गुरुवार, 2 जनवरी 2020

223. सुन्दरबन में नया साल

2020 का नया साल हमने सुन्दरबन के जंगलों में बिताया। स्टीमर पर।
अल्बम फेसबुक पर है. देखने के लिए कृपया तस्वीर पर क्लिक करें
       सुन्दरबन के परिचय में कुछ कहने की जरुरत तो खैर नहीं है, फिर भी बता दिया जाय कि यह करीब 10,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है। गंगा और ब्रह्मपुत्र-जैसी विशाल नदियों द्वारा ढोकर लायी गयी गाद से यह डेल्टा बना है। इन नदियों की यहाँ दर्जनों धारायें बहती हैं और दर्जनों टापु इनसे बनते हैं। यह क्षेत्र अपने मैंग्रूव जंगलों के लिए प्रसिद्ध है। खारे पाने में उगने वाली यह बहुत ही खास वनस्पति है। ...और ये जंगल प्रसिद्ध हैं बाघों के लिए, जिन्हें 'रॉयल बेंगॉल टाईगर' कहा जाता है। यह डेल्टा युनेस्को के 'विश्व धरोहर' में शामिल है। इसका 60 प्रतिशत हिस्सा बाँग्लादेश में पड़ता है और 40 प्रतिशत भारत में।
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       कुछ दिनों पहले हमें जैसे ही पता चला कि हमारे इलाके के ही एक टूर-ऑपरेटर घुमक्कड़ों को सुन्दरबन ले जा रहे हैं, जहाँ 30 और 31 दिसम्बर की रात स्टीमर पर ही बितानी है, हमने बिना कुछ सोच-विचार किये पहले हाँ कर दिया। वैसे, हमने कभी सोचा नहीं था कि हम कभी सुन्दरबन घूमने जायेंगे। हाँ करने के बाद हमने इण्टरनेट पर सुन्दरबन-ट्रिप के बारे में जानकारी हासिल की।
       योजना के अनुसार 29 दिसम्बर की दोपहर हम बरहरवा से पाकुड़ पहुँचे। वहाँ टूर-ऑपरेटर शेषनाथ जी के घर पर ही हम रुके। रात पौने ग्यारह बजे हमारी ट्रेन थी सियालदह (या सियालदा) के लिए- गौड़ एक्सप्रेस। ('गौड़' मालदह या मालदा के पास एक ऐतिहासिक स्थान है, जहाँ कभी बँगाल की राजधानी हुआ करती थी।) ट्रिप के और भी कुछ यात्री रात तक उनके घर पहुँचे। रात का खाना वहीं हुआ। रात पौने ग्यारह बजे हम सभी गौड़ एक्सप्रेस से रवाना हुए।
       सुबह मुँह अन्धेरे हम सियालदह स्टेशन पर थे। चाय पीकर लोकल ट्रेन से कैनिंग के लिए (64 किमी) रवाना हुए। कैनिंग इस रूट का आखिरी स्टेशन है। कैनिंग से टेम्पो में बैठकर हम सभी सोनाखाली के लिए (36 किमी) रवाना हुए। सोनाखाली स्टीमर घाट पर बहुत सारे स्टीमर नजर आये। हमारे स्टीमर का नाम 'भोलानाथ' था। करीब 50 लोग इस सवार हुए। कागजात वगैरह बनने में समय लगा। करीब बारह बजे हमारा स्टीमर रवाना हुआ। इस बीच स्टीमर पर गर्मागर्म नाश्ता हुआ।
