गुरुवार, 17 जनवरी 2019

206. आज की खेती का हाल





चित्र में सरसों के पीले फूलों से ढका खेत का एक टुकड़ा दिखायी पड़ रहा होगा। ध्यान से देखने पर पता चलेगा कि उसके बाद खेतों का एक विशाल रकबा वीरान पड़ा है- यानि परती। हमारे इलाके में आजकल यह दृश्य आम है। धान की फसल के बाद करीब 90 प्रतिशत खेत परती रह जाते हैं। मुश्किल से दस प्रतिशत खेतों में दलहन, तेलहन, गेहूँ और जौ के फसलें लहलहाती हैं। दस साल पहले हालात ऐसे न थे- रबी फसलों के मौसम में भी  ज्यादातर खेत हरे-भरे रहते थे और बीस साल पहले तो रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों के न के बराबर प्रयोग के बाद भी ऊँची-ऊची फसलें लहलहाती थीं।
     व्यक्तिगत रुप से हम खेती-बाड़ी से जुड़े नहीं हैं, पर दादाजी और पिताजी होम्योपैथ डॉक्टर होने के साथ खेती-बाड़ी में रुचि रखते थे, इसलिए थोड़ी-बहुत रुची हम भी रखने लगे हैं। अपने पैतृक गाँव में किसानी करने वाले कुछ गृहस्थों से बातचीत करने के बाद पता चला कि पहले खेतों में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर Shallow Boring हुआ करते थे। किसान डीजल पम्प सेट के सहारे इनसे सिंचाई कर लिया करते थे। पिछले कुछ वर्षों में तरक्की हुई, बिजली गाँवों तक पहुँची, सरकार ने अनुदान दिया और बड़े किसानों ने लाखों खर्च करके Deep Boring करवा लिया। इनसे वे खुद के खेतों में तो सिंचाई करते ही हैं, अन्यान्य किसानों को पानी बेचते भी हैं सिंचाई के लिए। एक-एक गाँव के आस-पास दर्जन भर डीप-बोरिंग हो गये हैं... नतीजा यह हुआ कि अब शैलो-बोरिंग से (डीजल पम्प के सहारे) पानी नहीं निकाला जा सकता- भूजल का स्तर नीचे चला गया है। ...इस प्रकार, मध्यम एवं छोटे किसानों/भागीदारों के खेत तथा डीप बोरिंग से काफी दूरी वाले खेत धान कटने के बाद परती रह जाते हैं।
     हमने पूछा- तालाब? जवाब में गाँव के आस-पास के पाँच-सात तालाब दिखा दिये गये- किसी में पानी नहीं था। धान की फसल जब तैयार हो रही थी, तब अन्तिम पटवन के लिए इन तालाबों से पानी लेना पड़ा। अब रबी फसलों की बुवाई लायक पानी इनमें नहीं बचा।
     मेरा कहना था, रबी फसलों को तो ज्यादा पानी नहीं चाहिए- धान कटने के बाद थोड़ी-बहुत नमी तो रहनी चाहिए खेतों में। और फिर दो-तीन दिन हल्की-फुल्की बारिश भी हुई थी- चक्रवात वाली। इसके जवाब में हमें यह जानकारी मिली कि पहले जब हल से खेतों की जुताई होती थी, तब मिट्टी नर्म रहती थी; अब जब से ट्रैक्टरों से जुताई होने लगी है- मिट्टी पत्थर-सरीखी होने लगी है- नंगे पैर इनपर चलना मुश्किल हो गया है। दूसरी बात- पहले जब यूरिया, डी.ए.पी. का प्रयोग नाम मात्र का होता था, या नहीं ही होता था, तब खेतों में केंचुए बहुतायात में पाये जाते थे। खेतों के मेंड़ तक केंचुओं से भरे होते थे। केंचुए मिट्टी को हल्का बनाये रखते थे। केंचुए अब खेतों में नहीं होते। इन दो कारणों से आजकल खेतों की मिट्टी नमी बनाये नहीं रख पाती। कहने की आवश्यकता नहीं कि नर्म और पोली मिट्टी नमी को ज्यादा समय तक रोकती है और सिंचाई के दौरान कम पानी माँगती है। ट्रैक्टर तथा यूरिया- ये दोनों भी तरक्की की निशानी हैं।
