रविवार, 21 जुलाई 2013

59. दो दीयों के तले का अन्धेरा




            "दीया तले अन्धेरा"- यह कहावत तो सबने सुनी है। मैं आज उदाहरण देने जा रहा हूँ एक ऐसे क्षेत्र का, जिसके दो तरफ दो बड़े-बड़े दीये जलते हैं, फलस्वरुप उस क्षेत्र का अन्धेरा और भी गहरा, और भी विस्तृत हो जाता है।
       वह क्षेत्र है- देश के सबसे बदनसीन राज्य झारखण्ड का सबसे बदनसीब जिला- साहेबगंज! जब बिहार था, तब साहेबगंज वालों को झारखण्डी माना जाता था और अब झारखण्ड के जमाने इस जिले वालों को बिहारी माना जाता है। बेशक, इसके पड़ोसी जिलों- पाकुड़ और गोड्डा भी बराबर के बदनसीब हैं।
       चित्र देखिये- इस जिले के दो तरफ दो NTPC हैं- एक फरक्का में, जो पश्चिम बंगाल राज्य में आता है, तो दूसरा कहलगाँव में, जो कि बिहार राज्य में आता है। इन स्थानों में बिजली नहीं जाती- रातभर ये स्थान जगमगाते रहते हैं। किसके दम पर? अरे, साहेबगंज, पाकुड़ और गोड्डा जिलों में पड़ने वाले कोयला खदानों से कोयले की निर्बाध आपूर्ति जो होती है इन थर्मल पावर स्टेशनों को!
बदले में इन तीनों जिलों को क्या मिलता है- धुप्प अन्धेरा! दिनभर में जो दो-एक घण्टे बिजली आ भी जाती है, वह इन पावर स्टेशनों से नहीं, बल्कि झारखण्ड के पतरातू-जैसे स्टेशनों से आती है, जिनकी उम्र इतनी हो गयी है कि ये बिजली पैदा कर रहे हैं- यही आश्चर्य है और जो इस इलाके से बहुत दूर हैं!
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पहले सरकार कहती थी- सन्थाल परगना में रेल लाईन नहीं बिछायी जा सकती- पहाड़ी जमीन है। इधर फरक्का का ताप बिजलीघर चालू हुआ, उधर ललमटिया में कोयले खदान बना और रातों-रात विशेष रेललाईन बिछ गयी- उसी झारखण्ड की पहाड़ी जमीन पर- फरक्का को कोयले की निर्बाध आपूर्ती देने के लिए। उस पटरी पर कोई और ट्रेन नहीं चलती। अब शायद सरकार को शर्म आयी है, तो सुना जा रहा है कि दुमका को रेललाईन से जोड़ा जा रहा है। ...आजादी के करीबन सत्तर साल के बाद!
इसी प्रकार, पहले सरकार कहती थी- बरहरवा से जमालपुर तक रेललाईन का दोहरीकरण नहीं हो सकता- जमालपुर की गुफा बाधा है। जब कहलगाँव ताप बिजलीघर को निर्बाध कोयले की आपूर्ति की जरुरत पड़ी, तो देखिये- लाईन के दोहरीकरण का काम दनादन चालू हो गया! इस रेल लाईन के बनने के 120 साल बाद!
पंजाब की एक निजी कम्पनी इस इलाके से कोयला खोदकर पंजाब ले जाती है- इसी रूट से। क्या पता, उसी के दवाब से 'दोहरीकरण' को हरी झण्डी मिली हो! रोज पता नहीं उसके 10 रेक निकलती है या 20, मगर एक-एक रेक करीब एक किलोमीटर लम्बी होती है- लगभग 100 डब्बे मालगाड़ी के! इस झारखण्ड के कोयले से पंजाब के लोगों को करीब चौबीसों घण्टे बिजली मिलती है... और झारखण्ड की दुर्दशा देखिये- अलग राज्य बने 13 साल हो गये, आज तक एक भी ताप बिजलीघर यहाँ नहीं लगा! जबकि इस बीच बिहार में 3 या 4 बिजलीघर बनकर चालू भी हो गये।
झारखण्डी राजनेताओं को म्यूजिकल चेयर खेलने से फुर्सत मिले तब न। 13 वर्षों में 13 निजाम बदल चुके हैं यहाँ। 9-10 मुख्यमंत्री बदल चुके हैं और 2-3 बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है। खरीद-फरोख्त के लिए यहाँ के नेता देशभर में बदनाम हो चुके हैं। अब तो लगता है कि "झारखण्डी राजनीति" एक मुहावरा ही बन जायेगा, जिसका प्रयोग घटिया स्तर की राजनीति के लिए किया जायेगा।
देश के 40 प्रतिशत खनिज-सम्पदा से समृद्ध इस बदनसीब क्षेत्र को पहले दिल्ली लूटती थी, पहले पटना लूटता था और अब इसी की मिट्टी के देशी लोग- मंत्री से सन्तरी तक और अफसर से ठीकेदार तक इसे लूट रहे हैं... ऐसी खुली लूट शायद ही दुनिया के किसी हिस्से में देखने को मिले!
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अन्त में- बचपन में हम बिजली की रोशनी में ही पढ़ते थे- कभी-कभार बिजली जाती थी। कहते हैं कि सिनेमा हॉल तक बिना जेनरेटर के चल जाते थे- 5-7 या 10-15 मिनट के लिए बिजली गुल होती थी। आज इतने समय के लिए बिजली आती है!
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किलोमीटर भर लम्बी सैकड़ों मालगाड़ियाँ प्रतिदिन झारखण्ड से कोयला लेकर निकलती हैं,
जिसके दम पर सारा देश जगमगाता है...
मगर झारखण्ड खुद अन्धेरे में डूबा रहता है! 


