शनिवार, 24 मार्च 2018

200. पहला मोबाइल



       वर्ष 2002 या 03 की बात है। हम 'बिहटा' में थे- पटना और आरा के बीच यह कस्बा है। वहाँ वायु सेना का एक स्टेशन है। बीस वर्षों की सेवा की अन्तिम पोस्टिंग थी हमारी- 2005 में घर लौटना था।
       'सिगनल सेक्शन' से बाकी सभी सेक्शनों को खबर मिलती है- जिन्हें "सिम" चाहिए, उनके नामों की सूची भेज दी जाय। करीब सारे सेक्शन अपने यहाँ कार्यरत कर्मियों के नामों की सूची भेज देते हैं। जो ज्यादा बुद्धीमान होते हैं, वे अपना नाम दर्ज नहीं करवाते- वे हँसते हैं- ऐसे भला "सिम" मिलता है?
       यह वह समय था, जब सिम लम्बे इन्तजार के बाद मिलता था। बाहर "ब्लैक" में शायद एक-डेढ़ हजार रुपयों में सिम बिकते थे!
खैर, सिगनल सेक्शन करीब डेढ़ सौ लोगों की सूची पटना स्थित BSNL मुख्यालय को भेज देता है। सुनने में आ रहा था कि वहाँ अभी जो अधिकारी हैं, वे हमारे सिगनल अधिकारी के मित्र हैं। सच्चाई जो हो, डेढ़ सौ सिम बिलकुल वाजिब कीमत पर वायु सेना स्टेशन, बिहटा को भेज दिये जाते हैं और सिगनल सेक्शन सूची के अनुसार उन सिम को सभी सेक्शनों में भेजवा देता है।
अब सिम तो हमारे हाथ में आ गया, मगर किसी के पास मोबाइल हैण्डसेट ही नहीं है। इक्के-दुक्के के पास होगा भी तो हमें नहीं पता।
ज्यादातर लड़के उसी शाम पटना निकल जाते हैं- हैण्डसेट खरीदने के लिए। हम नहीं गये। हरियाणा के एक मित्र ने याद दिलाया- यार कुछ दिनों पहले CSD कैण्टीन में हमने हैण्डसेट देखे थे। हो सकता है, अभी भी दो-एक पीस हो। पहले वहीं चलते हैं।
हमदोनों शाम कैण्टीन पहुँचे। सही में, सैमसंग R220 के दो सेट शो-केस में पड़े हुए थे। हमने खरीद लिया। बड़े चाव से डिब्बे को खोला, खूबसूरत हैण्डसेट को निकाला। जबर्दस्त पैकिंग थी। साथ में मोटी-से पुस्तिका भी थी- हैण्डबुक। मगर हैण्डबुक कौन पढ़ता है। कैण्टीन के स्टाफ ने सेट निकाल कर उसमें बैटरी जोड़ा। अब वह उलट-पलट कर मोबाइल को "ऑन" करने के लिए स्विच ढूँढ़ने लगा। नहीं मिला। हम दोनों ने भी उलट-पलट कर देखा- यह मोबाइल आखिर ऑन कहाँ से होगा? कहीं ऑन-ऑफ स्विच नहीं था!
हम निराश हो रहे थे। तभी हरियाणा वाले मित्र को कुछ याद आया- अरे यार, जिस बटन से फोन काटते हैं, उसी को दबाने से ऑन होगा शायद। हमने देखा था किसी को ऐसा करते हुए। कितना भी तो हरियाणा दिल्ली के पास है, उसने जरुर देखा होगा। वही किया गया.... और फोन ऑन हो गया!
सिम डाला गया।
क्वार्टर में आकर घर के बेसिक फोन पर फोन लगाया, मगर अपना "मोबाइल नम्बर" नहीं बता पाया। क्योंकि हमें सिम के साथ कागज का एक टुकड़ा भी नहीं मिला था!
अगली सुबह दफ्तर में एक-दूसरे के फोन पर डायल करके सभी अपना-अपना मोबाइल नम्बर जान रहे थे। वैसे, सूची में नाम के क्रम से गणना करके एक तेज-तर्रार साथी ने पहले ही बता दिया था कि आपके नम्बर के आखिरी अंक 111 होंगे। यह सही निकला।   
आज फेसबुक ने याद दिलाया, तो यह वाकया याद आया।
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मंगलवार, 20 मार्च 2018

199. "डाना"