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     जाहिर है, मेरे-जैसा आदमी अब यह सोच रहा है कि क्या वाकई यह तरक्की है? इससे से बेहतर होता कि खेती में हम तरक्की न ही करते! हल-बैलों से खेतों की जुताई होती; गोबर, घरेलू कचरे और चूल्हे की राख के खाद डाले जाते; किसान परिवार एक-दूसरे की मदद करते; साल भर के लिए अनाज उपजाते और अतिरिक्त उत्पाद बेचकर नकगी कमाई जाती।
     मेरे विचार का मजाक उड़ाया जाने लगेगा, इसलिए इस पर हम और चर्चा नहीं करते। कुछ दूसरी हल्की-फुल्की बातें कर लेते हैं।
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     हमारे बरहरवा में चार् मुख्य सड़कों के बीच खेतों का एक बड़ा-सा (प्रायः त्रिभुजाकार) रकबा है। हमें याद है कि अपने बचपन में होलिका दहन के पहले हमलोग इन खेतों से गेहूँ और चने के कुछ पौधे उखाड़ लाते थे और एक डण्डे पर इन्हें बाँधकर जलती होलिका में इन्हें पकाते थे। अब ये खेत खाली हैं- परती। हालाँकि पिछले साल ही किसी भागीदार ने हिम्मत करते कुछ खेतों में गेहूँ-चना बोया था, पर लगता है, उसे लाभ नहीं हुआ। इस साल ये खेत खाली हैं।
     प्रसंगवश, आग में चना को भूनकर जब खाया जाता है, तो उसे ओल्हा होल्हा, होरहा या ऐसा ही कुछ कहा जाता है। मेरा अनुमान कहता है कि पुराने जमाने में यह आम बात होती होगी। खेतों में आग जलाकर चने को उनमें भूनकर खाया जाता होगा और मौज-मस्ती की जाती होगी। जाड़े में हाथ सेंकना भी हो जाता होगा और फगुनाहट की मस्ती भी ली जाती होगी। ग्रामीणों-किसानों की यही परम्परा बाद में परिष्कृत होकर "होलिका" बन गयी होगी और समय के साथ इसमें रंगों का त्यौहार होली भी जुड़ गया होगा। बाकी कहानियाँ तो बाद में जोड़ दी गयी होंगी।
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यह चित्र "धान के गोले" का है। धान रखने के लिए आँगन में इसे बनवाया जाता है। शुद्ध हिन्दी में शायद इसे "खत्ती" कहेंगे। अपने पैतृक गाँव में एक गोले को देखकर याद आया कि हमारे बचपन में हमारे आँगन में धान रखने का एक विशाल गोला हुआ करता था। ...साथ में यह भी याद आया कि इसकी फूस की छप्पर में हमने एक शाम आग लगा दी थी। दरअसल, उन दिनों धान-गेहूँ के अलावे पटसन (पटुआ या जूट) की भी थोड़ी-बहुत खेती होती थी हमारे इलाके में। तब उसकी "सण्ठियों" का एक गट्ठर हमारे घर में रखा रहता था। ये सण्ठियाँ जलती बहुत अच्छी थीं। दोपहर के बाद कोयले के चूल्हे में थोड़ी-सी आँच बची होती थी। हमने एक सण्ठी जलाई और खिड़की से बाहर गोले के पुआल में आग पकड़ा दी- सोचा, दो-एक पुआल जलेंगे, और हम पानी से बुझा भी देंगे। पर आग भड़क गयी। पड़ोसियों की मदद से यह बुझी। गोले का धान भी भींग गया।
...अपनी इस तरह की बदमाशियों को याद करने पर लगता है कि आजकल के बच्चे कितने शरीफ होते हैं, है न?
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     पुनश्च:
     अपने गाँव में हमने कुछ किसानों को राजीव दीक्षित जी का एक विडियो दिखाया कि कैसे खेती में लागत कम करके उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। वे प्रभावित तो हुए, पर इसे शायद ही अपनायें। कभी मूड बना, तो हम खुद ही अपने दम पर इस तरह से खेती करने की कोशिश करेंगे। आप भी अगर खेती-बाड़ी से जुड़े हैं, तो इस विडियो को एकबार जरुर देखें। लिंक यहाँ है।