मंगलवार, 16 जुलाई 2013

58. "हरियाली और घर"



       बीते रविवार को जयचाँद घर आया था। उसने शायद घर के आस-पास फैली हरियाली पर "कलाकार वाली" एक नजर डाली होगी। रात जब मैं उससे मिला और बातों-ही-बातों में जिक्र किया कि अगले रविवार से अभिमन्यु आपके ड्रॉइंग क्लास में जायेगा, तब उसने हँसकर कहा- आपके घर के आस-पास जैसी हरियाली फैली है कि वहाँ रहकर कोई भी अपने-आप चित्रकार बन जायेगा... ।
       आगे उसने कहा- अगर उस हरियाली की चित्रकारी की जाय, तो मेरे-जैसे चित्रकार को भी पन्द्रह दिन लग जायेंगे- पूरा करने में!
      
       यह सुनकर मुझे लगा कि मुझे इस "हरियाली" को साझा करना चाहिए। मैंने अपना यह बसेरा अपने पैतृक घर के पिछवाड़े में ही बनवाया है।
       देखा जाय घर के आस-पास फैली हरियाली को-





















रविवार, 14 जुलाई 2013

57. चिरायता



       चित्र में सूखी हुई जो झाड़ियाँ आपको दीख रही हैं, वे "चिरायता" (चिरैता) की हैं। राजमहल की पहाड़ियों में बहुतायात में उगती हैं- खासकर, बरसात में। वैसे, आयुर्वेदिक दवाईयों (जैसे कि 'साफी' आदि) में जिस चिरायता का इस्तेमाल होता है, वे आसाम की होती हैं- वे बहुत लम्बी होती हैं- चार-पाँच फीट लम्बी। यह जानकारी राजन जी से मिली।
       बचपन में हम खुद ही बिन्दुवासिनी पहाड़ से मुट्ठीभर चिरायता उखाड़ लाते थे। फिर लम्बे अरसे के लिए मैं इसे भूल गया। कुछ रोज पहले एक छोटे रेलवे स्टेशन परिसर में एक बुजुर्ग सन्थाल महिला को सूखी हुई चिरायता लेकर बैठे हुए देखा। दो रुपये में एक 'मुट्ठा' चिरायता वह बेच रही थी- छोटी झाड़ियाँ थीं। मैंने एक मुट्ठा लिया।
       रात इसकी थोड़ी-सी पत्तियों को आधे गिलास पानी में डाल दिया। सुबह पानी काला हो चुका था। पत्तियों को फेंककर उस काले पानी का एक घूँट भरा- मारे कड़वाहट के आँखें बन्द हो गयीं- बचपन में पी गयी चिरायता की याद आ गयी।
       अगले रोज उस स्टेशन परिसर में मुझे चिरायता नहीं दीखा- जबकि मैं लेकर घर में रखना चाहता था। परिचित एक सन्थाल किशोर से मैंने पूछा- चिरायता कहाँ मिलेगा? वह बोला- मेरी मौसी के घर में इसका ढेर रखा हुआ है, वह हाट में बेचती है। वह मेरे लिए अपनी मौसी के यहाँ से ढेर सारा चिरायता खरीद लाया।
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       जैसा कि बताया जाता है- चिरायता खून को साफ करता है।
इसके सेवन के साथ एक चेतावनी भी दी जाती है कि लगातार बहुत दिनों तक इसे नहीं पीना चाहिए- वर्ना दूसरी दवाईयाँ शरीर पर असर नहीं करेंगी। या तो बीच-बीच में इसका सेवन छोड़ देना चाहिए, या फिर हफ्ते में दो-एक बार ही पीना चाहिए। किसी भी स्थिति में दो-तीन घूँट से ज्यादा चिरायता पी पाना मुझे तो सम्भव नहीं लगता।  
