बुधवार, 30 नवंबर 2016

168. क्रियेटिविटी- 1


पिछले दिनों जब अभिमन्यु घर आया हुआ था, तो हमने उसे यूँ ही दो पोस्टर डिजाईन करने को कहा था। उसने फटाक् से बना दिये। मेरे पास फोटो-पेपर थे ही, हमने उनका प्रिण्ट निकाल लिया। सोचा, लैमिनेट करवा कर एक खिड़की के दोनों तरफ इन्हें टाँग दिया जायेगा। मगर आलसवश, ये प्रिण्ट कई दिन यूँ ही पड़े रह गये। फिर लैमिनेशन के लिए दिया, तो अब लाना भूल जाते हैं। जल्दी ही याद करके इन्हें लायेंगे और दीवार पर सजायेंगे।

इस बीच आगर आपको भी ये डिजाईन पसन्द आ जाय, तो आप भी डाउनलोड कर सकते हैं।



रविवार, 27 नवंबर 2016

167. फिदेल कास्त्रो


       चौथी-पाँचवी कक्षा में हमें तीन ऐसी शख्सीयतों के बारे में पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, जिनके लिए ‘थे’ के स्थान पर ‘हैं’ शब्द का प्रयोग किया गया था। हम सहपाठियों के बीच यह कौतूहल और चर्चा का विषय बन गया था- अच्छा, तो ये अभी जीवित हैं? क्या हमलोग आज भी इनसे मिल सकते हैं, या इन्हें पत्र लिख सकते हैं?
       खैर, मिलना या पत्र लिखना तो नहीं हुआ, मगर इतना है कि हमने यह जाना कि कुछ लोग अपने जीते-जी ही किंवदन्ती बन जाते हैं, एक ऐसे मुकाम पर पहुँच जाते हैं कि पाठ्य-पुस्तकों में उन्हें शामिल कर लिया जाता है। 
       वे तीन शख्सीयत थे- 1. आचार्य बिनोवा भावे, 2. ‘सीमान्त गाँधी’ खान अब्दुल गफ्फार खाँ और 3. फिदेल कास्त्रो।
       बिनोवा भावे मेरे किशोर मन को ज्यादा प्रभावित नहीं कर सके, कारण शायद यह था कि उनके जीवन में संघर्ष और रोमांच नहीं था। हालाँकि डाकूओं के आत्मसमर्पण वाली घटना में थोड़ा-सा रोमांच था, मगर संघर्ष तो उनके जीवन में कहीं नजर नहीं आया हमें।
सीमान्त गाँधी ने प्रभावित किया। हमारे मुहल्ले के बुजुर्ग- अरूण के दादाजी- ने बताया कि वे बरहरवा भी आये थे। रेलवे के तालाब के किनारे एक नाँद को उल्टा कर दिया गया था और उसी पर खड़े होकर उन्होंने एक छोटे-से जन-समूह को सम्बोधित किया था।
       ...और फिदेल कास्त्रो? वे तो मेरे किशोर मन के लिए नायक-सरीखे बन गये थे!
      
वही फिदेल कास्त्रो कल दुनिया छोड़ गये। बिनोवा भावे और गफ्फार खान तो बहुत पहले ही दुनिया छोड़ चुके हैं- पिछली सदी में ही। मगर बीसवीं सदी के एक नायक कल अलविदा हुए। कल सोशल मीडिया पर किसी की टिप्पणी नजर आयी-

“बीसवीं सदी का आधिकारिक रुप से अन्त हुआ।“
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रविवार, 23 अक्टूबर 2016