       नदी में थोड़ा आगे बढ़ते ही मैंग्रूव के जंगलों की शुरुआत हो गयी। आगे चलकर यह और भी घना हो गया। पहले दिन हम जिस प्वाइण्ट पर उतरे, उसका नाम सांझेखाली वाइल्डलाईफ सैंक्चुअरी था। बहुत-से टापुओं में इस तरह की व्यवस्था है, जहाँ सैलानी उतरकर टापु पर घूमते हैं और 'वाच टावर' पर चढ़कर जंगल का नजारा देखते हैं। यहाँ एक संग्रहालय भी था।
       रात में हमारे स्टीमर ने ट्रिपलीघेरी बाजार नाम के एक टापु के पास लंगर डाला। उस शाम वहाँ साप्ताहिक 'हाट' भी लगी हुई थी। रात होने पर भी चहल-पहल थी। हमारे स्टीमर के कुछ यात्री वहीं गेस्ट-हाउस में ठहरे- रात बिताने के लिए। वैसे, स्टीमर पर गद्दों-रजाईयों की व्यवस्था थी; ठण्ड भी ज्यादा नहीं थी, इसलिए ज्यादातर यात्री स्टीमर पर ही सोये। 
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       अगले दिन- यानि 31 दिसम्बर को- हमारा स्टीमर तीन जगहों पर रुका- सुदर्णखाली, दुबांकी कैम्प और झारखाली इको पार्क। पहले टापु पर वाच टावर था, दूसरे पर वाच टावर के साथ-साथ एक पक्षी-अभयारण्य भी था और तीसरे पर दो बाघों को रखा गया था- सैलानियों के लिए। इस दरम्यान स्टीमर कम रफ्तार में चलता रहा- कभी संकरी, कभी चौड़ी धाराओं में। दोनों तरफ तरह-तरह के जंगल देखने मिल रहे थे। कहीं-कहीं जंगल बहुत घने थे। ज्यादातर टापुओं के जंगल रस्सी की विशाल जालियों से घिरे थे- ताकि कोई इनमें प्रवेश न कर सके। कई मगरमच्छ पानी से निकलकर किनारे पर धूप सेंकते हुए नजर आये। अक्सर बन्दर भी नजर आ रहे थे। जहाँ तक बाघों की बात है, हमें नहीं लगता कि जिन धाराओं से सैलानियों को लेकर स्टीमर गुजरते हैं, उन धाराओं के किनारे कभी बाघ आते भी होंगे। यही कारण है कि सैलानियों को दिखलाने के लिए झारखाली इको पार्क में दो बाघों को बन्दी अवस्था में रखा गया है, ताकि सुन्दरबन आने वाले सैलानी निराश न हों और बाघ देखकर ही जायें। इस पार्क में छोटा-सा सुन्दर बाजार भी है।
दोपहर के बाद हम जिस जगह से गुजरे, वहाँ तो किसी सागर का अहसास हो रहा था- शायद बँगाल की खाड़ी यहाँ से ज्यादा दूर नहीं थी।
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       दूसरी रात भी हमारे स्टीमर ने ट्रिपलीघेरी बाजार में ही डेरा डाला। उस रात बारह बजे तक हम स्टीमर में अन्ताक्षरी खेलते रहे- नये साल के स्वागत के लिए।
       2020 के पहले दिन, यानि 1 जनवरी को हमारे स्टीमर ने पाखीरालय नामक टापु के किनारे डेरा डाला। यहाँ भी एक बाजार था। इसके बाद लौटने का क्रम शुरु हुआ। लौटते हुए स्टीमर गोसाबा शहर के किनारे भी रुका। स्टीमर के एक यात्री का जन्मदिन था और उसे स्टीमर में बाँटने के लिए मिठाईयाँ भी खरीदनी थीं।