       मुझे ऐसा लगता है कि चूँकि इसका नाम "चिरायता" है, जिसमें "चिर" शब्द जुड़ा है, अतः इसका नियमित सेवन जरूर मनुष्य को "चिरायु" बनाता होगा।
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       पुनश्च:
इसे लिखने के बाद मैंने 'गूगल' के माध्यम से खोज किया, तो और भी कई बातों की जानकारी मिली। आप भी देख सकते हैं।
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चिरायता (Swertia chirata) ऊँचाई पर पाया जाने वाला पौधा है । इसके क्षुप 2 से 4 फुट ऊँचे एक-वर्षायु या द्विवर्षायु होते हैं । इसकी पत्तियाँ और छाल बहुत कडवी होती और वैद्यक में ज्वर-नाशक तथा रक्तशोधक मानी जाती है। इसकी छोटी-बड़ी अनेक जातियाँ होती हैं; जैसे-कलपनाथ, गीमा, शिलारस, आदि। इसे जंगलों में पाए जानेवाले तिक्त द्रव्य के रूप में होने के कारण किराततिक्त भी कहते हैं । किरात व चिरेट्टा इसके अन्य नाम हैं। चरक के अनुसार इसे तिक्त स्कंध तृष्णा निग्रहण समूह में तथा सुश्रुत के अनुसार अरग्वध समूह में गिना जाता है।
यह हिमालय प्रदेश में कश्मीर से लेकर अरुणांचल तक 4 से 10 हजार फीट की ऊँचाई पर होता है । नेपाल इसका मूल उत्पादक देश है । कहीं-कहीं मध्य भारत के पहाड़ी इलाकों व दक्षिण भारत के पहाड़ों पर उगाने के प्रयास किए गए हैं ।
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आयुर्वेद के अनुसार : आयुर्वेद के मतानुसार चिरायता का रस तीखा, गुण में लघु, प्रकृति में गर्म तथा कड़ुवा होता है। यह बुखार, जलन और कृमिनाशक होता है। चिरायता त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को नष्ट करने वाला, प्लीहा यकृत वृद्धि (तिल्ली और जिगर की वृद्धि) को रोकने वाला, आमपाचक, उत्तेजक, अजीर्ण, अम्लपित्त, कब्ज, अतिसार, प्यास, पीलिया, अग्निमान्द्य, संग्रहणी, दिल की कमजोरी, रक्तपित्त, रक्तविकार, त्वचा के रोग, मधुमेह, गठिया, जीवनीशक्तिवर्द्धक, जीवाणुनाशक गुणों से युक्त होने के कारण इन बीमारियों में सफलतापूर्वक उपयोग किया जाता है।
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100 ग्राम सूखी तुलसी के पत्ते का चूर्ण, 100 ग्राम नीम की सूखी पत्तियों का चूर्ण, 100 ग्राम सूखे चिरायते का चूर्ण लीजिए। इन तीनों को समान मात्रा में मिलाकर एक बड़े डिब्बे में भर कर रख लीजिए। यह तैयार चूर्ण मलेरिया या अन्य बुखार होने की स्थिति में दिन में तीन बार दूध से सेवन करें। मात्र दो दिन में आश्चर्यजनक लाभ होगा। बुखार ना होने की स्थिति में इसका एक चम्मच सेवन प्रतिदिन करें।

