सोमवार, 6 मई 2019

214. दो पेड़: दो कहानी



       बाँस को हालाँकि पेड़ नहीं माना जाता- यह घास की श्रेणी में आता है (पादप विज्ञान के अनुसार, यह ग्रामिनीई (Gramineae) कुल की एक अत्यंत उपयोगी घास है), पर हम इसे यहाँ पेड़- पेड़ क्या, 'महीरूह' मान कर चल रहे हैं
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      अपने घर के पिछवाड़े में जो थोड़ी-सी परती जगह है, वहाँ हम बाँस का पौधा रोपना चाहते थे, ताकि बहुत समय बाद वहाँ छोटा-मोटा जंगल हो जाय बाँस का। एक भागीदार से कहा, तो उसने टाल दिया। बोला- जहाँ कई बीघा परती जमीन होती है, वहाँ यह सब लगाया जाता है। यह युवा भागीदार था। फिर हमने बुजुर्ग भागीदार से अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि चैत महीने में बाँस का पौधा रोपा जाता है। तीन या चार साल पहले की बात है। हमने चैत महीने का इन्तजार किया। चैत आया और बीतने भी लगा, आज-कल करते-करते हम जा नहीं पाये पौधा लाने। चैत का आखिरी दिन आ गया। सुबह बाहर निकलने पर उत्तम मिला मोटर साइकिल पर। हमने पीछे बैठते हुए कहा- चलो चौलिया, बाँस का चारा लाना है।
       चौलिया में भागीदार ने (हमारी ही) छोटी-सी बाँस-झाड़ में से एक बाँस जड़ सहित काटा, उसे पाँच या छह फीट का बनाया फिर उसे रोपने का तरीका हमें विस्तार से बता दिया। जड़ में भागीदार ने पाँच "आँखें" दिखायी हमें कि इससे पाँच पौधे निकलेंगे।
       घर आकर हमने और उत्तम ने निर्देशानुसार उसे रोप दिया।
       आज तीन-चार साल बाद यहाँ पाँच-सात बाँसों की अच्छी-खासी झाड़ बन गयी है। और भी तीन-चार नये बाँस के पौधे उग आये हैं। हालाँकि यह जगह घर के पिछवाड़े में ही है, पर उस कोने की तरफ आना-जाना नहीं होता है- दो-चार-छह महीने में ही कभी उस कोने की तरफ जाते हैं। कुछ दिनों पहले उधर गये थे, तो झाड़ का एक विडियो बना लिये थे। बस, उसे ही साझा करने के लिए यह ब्लॉग-पोस्ट है। अपने हाथों से रोपा हुआ कोई पौधा जब महीरूह का रुप धारण करके लहलहाता है और उस पर चिड़ियाँ चहचहाती हैं, तो कितनी खुशी मिलती है!
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       एक और महीरूह (विशाल पेड़) है हमारे यहाँ- सेमल का। इसकी भी एक कहानी है।
