रविवार, 28 जनवरी 2018

१९५. "हाब-गुबा-गुब"


       बंगाल- बेशक, बाँग्लादेश सहित- की एक गायन शैली है- "बाउल"। यह लोकगीत की एक शैली है। इसे गाने वाले आम तौर पर यायावर सन्यासी होते हैं, जो विचारधारा से वैष्णव होते हैं। जानकारी मिलती है कि सूफी फकीर भी इसे गाते हैं- हो सकता है, बाँग्लादेश में ये पाये जाते हों। अपने बँगाल में गेरूआ चोगा पहने, गले में तुलसी माला लटकाये और सिर पर गेरूआ पगड़ी बाँधे ये लोकगायक अक्सर कहीं-न-कहीं मिल जाते हैं। बेशक, महिला सन्यासिनी भी होती हैं बाउल गाने वालीं। जीवन की आपाधापी में फँसे लोगों को ये लोग अपने अद्भुत गायन से संसार की नश्वरता का सन्देश देते हैं।
इस कलाकृति में एक वैष्णव सन्यासी बाउल गा रहा है...

...तो इस कलाकृति में एक सूफी फकीर को बाउल गाते हुए दिखाया गया है. 
       इनके हाथ में इकतारा किस्म का एक वाद्ययंत्र होता है, जिसकी ध्वनि इनके गायन के साथ ऐसे घुल-मिल जाती है कि बिना इस वाद्ययंत्र के संगीत के बाउल गान की कल्पना ही नहीं की जा सकती! यह वाद्ययंत्र कद्दू के बाहरी आवरण से बना होता है, ऊपर बाँस की दो खपच्चियाँ जुड़ी होती हैं, पेन्दे की तरफ चमड़ा लगा होता है और खपच्चियों के सिरे से लेकर चमड़े तक एक तार लगा होता है। (अब आधुनिक किस्म के वाद्ययंत्र भी बनने लगे हैं, जैसा कि पिछले दिनों मैंने ट्रेन में देखा- युवा बाउल गायक के हाथ में।)

       इस वाद्ययंत्र को हमलोग अपने बचपन में "हाब-गुबा-गुब" कहते थे। अनुमान लगाता हूँ कि गाँव-देहातों में आज भी इसे "हाब-गुबा-गुब" ही कहा जाता होगा। यह नाम इसे इससे निकलने वाली ध्वनि के आधार पर दिया गया है।

       अभी नेट पर जानकारी बढ़ाने के क्रम में पता चला कि एक तार वाले वाद्ययंत्र को वास्तव में 'गुबगुबा' ही कहते हैं। जिस वाद्ययंत्र में दो तार लगे होते हैं, उन्हें 'खोमोक' कहते हैं।
       जानकारी मिल रही है कि इकतारा-दोतारा के अलावे दो से अधिक तारों वाले सारंगी-जैसे वाद्ययंत्र और छोटे तबले-जैसे "डुगी" का भी इस्तेमाल होता है बाउल में। घुँघरू और करताल का इस्तेमाल तो खैर होता ही है।
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       जब हमलोग सवारी रेलगाड़ी में अपने यहाँ से रामपुरहाट या इससे आगे जाना-आना करते हैं, तो अक्सर ट्रेन में बाउल गाने वाले मिल ही जाते हैं। कभी कोई युवा सन्यासी अकेला गाता है और कभी कोई वैष्णव दम्पत्ति साथ में गाते हैं।
       कुछ समय पहले ट्रेन में एक युवा सन्यासी को बाउल गाते देखा, तो मैंने उसका विडियो बना लिया था। उसे यहाँ क्लिक करके देखा जा सकता है।  
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       इस आलेख को लिखने से पहले जब मैंने थोड़ी-सी जानकारी बढ़ानी चाही बाउल के बारे में, तो मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि 'युनेस्को' ने साल २००५ में इस गायन शैली को मानवता के धरोहर ("Masterpieces of the Oral and Intangible Heritage of Humanity") की सूची में शामिल किया है।
       एक और जनकारी मिली कि "लालन फकीर" (१७७४-१८९०) अब तक के सबसे प्रसिद्ध बाउल गायक हुए हैं। बाउल संगीत की उत्पत्ति के बारे में कोई खास जानकारी उपलब्ध नहीं है। सदियों से यह संगीत परम्परा बंगाल की संस्कृति में रच-बस कर बंगाली जन-मानस को प्रभावित करती रही है। कहते हैं कि रवींद्रनाथ ठाकुर भी इस संगीत से प्रभावित थे और रवींद्र संगीत में कुछ हद तक उसकी छाप मिल जाती है। मेरा अनुमान है कि एस.डी. बर्मन साहब ने भी कुछ फिल्मी गीतों में बाउल संगीत वाली शैली का उपयोग किया है।