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बाजार से आप थोडा-सा चिरायता ले आइये और उसे आवश्यकतानुसार एक गिलास पानी में मिला लीजिए व उबलने रख दीजिए। उसे तब तक उबालें जब तक कि पानी का कलर चाय की तरह भूरा ना हो जाए। अब उस साफ शीशी में भरकर रख लीजिए व कुछ दिन सुबह खाली पेट एक-एक चम्मच इस्तेमाल कीजिए। कुछ ही दिन में आपके मंहुसे निकालने बंद हो जायेंगे और कई छोटे-मोटे बीमारियां चिरायता लेने के कारण दूर हो जाएंगे। क्योंकि चिरायता रक्त साफ करता है और शुद्ध रक्त स्वास्थ्य की पहली जरूरत है।
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चिरायते का काढ़ा एक सेर औंस की मात्रा में मलेरिया ज्वर में तुरंत लाभ पहुँचाता है । लीवर प्लीहा पर इसका प्रभाव सीधा पड़ता है व ज्वर मिटाकर यह दौर्बल्य को भी दूर करता है । कृमि रोग कुष्ठ, वैसीलिमिया, वायरीमिया सभी में इसकी क्रिया तुरंत होती है । यह त्रिदोष निवारक है अतः बिना किसी न नुनच के प्रयुक्त हो सकता है ।
अन्य उपयोग-संस्थानिक बाह्य उपयोग के रूप में यह व्रणों को धोने, अग्निमंदता, अजीर्ण, यकृत विकारों में आंतरिक प्रयोगों के रूप में, रक्त विकार उदर तथा रक्त कृमियों के निवारणार्थ, शोथ एवं ज्वर के बाद की दुर्बलता हेतु भी प्रयुक्त होता है । इसे एक उत्तम सात्मीकरण स्थापित करने वाला टॉनिक भी माना गया है ।
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56. धान-रोपनी: कहीं कुछ खो-सा गया है



       धान-रोपनी का काम पूरे जोरों पर है
       हमारे आस-पास के खेतों पर कालोनियाँ बस चुकी हैं।
       अल-सुबह हल के घिसटने की आवाज अब नहीं सुनायी पड़ती- पहले जब किसान खेतों की ओर जाते थे, तब जोड़ा बैलों की गर्दनों पर टँगा हल आवाज करते हुए घिसटता जाता था।
       इधर-उधर जाने पर दूर से ही धान-रोपनी देखने का मौका मिला।
       मगर लगता है- कहीं कुछ खो गया है...
       बाँस के छिलकों से बनी वह बड़ी-सी शानदार टोपी कहीं नहीं दीखी, जिसे किसान हल चलाते वक्त सर पर पहनते थे और जो उन्हें धूप-वर्षा से बचाती थी।
       बड़े-बड़े पत्तों को कायदे से गूँथकर बनाया गया वह प्राकृतिक "रेनकोट" तो खैर, बहुत पहले से विलुप्त हो गया है- इसका स्थान प्लास्टिक के रंग-बिरंगे रेनकोट ने ले लिया था। मगर कहाँ- वह रंग-बिरंगा रेनकोट भी तो गायब है। पहले धानरोपनी के इस समय पर प्रायः हर दर्जी इन रेनकोटों को सिलने में व्यस्त हो जाता था। अब शायद वर्षा ही ढंग से नहीं होती है।
       धान-रोपनी के लोकगीतों की स्वरलहरियाँ भी कहीं से नहीं उभरीं। ठीक से याद नहीं, पर शायद सन्थाल महिलायें ही धान रोपते वक्त गीत गुनगुनाती थीं।
अब शायद यह स्वरलहरी कभी किसी खेत से नहीं उठेगी...
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रविवार, 7 जुलाई 2013