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2018

205. शुभ विजयादशमी




     विजयादशमी के दिन शस्त्र-पूजन की परम्परा है। अब एक किसान या खेतीहर मजदूर के लिए अस्त्र-शस्त्र क्या है? बेशक, कुदाल (फावड़ा), हँसिया, तराजू इत्यादि। दूसरी जगहों के बारे में हम नहीं जानते, पर हमारे पैतृक गाँव में इन्हीं शस्त्रों की पूजन की परम्परा है। ऊपर जो दो छायाचित्र हैं, वे हमारे पैतृक गाँव के दो आँगनों के है। इन्हें देखकर समझा जा सकता है कि मुख्य रुप से कृषि से आजीविका प्राप्त करने वाले गृहस्थों के लिए अस्त्र-शस्त्र क्या होते हैं।
     हमलोग अब कृषि से प्रत्यक्ष रुप से नहीं जुड़े हैं, मगर इस पुरानी परम्परा को आज तक हमारे घर में भी निभाया जाता है। आँगन को गोबर से लीपकर गृहस्थी के सारे हथियारों को धोकर एक साथ रखा जाता है और उनकी पूजा की जाती है। "ढेकी" को समाप्त हुए जमाना बीत गया (हालाँकि सुदूर ग्रामीण इलाकों में ढेकी अभी भी इस्तेमाल में है, खासकर, सन्थाली बस्तियों में), मगर एक ओखली और मूसल हमारे यहाँ अब तक सुरक्षित है। साल भर वह कहाँ रहता है, पता नहीं (मतलब व्यक्तिगत रुप से मुझे नहीं पता), मगर आज के दिन वह बाहर आता है। एक दिन और बाहर आयेगा- जब नये चावल का त्यौहार "नवान्न" मनाया जायेगा। उस दिन बाकायदे इस ओखली का प्रयोग किया जायेगा- चावल का प्रसाद बनाने के लिए। एक परिवार है, जिसके यहाँ से हर साल मेरे भाई का एक दोस्त "मूसल" माँगने आता है- शायद गोवर्धन पूजा के दिन। उस दिन उसके घर में इसकी पूजा होती है।
     प्रसंगवश, बता दिया जाय कि एक छोटी चक्की तो हमारे यहाँ है ही- दाल वगैरह दलने के लिए- एक बड़ी चक्की के दो पत्थर भी हमारे यहाँ दशकों से बेकार पड़े हुए हैं। अभी हाल ही में मुहल्ले के दोनों आटा-मिल बन्द हो गये हैं और अन्य मिल जरा दूर के मुहल्ले में हैं। ऐसे में हम गम्भीरता से इन बड़ी चक्कियों को फिर से स्थापित करने के बारे में सोच रहे हैं- गेहूँ पीसने के लिए। इस बड़ी चक्की को हमारे यहाँ "जाँता" कहते हैं।
     आज अपने पैतृक गाँव चले गये थे। पता चला, आज के दिन कभी वहाँ बैलों की छोटी-मोटी दौड़ भी आयोजित होती थी। अब नहीं होती। शायद फिर कभी शुरु हो जाय। जब पाँच साल बाद गाँव में फिर से "चरक मेला" की शुरुआत हो सकती है (इस मेले पर दो आलेख मेरे इस ब्लॉग में हैं), तो बैलों की दौड़ भी शुरु हो सकती है! इसी दिन धान की कीमत भी तय करने की परम्परा थी पहले। अब नहीं है।
     धान पकने से याद आया। देश के पश्चिमी हिस्से में धान पक चुका है, फसल कट चुकी है और अब पराली (हमारे यहाँ पुआल कहते हैं) जलाने- न जलाने को लेकर समस्या हो रही है। देश के मध्य भाग में धान की फसल पकने लगी है- शायद एक-दो हफ्ते में कटने भी लगे। मगर हमारे इलाके में- मेरा अनुमान है कि सारे पूर्वी भारत में अभी धान के पौधों बालियाँ आ रही हैं। नीचे की दो तस्वीरों से अनुमान लगाया जा सकता है कि अभी धान में बालियाँ ठीक से आयी भी नहीं हैं। हमारे यहाँ फसल कटते-कटते "अगहन" (अग्रहायण- मार्गशीर्ष) महीना आ जायेगा। दरअसल, पूर्वी भारत की खेती अब भी "मौनसून" आधारित है, जबकि पशिचमी भारत में सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं- इसलिए ऐसा अन्तर है। वैसे, धान की फसल पकने का सही एवं प्राकृतिक समय "अगहन" मास ही है, इसलिए एक युग में इसे महीने को साल का पहला महीना माना जाता था।


     जब आप चित्र देखेंगे, तो आपको उसमें स्कूटर भी नजर आयेगा। अब उस पर भी कुछ कह दिया जाय। पहली बात, यह स्कूटी नहीं, स्कूटर है- बजाज का 'लीजेण्ड'। 150 सी.सी. का फोर स्ट्रोक इंजन है इसमें। इसका नम्बर है- 8499। इस नम्बर को तारीख में बदलने पर तारीख बनती है- 8 अप्रैल 99 और इसे हमने सही में 1999 के अप्रैल महीने में लिया था- 5 तारीख को। यह आज भी चल रहा है और हाल ही में इसकी मरम्मत करने वाले मैकेनिक ने स्वीकार किया कि इसकी माइलेज गजब की है- यानि आज की नयी गाड़ियाँ भी शायद इतनी माइलेज न दे! 