       जहाँ तक हमें याद है, इसका पौधा पिताजी कल्याण क्रिश्चियन के यहाँ से लाये थे। कहा था कि यह उन्नत नस्ल का सेमल है। आम तौर पर पकने या सूखने के बाद सेमल के फल फटने लगते हैं और उसकी रूई के फाहे हवा में उड़ने लगते हैं। पिताजी ने कहा था कि इसमें ऐसा नहीं होगा। समय के साथ पौधा (या डाली- जो भी रही हो) बड़ा हुआ और उस पर फल लगे। देखा गया- सही में, इसके फल गर्मियों में नहीं फटते थे और रुई बर्बाद नहीं होती थी। बहुत सारे तकिये बने सेमल की रूई के।
       सेमल का पेड़ विशाल तो होता है, पर उसकी जड़ें शायद मजबूत नहीं होतीं। एक आँधी में पेड़ गिर गया। बहुत दिनों तक गिरा रहा। फिर कुछ लोगों (बेशक, भागीदार ही रहे होंगे) की मदद से उसे खड़ा किया गया। वह फिर टिक गया और फिर फल देने लगा।
       कुछ वर्षों बाद एक आँधी में वह दुबारा गिर गया। इस बार उसे उठाने की कोशिश नहीं की गयी। उसे मरने या सूखने के लिए छोड़ दिया गया। जो राजमिस्त्री हमारे यहाँ काम किया करता था, उसकी नजर पड़ी मोटे तने वाले इस मरते हुए पेड़ पर। उसने इसने खरीदने की पेशकश की। सेमल के तख्तों का इस्तेमाल यहाँ भवन-निर्माण के दौरान "शटरिंग" (हमारे इलाके में "सेण्टरिंग" कहते हैं, जो गलत है) के लिए होता है। पता नहीं क्यों, हम लोगों ने गिरे हुए पेड़ को बेचने में रुचि नहीं दिखायी।
       कुछ वर्षों बाद देखा गया कि जमीन पर गिरे हुए तने से नयी-नयी डालियाम फूट रही हैं और वे सीधी होकर नये पेड़ के रुप में बड़ी हो रही हैं। जहाँ सेमल का सिर्फ एक पेड़ था, वहीं दर्जनों पेड़ एक साथ बढ़ने लगे। आज यह एक महीरूह है। कई सारे तने सीधे खड़े हैं, जो जमीन से नहीं, बल्कि गिरे हुए मुख्य तने से निकले हुए हैं। जड़ें वही पुरानी है, जो उखड़ गयी थी- लेकिन एक हिस्सा तो जमीन से जुड़ा हुआ था ही। वर्षाकाल में यह बहुत ही घना और हरा-भरा हो जाता है। गर्मियों में इसमें फल आते हैं। फलों को पोषण देने के लिए गर्मियों में इसके ज्यादातर पत्ते झड़ जाते हैं। इस वक्त फल पक रहे हैं। फिर सूखेंगे, इन्हें तोड़ा जायेगा, इनसे रूई निकाली जायेगी और फिर उस रूई से बनेंगे तकिये आदि। सेमल की रूई तकियों के बहुत अच्छा होता है- बहुत ही मुलायम और आरामदायक।
       इस पेड़ के पुनर्जन्म से एक तो 'फीनिक्स'- सुरखाब की याद आती है, जो अपनी राख से दुबारा जन्म लेता है (बेशक, किंवदन्ति है) और दूसरे, जीवन की जीवटता को भी याद दिलाता है- कैसे गिर कर फिर से उठा जाता है...
       इति।
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शनिवार, 4 मई 2019