55. पहाड़ और पत्थर




  
      बचपन में रेलगाड़ी में बैठकर साहेबगंज जाते वक्त हमलोग अक्सर बाईं तरफ पहाड़ियों को निहारा करते थे। छोटे-छोटे धान के खेत, खजूर के पेड़ों की बेतरतीब कतारें, छोटे-बड़े मैदान, ताल-तलैये, छोटे-छोटे स्टेशन, सब अच्छे लगते थे। साहेबगंज से ठीक पहले सकरीगली में पहाड़ की एक चोटी गर्व से सिर उठाये रेलयात्रियों का स्वागत किया करती थी।
ट्रेन से पहाड़ियों को निहारने की आदत मेरी अब भी बनी हुई है- खासकर, बरसात में।
मगर अब एक अन्तर आ गया है- एक टीस-सी उठती है मन में। ऐसा लगता है किसी ने विशाल उस्तरे से पहाड़ियों के सीने को छलनी-छलनी कर दिया है! हर जगह पत्थरों के खदान, हर जगह क्रशर, हर जगह पत्थर (बोल्डर, गिट्टी, डस्ट, इत्यादि के रुप में) से लदे ट्रकों की कतारें... चौबीसों घण्टे, सातों दिन, बारहों महीने...!
और सकरीगली की वह चोटी? उसका तो सर ही कट गया है! पत्थर खोदने वालों ने उस चोटी का ज्यादातर हिस्सा खा लिया है। अब वह चोटी रेलयात्रियों का स्वागत नहीं करती, बल्कि रोते-सिसकते हुए अपना दर्द बयां करती है कि देखो, मेरी क्या दुर्गति हो गयी है! वह सावधान भी करती है- चेत जाओ, वर्ना मिर्जाचौकी (जहाँ से झारखण्ड राज्य की सीमा तथा राजमहल की पहाड़ियों की शृंखला शुरु होती है) से लेकर पाकुड़ तक हर पहाड़ की यही दुर्गति होगी!
सकरीगली का यह 'गदवा पहाड़' अब 'मुड़कटवा' (सिरकटा) पहाड़ कहलाने लगा है- यह "लैण्डमार्क" बन गया है- इस इलाके में अन्धाधुन्ध पत्थर खनन का।
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मिर्जाचौकी से पाकुड़ तक का क्षेत्र करीब 100 किलोमीटर लम्बा है। मिर्जाचौकी से बाकुडीह तक, यानि करीब 70 किलोमीटर तक, रेलपथ व सड़क पहाड़ियों के साथ-साथ चलती हैं। इसलिए यहाँ ट्रेन या गाड़ी से गुजरते वक्त खनन व्यवसाय का थोड़ा-बहुत अन्दाज लग जाता है। मगर बाकुडीह के बाद पहाड़ियाँ रेलपथ व सड़क से दूर हो जाती हैं और खनन कितने बड़े पैमाने पर होता है- इसका अनुमान पहाड़ों की ओर गये बिना नहीं लगता। इन इलाकों में बड़े पैमाने पर अत्याधुनिक मशीनों से दिन-रात खनन होता है। पहाड़ों से जानवर तो कब के गायब हो चुके हैं अब खदानों के आस-पास नगर बसने लगे हैं और रातभर काम होने लगा है, इसलिए अब शायद पंछी भी न रहें इन पहाड़ों में।
पहाड़ों के अलावे जमीन के नीचे से भी पत्थर निकाले जाते हैं- तालाब-जैसी खुदाई करके- यह सिलसिला पश्चिम बंगाल के पड़ोसी जिले बीरभूम तक चलता है। कहा जा रहा है कि चूँकि इन तालाबों में काफी गहरी बोरिंग करके विस्फोट किये जाते हैं, इसलिए निकट भविष्य में इस इलाके का भूजल स्तर नीचे जाने वाला है!
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किसी के पास कोई आँकड़ा उपलब्ध नहीं होगा। बस यूँ समझ लीजिये कि करीब 1,000 खदानें और 10,000 क्रशर यहाँ होंगे! प्रतिदिन 10,000 ट्रक तो यहाँ से पत्थर लेकर निकलते ही होंगे। दिन में जितने ट्रक आपको दीखेंगे, उससे 10-20-30 गुना ज्यादा ट्रक रात में निकलते होंगे। ज्यादातर खदान गैर-कानूनी हैं। जो कानूनी हैं, वे अपने रकबे से कईगुना ज्यादा रकबे में खुदाई करते हैं। एक विस्फोट की अनुमति पर 50 विस्फोट यहाँ किये जाते होंगे! क्रशर की धूल आस-पास के लोगों के स्वास्थ्य के साथ-साथ आस-पास की जमीन को भी नुकसान पहुँचाती है। पर्यावरण के नियमों की हर कदम पर धज्जियाँ उड़ायी जाती है।