166. "राजमहल की पहाड़ियाँ": सौन्दर्य


हमारा सन्थाल-परगना "दामिन-ए-कोह" है: अर्थात् "पर्वतों का आँचल"। इस पर्वत-शृँखला का नाम है- "राजमहल की पहाड़ियाँ"। ये पहाड़ियाँ प्रागैतिहासिक काल की हैं- यहाँ डायनासोरों के जीवाश्म पाये जाते हैं! राजमहल इस इलाके का एक ऐतिहासिक शहर है, जो मुगलकाल में दो बार बँगाल प्रान्त (अँग-बँग-उत्कल) की राजधानी रह चुका है।
सन्थाल-परगना के विभिन्न शहरों/कस्बों में यातायात के दौरान हमने इस पहाड़ियों की जो तस्वीरें खींची है, उन्हें ही यहाँ (धारावाहिक रुप) प्रस्तुत करने का इरादा है। आशा है, इन पहाड़ियों का सौन्दर्य आपको पसन्द आयेगा। मगर इन तस्वीरों को देखने के लिए आपको मेरे एक अन्य ब्लॉग "मेरी छायाकारी" पर आने का कष्ट उठाना होगा- http://jaydeepphotography.blogspot.in/ ।
वैसे, इन पाहाड़ियों की एक दुखती रग भी है, जिसे हमने fb page "Save the Hills of Rajmahal" पर प्रस्तुत किया है-।

अन्त में, मेरे बेटे अभिमन्यु ने अपने कॉलेज के लिए एक रपट तैयार की थी "Tribal Wall Art of Rajmahala Hills", इसमें उसने Wikipedia से जानकारियाँ लेकर दो परिशिष्ट जोड़ी थी- इन पहाड़ियों के इतिहास एवं भूगोल पर। आप चाहें, तो उस रिपोर्ट को डाउलोड कर सकते हैं- http://jagprabha.in/product/tribal-wall-art-of-rajmahal-hills/   



शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

165. "बात-बात में बात"


       क्या आपने कभी रामप्रिय मिश्र "लालधुआँ" का नाम सुना है?
       यह सवाल हम इसलिए पूछ रहे हैं कि हमने अपने बचपन में बाल-गीतों की एक पुस्तिका पढ़ी थी, जिसके रचयिता रामप्रिय मिश्र "लालधुआँ" जी थे। पुस्तिका का नाम था- "बात-बात में बात"। पुस्तिका आयताकार थी- लैण्डस्केप। आवरण पर बड़े-बड़े कुछ फूल अंकित थे, जिनके बीच बच्चों के चेहरे उकेरे हुए थे। कोई दर्जन भर कवितायें थीं इस संग्रह में- सभी चार-चार पंक्तियों की। हर कविता के साथ रेखाचित्र भी बने हुए थे।
       आज एक जमाने बाद जब याद करने की कोशिश करते हैं, तो पहली और आखिरी कविताओं के साथ बीच की सिर्फ दो ही कवितायें याद आ रही हैं।
       गूगल पर जानना चाहा, तो बिहार की एक साहित्यिक संस्था की वेबसाइट पर कुछ कवियों के साथ-साथ रामप्रिय मिश्र "लालधुआँ" का जिक्र मिला। उन्हें "महाकवि" कहकर सम्बोधित किया गया था। जाहिर है, वे प्रसिद्ध कवि रहे होंगे। पर अफसोस, कि नेट पर उनपर और कोई जानकारी हम नहीं ढूँढ़ पाये। उन कविताओं को तो शायद ही कभी खोज निकाल सकें।
       भूमिका में कवि ने लिखा था कि हर कविता किसी-न-किसी मुहावरे पर आधारित है, मगर बच्चे बिना उन मुहावरों को समझे इन कविताओं को गुनगुनायेंगे। जब वे कुछ बड़े होंगे, तब वे इन कविताओं में छुपे मुहावरों को समझेंगे।
       खैर, तो पहली कविता इस प्रकार थी-
       "चाँद खटोले चरखा लेकर
       बुढ़िया काते सूत,
       उस बुढ़िये को देख चहकता
       चिड़िये तक का पूत।"
       ***
       आखिरी कविता थी-
       "धरती गोल घूमकर देखा
       मगर न पाया भेद,
       चौड़ी दरी के नीचे
       मुन्ना पाया गेन्द।"
       ***
       जैसा कि मैंने कहा, बीच की भी दो कवितायें मुझे याद आ रही हैं-
       "खा लो भैया चना-चबेना
       पी लो गंगा नीर,
       कभी किसी दिन याद करोगे
       थी गरीबी में पीर।"
       ***
       "गुरूजी गुड़ तो चेला चीनी
       ये चीनी के पेड़,
       छोड़ पढ़ाई तब से अब तक
       चरा रहे हैं भेड़।
       ***
       एक कविता ऐसी है, जो आधी याद आ रही है-
       "एक ताल में नयी मछलियाँ
       बगुला भगत पुराने,
       ...............................  
       ....................................... ।
       ***
       और एक ऐसी भी है, जिसकी एक ही पंक्ति याद है-
       "कौआ राम करम के खोटे
       .......................,
       ...............................
       ........................................ ।"
       ***
       अन्त में, स्वाभाविक रुप से यही कहना चाहेंगे हम कि अगर किसी महानुभाव के पास "लालधुआँ" जी के बारे में कुछ जानकारी हो, तो वे कृपया उसे सबके समने लायें और अगर "बात बात में बात" की सारी कवितायें कोई सामने ला सके, तो यह सोने पे सुहागा वाली बात होगी...
       इति।