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       जो लोग मांसाहर के शौकीन हैं, लगता है, उनके लिए यह ट्रिप बढ़िया है, क्योंकि टूर आयोजन करने वालों की ओर से स्टीमर पर भोजन आदि का इन्तजाम बहुत ही खुले दिल से किया जा रहा था। पहले दिन जिस मछली का व्यंजन चावल के साथ परोसा गया, उसके बारे में बताया गया कि यह गंगा की 'भेटकी' मछली है, जिसकी कीमत आम मछलियों की तुलना में ज्यादा होती है। यह मछली हमें वाकई स्वादिष्ट लगी। दूसरे दिन के भोजन में बड़े आकार की झींगा मछली थी। पता चला, यह भी महँगी मछली है, लेकिन चूँकि यह समुद्र की मछली है, इसलिए बहुतों को इसका स्वाद नहीं रुचेगा। हम भी इसकी खास महक और बनावट के कारण इसे नहीं खा पाये। तीसरे दिन के भोजन में मछली तो साधारण थी, पर उसे पकाया गया था खास बँगाली तरीके से, यानि 'सरसे बाँटा' (सरसों पीसकर) के साथ। यह व्यंजन भी स्वादिष्ट लगा हमें। रात के खाने में एक रोज मुर्गे और दूसरे रोज मांस का इन्तजाम था। चावल के साथ रोटियाँ भी रहती थीं- हालाँकि एक रात हमने रोटियाँ कम पड़ते देखा। शाम के स्नैक्स में एक शाम चिकन-पकौड़ा था। सुबह के नाश्ते में मैदे की पूरियाँ होती थीं। तीनों वक्त चाय-कॉफी तो चलता ही था। कुल-मिलाकर, भोजन के शौकीनों को यहाँ निराश नहीं होना पड़ेगा। उम्मीद करते हैं कि हर स्टीमर में ऐसा ही इन्तजाम रहता होगा।
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       रही बात इस ट्रिप की कमी की, तो वह है- खारा पानी, जिससे नहाना- खासकर, सिर धोना मुश्किल है। इससे बचने के लिए आपको रात स्टीमर में न ठहर कर किसी टापु के लॉज या होटल में रुकना पड़ेगा- जिसका खर्च अलग पड़ेगा। हो सकता है, किसी स्टीमर में कुछ और भी व्यवस्था हो। दरअसल ज्वार के कारण यहाँ नदियों का पानी भी खारा हो जाता है। हम अब तक जानते थे कि ज्वार पूर्णिमा के दिन आता है और भाटा अमावस्या के दिन, पर यहाँ बताया गया कि हर छह घण्टों में ज्वार-भाटा होता है। रात में तो खैर, हमने स्पष्ट देखा, तेजी से पानी बढ़ते हुए। दिन में भी एकबार पानी चढ़ता है।
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       आम तौर पर नये साल के दिन पिकनिक मनाया जाता है; पिकनिक को हिन्दी में बनभोज या वनभोज कहते हैं और सुन्दरबन एक जंगल है, यानि वन। यहाँ स्टीमर पर दो रातें तीन दिन बिताते हुए भोजन करना- इससे बड़ा "बनभोज" भला और क्या हो सकता है!
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मंगलवार, 5 नवंबर 2019