पहले 6 पहियों के ट्रक चलते थे- अब 10 से कम पहियों वाले ट्रक दीखते ही नहीं हैं। 100 किलोमीटर के इस इलाके के हर गाँव, हर कस्बे, हर शहर की सड़कों को कबाड़ बना देते हैं ये ट्रक। सड़कें बनती हैं 18 टन तक वजनी गाड़ियों के लिए और ये ट्रक 36 ट्न वजनी होते हैं! (बाद में पता चला, इन ट्रकों में 40 टन से ज्यादा लोड होता है!) कहने को ऐसा नियम है कि इन भारी वाहनों को दिन के वक्त बाजारों से नहीं गुजरना होता है- मगर सुबह से शाम तक हर बाजार की सड़कों को ये जाम करते रहते हैं। दिन के मुकाबले रात में इन ट्रकों की संख्या 20-30 गुना तो बढ़ ही जाती होगी।
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जहाँ तक मालगाड़ियों की बात है, हफ्ते में सैकड़ों 'रेक' इस इलाके से निकलती होंगी। शायद "पाकुड़ स्टोन" का नाम आपने भी सुना हो- यहाँ के पत्थर को बहुत ही उम्दा किस्म का पत्थर माना जाता है- बाँध, सड़क, मकान, इत्यादि के निर्माण के लिए सर्वथा उपयुक्त।
प्रसंगवश- अँग्रेजों ने तीसरी (या शायद दूसरी) रेल लाईन इसी साहेबगंज रेल खण्ड के रुप में बिछाई थी- 1863 में। उनका मकसद शायद इन पत्थरों का दोहन ही था। क्योंकि बहुत-सी ऐसी पुरानी पटरियाँ हैं, जो इन इलाकों में पहाड़ियों के अन्दर दूर तक जाती हैं। कुछेक पटरियों का पिछले कुछ वर्षों से फिर से उपयोग किया जाने लगा है, मगर ज्यादातर को उखाड़ डाला गया है- अब यह रेलवे ने उखड़वाया है या तस्करों ने, यह नहीं पता।
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बिहार में पत्थर खनन पर रोक लग गयी है और बंगाल में भी कुछ कड़ाई की जा रही है शायद। इसलिए खनन का पैमाना यहाँ झारखण्ड में दो-तीन गुना बढ़ गया है। झारखण्ड जब से बना है, यहाँ शासन, प्रशासन और पुलिस किस चिड़िया का नाम है- लोग भूल ही गये हैं- हर तरफ अराजकता... जिसका जहाँ मन कर रहा है, पहाड़ खोदो, पत्थर निकालो... बस जो माँगे, उसे हफ्ता पहुँचाते रहो....! लूट लो झारखण्ड को! फिर मौका मिले, न मिले।
अब प्रायः हर खदान "फुल्ली ऑटोमेटिक" हो गया है, हर जगह बड़े-बड़े जे.सी.बी. और जेनरेटर चलने लगे हैं।
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जिन रास्तों से ये पत्थर लदे ट्रक गुजरते हैं उन रास्तों में पड़ने वाली पुलिस चौकियों के थानेदार की पोस्ट कितने रुपये में "नीलाम" होती है, इसका हम और आप अनुमान भी नहीं लगा सकते! यकीनन, अनुमान नहीं लगा सकते!! कारण यह है कि ये ट्रक अपनी क्षमता से दो-ढाई गुना ज्यादा लोड लेकर चलते हैं और बहुत-सी गाड़ियों के  'कागज-पत्तर' ठीक नहीं होते हैं।
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ऐसा नहीं है कि इस समस्या का कोई इलाज नहीं है। इलाज सीधा-सादा है कि आज से 25-30 साल पहले जिस तरह से खनन होता था, उसी तरीके को फिर से अपना लिया जाय- न बड़े ट्रक चलें, न जेसीबी और पोर्कलेन, न क्रशर पूरी तरह से ऑटोमेटिक हों और न ही शाम ढलने के बाद काम हो!
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साथियों, एक अनुरोध है।
आगे से जब भी आपका ध्यान रेल-पटरियों के किनारे बिछे पत्थरों पर जाये, या जब भी आप किसी सुपर हाई-वे गुजरें, या कोई विशाल पुल या बाँध देखें, या अपने ही मकान की छत की ढलाई करवायें, तो एकबार कृपया याद जरूर कर लें कि ये पत्थर राजमहल की (या किन्हीं और) पहाड़ियों से निकलकर आये हैं और इन्हें निकालने के लिए इन पहाड़ियों को तिल-तिल कर मारा जा रहा है... इन पहाड़ियाँ का सीना क्षत-विक्षत, लहू-लुहान हो रहा है... ये मर रही हैं... विश्वास कीजिये- ये मर रही हैं...
यह भ्रम है कि पहाड़ नहीं मरेंगे और थोड़ा-सा पत्थर निकाल लेने से इनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। हमारे पूर्वज पहले ही कह गये हैं-
"शश्वदुपभोगे गिरिरपि नश्यति।"
अर्थात्, निरन्तर उपभोग करने से पर्वत भी समाप्त हो जाता है। (गद्यचिन्तामणि 1/3)।
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रविवार, 30 जून 2013