       हमारे इलाके के एक झील का नाम है- पतौड़ा। बरहरवा से सात-आठ किलोमीटर दूर- उधवा कस्बे के पास। इस पर पहले से मेरा एक आलेख है इस ब्लॉग पर।
       अभी खबर है कि इस बार सबसे अधिक प्रजाति के प्रवासी पक्षी इसी पतौड़ा झील में आये थे।
Bird Watching अपने आप में एक शौक है। चिड़ियों की छायाकारी भी एक शौक है। मुझे गर्व है कि फेसबुक पर ऐसे ही एक छायाकार की मित्रता मुझे हासिल है।
मुझे तो बस चिड़ियों का कलरव पसन्द है- इससे ज्यादा कुछ नहीं। अभी जो ऋतु चल रही है, इसमें सुबह-सुबह नहीं भी तो कम-से-कम दो दर्जन तरह की चिड़ियों का कलरव सुनायी पड़ता है, पर मैं अज्ञानी ज्यादा-से-ज्यादा आठ-दस चिड़ियों की आवाजों को पहचानता हूँ।
अब यह संयोग ही है कि जब ऐसी खबर अखबार में छपी है- मैं "बनफूल" का "डाना" उपन्यास पढ़ रहा हूँ। डाना, यानि डैना। पुस्तक चिड़ियों पर ही आधारित है- ऐसा कहा जा सकता है, मगर नायिका का भी नाम इसमें "डाना" है। वह बर्मा की एक शरणार्थी युवती है। उसका नाम एक अँग्रेज नर्स ने "डायना' रखा था, जो बाद में "डाना" बन गया। उपन्यास में तीन और प्रमुख चरित्र हैं- एक पक्षी वैज्ञानिक, जो पक्षियों के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहता है; एक अवकाशप्राप्त सज्जन, जो कवि हैं और किसी भी चिड़िया को देखकर मुग्ध होकर उसपर कवितायें रचने लगते हैं; और एक दुनियादार सज्जन, जो रहते तो इन्हीं दोनों के साथ हैं, मगर पक्षियों में कोई रुचि नहीं रखते- हाँ, उनके स्वाद (पक्षी का मांस) में रुचि जरुर रखते हैं। इस प्रकार, उपन्यास जरा अलग हटकर है।
हालाँकि "डाना" का अनुवाद सम्भव नहीं लगता, फिर भी, अगर कभी अनुवाद किया, तो हम इसके आवरण पर मित्र Sanjay Kumar Singh की किसी तस्वीर का उपयोग करना चाहेंगे....
हमने पढ़ा है कि इस उपन्यास को लिखते समय "बनफूल" ने बाकायदे दूरबीन लेकर पक्षियों का गहन अध्ययन किया था। हमने यह भी पढ़ा है कि बँगला के एक अन्य लेखक परशुराम ने "बनफूल" को सलाह दी थी कि "डाना" उपन्यास का अँग्रेजी में अनुवाद करवा कर इसे "नोबल पुरुस्कार" के लिए भेजा जाना चाहिए। "बनफूल" पुरुस्कारों पर यकीन नहीं करते थे।
वैसे, लगता तो नहीं कि "डाना" का अनुवाद सम्भव है। हर दूसरे-तीसरे पेज पर एक कविता है और पद्य का अनुवाद हमेशा कठिन होता है।
*
"डाना" मँगवाने के साथ ही साथ मैंने डॉ. सलीम अली की प्रसिद्ध पुस्तक "भारत के पक्षी" को भी मँगवा लिया था, क्योंकि मुझे पता था कि "डाना" में बहुत-सी चिड़ियों का नाम बँगला में होगा और मैं शायद उन्हें न पहचान पाऊँ। ऐसे में, डॉ. सलीम अली के पुस्तक काम आती। एक Exotic India नाम की वेबसाइट पर बीते नवम्बर में ऑर्डर दिया। दो महीनों बाद उन्होंने सूचित किया कि पुस्तक आउट ऑव स्टॉक है। आज चार महीने बीत गये, अभी तक पुस्तक नहीं मिली है।
लगता है कहीं और से इसे मँगवाना पड़ेगा।
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यह एक सुखद संयोग ही है कि 20 मार्च को इस आलेख को लिखा और देर रात पता चला कि कि आज "विश्व गौरैया दिवस" है।

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198. "बेला"