222. आँवले की छाँव में-


हमें नहीं पता था कि वर्ष में एक दिन ऐसा भी होता है, जिस दिन आँवले के पेड़ के नीचे भोजन करने की परम्परा है। आज पहली बार पता चला और पहली बार हमने आँवले के पेड़ के नीचे भोजन किया।
       दिवाली के बाद अभी-अभी तो छठ महापर्व की गहमा-गहमी समाप्त हुई और बीते कल ही "गौशाला मेला" था। गौशाला मेला यानि "गोपाष्टमी" त्यौहार। हमारे यहाँ बिन्दुवासिनी पहाड़ के पिछले हिस्से में शाम के वक्त इस दिन छोटा-सा मेला लगता है। किसी समय इस मेले का स्वरुप बहुत बढ़िया था। लोग अपने पालतू पशु-पक्षियों को लेकर आते थे, एक निर्णायक-मण्डल सबका निरीक्षण करता था और प्रखण्ड विकास पदाधिकारी की ओर से पुरस्कार-वितरण होता था। बाकी चाट-पकौड़ियों की दुकानें सजती थीं। कहने की आवश्यकता नहीं, इस सुन्दर परम्परा की शुरुआत "पहाड़ी बाबा" ने की थी, जो 1960 से '72 तक यहाँ "बिन्दुधाम" में रहे थे और जिन्होंने इस धाम को भव्य रुप प्रदान किया था। (मेरा एक अलग ब्लॉग ही है बिन्दुधाम तथा पहाड़ी बाबा पर- यहाँ क्लिक करके आप उसे देख सकते हैं।) अब स्वरुप बदल गया है, लेकिन एक शाम का मेला जरुर लगता है। लोग बिन्दुधाम की गौशाला में जाकर गायों को अपने हाथों से कुछ खिलाते हैं।
       खैर, तो गौशाला मेला कल समाप्त हुआ और आज पता चला कि आँवले के पेड़ के नीचे खाना खाने के लिए मुझे डेढ़ बजे बिन्दुवासिनी पहाड़ पहुँचना है। पता चला, आज की नवमी को "आँवला नवमी" (या "अक्षय नवमी") कहते हैं। यह मेरे लिए नयी जानकारी थी। ... तो इस प्रकार, आज आँवले के पेड़ के नीचे खाना खाकर हम आये। (विडियोफेसबुक पर)
हम-जैसे लोग किसी भी विषय पर सोचना शुरु कर देते हैं। इस पर भी हमने सोचा, तो पाया कि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति से जुड़े रहने के लिए इस तरह की परम्पराओं की शुरुआत की होगी, मगर अफसोस कि हम आज ऐसी परम्पराओं को "रूढ़ियों" की तरह निभा तो रहे हैं, मगर इनके पीछे छुपे सन्देश को पूरी तरह से भूल गये हैं। नहीं तो ऐसी परम्पराओं वाले देश में प्रकृति, पर्यावरण और जैव-विविधता दुनिया में सर्वोत्तम होनी चाहिए थी!
सोच आगे बढ़ी, तो पाया कि विवाह-जैसे संस्कारों में ऐसी अनेक रीतियाँ होती हैं, जिनमें समाज के अलग-अलग वर्गों से सम्पर्क करने की जरुरत पड़ती है। इन रीतियाँ को हमारे पूर्वजों ने सामाजिक समरसता को बनाये रखने के लिए गढ़े होंगे, मगर यहाँ भी अफसोस कि इन रीति-रिवाजों को रूढ़ियों की तरह निभाया जाता है और व्यवहार में सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया जाता है।
यह कुछ ऐसा ही है, जैसे कि बुद्ध ने जटिलताओं एवं रूढ़ियों से बचने के लिए एक सरल धर्म की स्थापना की और उनके अनुयायियों ने आज इस धर्म को एक जटिल एवं रूढ़ियों से परिपूर्ण धर्म में बदल दिया! हमने रामकृष्ण मिशन में रामकृष्ण परमहँस की प्रतिमा भी देखी है, जिनकी बाकायदे पूजा-अर्चना होती है। रामकृष्ण परमहँस आज धरती पर आ जायें, तो बेशक, सबसे पहले वे अपनी मूर्तियों को तुड़वायेंगे!
लगे हाथ यह भी बता दें कि हमने भी अपने घर के सामने आँवले का एक पेड़ रोपा है, मगर वह अभी तक तनकर खड़ा नहीं हो पाया है- लम्बा अच्छा-खासा हो गया है। शायद धूप कम मिलने के कारण ऐसा है। (विडियो फेसबुक पर) भविष्य में शायद कभी इसके नीचे आज के दिन भोजन पके और सब मिलकर खायें।
आँवले से याद आया। श्रीमतीजी हर साल खुद ही च्यवनप्राश बनाती हैं। यह दो-तीन महीने चलता है, जबकि कहा जाता है कि आँवला सालों भर किसी न किसी रुप में खाना चाहिए। इसका तोड़ हमने यह निकाला है कि कुछ आँवले को काटकर उसमें नमक मिलाकर धूप में सुखा लिया जाता है। फिर यह सालभर चलता है। खाना खाने के बाद इसके एक टुकड़े को चूसना अच्छा लगता है। वैसे, आँवले की मीठी कैण्डी भी बनायी जा सकती है। श्रीमतीजी ने इसे भी बनाया है। यु-ट्युब में इनसे समन्धित ढेरों विडियो मिल जायेंगे।
अन्त में, एक बुजुर्ग की बात, जो वे अक्सर कहा करते थे-
"बुजुर्गों की बात और आँवले का असर देर से होता है!"
इति। 
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जब बिन्दुवासिनी पहाड़ चले ही गये थे, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि कुछ छायाकारी न करें- 


