मिल जायेंगी।
(बात यहाँ आस्तिकता-नास्तिकता की नहीं है; मूर्ति पूजा के औचित्य की बात भी नहीं है; और सुर-असुर के रुप को सवर्ण-दलित के रुप में देखने की बात तो बिलकुल नहीं है। सीधी-सी बात है, यह ऋतु का सन्धि काल है, मौसम सुहाना होता है, लोगों को ऐसे मौसम में त्यौहार मनाना और इसी बहाने जीवन में आमोद-प्रमोद को शामिल करना अच्छा लगता है। ऐसा होना चाहिए, होते आया है, होते रहेगा। ज्यादा दिमाग खपाना उचित नहीं- मेरी समझ से।)
खैर, हमारे बरहरवा में कुल सात दुर्गा-पूजा मण्डप हैं। हर साल की भांति इस साल भी पूजा धूम-धाम से मनी। मैं तस्वीरें नहीं खींच पाया, यह और बात है।
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इस बार जो विशेष बात रही, वह यह कि दुर्गा पूजा के साथ ही मुहर्रम भी चल रहा था। बरहरवा में मुहर्रम पर गीत गाते और खून बहाते हुए मातमी जुलूस तथा ताशे की धुन पर लाठियाँ खेलते हुए ताजिया जुलूस दोनों निकलते हैं। दोनों जुलूसों का समय अलग-अलग होता है। इस बार मुहर्रम में कुछ बातें मैंने नोट की और इसीलिए इस पोस्ट को मैं लिख रहा हूँ।
विजयदशमी के दिन बरहरवा में सिर्फ एक ही प्रतिमा का विसर्जन हुआ, बाकी प्रतिमाओं का विसर्जन अगले दिन यानि बीते शुक्रवार को हो रहा था। (आम तौर पर वृहस्पतिवार को बेटी को विदा नहीं किया जाता।) इधर हम नवरात्र/दुर्गा-पूजा के कारण एक दिन भी "मज़लिस" में नहीं जा पाये थे, जहाँ इमाम हुसैन तथा उनके परिजनों की शहादत की कहानियों दस दिनों तक चलती है। (इस पर मेरा एक विस्तृत आलेख क्रमांक 42 पर है- 'सक़ीना' नाम से)।
शुक्रवार को हम जाने के लिए तैयार थे, मगर रात के साढ़े नौ बजे के बाद भी मज़लिस शुरु होने की आवाज नहीं आयी (लाउडस्पीकर पर)- जबकि नौ बजते-बजते आवाज आ जाया करती थी। दस बजे करीब मैं सरबर ईरानी साहब के घर गया- पता लगाने कि आज मज़लिस होगी या नहीं। सरबर साहब ने बताया कि चूँकि आज आखिरी रात है और आज हमलोग रातभर जागते हैं, इसलिए देर से शुरुआत करेंगे। आपलोग साढ़े दस बजे रात तक आ जाईये। मुझे लगा, वे सही कह रहे होंगे। बाहर निकलते वक्त मौलाना साहब मिल गये, जो हर साल लखनऊ से आते हैं। असली बात उन्होंने मुझे बतायी- आपलोगों की पूजा जो घूम रही है न, इसलिए हमलोग देर कर रहे हैं।
तब मेरा ध्यान गया कि विसर्जन के लिए माँ दुर्गा की प्रतिमाओं के साथ हमारे जुलूस भी तो घूम रहे हैं- पूरे बाजे-गाजे के साथ। अभी कुछ ही देर पहले ऐसा एक जुलूस हमारे मुहल्ले से होकर गुजरा था। ऐसे में, अगर इनका लाउड स्पीकर भी उस वक्त ऑन रहता, तो क्या अटपटा नहीं लगता? एक तरफ खुशी के बाजे-गाजे और दूसरी तरफ मातमी स्वर... ।
जो भी हो, मुझे उनका यह निर्णय बहुत अच्छा लगा।
कल मुहर्रम के दोनों जुलूस निकले- एक दोपहर से पहले, दूसरा दोपहर के बाद।
आज शाम ताजिया के साथ एक और जुलूस निकला। ताशा बज रहा था, नौजवान लाठियाँ खेल रहे थे... अचानक मेरा ध्यान गया- एक तिरंगे पर। तिरंगा! यह तो पहली बार मैं देख रहा था- विशाल धार्मिक झण्डों के साथ-साथ एक "राष्ट्रध्वज" भी।
एक और बात पर ध्यान गया- ईरानियों के जुलूस के साथ तो खैर महिलायें और लड़कियाँ रहती ही थीं; इस बार देखा, ताजिया वाले जुलूस के साथ भी महिलायें और लड़कियाँ घूम रही थीं।
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मुझे लग रहा है, कोई कुछ भी समझे, मुझे अपने ब्लॉग पर इन शुभ लक्षणों वाली बातों का जिक्र कर देना चाहिए, जिन्हें मैंने अपने बरहरवा में दुर्गा-पूजा और मुहर्रम के दौरान नोट किया- इस साल।