       कुछ दिनों पहले अभि ने कोलकाता से फोन पर अपनी माँ से कहा कि वह गिटार सीखना चाहता है। वह अनुमति माँग रहा था। हमदोनों ने तुरन्त सहमति दे दी।
       हमें याद आया कि जब हम अभि की उम्र के थे, तब हम भी गिटार सीखना चाहते थे। तब हम आवडी में थे। 1986-87 की बात है। पता चला कि आवडी में एक संगीत विद्यालय है। हम पहुँच गये। दुमंजिले पर एक बड़े हॉल में संगीत की कक्षा चल रही थी। करीब तीस-चालीस विद्यार्थी हाथों में वायलिन लिए बैठे थे और सफेद दाढ़ी वाले गुरूजी बैठकर शिक्षा दे रहे थे। गुरूजी के सामने पहुँचकर हमने जानना चाहा कि क्या यहाँ गिटार की शिक्षा भी दी जाती है? विनम्र मुस्कुराहट के साथ गुरूजी ने 'ना' में सिर हिलाया। कहा- यहाँ वायलिन की शिक्षा दी जाती है।
       आज तीस वर्षों के बाद जब उस दृश्य की याद आती है, तो चूल्लू भर पानी में डूब जाने को दिल चाहता है। फिर उम्र का अक्खड़पन और अल्हड़पन समझ कर सन्तोष कर लेना पड़ता है। काश, वहाँ वायलिन सीखना हमने शुरु कर दिया होता! खैर, हमें कुछ न कुछ करने से मतलब था और कुछ दिनों बाद हम तैराकी टीम में शामिल हो गये। वैसे भी, गीत-संगीत सीखने का गुण हममें नहीं था।
तैराकी के सिलसिले में ही एकबार कानपुर जाना हुआ। 1988 या 89 की शुरुआत थी। जाड़े में स्वीमिंग पूल की सफाई चल रही थी और हमें समय बिताने के लिए कुछ चाहिए था। एक संगीत विद्यालय में फिर हम जा घुसे। इस बार हम दो थे। उस विद्यालय के गुरूजी 'सूरदास' थे। जैसा कि होता है, व्यक्ति की एक ज्ञानेन्द्री सुप्त होने से दूसरी ज्ञानेन्द्रियाँ ज्यादा ही जाग्रत हो जाती हैं। तो वे गुरूजी सुर में थोड़ी-सी कमी को भी पकड़ लेते थे और खूब रियाज करवाते थे। हमारे बारे में उन्होंने अनुमान तो लगा ही लिया होगा कि हम संगीत नहीं सीख सकते, फिर भी, अपनी ओर से वे पूरी कोशिश करते थे हमें सिखाने की। वहाँ हम सरगम का अभ्यास किया करते थे।
1991 में ग्वालियर जाना हुआ। वहाँ तब स्वीमिंग पूल नहीं था। (बाद में बना।) हाँ, बैडमिण्टन का कोर्ट बहुत बढ़िया था- लकड़ी का फर्श था। थोड़ा हाथ आजमाया वहाँ। पुराना अनुभव था ही। क्योंकि आवडी में भी यदा-कदा खेलना होता था और घर में रहते हुए भी खेला करता था। (पिताजी बैडमिण्टन के अच्छे खिलाड़ी थे।) मुश्किल यह है कि यह सिर्फ जाड़े का खेल है। गर्मियों में क्या किया जाय? फिर संगीत विद्यालय खोजना शुरु किया।
इन पाँच वर्षों में मेरे दिमाग से गिटार का भूत उतर चुका था। हमने जान लिया था कि गीत-संगीत में पहला स्थान "गले" (कण्ठस्वर) का होता है; दूसरा, "बाँसुरी" या शहनाई-जैसे वाद्ययंत्रों का; तीसरा "तार" वाले वाद्ययंत्रों का; और बाकी वाद्ययंत्रों का नम्बर इनके बाद ही आता है। गिटार और वायलिन, दोनों भले तार वाले ही वाद्ययंत्र हैं, मगर गिटार को जहाँ पाश्चात्य संगीत पर (आम तौर पर) बजाया जाता है, वहीं वायलिन को हमारे देश में भारतीय संगीत पर बजाया जाता है। हमने यह भी जान लिया था कि "भारतीय" संगीत जहाँ सिर यानि मस्तिष्क पर असर डालता है, वहीं "पाश्चात्य" संगीत पैरों पर।