       ***** 

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

164. 'Sand Art'- बरहरवा में (दुर्गापूजा'2016)

बरहरवा के बँगालीपाड़ा (कालीतला) में जो दुर्गापूजा होती है, वहाँ की दो खासियत है- एक तो वहाँ आडम्बर, दिखावा या तामझाम नहीं के बराबर होता है; दूसरे "कला" की किसी-न-किसी विधा को वहाँ हर साल "थीम" बनाया जाता है.  
तो इस बार रेत या बालू से बनी कलाकृतियाँ वहाँ प्रदर्शित की गयी हैं. आम तौर पर सैण्ड-आर्ट का प्रदर्शन समुद्र के किनारे ही देखने को मिलता है. बरहरवा के एक पूजा-पण्डाल में इनका प्रदर्शन एक नयी बात है. 
देखिये- 









शनिवार, 21 मई 2016

163. "हीरक जयन्ती"

       कल 20 मई को माँ-पिताजी के विवाह की "हीरक-जयन्ती" (Diamond Jubilee) थी, यानि विवाह के साठ साल पूरे हुए। इस अवसर पर सुबह एक हवन और सन्ध्या में स्वल्पाहार का छोटा-सा कार्यक्रम घर में आयोजित हुआ।
       10 साल पहले "स्वर्णिम जयन्ती" (Golden Jubilee) भी मनायी गयी थी। उसके कुछ छायाचित्र यहाँ मौजूद हैं।
       इस बार के आयोजन का पैमान थोड़ा-सा (स्वर्णिम के मुकाबले) बड़ा था और इसलिए इसके लिए बाकायदे आमंत्रण पत्र भी छपवाया गया था। उस पत्र का भी चित्र यहाँ डाल रहा हूँ, क्योंकि इसकी डिजायनिंग अभिमन्यु ने की है- शब्द मेरे ही थे।


