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मंगलवार, 4 अगस्त 2015

141. "रोमियो"

जब रोमियो के आये तीन दिन हुए थे. 

       पहले ही स्पष्ट करना जरुरी है कि "रोमियो" हमारे घर में रह रहे बिल्ली के नन्हे बच्चे का नाम है
       दो महीने पहले (5 मई को) यह बच्चा हमारे घर में 'मान न मान, मैं तेरा मेहमान' के रुप में आ गया था। जैसा कि हमारे घर की परम्परा रही है (पहले पिताजी कुत्ता पालने का शौक रखते थे और माँ भुनभुनाती थी फिर मैं कुता रखता था तो श्रीमतीजी भुनभुनाती थी- हालाँकि बाद में देखभाल में उन्हीं लोगों का हाथ ज्यादा होता था।), अंशु ने उसे भगाना चाहा, मगर अभिमन्यु ने उसे रख लिया।
       बिल्ली का वह बच्चा औरों से अलग था- हमेशा लोगों के साथ रहना पसन्द करता था और हमेशा बिस्तर वगैरह पर ही बैठना पसन्द करता था। ऐसा लगता था, मानो पहले से ही पालतू हो; जबकि आम तौर पर इतने छोटे बिल्ली के बच्चे इन्सानों से दूर भागते हैं।
अभिमन्यु की गोद में आराम फरमाते हुए... 
       खैर, वह घर में रहने लगा। जल्दी ही अभिमन्यु का दोस्त बन गया। हमने भी अंशु से कहा- रहने दो, कौन जाने किसी जन्म में कभी यह कोई अपना ही रहा हो! कुछ दिनों बाद तो ऐसा हुआ कि दो-एक घण्टे उसे न देखने पर हमलोग खुद ही उसे खोजने लगते थे- कहाँ गया रोमियो?
       वह खाने का शौकीन बिल्कुल नहीं था। रोटी के कुछ टुकड़े और दो-चार शिप दूध, बस यही उसका खाना था। हाँ, रसोई में बर्तनों की आवाज सुनते ही वह रसोई में आकर चुपचाप बैठ जाता था।
       हमलोग मांसाहार न के बराबर करते हैं। मगर रोमियो के कारण अभिमन्यु सप्ताह में एकबार खुद ही मछली या चिकन लेकर आने लगा- आम तौर पर वह बाजार जाने से कतराता था। अभिमन्यु उसे कभी-कभी नहलाता था- नहाने के बाद रोमियो छत पर बैठा रहता था- सूख जाने तक। हाल में अभिमन्यु की किताबों की आलमारी से दुछत्ती तक एक पुल बना दिया गया था और वह दुछत्ती पर भी कुछ समय बिताने लगा था।
       रोमियो कभी-कभी मच्छरदानी के ऊपर सोता था- झूलते हुए।
       ***
     
एक रोज इस तरह सोते हुए पाया गया वह... 
  रोमियो अब भी घर में ही है- मगर अब वह उदास रहता है- ढंग से आँखें खोलकर देखता भी नहीं। खाना-पीना बस नाममात्र का रह गया है। बीते वृहस्पतिवार को अभिमन्यु कोलकाता चला गया- आगे की पढ़ाई करने। हमदोनों भी गये थे- हमदोनों तो सोमवार को लौट आये, अभिमन्यु वहीं रहा। शायद पन्द्रह अगस्त पर वह घर आये। तब शायद रोमियो फिर पहले की तरह खुश हो जाये... मगर सिर्फ दो दिनों के लिए ही...

       पता नहीं आगे उसके दिन कैसे गुजरेंगे...  

शरारत करते हुए... 

बाहर बरामदे पर रोमियो. 