     अन्त में दो और तस्वीरें- श्रीमतीजी की। एक तस्वीर तलवार के साथ है- इस तलवार को हमने अमृतसर में लिया था- स्वर्ण मन्दिर के परिसर से- एक यादगार के तौर पर। दूसरी तस्वीर एयर गन के साथ है, इसे हमने पूर्णिया में लिया था- बेटे के जन्मदिन के तोहफे के रुप में- जब वह छोटा था। आज शस्त्र-पूजन के लिए इन्हें भी बाहर निकाल लिया था।
     इतना ही।
     शुभ विजयादशमी- बड़ों को चरणस्पर्श, छोटों को प्यार और हमउम्र को स्नेह।

रविवार, 26 अगस्त 2018

204. दिगम्बर जेठू, बालिका नृत्यांगना तथा नैसर्गिक हँसी



      तस्वीर खींचते समय एक होता है- 'इधर देखिये, मुकुराईये' कह कर (अँग्रेजी में- 'Say Cheese') तस्वीर खींचना और एक होता है- जब कोई किसी काम में या बातचीत में, या फिर किसी भी एक्टिविटि में मशगूल हो, तब तस्वीर खींच लेना। पहले तरीके से तस्वीर खींचने पर आम तौर पर एक "कृत्रिम" हँसी कैमरे में कैद होती है, जबकि दूसरा तरीका अपनाने पर कई बार एक "नैसर्गिक" हँसी कैमरे में कैद हो जाती है।
      अभी 'विश्व छायाकारी दिवस' पर जानकारी (कि यह 19 अगस्त को क्यों मनाया जाता है) हासिल करते समय विख्यात छायाकार रघु राय का एक कथन मेरे सामने से गुजरा। कथन इस प्रकार से था: 'चित्र खींचने के लिए पहले से कोई तैयारी नहीं करता। मैं उसे उसके वास्तविक रूप में अचानक कैंडिड रूप में ही लेना पसंद करता हूं।'
"रघु राय" नाम तथा उनकी तस्वीरों से हम तब से परिचित हैं- जब पत्र-पत्रिकाओं का जमाना हुआ करता था। उनका यह कथन हमें बहुत अच्छा लगा, क्योंकि हम भी इसी सिद्धान्त पर चलना पसन्द करते हैं- भले हम छायाकार नहीं हैं।
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खैर, तो मुद्दे की बात यह है कि 15 अगस्त के दिन हम घूमते हुए शिष्टाचार वश 'दिगम्बर जेठू' से मिलने चले गये थे। कुछ देर बाद वहाँ नृत्यांगना की वेशभूषा में एक बालिका आयी अपनी माँ के साथ। याद आया- कुछ देर पहले बरहरवा हाई स्कूल के प्राँगण में ('नागरिक मंच' द्वारा आयोजित वार्षिक) स्वतंत्रता दिवस समारोह में हमने जो उद्घाटन नृत्य देखा था, उसे सम्भवतः यही बलिका नृत्यांगना कर रही थी। वह अपना पुरस्कार दिखलाने आयी थी।
दिगम्बर जेठू मेरे पिताजी के हमउम्र हैं- कुछ बड़े ही हैं- तभी तो उन्हें हमलोग 'काकू' के स्थान पर 'जेठू' कहते हैं। उस बालिका के लिए वे 'दादाजी' होंगे। तो दादा-पोती खूब मशगूल होकर बातें करने लगे। इसी बीच हमने उनकी कुछ तस्वीरें खींच लीं। जब बातचीत बन्द हुई, तब हमने तस्वीरें दिखायीं उन्हें। जेठू ने मेरी इस कलाकारी की तारीफ की कि हम एक "नैसर्गिक" हँसी को कैमरे में कैद करने में सफल रहे।
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अभी लिखते वक्त याद आ रहा है कि दिगम्बर जेठू के छोटे भाई दिलीप काकू ने भी एकबार मेरी छायाकारी की प्रशंसा की थी। वह रील वाले कैमरे का जमाना था। हमने सूर्योदय के वक्त बिन्दुवासिनी पहाड़ी पर जाकर उगते हुए सूर्य की तस्वीर ली थी। उस तस्वीर को देखने के बाद दिलीप काकू ने तुरन्त अपनी जेब से कलम निकाल कर तस्वीर के पीछे लिख दिया: "बधाई! बेटा बाप हो गया (फोटोग्राफी में)!"
बता दूँ कि दिलीप काकू का देहावसान बहुत पहले हो चुका है- वे पिताजी के बाल्यसखा थे- एक बँगला नाटक में दोनों ने जिगरी दोस्त की भूमिका भी निभायी थी।
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