बुधवार, 18 मई 2016

162. ...और 'जुलियट' नहीं लौटी


      मेरे इस ब्लॉग में क्रमांक 141 में एक आलेख है-"रोमियो"। इसमें बिल्ली के उस बच्चे का जिक्र है, जो मई'15 में हमारे घर में आकर रहने लगा था और अभिमन्यु से कुछ ज्यादा ही हिल-मिल गया था। यह हिलना-मिलना कुछ ज्यादा ही हो गया था। इतना कि अगस्त में जब अभिमन्यु कोलकाता चला गया, तब वह शायद अवसाद से ग्रस्त हो गया और कुछ ही दिनों के अन्दर ही चल बसा था। तब अंशु बहुत रोई थी।
अभिमन्यु अक्सर फोन पर रोमियो का हाल-चाल पूछता था और अंशु उसे झूठा हाल-चाल बताती थी। कुछ दिनों बाद जब अभिमन्यु घर आया, तो मैं उसे लेने स्टेशन पर गया था। ट्रेन से उतरकर उसने सबसे पहले यही कहा था कि बाजार होकर घर चलते हैं- रोमियो के लिए चिकन लेते हुए। हमने कहा था- पहले घर चलो। घर आने के बाद उसे बताया गया कि रोमियो नहीं रहा।
दिसम्बर में अभिमन्यु फिर घर आया था। इस बार वह बिल्ली के बच्चों का जोड़ा लेकर आया। बहुत ही नन्हे बच्चे थे। अंशु ने एक-डेढ़ महीने तक उन्हें ड्रॉपर से दूध पिलाया। चूँकि ये दो थे, इसलिए अभिमन्यु से हिलने-मिलने के बजाय आपस में खेलने में ज्यादा मस्त रहते थे।
अब तो ये करीब छह महीने के हो गये थे। हमें लगा, बड़े हो रहे हैं, तो इन्हें इनकी स्वाभाविक स्वछन्दता मिलनी चाहिए और अब ये रात में बाहर जाने-आने लगे थे। आम तौर पर 'रोमियो' ही बाहर जाता था। 'जुलियट' घर में रहना ही पसन्द करती थी। हाँ, इस बार भी बिल्ले का नाम 'रोमियो' ही रहा। बिल्ली को 'जुलियट' नाम दिया गया। हालाँकि अंशु उन्हें चुन्नू-मुन्नी कहती थी।
कभी-कभार जुलियट भी रात में बाहर जाती थी, मगर वह प्रायः भोर में बिस्तर के आस-पास चक्कर लगाने लगती थी। फिर अंशु उसे मच्छरदानी के अन्दर लाकर अपने बगल में सुलाती थी।
वही जुलियट आज सुबह नहीं लौटी।
जब रोमियो को मछली दी गयी, तो उसने खाने से इन्कार कर दिया। जबकि मछली के भक्त थे ये दोनों। कई कोशिशों के बाद भी जब उसने कुछ भी नहीं खाया, तब मेरे कान खड़े हुए कि जरुर जुलियट के साथ कुछ बुरा हुआ है और या तो रोमियो ने यह घटना देखी है, या फिर उसे आभास हो गया है!
जुलियट के इन्तजार आज का सारा दिन बीत गया, मगर वह नहीं लौटी। पता नहीं, क्या हुआ होगा उसके साथ। रोमियो ने दिन भर कुछ नहीं खाया। अभी रात में उसने थोड़ा दूध पीया, मगर बगल में पड़ी मछली को उसने देखा तक नहीं। अंशु को रह-रह कर रोना आ रहा है। अभिमन्यु को इस पोस्ट के माध्यम से पता चल ही जायेगा। वैसे, अब वह इनका ज्यादा हाल-चाल नहीं पूछता था, मगर अफसोस तो उसे होगा ही। कल ही वह घर आ रहा है... और आज यह घटना घट गयी...
काश कि कल भोर में जुलियट की म्याऊँ से हमारी आँखें खुले...
*** 
पुनश्च (19.5.2016):
       कल रात एक प्यारी-सी बच्ची "हनी" ने बड़े भोलेपन से जुलियट के बारे में कहा था- "कल आ जायेगी।" पता नहीं क्यों, मुझे भी उसकी बात पर भरोसा हो गया था। और सचमुच आज सुबह पाँच बजे जब अंशु सीढ़ी घर में गयी, तो वहाँ जुलियट मौजूद थी! वह कहाँ से आयी, कब आयी, कैसे आयी, पता नहीं, मगर उसे गोद में लेकर अंशु ने मुझे यह खबर दी। तब मैं बिस्तर पर ही था।
       ऊपर वाले की मेहरबानी, शुभचिन्तकों की दुआ और "हनी" की बात से आखिरकार वही हुआ-

       ...जुलियट के लौटने की खबर के साथ मेरी आँखें खुली।