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गुरुवार, 18 जनवरी 2018

१९४. स्टीमर यात्रा का एक अनुभव

      साहेबगंज और मनिहारी के बीच जो स्टीमर सेवा (इसे एल.सी.टी., लाँच, या जहाज कहते हैं) चलती है, उससे हमने कई बार यात्रायें की हैं। कई अनुभवों का जिक्र इस ब्लॉग पर है। आज एक और अनुभव का जिक्र कर रहे हैं- आज के अखबार में प्रकाशित एक खबर को पढ़कर उस अनुभव की याद आ गयी है।
वाकया ऐसा है कि बीच गंगा में चलते-चलते स्टीमर अचानक एक छोटे-से दियारा की ओर मुड़ने लगा। हम सभी यात्री चकित रह गये कि स्टीमर अचानक इस निर्जन टापू की ओर क्यों मुड़ रहा है!
       खैर, स्टीमर ने उस निर्जन टापू के किनारे लंगर डाला और इसके बाद जहाज के स्टाफ लोगों की बातचीत से पता चला कि इंजन का डीजल खत्म हो गया है! दरअसल, हुआ यूँ था कि सुबह स्टीमर पर चढ़ाने के लिए डीजल के कुछ ड्रम घाट पर रखे हुए थे, जिन्हें स्टाफ लोग चढ़ाना भूल गये थे। डीजल के ड्रम घाट पर ही रखे रह गये थे।
       खैर, यह मोबाइल का जमाना है, तुरत-फुरत में फोन किया गया और फिर एक छोटे स्टीमर पर डीजल के उन ड्रमों को चढ़ाकर लाया गया। पूरा वाकया घण्टे-दो घण्टे से ज्यादा का नहीं था। दिन का समय था, यात्रियों को कोई खास परेशानी भी नहीं हुई।

       ...मगर आज अखबार में हमने पढ़ा कि साहेबगंज से शाम को जो स्टीमर खुला, वह कोहरे में रास्ता भटक गया और फिर रात भर के लिए वह एक ही स्थान पर लंगर डाले खड़ा रहा! एक तो कोहरे में लिपटी सर्द रात और ऊपर से गंगा की सांय-सांय चलती ठण्डी हवायें। सोचकर भी सिहरन होती है कि करीब डेढ़ सौ लोगों ने रात कैसे काटी होगी- बेशक, यात्रियों में बच्चे भी थे।  
       मनिहारी से नावों को रवाना किया गया, जो किसी तरह जहाज तक पहुँचे। फिर सुबह उन नावों से ही यात्रियों को सकुशल मनिहारी पहुँचाया गया।

       गंगा में शाम से ही कोहरा छाने लगता है- ऐसा बीते दो हफ्ते से हो रहा है, ऐसे में साहेबगंज से शाम साढ़े चार बजे स्टीमर को रवाना करने के फैसले को किसी भी लिहाज से सही नहीं ठहराया जा सकता। खैर, उम्मीद है कि यात्रियों को और स्टीमर के परिचालकों को- दोनों को सबक मिल गया होगा।   

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

१९३. “सोंस”