यह गुरूमन्दिर है

मुख्य मन्दिर का पश्चिमी द्वार

एक तने पर उगे मशरूम नजर आये

दीक्षा कुटीर

पहाड़ी बाबा की कुटिया

एक चबूतरा

जंगली फूल हमेशा आकर्षित करते हैं हमें

दूर से- वह आँवले का पेड़, जहाँ पूजा हो रही थी
 

बुधवार, 2 अक्तूबर 2019

221. जलप्लावन'2019


पिछ्ले हफ्ते के मंगलवार से शुरु हुई वर्षा इस हफ्ते सोमवार तक जारी रही। इन सात दिनों की बरसात में हमारे बरहरवा के दक्षिण में सैकड़ों वर्गकिलोमीटर का क्षेत्र एक विशाल झील में परिणत हो गया। कल वर्षा रुकी थी, तो ये कल की तस्वीरें हैं।
यह जो झील बनी, इसका एक किनारा तो गंगा नदी है, दूसरा किनारा गुमानी नदी है और तीसरा किनारा राजमहल की पहाड़ियाँ हैं। यानी लगभग में यह एक त्रिभुजाकार झील है।
गुमानी एक पहाड़ी नदी है, जो पहाड़ियों से उतरने वाले वर्षा जल को फरक्का के पास गंगा तक ले जाती है। फरक्का में बाँध है, जिस कारण यहाँ गंगा का बहाव धीमा हो जाता है। बाँध के दरवाजों से पानी हालाँकि निकल रहा है, लेकिन जो रफ्तार है, उससे लगता है कि पानी उतरने में तीन दिन लग जायेंगे- बशर्ते कि फिर वर्षा न हो!
बताया जा रहा है कि धान की पैदावार लगभग एक चौथाई घट जायेगी। बाकी जो नुकसान हो रहा है, वो तो है ही।
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कल हमने एक लेख साझा किया था (फेसबुक पर, लिंक यहाँ है), जिसमें बताया गया है कि टिहरी बाँध के कारण मैदानी इलाके में गंगा का बहाव धीमा हो गया है, जिसके फलस्वरुप गंगा अपनी गाद को बहाकर नहीं जा पा रही है। गाद नहीं बहने से गंगा की गहराई कम होती है और बाढ़ के समय पानी अगल-बगल ज्यादा फैलता है।
बाढ़ एक प्राकृतिक घटना है। अगर "प्राकृतिक" रुप से हर साल या दो-चार साल में एकबार बाढ़ आने दिया जाय, तो गंगा की पल्ली मिट्टी खेतों पर आ जाती है और इससे कृषि को बहुत फायदा होता है। प्राकृतिक स्वरुप में गंगा का बहाव भी तेज होगा, बाढ़ पानी जल्दी उतरेगा और गंगा की गहराई भी बनी रहेगी। पर टिहरी बाँध ने गंगा के "प्राकृतिक" बहाव को समाप्त कर दिया है!
फिर भी, गंगा किसी तरह अपनी गाद को भागलपुर तक बहा लाती है। यहाँ आकर गंगा की हिम्मत और ताकत जवाब दे देती है, क्योंकि आगे फरक्का बाँध बहाव को रोक रहा होता है। नतीजा? गंगा में विशाल टापुओं का निर्माण। इन्हें हिन्दी में "दियारा" और बँगला में "चर" कहते हैं। दियारा पहले भी होते थे, पर फरक्का बाँध बनने के बाद से इनका क्षेत्रफल बहुत बढ़ने लगा है। कहीं कोई शोध या अध्ययन तो होता नहीं, इसलिए लगता नहीं है कि कोई आँकड़ा उपलब्ध होगा कि 1970 से पहले दियारा का कुल क्षेत्रफल कितना था और अब कितना है।
फरक्का बाँध ने जलजीवों को भारी नुकसान पहुँचाया है। मीठे पानी की कुछ मछलियाँ प्रजनन के लिए खारे पानी में जाती थीं और इसी प्रकार, खारे पानी की कुछ मछलियाँ प्रजनन के लिए मीठे पानी में आती थीं। आपने शायद "हिल्सा" मछली का नाम सुना हो। कभी यह समुद्र से निकलकर बहाव के विरुद्ध तैरते हुए हरिद्वार तक जाया करती थी, आज यह फरक्का बाँध के उस तरफ ही रह जाती है! भले इनके लिए नहर आदि बनाने की बात हो रही है, पर लगता नहीं है कि यह "कृत्रिम" उपाय कोई काम आयेगा।