213. साहेबगंज: 2 विडियो और 1 तस्वीर


https://www.youtube.com/watch?v=MMRyUZFtMOs&feature=youtu.be

       साहेबगंज हमारे जिले का भी नाम है और उस शहर का भी नाम है, जहाँ हमारा जिला मुख्यालय है। यह विडियो हमने आज ही साहेबगंज रेलवे स्टेशन के नये बने फुट ओवर ब्रिज से बनाया है। विडियो के अन्त में आपको एक वाष्प इंजन दिखायी पड़ेगा, जिसे अब उठा कर स्टेशन के सामने प्राँगण में स्थापित किया जायेगा। इस वाष्प इंजन का कोई नाम है या नहीं, पता नहीं; सामने स्थापित करते वक्त भी इसे कोई नाम दिया जायेगा या नहीं- नहीं पता, पर हम इसे नाम देना चाहेंगे- "कृष्णसुन्दरी"! जहाँ तक हमें याद है, पहले बाकायदे रेल इंजनों के नाम हुआ करते थे। (बताते चलें कि इस इंजन पर 'कृष्णसुन्दरी' शीर्षक से ही एक आलेख हम इस ब्लॉग पर पहले कभी लिख चुके हैं।)
       हमने ऊपर 'नये बने फुट ओवर ब्रिज' जिक्र किया, तो बता दें कि पहले साहेबगंज में जो फुट ओवर ब्रिज इस्तेमाल में था, वह अँग्रेजों के जमाने का था और उसकी एक तरफ की सीढ़ियाँ लकड़ी की थीं। बेशक, वह पुराना ब्रिज अब भी कायम है, पर उस पर आवागमन रोक दिया गया है। यह ब्रिज कितना पुराना होगा, इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि यहाँ के रेल कैम्पस में स्थित रेलवे हाई स्कूल की स्थापना 1878 में हुई थी। (स्कूल के बोर्ड पर लिखा देखा।) 1878 में अगर किसी रेल-कैम्पस में हाई स्कूल की जरुरत पड़ गयी, तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि रेल-लाईन बिछाने का काम यहाँ 1850 के आस-पास ही शुरु हो गया होगा। यही कारण है कि हम अपने इलाके की इस रेल-व्यवस्था को भारत की पहली रेल-व्यवस्था होने का दावा करते हैं। रुड़की से पिरान कलियर के बीच पहली 'मालगाड़ी' वर्ष 1851 में और मुम्बई से थाने के बीच पहली 'सवारी' रेलगाड़ी वर्ष 1853 में इसलिए चल गयी, क्योंकि इन दोनों रेल-पटरियों की दूरी बहुत ही कम थी। इनके मुकाबले हमारे इलाके की रेल-पटरियों की दूरी बहुत ज्यादा थी- करीबन 300 किलोमीटर। दरअसल (जहाँ तक मेरा अनुमान है) अँग्रेज बँगाल प्रान्त की पुरानी राजधानी "राजमहल" (जो कि एक अन्तर्देशीय बन्दरगाह भी था) को अपनी नयी राजधानी "कोलकाता" से जोड़ना चाहते थे। भारत में "पहली" रेल योजना यही बनी होगी, मगर दूरी ज्यादा होने के कारण यहाँ पटरियाँ बिछाने में समय ज्यादा लग गया, रेलगाड़ी चलाने में देर हो गयी और इस बीच रूड़की-पिरान कलियर और मुम्बई-थाने में रेलगाड़ियाँ चल गयीं!
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       खैर, साहेबगंज के प्लेटफार्म पर ही हमने एक विडियो और बनाया- इसे भी देखिये। इसमें मालगाड़ी चल रही है, जिसमें कोयला लदा है। हमारे झारखण्ड का कोयला। रोज दर्जनों ऐसी मालगाड़ियाँ कोयला लेकर दूसरे राज्यों में जाती होंगी। देश भर के दर्जनों ताप विद्युत गृह इस कोयले से संचालित होते होंगे। उन विद्युत गृहों से पैदा होने वाली बिजली से दर्जनों शहर रात भर जगमगाते होंगे.... और इधर हम झारखण्ड वासी बिजली के लिए तरसते रह जाते हैं। बँगला कवि सुकान्तो भटाचार्य की एक कविता की पंक्तियाँ हैं-
       "मैं मानो वही रोशनी वाला हूँ,
       जो सन्ध्या में राजपथों पर बत्तियाँ जलाया करता है
       हालाँकि अपने ही घर में नहीं है जिसकी-
       बत्ती जलाने की सामर्थ्य,
       अपने ही घर में जमा रहता है दुःसह अन्धकार।"


https://www.youtube.com/watch?v=i-_5uPBs2Es&feature=youtu.be
     
ये पंक्तियाँ हम पर सटीक बैठती हैं। पंजाब- जहाँ जमीन के नीचे एक किलो भी कोयला नहीं है- में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत लगभग 1,500 किलोवाट प्रतिघण्टा (KWH) है; वहीं कोयले के भण्डार वाले हमारे झारखण्ड में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 550 के लगभग है। (कहने की जरुरत नहीं, इस मुद्दे पर भी दो-एक आलेख मेरे इस ब्लॉग पर हैं।)
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      एक और बात। अभी हमने देखा कि साहेबगंज स्टेशन की दीवारों पर बड़ी-बड़ी चित्रकारी की हुई है। बता दें कि यह बँगाल की संस्कृति है। वहाँ के स्टेशनों पर कलाकारों को भरपूर मौका दिया जाता है- अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का। बेशक, साहेबगंज वाला चित्रकार भी बँगाली ही है- एक कोने में नाम लिखा दिखा, मगर बधाई तो साहेबगंज स्टेशन के प्रबन्धक महोदय को देना पड़ेगा। हाँ, थोड़ी-सी चित्रकारी पड़ोसी स्टेशन सकरीगली में भी है। हम इन चित्रकारियों की तस्वीरें लेना भूल गये।
       अब कलाकारी की बात चली है, तो एक तस्वीर तो यहाँ साझा कर ही दें। तस्वीर साहेबगंज जिला मुख्यालय की है। एक कलाकार ने दीवार भगवान शंकर और गंगा माता की बहुत ही सुन्दर और आकर्षक प्रतिमायें उकेरी हैं। बेशक, एक बधाई तो उपायुक्त महोदय को भी बनती है। 