        कल के अखबार में एक दुःखद समाचार प्रकाशित हुआ था- हमारे इलाके में कुछ ग्रामीण एक “सोंस” को मारकर खा गये
       “सोंस” एक मछली का नाम है, जो गंगा में पायी जाती है। जब नदियाँ मुक्त होकर बहती थीं, यानि जब बाँध आदि नहीं बने थे और जब नदियाँ प्रदूषित नहीं हुआ करती थीं, तब इनकी संख्या बहुत रही होंगी, मगर अब इनकी संख्या दो हजार से कम है। २००९ से इसके शिकार पर प्रतिबंध है। गंगा के एक हिस्से को (सुल्तांगंज से कहलगाँव तक का क्षेत्र) इनके लिए आश्रयस्थली भी घोषित कर दिया गया है।
       “सोंस” एक प्रकार की डॉल्फिन है। विकिपीडिया में इसपर जो जानकारी दी गयी है, उसे मैं यहाँ साभार उद्धृत कर रहा हूँ, ताकि इसके बारे में जानकारी और भी लोगों तक पहुँचे:
       गंगा नदी डॉल्फिन (Platanista gangetica gangetica) and सिंधु नदी डॉल्फिन (Platanista gangetica minor) मीठे पानी की डॉल्फिन की दो प्रजातियां हैं। ये भारतबांग्लादेशनेपाल तथा पाकिस्तान में पाई जाती हैं। गंगा नदी डॉल्फिन सभी देशों के नदियों के जल, मुख्यतः गंगा नदी में तथा सिंधु नदी डॉल्फिन, पाकिस्तान के सिंधु नदी के जल में पाई जाती है। केंद्र सरकार ने ०५ अक्टूबर २००९ को गंगा डोल्फिन को भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया है। गंगा नदी में पाई जाने वाली गंगा डोल्फिन एक नेत्रहीन जलीय जीव है जिसकी घ्राण शक्ति अत्यंत तीव्र होती है। विलुप्त प्राय इस जीव की वर्तमान में भारत में २००० से भी कम संख्या रह गयी है जिसका मुख्य कारण गंगा का बढता प्रदूषण, बांधों का निर्माण एवं शिकार है। इनका शिकार मुख्यतः तेल के लिए किया जाता है जिसे अन्य मछलियों को पकडनें के लिए चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है। एस समय उत्तर प्रदेश के नरोरा और बिहार के पटना साहिब के बहुत थोड़े से क्षेत्र में गंगा डोल्फिन बचीं हैं। बिहार व उत्तर प्रदेश में इसे 'सोंस' जबकि आसामी भाषा में 'शिहू' के नाम से जाना जाता है। यह इकोलोकेशन (प्रतिध्वनि निर्धारण) और सूंघने की अपार क्षमताओं से अपना शिकार और भोजन तलाशती है। यह मांसाहारी जलीय जीव है। यह प्राचीन जीव करीब १० करोड़ साल से भारत में मौजूद है। यह मछली नहीं दरअसल एक स्तनधारी जीव है। मादा के औसत लम्बाई नर डोल्फिन से अधिक होती है। इसकी औसत आयु २८ वर्ष रिकार्ड की गयी है। 'सन ऑफ़ रिवर' कहने वाले डोल्फिन के संरक्षण के लिए सम्राट अशोक ने कई सदी पूर्व कदम उठाये थे। केंद्र सरकार ने १९७२ के भारतीय वन्य जीव संरक्षण कानून के दायरे में भी गंगा डोल्फिन को शामिल लौया था, लेकिन अंततः राष्ट्रीय जलीव जीव घोषित करने से वन्य जी संरक्षण कानून के दायरे में स्वतः आ गया। १९९६ में ही इंटर्नेशनल यूनियन ऑफ़ कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर भी इन डॉल्फिनों को तो विलुप्त प्राय जीव घोषित कर चुका था। गंगा में डॉल्फिनों की संख्या में वृद्धि 'मिशन क्लीन गंगा' के प्रमुख आधार स्तम्भ होगा, क्योंकि केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश के अनुसार जिस तरह बाघ जंगल की सेहत का प्रतीक है उसी प्रकार डॉल्फिन गंगा नदी के स्वास्थ्य की निशानी है।
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मछुआरों को चाहिए कि जब भी कोई “सोंस” उनके जाल में फँसे, तो वे उसे वापस पानी में छोड़ दें। यह एक “विलुप्तप्राय” जलीय जीव है, यह हमारे देश का “राष्ट्रीय” जलीय जीव है। इसे न मारा जाय। नहीं तो यह प्राणी विलुप्त हो जायेगा।
       मॉरिशस में एक पक्षी पाया जाता था, जिसे “डोडो” कहा जाता था- उसके सरल स्वभाव के कारण। उसके खात्मे का दाग “डच” लोगों पर लगा हुआ है। डच लोगों ने इतना मारकर खाया उसे कि वह पक्षी धरती से विलुप्त ही हो गया।
       ऐसा कोई दाग हम गंगा किनारे रहने वालों पर- खासकर भागलपुर से साहेबगंज के बीच के इलाकों के- न लगे। 
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नीचे की तस्वीर बाँग्लादेश की है- 