(भारतीय संगीत पर एक सुन्दर आलेख परमहँस योगानन्द जी ने अपनी आत्मकथा 'योगी कथामृत' में लिख रखा है। उसे हमने एक ब्लॉग पर साभार उद्धृत भी कर रखा है। उसे पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें।)
पता चला एक संगीत विद्यालय तो है, मगर दूर है। पहुँच गये साइकिल लेकर। इस बार हमने सीधे पूछा कि वायलिन सिखाने की व्यवस्था है क्या? पता चला, सप्ताह में दो-तीन दिन एक रिटायर्ड सज्जन आते हैं, वे वायलिन सिखाते हैं। हमने सीखना शुरु कर दिया।
कुछ भी नया जब हम सीखना शुरु करते हैं, तो एक दौर ऐसा आता है कि लगता है कि कहाँ फँस गये- नहीं होने वाला, मगर उस दौर को पार करते ही फिर आनन्द आने लगता है। हमने भी खूब मन लगाकर सीखा। गुरूजी ने एक टूटा वायलिन भी दिया कि यह मरम्मत हो जायेगा- ठीक करवा लो। पता भी बताया- ठीक करने वाले का। हमने करवा लिया। अब मेरा अपना वायलिन भी हो गया। कुछ समय बाद गुरूजी ने विद्यालय आना छोड़ दिया और हमें अपने घर पर ही आने को कहा। मेरी साइकिलिंग लगभग दोगुनी हो गयी- 7 के स्थान पर करीब 14 किलोमीटर जाना पड़ता था अब। लेकिन मेरे लिए यह कोई समस्या नहीं थी। करीब चार साल हमने वायलिन सीखा- कई राग बजाने लगाने थे हम। इस बीच दो बार स्वीमिंग चैम्पियनशिप में भी भाग लिया। अन्त में, 1995 में ग्वालियर छोड़ने का समय आया।

दोस्तों का कहना था कि तुम दो बार वायलिन का मरम्मत करवा चुके हो और इनमें जितना खर्च आया है कि उतने में तुम नया खरीद सकते थे, तो यह अब तुम्हारा ही है। बात तो सही थी, मगर यही बात हम गुरूजी के मुँह से सुनना चाहते थे। सो, ग्वालियर छोड़ने से पहले हम वायलिन लेकर गुरूजी के पास गये। अफसोस, कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा और वायलिन लेकर रख लिया।
इसके बाद न नया वायलिन लेना हुआ और न अभ्यास हुआ। एक शौक मेरा अधूरा रह गया। अब लगता है कि वायलिन मिल भी जाय, तो शायद हम न बजा पायें... (वैसे, वायलिन पर दो पुस्तकें मेरे पास हैं। एक तो संगीत कार्यालय, हाथरस की है- "बेला विज्ञान", 1980 का संस्करण।)

इस आलेख को इसलिए लिखा कि अभि को पता चल जाय कि गिटार सीखने से बेहतर है वायलिन सीखना। उसे इतना तो पता होगा कि शरलॉक होम्स भी कभी-कभी वायलिन बजाते थे- यानि यह मस्तिष्क को आराम पहुँचाने तथा उसमें नयी ऊर्जा भरने में सहायक होता है।

अब रही बात कि इस आलेख का नाम "बेला" क्यों है? दरअसल, हमने पढ़ा कि "बेला" एक पुराना भारतीय वाद्ययंत्र था, जो पश्चिम में जाकर "Voila" बन गया। "वॉयला" का ही परिष्कृत रुप "वायलिन" है। यानि हमारी "बेला" ही यूरोप जाकर "वायलिन" के रुप में परिष्कृत होकर वापस भारत आ गयी है... 
 ***

197. पुरी यात्रा (संस्मरण)