       जहाँ तक कलाकारों को बधाई देने की बात है- उन्हें हम हृदय के अन्तःस्थल से बधाई देते हैं।
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अन्त में, विडियो में आप देखेंगे कि मौसम बरसात-जैसा है। यह चक्रवातीय तूफान "फानी" का असर है। इस तूफान ने उड़ीसा में कहर ढा दिया है। कल हमारे यहाँ भी वर्षा हुई। शाम से तो ऐसी वर्षा (मूसलाधार नहीं, फुहार- जिसे "झिंसी" या बोलचाल में "फिसिर-फिसिर" कहते हैं इधर) शुरु हुई कि रात भर बरसने के बाद सुबह 9-10 बजे तक पाने बरसते ही रहा। बाद में मौसम सुहाना हो गया। दिन ढलते समय थोड़ी धूप उगी। अभी- शाम पौने छह बजे जब हम घर में यह टाईप कर रहे हैं, बाहर कोयलों की तेज कलरव सुनायी पड़ रही है। लगता है, सुहाने मौसम से वे कुछ ज्यादा ही मस्ती में आ गये हैं...
       इति।
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रविवार, 21 अप्रैल 2019

212. बरहरवा गोलीकाण्ड तथा मनोज


       हमारे बरहरवा में एक गोलीकाण्ड हुआ था- पुरानी बात है- सम्भवतः 1982 की। हमलोग आठवीं-नवीं कक्षा में थे। रेलवे स्टेशन के परिसर से पुलिसवालों ने प्रदर्शन कर रही जनता पर गोलियाँ चलायी थी। एक युवक मारा गया था। एक गोली सौ-डेढ़ सौ मीटर दूर अपने घर से बाहर खड़े हमारे दोस्त मनोज के पैर में लगी थी। गोली आर-पार निकल गयी थी। भागलपुर में शुरुआती ईलाज के दौरान डॉक्टरों का कहना था कि पैर काटना पड़ेगा। मनोज ने विरोध किया- गोली लगने के बाद मैं दौड़ कर घर के अन्दर गया था। अगर हड्डी को नुकसान पहुँचा होता, तो मैं दौड़ता कैसे? दरअसल, यह वह जमाना था, जब एक्स-रे की रिपोर्ट तीन दिनों बाद आती थी! तो तीसरे दिन पता चला कि पैर सही-सलामत रहेगा।
       आप कहेंगे, अचानक इतने वर्षों बाद इस गोलीकाण्ड की याद क्यों? तो बात यह है कि मनोज- हमारे बैच का एक 'पैन्थर'- कल (19 अप्रैल को) एक दिन के लिए बरहरवा आया था। आधी रात में ही उसे वापसी की ट्रेन पकड़नी थी। अभी वह फरीदाबाद में बस गया है। सी.ए. है- चार्टर्ड अकाउण्टैण्ट। तो हम कुछ दोस्त रात करीब तीन घण्टों तक साथ बैठे थे। दुनिया भर की बातें हुईं। उन्हीं बातों में गोलीकाण्ड वाली बात भी उठी। पता चला, तीस-चालीस लोगों को आरोपित बनाया गया था। मनोज, जो कि एक नाबालिग था और गोलीकाण्ड का भुक्तभोगी था- उसे भी आरोपित बना दिया गया था। गोलीकाण्ड के बारे में संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि रेलवे-स्टेशन पर मजिस्ट्रेट-चेकिंग के दौरान स्थानीय लोगों तथा पुलिसवालों के बीच झड़प हो गयी थी। कुछ लोगों को रेलवे की हाजत में डाल दिया गया था। बाद में हो-हंगामे के