...और यह दर्दनाक तस्वीर आसाम से है- 

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

१९२. टॉमी



       आज टॉमी गुजर गया
       बहुत अफसोस हो रहा है। नन्हा-सा पिल्ला था वह। कुछ ही रोज पहले हमारे परिवार का सदस्य बना था। छोटा भाई लेकर आया था उसे। बता रहा था, अच्छी नस्ल का था। उसका स्वभाव था भी बहुत अच्छा। हर वक्त खेलने के मूड में रहता था। सबके साथ खेलता था, सबके पैरों से लिपटता फिरता था। आस-पास के दर्जन भर बच्चों का तो वह दोस्त बन गया था! कुल-मिलाकर, बहुत ही प्यारा था।
       कल थोड़ी-सी गलती हो गयी, वह शाम के धुंधलके में बाहर निकल गया। लौटा, तो सिर से खून बह रहा था। अब दुर्घटना हुई, या किसी ने पत्थर से मार दिया, पता नहीं। सेवा की गयी, दवा लगाई गयी, मगर आज वह चल बसा। कुछ ही दिनों में सबका मन बहलाकर, सबका दिल जीतकर वह चला गया।

       संयोगवश, परसों रात ही वह खेलते हुए मेरे पास आ गया था। हम अलाव जलाकर हाथ सेंक रहे थे। मैंने उसे गोद में बिठाकर उसका गला सहलाया, वह प्यार से लेट गया मेरी गोद में। कुछ देर में जब वह उतरा, तो पास ही में अलाव की गर्मी सेंक रहे बिल्ली के दोनों बच्चों को खेलने के लिए बुलाने लगा; मगर बिल्ली के बच्चे- चिंटू-पिंटू- उसके साथ खेलने के लिए राजी नहीं हुए। (विडियो)


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       लगता है, एक दूसरा पिल्ला जल्दी ही घर लेकर आना होगा- तभी सबका मन ठीक होगा। इसके पहले जब हमारा रोमियो (बिल्ली का बच्चा) चल बसा था, तब भी हमलोग उदास हुए थे। बाद में जब रोमियो-जूलियट के रुप में दो बच्चों को फिर लेकर आये, तब सबका मन बहला। (पहला रोमियो खुद ही घर में आ गया था।) बड़े होने पर दूसरा रोमियो घर छोड़ गया- यह बीते मार्च की बात है- तब हमलोग दस दिनों के लिए बाहर गये हुए थे। आठवें दिन वह घर छोड़ गया था। बाद में, बीते अक्तूबर में जूलियट ने दो बच्चों को जन्म दिया- ऊपर चिंटू-पिंटू के रुप में उन्हीं का जिक्र हुआ है।
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       टॉमी का रंग हल्का भूरा था। इसके पहले हमारे घर में जितने भी कुत्ते रहे हैं- सब काले रंग के रहे हैं और सबका नाम भी एक ही रहा है- “झिमी”। यह टॉमी अपवाद था- रंग अलग था और कोई इसे “झिमी” पुकारने के लिए तैयार नहीं था। सोच रहा हूँ, इस बार काले रंग का ही पिल्ला फिर लाया जाय और उसे “झिमी” ही पुकारा जाय।
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       पहला “झिमी” एक सन्थाली कुत्ता था। पिताजी एक मॉर्निंग वाक से उसे घर लाये थे। माँ बहुत बिगड़ी थी कुत्ते को देखकर, पर खाना भी वही खिलाती थी। इधर रोमियो को घर में देखकर श्रीमतीजी भी बिगड़ी थी, मगर बेटे अभि के कारण उसे घर में रखना पड़ा, अब ऐसा है कि श्रीमतीजी इन बच्चों से बातचीत भी करती है! वे भी म्याऊँ ऐसे बोलते हैं, मानो माँ बोल रहे हों!
       दूसरे-तीसरे “झिमी” की कोई खास बात नहीं थी, मगर अन्तिम “झिमी” अपनी उम्र पूरा नहीं कर पाया था। इस पिल्ले को उत्तम हमारे घर में छोड़ गया था- उसके घर में कुछ दिक्कत हुई थी। साल भर में ही यह शानदारा गबरू कुत्ता बन गया था। एक रात वह कहीं से अपना एक पैर कटवा आया। सेवा की गयी- याद है कि सबसे ज्यादा सेवा बड़े भाई ने की थी। ठीक होने के बाद भले वह तीन पैरों पर चलता था, मगर उसका गबरूपन बरकरार था। इसी दौरान मुझे नौकरी के सिलसिले में बाहर जाना पड़ा (२००८ में अररिया जाना पड़ा था), और हमें न देखकर “झिमी” परेशान हो गया था। उसने किसी पलतू बकरे का कान काट लिया था और बदले में कुछ लोगों ने उसे मौत के घाट उतार दिया। तब से, यानि २००९-१० से कोई कुत्ता हमारे घर नहीं लाया गया था।
       कुछ दिनों पहले यह टॉमी ही आया था, जो सबका दुलारा बन गया था।
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       अगर कोई कुत्ता अब घर आया, तो यहाँ पुनश्च के रुप में उसकी जानकारी दे दूँगा।