जगन्नाथ मंदिर
           पुरी गये हुए तीन महीने से ज्यादा हो गये,पर अब तक इस यात्रा पर लिखना नहीं हो पाया था
       *  
       हुआ यूँ कि कई साल पहले जब हम पुरी गये थे (शायद 2007 में), तब हमने पड़ोस के रेलवे स्टेशन पाकुड़ से गौहटी-पुरी एक्सप्रेस ट्रेन पकड़ी थी। यह एक साप्ताहिक ट्रेन है। करीब 18 घण्टों का सफर है।
       बीते साल के अन्त में जब हमारी साली साहिबा (मुरादाबाद वाली) का कार्यक्रम बन रहा था हमारे यहाँ आने का, तब श्रीमतीजी ने उसे कह दिया कि यहाँ से पुरी नजदीक है- पाकुड़ से ट्रेन चलती है। दोनों ने कार्यक्रम बना लिया- पुरी भ्रमण का और बाद में हमें बताया। हमने समझाने की कोशिश की कि पुरी नजदीक-वजदीक नहीं है, इतना है कि गौहाटी से पुरी जाने वाली साप्ताहिक ट्रेन यहाँ पाकुड़ से मिल जाती है। मगर अब कोई सुनने को तैयार नहीं था- कार्यक्रम बन गया है, तो जाना ही है।
       अब हम IRCTC की शरण में गये। वापसी यात्रा के लिए पुरी-गौहाटी एक्सप्रेस को ही चुना, ताकि पाकुड़ स्टेशन पर उतरकर आराम से घर (बरहरवा) आ सकें। जाने के लिए हावड़ा से कोई ट्रेन पकड़ना चाहते थे हम कि मेहमानों को कोलकाता भी घुमा दिया जाय और कोलकाता में (बेटे) अभिमन्यु से भेंट भी हो जाय। हावड़ा से पुरी के लिए खुलने वाली सारी ट्रेनें भरी हुई थीं। 'साँतरागाछी' (कोलकाता का एक उपनगरीय इलाका) से एक साप्ताहिक ट्रेन में जगह मिली।
       *
कालीघाट
पहली दिसम्बर की रात हम रवाना हुए और अगले दिन सुबह-सुबह हावड़ा पहुँचे। एक शानदार बस में बैठकर टॉलीगंज पहुँचे। वहाँ से अभिमन्यु के फ्लैट पर गये। कायदे से, कोलकाता में जब समय कम हो, तो विक्टोरिया मेमोरियल ही घूमने जाना चाहिए। मगर महिलाओं को कुछ बातें नहीं समझायी जा सकतीं। दोनों बहनें कालीघाट ही जाने की जिद पर अड़ी रहीं। मन मारकार हम कालीघाट के लिए ही रवाना हुए। इसबार टॉलीगंज (यह स्टेशन महानायक उत्तम कुमार को समर्पित है) से हमने मेट्रो पकड़ी, ताकि मेहमानों को मेट्रो में सफर का अनुभव करवाया जा सके- यही सुविधाजनक भी था।
कालीघाट का अनुभव इतना बुरा रहा कि क्या बताया जाय! खुली लूट-खसोट और अव्यवस्था का आलम था वहाँ। उस दिन शनिवार होने के चलते भीड़ ज्यादा थी शायद। हम खुद और मुकेश भाई साहब शॉर्टकट में दर्शन करने के बाद बाहर इन्तजार करते रहें और दोनों बहनें बढ़िया से काली माता के दर्शन के लिए घण्टों कतार में खड़ी रहीं। घूँस-घास देकर ही दोनों ने अच्छे-से दर्शन किया। अन्त में बाहर प्रसाद वाली दूकान के दूकानदार और पण्डे- दोनों से बहसबाजी भी करनी पड़ी। बहुत खरी-खोटी सुनायी हमने उन्हें कि बाहर से आने वालों को ऐसा ही घटिया अनुभव करवाना चाहते हैं आपलोग कोलकाता के बारे में! मुझे याद आया कि बचपन में जब कभी यहाँ आया था, तब भी यही आलम था- 1975-76 की बात होगी।
*
अभि ने एक 'ओला' कैब बुक कर दिया था हावड़ा स्टेशन के लिए। तय हुआ था कि हावड़ा से कोई एक लोकल ट्रेन पकड़कर साँतरागाछी चला जायेगा- वहीं से रात में हमारी पुरी वाली ट्रेन खुलने वाली थी। अभि ने बताया कि साँतरागाछी तक जाने का ओला कैब ज्यादा किराया ले लेगी, क्योंकि वह महानगर क्षेत्र से बाहर है। हावड़ा से जब हमने लोकल ट्रेन पकड़ी, तब समझ में आया कि कैब वाले को ज्यादा किराया देकर सीधे साँतरागाछी पहुँचना उचित था। भयंकर भीड़ हो गयी थी ट्रेन में। रास्ता भले बीस-पच्चीस मिनट का रहा होगा, मगर भीड़ के कारण किसी स्टेशन पर उतर पाना तक मुश्किल था। जैसे-तैसे हम उतरे।
स्टेशन पर कुछ समय बिताया हमने, खाना पैक करवाया, ट्रेन आयी और अब हम पुरी की ओर रवाना हो गये।
*
रात भर की यात्रा के बाद मुँह-अन्धेरे हम पुरी स्टेशन पर थे। जिस अर्द्धसरकारी संस्थान में मैं काम करता हूँ, ऑटो लेकर हम पहले उसके हॉलीडे होम गये- टिकट बनवाते ही हमने यहाँ के दो कमरों के लिए आवेदन दे दिया था। युनियन के पदाधिकारी से भी अनुरोध किया था। मगर पता चला- मेरा आवेदन वहाँ पहुँचा ही नहीं था। मुझे पता था- ऐसा ही होगा- यहाँ सिर्फ बड़े 'एप्रोच' वालों का ही कमरा बुक होता होगा। सरकारी-अर्द्धसरकारी विभागों में ऐसा होना ही स्वाभाविक है।
पुरी समुद्रतट पर सूर्योदय 
ऑटो वाला हमें एक होटल में लाया। नाम अभी याद नहीं आ रहा, पर नाम में 'Love' शब्द जुड़ा हुआ था। चूँकि सैलानियों की संख्या अभी ज्यादा नहीं थी, इसलिए सस्ते में ही एक कॉटेज मिला- दो कमरों का। अभी तक पौ नहीं फटा था। मैनेजर ने कहा- बीच पर जाकर सनराईज देख आईयेगा। हम तो पहले से ही तैयार थे इसके लिए, सो कुछ मिनटों में ही हम समुद्रतट की ओर निकल गये। बाकी तीनों तैयार-वैयार होकर जब तक तट पर पहुँचे, तब तक सूर्योदय हो चुका था।
*
पिछली बार (2007 में) जब हमारा पुरी आना हुआ था, तब रिक्शेवाला हमें 'माँ तारिणी' नाम के एक छोटे-से लॉज में ले गया था। वहाँ जिस पण्डेजी ने हमसे सम्पर्क किया था, उन्होंने बहुत अच्छे तरीके से हमें जगन्नाथ जी के दर्शन करवाये थे। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी से जुड़ी कहानियों को उन्होंने इतने अच्छे से हमें सुनाया था कि हम भाव-विभोर हो गये थे। मन्दिर का चप्पा-चप्पा उन्होंने घुमाया था और अन्त में सड़क के दूसरी तरफ स्थित लाइब्रेरी की छत पर भी हमें वे ले गये थे, ताकि हम वहाँ से भी तस्वीरें खींच सकें।
लेकिन इस बार का अनुभव उल्टा हो गया। होटल में जिस पण्डेजी ने हमसे सम्पर्क किया, वे हमें अच्छे-से दर्शन नहीं करवा सके। पहले इधर-उधर घुमाकर बाद में मन्दिर के अन्दर ले गये, जब पट बन्द हुआ ही था। घण्टा-डेढ़ घण्टा हमें वहाँ बैठना पड़ गया। इस बार दर्शन भी दूर से हो रहा था। एक बूढ़े पण्डेजी से हमने इसका कारण पूछा, तो उन्होंने बताया कि गर्भगृह के पास मरम्मत का काम चल रहा है। पिछली बार तो हमने बाकायदे वेदी की परिक्रमा की थी और विग्रहों को बिलकुल नजदीक से देखा था।