गंगा की जो "डॉल्फिन" है- जिसे स्थानीय भाषा में "सोंस" कहते हैं और जो एक नेत्रहीन मासूम बड़ी मछली होती है- हमें लगता है कि इसका भी विचरण क्षेत्र फरक्का बराज के चलते सिकुड़ गया है और इनकी संख्या भी कम हो रही होगी!
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फरक्का बाँध से सिर्फ हम आस-पास वाले लोग ही बुरी तरह से प्रभावित नहीं हैं, बल्कि भागलपुर और पटना तक के लोग इससे प्रभावित हैं। इस बाँध से न तो कोई सिंचाई होती है (मेरी जानकारी में तो इससे कोई नहर "सिंचाई" के लिए नहीं निकलती है) और न ही इससे "पनबिजली" बनती है। (न्यू फरक्का में जो बिजलीघर है, वह "ताप" बिजलीघर है- थर्मल पावर स्टेशन- झारखण्ड के कोयले को जलाकर वहाँ बिजली बनती है। बदले में झारखण्ड अन्धेरे में डूबा रहता है- यह एक अलग विषय है।)
आप जानना चाहेंगे कि आखिर फरक्का बाँध से लाभ क्या है? पटना से लेकर फरक्का तक- 300 किमी की लम्बाई में गंगा किनारे रहने वाले लोगों से पूछकर देखिये, उनका जवाब बड़ा रोचक होगा। वे कहेंगे- फायदा तो इससे कुछ नहीं है, नुकसान ही नुकसान है, मगर इसी बराज के के चलते भारत ने बाँग्लादेश को "टाईट" कर रखा है!
"बाँग्लादेश को टाईट करने के लिए फरक्का में बराज बन रहा है"- यह इंजेक्शन 1970 के दशक वाली पीढ़ी को दिया गया था, मगर आज दस साल का एक बच्चा भी आपको यही जवाब देगा। मेरे ख्याल से, विश्व का यह एकमात्र ऐसा "मनोवैज्ञानिक" इंजेक्शन है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी अपना असर दिखा रहा है।
(वैसे, जहाँ तक मेरी जानकारी है, कोलकाता के डायमण्ड हार्बर बन्दरगाह में पानी की उपलब्धता बनाये रखने के लिए यह बाँध बना था। चूँकि यहाँ से गंगा की एक शाखा बाँगलादेश जाती है, इसलिए बाँग्लादेश के साथ एक समझौता भी है कि कब कितना पानी उसके लिए छोड़ना है।)
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जो हो, व्यक्तिगत रुप से मैं "बाँध विरोधी" हूँ और मेरा मानना है कि दुनिया की हर नदी को स्वाभाविक और प्राकृतिक रुप से बहने देना चाहिए। वैसे भी, "सीमेण्ट" की एक आयु होती है, जो सौ-डेढ़ सौ साल से ज्यादा नहीं हो सकती। 1930-40 से बाँध बनाने के फैशन चला है, अब देखा जाय कि 2030-40 के बाद से इन बाँधों की क्या गति होती है!

(छायाचित्रों में एक तस्वीर मेरे घर के सामने की है, एक-डेढ़ दिन के लिए यहाँ भी पानी जमा हो गया था।)
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पुनश्च: ऊपर एक लेख का जिक्र है. यह लेख ''झुनझुनवाला इकोनॉमिक्स" पेज पर है. शीर्षक है: "हम स्वयं बुला रहे बाढ़ की तबाही...". बाद में उसी पेज पर एक और लेख प्रकाशित हुआ है, जिसका शीर्षक है: "फरक्का का तांडव..". इस लेख का लिंक यहाँ है.