54. अभिमन्यु कॉलेज में





       हो सकता है, मेरा फैसला गलत हो। हो सकता है, आगे चलकर अभिमन्यु मुझे दोषी ठहराये। मगर मैंने उसे पढ़ने के लिए "बाहर" नहीं भेजा, जो कि यहाँ बरहरवा में एक ट्रेण्ड बन चुका है।
ज्यादा-से-ज्यादा मैं उसे जिला शहर स्थित साहेबगंज कॉलेज (साहेबगंज 55 किलोमीटर दूर है बरहरवा से और ट्रेनें बहुत हैं- भले वे लेट-लतीफ भी बहुत होती हैं) में पढ़ाना चाहता था। मगर दिक्कत यह हुई कि प्रथम श्रेणी वालों का सीधा नामांकन हो रहा था और इसके लिए एस.एल.सी. की जरुरत थी। अभिमन्यु की एस.एल.सी. अररिया से 'कूरियर' द्वारा भेज दी गयी थी, मगर वह हम तक पहुँची आठवें दिन! तब तक नामांकन की तिथि निकल गयी।
अपने बरहरवा के बी.एस.के. कॉलेज में अन्तिम तिथि 26 जून थी और यहाँ भी साहेबगंज कॉलेज वाला नियम लागू था। संयोग से 25 को एस.एल.सी. पहुँच गयी। 26 जून को एडमिशन हो गया।
इस कॉलेज की स्थापना 1977-78 में हुई थी। तब शिवबालक राय प्रिन्सिपल थे। उन्होंने मेरी बड़ी दीदी का नाम सबसे पहले कॉलेज में लिखा था- इस प्रकार मेरी बड़ी दीदी (जो अभी अररिया में है, जहाँ मैं रहा 5 साल) इस कॉलेज की "पहली" विद्यार्थी है।
पहले बैच के ही कुछ छात्र बाद के दिनों में कॉलेज में स्टाफ बने। ऐसे ही एक स्टाफ नाम लिखाने के समय आवेदन तथा संलग्नक जाँच रहे थे। उन्होंने शायद मुझे ठीक से पहचाना नहीं। अभिमन्यु से पूछा- "कहाँ घर हुआ?" पीछे से मैंने कहा- "मेरा बेटा है, डॉक्टर जे.सी. दास का पोता।"
"अरे बाप रे!" उनके मुँह से निकला और उन्होंने झट आवेदन पर हस्ताक्षर करके प्राचार्य की ओर जाने का इशारा कर दिया।   
बाद के दिनों में इस कॉलेज की प्रतिष्ठा कम हो गयी थी- यह एक सच्चाई है। अब जो नये प्रिन्सिपल आये हैं, उन्होंने इसकी प्रतिष्ठा फिर से कायम करने के लिए कुछ कदम उठाये तो हैं। अब देखा जाय। वे तो "ड्रेस कोड" की भी बात कर रहे थे और नामांकन के समय अभिभावक का साथ होना उन्होंने अनिवार्य कर रखा था।
चित्र में अभिमन्यु की पृष्भूमि में कॉलेज का एक नया भवन भी दीख रहा है। ये भवन विन्दुवासिनी पहाड़ के पीछे की तलहटी में बने हैं और नये भवन का उद्घाटन कुछ ही दिनों पहले कुलपति के हाथों हुआ। (तभी तो 26 तक नामांकन चला, वरना यहाँ भी 20 जून को ही नामांकन बन्द हो जाता!) पहले यह कॉलेज विन्दुवासिनी पहाड़ पर स्थित "वानप्रस्थ आश्रम" के भवन में चलता था- मैं भी उसी में पढ़ा हूँ।
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विषयान्तर।
अखबारों में कोचिंग इंस्टीच्यूट वालों के दो-दो पेज विज्ञापन छपते हैं। इनमें सैकड़ों तथाकथित मेधावी छात्रों की तस्वीरें छपी होती हैं। यह "कोचिंग" परम्परा 20-25 वर्षों से तो चल ही रही है। क्या कोई बता सकता है कि जब ये इंस्टीच्यूट इतनी बड़ी मात्रा में मेधावी छात्रों को तैयार करते हैं, तो पिछले कुछ वर्षों में विज्ञान, तकनीक, अभियांत्रिकी के क्षेत्र में भारत का विश्व में क्या योगदान रहा है?
अगर कोई योगदान नहीं है (शायद है भी नहीं), तो जाहिर है कि यहाँ 'थ्री इडियट्स' के "चतुर" पैदा किये जाते हैं- जिनके जीवन का सिर्फ एक ही उद्देश्य होता है- रट्टा मारकर परीक्षायें पास करके मलाईदार नौकरी हासिल करना! विज्ञान या तकनीक या इंजीनियरिंग के प्रति इनके मन में कोई "पैशन" नहीं होता।
मैं आशा कर सकता हूँ कि मेरा बेटा अभिमन्यु कभी भी इन कोचिंग इंस्टीच्यूटों में जाने की इच्छा व्यक्त नहीं करेगा- वैसे भी, घिसी-पिटी लीक पर चलना वह पसन्द नहीं करता।
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रविवार, 23 जून 2013