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सोमवार, 13 नवंबर 2017

190. 'भुवन सोम' के अनुवाद की भूमिका





एक जमाने में सकरीगलीएक प्रसिद्ध जहाज घाटहुआ करता था। यहाँ जहाजकहा जा रहा है स्टीमर को। दूर-दराज से यात्रीगण रेल द्वारा सकरीगली स्टेशन तक आते थे, ‘घाट गाड़ी’ (स्टेशन और गंगाघाट के बीच चलने वाली ट्रेन) से घाट तक जाते थे और फिर यहाँ से स्टीमर में बैठकर या तो बहाव के साथ चलते हुए कोलकाता की ओर; या फिर, धारा के विरुद्ध चलते हुए मनिहारी घाट की की ओर यात्रा किया करते थे- मनिहारी से पूर्णिया-कटिहार की ओर जाया जाता था। तब रेलवे ईस्ट इण्डिया कम्पनीकी हुआ करती थी और स्टीमर भी रेलवे के ही चलते थे।
       प्रस्तुत कहानी 1950 के दशक की है, तो जाहिर है कि उस समय तक सकरीगली और कोलकाता के बीच स्टीमरों का परिचालन जारी था और सकरीगली का जलवा बरकरार था।
       (हालाँकि कहानी में स्पष्ट तौर पर सकरीगलीका जिक्र नहीं है और सखीचाँद के सवाल के उत्तर में  अनिल बता रहे हैं कि भुवन सोम साहेबगंजसे आ रहे हैं; मगर मुझे लगता है कि कहीं कुछ गलती हो गयी है। मेरे अनुसार, कहानी सकरीगली घाट से ही शुरु हो रही है और भुवन सोम कोलकाता से आ रहे हैं- तभी तो अनिल स्टीमर का संकेत देखने के लिए पूरब की ओर देखते हैं।)
बाद के दिनों में रेलवे के स्थान पर बच्चा बाबूके स्टीमर चलने लगे और सकरीगली के स्थान पर साहेबगंज से स्टीमरों का परिचालन होने लगा। आज सकरीगली एक छोटा-सा स्टेशन है- वीरान-सा। अब शायद ही कोई यकीन करे कि इस स्टेशन पर कभी काफी चहल-पहल रहा करती थी!
साहेबगंज और मनिहारी के बीच स्टीमरों का परिचालन आज भी जारी है। स्थानीय बोल-चाल में इन स्टीमरों को लॉन्चभी कहते हैं। मनिहारी घाट पर उतरकर यात्रीगण कटिहार, पूर्णिया, अररिया, फारबिसगंज इत्यादि शहरों की ओर चल पड़ते हैं। प्रसंगवश, बता दूँ कि फारबिसगंज ही रेणुकी भूमि है, यानि कि मैला आँचल’!  
दोनों घाटों के बीच गंगा में छोटे-बड़े बहुत-से रेतीले टीले हैं, जिन्हें स्थानीय बोलचाल में दियाराकहा जाता है- बँगला में चर। इन रेतीले टीलों का भौगालिक आकार-प्रकार बदलते रहता है, मगर इनका उपजाऊपन बना रहता है और इसी कारण बहुत सारी मुश्किलों के बावजूद इनपर बस्तियाँ बसते रहती हैं। कुछ दियारा तो बहुत ही विशाल हैं।
       बनफूलका जन्मस्थान एवं पैतृक आवास मनिहारी में था और वे स्वयं भागलपुर में बस गये थे। जाहिर है कि वे भागलपुर से ट्रेन से सकरीगली आते थे और सकरीगली से स्टीमर में बैठकर मनिहारी तक जाना-आना करते थे।
दूसरी बात, ‘डाना’ (‘डानायानि डैनायानि पंख- यह वृहत् रचना तीन खण्डों में है, जिन्हें उन्होंने 1948, 1950 तथा 1955 में पूरा किया था।) उपन्यास की रचना के समय उन्होंने बाकायदे दूरबीन लेकर पक्षियों का अध्ययन किया था, तो जाहिर है कि इसके लिए इन दियारों का भी उन्होंने काफी भ्रमण किया होगा। ऐसे में, दियारा की पृष्ठभूमि पर उनके द्वारा एक लघु उपन्यास की रचना करना एक स्वाभाविक बात है। यह भुवन सोमवही उपन्यास है- जिसे उन्होंने 1955-56 में प्रकाशित किया। उपन्यास में साहेबगंज के साथ-साथ पाकुड़, बरहरवा, राजमहल, जमालपुर, कटिहार, रामपुरहाट का भी जिक्र आ गया है। मैं चूँकि स्वयं बरहरवा का वासी हूँ, इसलिए मेरे द्वारा अनुवाद के लिए बनफूलके 60 उपन्यासों में से सबसे पहले इसे चुनना स्वाभाविक बात है।