बाद क्या हुआ, क्या नहीं- यह हम नहीं जानते, पर सुनने में आया कि हाजत तोड़ कर लोग भाग गये। हालाँकि यह आरोप सही नहीं जान पड़ता- अँग्रेजों के जमाने की बनी बीस-तीस ईंच मोटी दीवार को तोड़ डालने की बात हजम नहीं होती। वैसे, जानकारों से पूछने पर सही बात का पता चल जायेगा- पर फिलहाल हम भी किसी के जख्म को कुरेदना नहीं चाहते। लेकिन कुछ लोग पुलिस हिरासत से भागे जरुर होंगे- तभी बवाल हुआ और थाने से मदद मँगवायी गयी। उस समय दिनेश सिंह नाम के एक दारोगा थे- दबंग किस्म के। उन्हीं के कारण गोलियाँ चलीं।
       खैर, वर्षों तक मुकदमा चला- पुलिस-प्रशासन-रेलवे की ओर से कभी कोई हाजिर नहीं हुआ। आई.जी. की रिपोर्ट में भी साबित हुआ कि गोली चलाने लायक स्थिति नहीं थी। मगर दुर्भाग्य से, मुकदमा खारिज नहीं हुआ- ठण्डे बस्ते में चला गया।
       वर्ष 2000 में झारखण्ड बिहार से अलग हुआ। मुकदमों का भी बँटवारा हुआ। कहा गया कि पुराने मामलों को निपटाया जाय। निपटाने के लिए केस को खोलना जरूरी था और फिर एकबार शुरु हुआ तारीख पर तारीख वाला खेल। मनोज हर तारीख पर दिल्ली से आता- हजारों रुपये खर्च करके- मिलती अगली तारीख। उसके बच्चे बड़े हो रहे थे- उनका सवाल था- आपने कुछ तो ऐसा किया होगा, जिस कारण पुलिस ने आपके पैर में गोली मारी! सोचिये, क्या हालत थी उसकी।
       अभी मात्र दो साल पहले वह मुकदमा खारिज हुआ। तब जाकर उसने चैन की साँस ली।
      
       खैर, कल की बैठकी जबर्दस्त रही- इससे ज्यादा कुछ कहा नहीं जा सकता। 


211. केंचुल



       बीते शुक्रवार को एक केंचुल मिला था, जिसकी लम्बाई 8 फीट के करीब थी- चार ईंच कम। यानि इतने लम्बे-लम्बे साँप आज भी हमारे इलाके में हैं। हम सोचते थे कि अब बड़े-बड़े साँप हमारे इलाके से- खासकर, रिहायशी इलाके से खत्म हो गये हैं। जंगल-पहाड़ों में होते होंगे, तो होते होंगे।
       केंचुल सही-सलामत था। यह मिला हमें रतनपुर में, जहाँ पुराने निर्माण को तुड़वा कर नये निर्माण का काम चल रहा है।
       कहते हैं कि मोर का साबुत पंख या साँप का साबुत केंचुल मिलना सौभाग्य का सूचक होता है। सौभाग्य वाली बात छोड़ भी दी जाय, तो आठ फीट लम्बे एक साबुत केंचुल को दुर्लभ तो कहा ही जा सकता है। हमने इसे वहीं स्टोर में रखवा दिया। यहीं थोड़ी गलती हो गयी- या तो उसे घर ले आना चाहिए था, या फिर, उसे किसी दराज में रखवाना था। अगली सुबह वह केंचुल अपनी जगह से गायब था। अब अगर चूहा ले गया हो, तो उसे कुतर कर बर्बाद कर दिया गया होगा।
       अफसोस तो हुआ कि एक दुर्लभ चीज हाथ आकर भी खो गयी- लापरवाही के चलते। गनीमत है कि एक तस्वीर ले ली थी हमने।