53. विदा अररिया...










       "रियाज़" की उम्र अभी बस डेढ़ साल है। वह एक नन्हा बच्चा है। हो सकता है हमें न देखने के बाद वह जल्दी ही हमें भूल जाय।
       मगर हम बच्चे नहीं हैं। हम उसे कैसे भूलें?
कैसे वह हमारे घर में आकर खुश हो जाता था... कैसे घण्टों वह हमारे साथ बिताता था... कितने शौक से 'मैगी' खाता था... कैरम की गोटियों से तथा दूसरी चीजों से खेलता रहता था... इन बातों को हम तो कभी भूलने से रहे।
उसे अब कब देख पायेंगे, पता नहीं। वह पहले की तरह हमारे पास आयेगा या नहीं, पता नहीं। 
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       लगभग पाँच साल बिताकर हम अररिया छोड़ आये।
       किसी अनुभवी व्यक्ति ने बताया था कि बिहार में चार जिले ऐसे हैं, जहाँ वह "बिहारी" कल्चर नहीं पाया जाता, जिसके लिए सारा बिहार बदनाम है- और वे जिले हैं- अररिया, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज। मैंने भी यही अनुभव किया।
       यूँ तो अररिया में मेरी बड़ी दीदी की शादी 1984 में ही हुई थी, पर पिछ्ले लम्बे समय से मेरा अररिया आना-जाना बन्द था। तीन रास्ते हैं, तीनों अलग-अलग किस्म के सरदर्दों से भरे पड़े हैं- सो यहाँ आने से मैं बचने लगा था। बाद में ऐसा हुआ कि 2008 से मुझे एक तरह से यहाँ बसना पड़ा। इसी बहाने दीदी-जीजाजी तथा अन्य परिजनों से सम्बन्ध फिर से प्रगाढ़ हुए- क्योंकि मैं दीदी के घर के आस-पास ही किराये पर रहा।
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       यहाँ मेरा समय अच्छा बीता- हर तरह से।
       जिनकी याद कभी-कभार आयेगी, उनमें हैं- कैसर और मण्टू (शमीम) भाई तथा उनका परिवार। वैसे, दोनों फेसबुक पर भी हैं, इसलिए उम्मीद करता हूँ कि सम्पर्क बना रहेगा। आजाद हुसैन भी फेसबुक पर है, पर लगता है, उसकी रुची इसमें नहीं है। जय कह रहा था- ठीक है, वह भी मुझे खोज निकालेगा फेसबुक पर। जेनिश, विपुल और जयराम से शायद फिर कभी सम्पर्क न हो।
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अररिया का लैण्डमार्क- काली मन्दिर, जिसके शिखर का अनावरण पिछले साल (2012) में ही हुआ. अन्यथा, यह बाँस बल्लियों से ढका रहता था- यानि काम चलता रहता था. 
मेरी दीदी ने बताया कि जबसे वह यहाँ आई है (1984 में), तभी से यह शिखर ढका है.