इसबार ऑटो वाला भी बेवकूफ निकला, सो और बिना कहीं घूमे हम होटल लौट आये। समुद्रतट पर गये। खूब नहाये। मेरे अलावे, बाकी तीनों के लिए यह पहला अनुभव था समुद्र की लहरों से खेलते हुए नहाने का।
दोपहर बगल के मारवाड़ी बासा से खाना लाकर हमने खाया, थोड़ा आराम किया और दोपहर बाद 'स्वर्गद्वार' घूमने निकल गये। वहाँ के समुद्रतट को देखकर मेरिना बीच की याद आ गयी। खाने-पीने और खरीदारी करने के लिए ढेरों दूकानें थीं वहाँ। घूम-फिर कर रात हम लौट आये।




आने के बाद अकेला बाजार निकला- तीन-चार 'क्युरियो शॉप' का चक्कर लगाया। एक "नटराज" लेना था। दरअसल, उसी रात (3 दिसम्बर) मित्र जयचाँद की शादी थी, एक कलाकार होने के नाते उसे गिफ्ट में "नटराज" की मूर्ति देनी थी और यहाँ से वापस बरहरवा लौटकर हमें उसके रिसेप्शन में (6 दिसम्बर को) शामिल होना था।
*
कोणार्क सूर्य मन्दिर 

धौलागिरि बौद्ध स्तुप 

भुवनेश्वर में सड़क के किनारे एक मन्दिर. मुख्य मन्दिर (लिंगराज) में भी फोटोग्राफी की अनुमति ही नहीं है. 