खेलने के मूड में. 

और अब कल की तस्वीर- उदास रोमियो.
पुनश्च: 9/8/2015
"रोमियो" चल बसा... 
सुबह अंशु की सिसकियों से मेरी आँखें खुलीं... 
देखा रोमियो के मृत शरीर को गोदी में लेकर वह रो रही है...  

रविवार, 26 जुलाई 2015

140. जिन्दगी


       1984 में मैट्रिक पास करके मैं अगले ही साल (इण्टर की पढ़ाई अधूरी छोड़) एक भारतीय सशस्त्र  सेना में शामिल हो गया था- एक मामूली सैनिक के रुप में। ज्यादा पैसा कमाने, ऊँचा ओहदा पाने की चाह कभी मुझ पर हावी नहीं हो सकी। मैं अपने काम के प्रति ईमानदार रहा, निजी जीवन में मस्त रहा, सिर उठाकर चला, अपनी मर्जी से मैंने जीवन को जीया...
       मेरा एक सहपाठी- जिसकी गिनती तेज विद्यार्थी के रुप में होती थी- रेलवे में क्लर्क बना। उसकी पोस्टिंग मालदा में हुई, जो हमारे बरहरवा से ज्यादा दूर नहीं है। फिर वह देश के फ्लैगशिप बैंक में पी.ओ. बना।
       पिताजी के एक पत्र से मुझे यह खुशखबरी मिली। उन्होंने यह भी लिखा कि मुझे भी कुछ इसी तरह कोशिश करनी चाहिए, जीवन में ऊँचा मुकाम हासिल करने के लिए। मैं उस वक्त आवडी में था। साथियों से पूछा कि यह पी.ओ. क्या बला है, जो मेरे पिताजी भी मुझे इसकी सलाह दे रहे हैं?
       साथियों ने बताया- ज्यादा दिमाग लगाने की जरुरत नहीं है, संक्षेप में यही समझो कि बैंकों में पी.ओ. वह होता है, जो सुबह आठ बजे बैंक में घुसता है और रात आठ बजे दरवाजे-खिड़कियाँ बन्द करके ताला लगाकर घर लौटता है।
       उन दिनों सेना में हमारा वर्किंग आवर सुबह साढ़े सात बजे से दोपहर डेढ़ बजे तक का हुआ करता था। डेढ़ बजे दफ्तर से आकर हमलोग मेस में खाना खाते थे और खिड़कियों पर पर्दे तान कर सो जाया करते थे। शाम हम स्वतंत्र होते थे- खेलने, फिल्म देखने, बाजार घूमने या किसी भी अन्यान्य गतिविधि के लिए। हफ्ते में दो दिन शाम को पी.टी. होती थी।
        मैंने पिताजी को पत्रोत्तर देते समय यही लिखा कि सबको उसकी ऊँची सैलरी दिखायी देगी, मगर किसी को भी उसका सुबह आठ से रात आठ बजे तक का काम नहीं दिखायी देगा। ...मैं ऐसा जीवन नहीं जी सकता।
       ***
       समय गुजरता रहा। सेना में बीस साल बिताकर मैं घर लौट आया। दो-तीन साल कम्प्यूटर वगैरह लेकर डी.टी.पी. का काम किया। 2008 में उसी बड़े बैंक में बड़ी बहाली हुई और मैं उस संस्था में शामिल हो गया- बतौर मामूली क्लर्क।
(प्रसंगवश, दो बातों का जिक्र कर दूँ- एक, उस संस्था की कमान उस वक्त एक ऐसे नायक के हाथों में थी, जिनके प्रति मेरे मन में गहरा सम्मान है, उन्होंने लड़खड़ाती हुई उस संस्था को फिर से मजबूत बनाया; दो, मैं आभारी हूँ उस सशस्त्र सेना का, जो 20 वर्षों की सैन्य सेवा के बाद अवकाश लेने वाले सैनिकों को "स्नातक" की डिग्री प्रदान करती है, इसी डिग्री की बदौलत मैं नयी नौकरी में शामिल हो सका। (इग्नू से मैंने ग्रेजुएशन किया जरुर, मगर एक तो "जयदीप शेखर" के नाम से, जो मेरा "कलमी" नाम है, और दूसरे वहाँ से मुझे सर्टीफिकेट नहीं मिल पाया- ऐन मौके पर पता बदलने के कारण।)
       ***
       खैर, तब तक मेरा वह पी.ओ. मित्र ऊँचे ओहदे पर पहुँच चुका था। वह काफी मेहनती था, मगर उसे और किसी चीज का कोई खास शौक नहीं था। कभी-कभी वह बरहरवा आता था, उससे बातचीत भी होती थी।