हालाँकि इस उपन्यास के प्रति मेरे मन में रूचि श्री मानवेन्द्र जी के कारण पैदा हुई। सोशल मीडिया फेसबुकपर उन्होंने मुझे सूचित किया था कि वे हिन्दी समानान्तर सिनेमा तथा साहित्य के बीच सम्बन्धों पर शोध कर रहे हैं और इस क्रम में उन्हें भुवन सोमका भी जिक्र करना है, मगर इसका हिन्दी अनुवाद उन्हें कहीं मिल नहीं रहा है। मैंने भी नेट पर खोजा, पर सफलता नहीं मिली। तो मैंने मूल बँगला पुस्तक मँगवा ली कि (उपन्यासों के) अनुवाद की शुरूआत इसी से सही!
यहाँ यह बताना प्रासंगिक होगा कि मृणाल सेन ने 1969 में इस उपन्यास पर जो हिन्दी फिल्म (भुवन सोमनाम से ही) बनायी थी, उसे समानान्तर सिनेमा की दुनिया में मील का एक पत्थर माना जाता है। फिल्म में मुख्य भूमिका- यानि भुवन सोम का किरदार- उत्पल दत्त ने निभायी थी, स्त्री चरित्र (दियारा की चुलबुली लड़की- गौरी) की भूमिका निभायी थी सुहासिनी मूले ने और सूत्रधार की भूमिका में थे अमिताभ बच्चन। (फिल्म की कहानी की भूमिका बाँधने तथा उपसंहार करने के लिए अमिताभ बच्चन की आवाजका इस्तेमाल हुआ है।) फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक (मृणाल सेन) तथा सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (उत्पल दत्त) के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले थे।
लगे हाथ, इस फिल्म पर भी दो शब्द कह दिया जाय। फिल्म को राजस्थान के रेतीले टीलों की पृष्ठभूमि में तथा राजस्थानी गाँवों की संस्कृति के रंग में फिल्माया गया है। मृणाल सेन साहब ने यह बदलाव क्यों किया, पता नहीं। क्या साहेबगंज की गंगा के रेतीले दियारोंके बीच दियारा-बस्तियों की संस्कृति के रंग में फिल्मांकन करना असम्भव था?
खैर। बनफूलकी दर्जनों कहानियों का मैंने अनुवाद कर रखा है, मगर उपन्यास के अनुवाद का यह मेरा पहला प्रयास है। आशा है, आपको अच्छा लगेगा।
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एक और बात, जिसे बताने से मैं स्वयं को रोक नहीं पा रहा हूँ, वह यह है कि आवरण पर जिस छाायाचित्र का प्रयोग हुआ है, वह वाकई सकरीगली के पास गंगा की धार की है। धार में एक छोटी नाव दिखायी दे रही है, जो कुछ लोगों को उस पार दियारातक ले जा रही है। मैंने यह तस्वीर स्टीमर से ही ली है। मैं मनिहारी से साहेबगंज आ रहा था, गंगा में पानी कम होने के कारण स्टीमर सीधे साहेबगंज न आकर दियारा का चक्कर लगाकर सकरीगली होते हुए साहेबगंज आ रहा था।
तस्वीर में उड़ते पंछियों को भी दिखाया गया है- इसे एक दूसरी तस्वीर से काटकर लिया गया है। उड़ते पंछियों वाली दूसरी तस्वीर मैंने तालझारी स्टेशन के पास खींची थी, ट्रेन से।
-जयदीप शेखर, 10 जुलाई 2017, बरहरवा.
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मेरी वेबसाइट "जगप्रभा" पर इसका लिंक- http://jagprabha.in/product/bhuwan-som/


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