उदयगिरि 

खण्डगिरि 

अगले दिन कोणार्क, भुवनेश्वर, धौलागिरी और खण्डगिरि का टूर था। टूर अच्छा ही रहा। उस वक्त कोणार्क में Sand Festival भी चल रहा था। हाँ, चलने से पहले हमने उसी मारवाड़ी बासे से आलू के परांठे पैक करवा लिये थे। बासा के बुजुर्ग मालिक तो जैसे हमारे पुराने परिचित बन गये थे। बहुत अच्छा व्यवहार था उनका। किसी को भी तुरन्त अपना बना लेने की क्षमता थी उनमें।
मारवाड़ी बासा के मालिक 
रात खाना खाने हमलोग बासे में ही गये।
एक गड़बड़ हुई, पण्डेजी जगन्नाथ जी का प्रसाद हमारे लिए होटल मैनेजर को दे गये थे और मैनेजर हमें देना भूल गया। वर्ना रात में हमें एकसाथ बैठक्र वही प्रसाद खाना था। पिछली बार हमने इसी तरह से प्रसाद खाया था। हमारे साथ विजय था- सपत्नीक। तब अभिमन्यु भी साथ था- बच्चा था वह। विजय का साथ हमें संयोग से ही मिल गया था। वह पाकुड़ स्टेशन पर टहल रहा था। हमने पूछा तो बताया कि यहाँ उसका ससुराल है। फिर उसने पूछा, तो हमने बताया कि हम गौहाटी-पुरी का इन्तजार कर रहे हैं। वह हँसने लगा, बोला- हम भी तो उसी ट्रेन का पता लगाने आये हैं। यानि वे भी उसी दिन उसी ट्रेन से पुरी जा रहे थे।
*
अगले दिन, यानि 5 दिसम्बर को हमारी ट्रेन दोपहर के बाद थी। सो, सुबह-सुबह हमलोग जगन्नाथ जी के दर्शन को पहुँच गये, ताकि इसबार अच्छे-से दर्शन कर सकें। अच्छे से दर्शन करके हम होटल लौट आये। फिर एकबार समुद्रतट पर गये- हालाँकि इसबार नहाने के मकसद से नहीं, बस घूमने गये थे। लौटकर एक दूसरा ऑटो किया, होटल छोड़कर अपना सारा सामान रख लिया और ऑटो वाले को कहा कि वह पुरी शहर के अन्दर के सारे दर्शनीय स्थलों को दिखलाने के बाद हमें स्टेशन पर उतार दे।
पुरी नगर के अन्दर एक बौद्ध-स्तुप...
...और वहाँ कार्यरत कुछ मूर्तिकार
(पता नहीं, हमारे मन्दिरों में मूर्तिकारों को स्थान क्यों नहीं दिया जाता?)
 ऐसा ही हुआ।
दोपहर बाद ट्रेन खुली, जिसने हमें अगली सुबह पाकुड़ स्टेशन पर उतार दिया। पाकुड़ से अगली सवारी ट्रेन पकड़कर हम बरहरवा लौट आये।
*** 
कोणार्क मन्दिर में भी खजुराहो-जैसी मूर्तियाँ हैं- हालाँकि बहुत कम. 


शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

196. "ओक्का-बोक्का"


       आज फेसबुक पर वरिष्ठ मित्र नारायण प्रसाद शर्मा जी ने उन गीतों की याद दिलायी, जिन्हें हम अपने बचपन में विभिन्न खेल खेलते समय दुहराया करते थे। उनकी पोस्ट निम्न प्रकार से है:
       ***   
बच्चों का अपने खेलों में टॉस करने का मनोरंजक एवं रचनात्मक तरीका उसकी कुछ बानगी प्रस्तुत है-
१.       अब्बक दब्बक दायं दीं, गोल चौवल पायं पीं, रंग रूप सरूप राय रज्जा (१३ शब्दों की आवृत्ति)
२.       अटकन, बटकन, दही, चटाकन, लौहा, लाटा, बन के, काटा, तुहुर, तुहुर, पानी आवै , सावन में करेला पाके, चल, चल, बिटिया, गंगा, जाई, गंगा, ले, गोदावरी, पाका, पाका, बेल खाई, बेल, के डारा, टूट गए, भरे, कटोरा, फूट गए, (१७ शब्दों की आवृत्ति)
३.       इस, पीस, कोयला, पीस, मारे, दबक्का, उन्नीस, बीस (८ शब्दों की आवृत्ति)