       फिर पता चला कि काम के दवाब के चलते उसका "शुगर लेवल" खरतनाक स्तर तक पहुँच गया है!
       मैं फोन से उससे सम्पर्क नहीं कर पाया- नम्बर बदल गया था, नया नम्बर उसने दिया नहीं। उनके भाई साहब से दो बार उसका हाल-चाल लिया- पता चला, कुछ दिनों तक ठीक रहता है, फिर तबियत बिगड़ जाती है।
       बेशक, काम के दवाब के कारण ही उसकी यह हालत हुई होगी। लगता तो नहीं है कि ज्यादा पैसे कमाने और ज्यादा ऊँचा ओहदा पाने का उसे कोई शौक था। बस वह बगावत करना नहीं जानता था- नाक तक पानी आ जाने पर भी...
       ...पानी वाकई नाक तक पहुँचा और आज यह मनहूस खबर मिली कि वह नहीं रहा... बीती रात वह चल बसा है...
       ***
       किसको जिम्मेदार ठहराऊँ मैं? खुद उसे ही, जो परिवार-समाज से कटकर, स्वास्थ्य-शौक को त्यागकर सिर्फ काम करता था? या उस संस्था को, जो "per employee" ज्यादा-से-ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए अपने कर्मियों की जान तक की परवाह नहीं करती?
       किसने छीना मेरे एक दोस्त को? आज की जीवन-शैली ने, जिसमें आदमी कुत्ते की तरह जीभ निकाले बस दौड़ता रहता है? आज के संस्कारों को, जिसमें आदमी वक्त और जरुरत पड़ने पर भी बगावत नहीं करता?
       कहाँ हैं वे युनियन वाले, जो पहली मई को सन्देश भेजते हैं: On the May day, let us all pledge to fight against exploitation of intellectual and physical labour!, मगर इस दिशा में करते कुछ नहीं
       ***
       मैं तो मामूली क्लर्क हूँ, मगर मुझसे भी एकबार उम्मीद की गयी थी कि मैं देर रात तक काम करूँ। मैंने मना करके इस्तीफा सौंप दिया। कहा गया, इस्तीफा मंजूर होने में दो-तीन महीने लगते हैं। मैं तीन महीने दफ्तर गया ही नहीं था! यह और बात है कि इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ और इसके बदले मेरा स्थानान्तरण ही मेरे गृहनगर में कर दिया गया।
       यहाँ भी मुझसे उम्मीद की गयी कि मैं देर शाम तक दफ्तर में काम करूँ। मेरा जवाब था- मैं काम के प्रति ईमानदार हूँ, काम के बाद मैं परिवार, समाज, स्वास्थ्य, शौक के लिए समय बिताना पसन्द करता हूँ। काम और परिस्थिति को देखते हुए मैं अपनी मर्जी से भले कुछ ज्यादा समय तक रुक जाऊँ, मगर नियमित रुप से देर शाम/रात तक दफ्तर में बैठना मुझसे नहीं हो पायेगा! मैंने अपनी बात लिखकर भी दे दी है...
       एक और बात मौखिक रुप से मैंने बतायी- इस संस्था ने मेरे "पुनर्वास" के लिए मुझे नौकरी पर रखा है- क्योंकि मैंने अपनी युवावस्था के बेशकीमती बीस साल देश की सेना को दिये हैं... जिस दिन संस्था को लगे कि मैं अपने हिस्से का काम नहीं कर रहा हूँ, या जिस दिन इस संस्था को यह पुनर्वास बोझ लगने लगे, उस दिन वह बेशक मुझे निकाल बाहर कर सकती है!
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       जिन्दगी को जीने के मेरे अपने कुछ उसूल हैं... किसी को पसन्द आये, तो ठीक, न आये तो ठीक... मगर मैं जीभ निकाल कर हाँफते हुए जिन्दगी बिताने के लिए तैयार नहीं हूँ... न ही मधुमेह, रक्तचाप, तनाव का मरीज बनकर दवाईयों पर जीने के लिए!
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