देश के विभिन्न क्षेत्रों में पद्यों के सैकड़ों प्रकार मिल जावेंगे जो कि भुलाए नहीं भूले जाते मित्र अपने बचपन में कुछ समय के लिए प्रवेश करें तो उन्हें वह सब कुछ याद आ जावेगा जिसके लिए आज वे तरस रहे हैं
***
जैसा कि उन्होंने कहा है- हमने भी अपने बचपन में प्रवेश कर गीतों को याद करने की कोशिश की, मगर अफसोस, कि कोई गीत पूरा याद नहीं आया। जितना याद आया, उतना लिख रहा हूँ और यह उम्मीद कर रहा हूँ कि कोई-न-कोई मित्र इन गीतों को जरूर पूरा करेगा:-
१.       "ओक्का-बोक्का, तीन-तिरोक्का, लोहा-लाठी, चन्दन-काठी, बाग में बघवन डोले, सावन में करैला फूटे, ................" (बाकी याद नहीं आ रहा)
इस गीत को आम तौर पर 'ओक्का-बोक्का' खेलते समय गाया जाता था। इस खेल में सभी बच्चे गोल घेरा बनाकर बैठते थे और सभी अपने हाथों को सामने उँगलियों पर टिकाकर रखते थे। एक बच्चा 'ओक्का-बोक्का' गाते हुए अपनी उँगली से सभी हाथों को छूता था। जहाँ गीत खत्म होता था, वहाँ उस हथेली को पिचका दिया जाता था। इसके बाद और भी कई चरण थे, जो अब ठीक से याद नहीं रहे।
२.       एक खेल ऐसा था, जिसमें एक बच्चा अपना एक पैर आगे कर उसके अँगूठे को पकड़ लेता था। फिर उसके (हाथ के) अँगूठे को दूसरा बच्चा पकड़ता था और फिर इस तरह सभी बच्चे मिलकर एक पेड़ बना लेते थे। फिर एक बच्चा एक हथेली को कटार बनाकर पेड़ को काटता था। तब जो गीत गाया जाता था, वह कुछ इस प्रकार से था:
"ताड़ काटे, तरकुल काटे, काटे रे बनखाजा........" (बेशक, आगे कुछ याद नहीं)
३.       एक गीत जो हम बच्चों को बहुत प्रिय होता था, वह था- "घुघुआ-घूघ"। इसे बड़े गाते थे, या हम बच्चों में से ही जो बड़े होते थे, वे गाते थे। इसमें छोटे बच्चों को झुला झुलाया जाता था, इसलिए शायद यह छोटे बच्चों को बहुत प्रिय हुआ करता था। बड़े बिस्तर पर पीठ के बल लेट जाते थे- अपने दोनों घुटनों को झूला बनाते हुए। बच्चे पैर पर बैठ जाते थे। बड़े गाते हुए बच्चे को झुलाते थे और आखिरी पंक्ति में बच्चों को बहुत ऊँचा उठा देते थे। गीत था:
"घुघुआ घुघ, मरेल पुर, चल गे बिल्ली, ककड़ी खेत, मैया गे मैया, डर लागे छौं, कथी के डर बेटा, कथी के डर, ऊपर कछुआ डोलैछे, नीचे सितुआ लोटैछे, ............" (बाकी याद नहीं आ रहा, मगर एक शब्द 'फुदकल जाम' (फुदकते जाऊँ) इसमें आता था)
यह गीत बिहार की जिस बोली में है, उसे "छै-छा" कहते हैं। इसके कई स्वरुप हमारे इलाके में पाये जाते हैं।
४.       ऊपर जिस "घुघुआ-घूघ" गीत का जिक्र हुआ है, उसका एक बँगला संस्करण भी है। चूँकि मेरे घर में बँगला बोली जाती थी (है) और ननिहाल में "छै-छा", इसलिए दोनों गीतों के कुछ शब्द याद रह गये हैं। बँगला गीत इस प्रकार से है:
"घुघु-घुघु, तिसि-ताल, बेटा-छेला, माछ मारते........ (दिमाग में बहुत जोर डालकर भी आगे याद नहीं आ रहा!)
५.       इनके अलावे और भी आधा दर्जन तरह के खेल थे, जैसे दो टीम बनाकर किसी एक की आँखें बन्द कर अपनी टीम से किसी को "छ्द्म नाम" से बुलाना- जैसे, "आ रे मेरे आम"; एक खेल था जिसमें एक गोल घेरे के बाहर कोई दौड़ते हुए बोलता था- "राजा, राजा किवाड़ी खोल" घेरे के बच्चे पूछते थे- "कौन है?" उत्तर आता था- "खपड़ियो चोर"। दरअसल, इस खेल को मारवाड़ी बच्चों ने लोकप्रिय बनाया था- शायद यह खेल राजस्थान में खेला जाता है। "डेंगा-पानी", "सतमी-ताली", "बुढ़िया-कबड्डी", "रूमाल-चोर"-जैसे खेल तो शायद देश भर में खेले जाते होंगे। हमारे इलाके का एक दम-खम वाला खेल था‌- "गद्दी"। अपनी किशोरावस्था में हमने इसे खूब खेला है।
फिलहाल इतना ही, बाकी फिर कभी फुर्सत में कुछ और जोड़ा जा सकता है इस आलेखा में...  
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लगे हाथ, इन खेलों के बारे में बताते हुए मैंने बच्चों की दो तस्वीरें भी खींच ली-