सोमवार, 16 नवंबर 2015

148. कबाड़ में "टप्पर"


       25 नवम्बर 2010 का मेरा एक आलेख है- "टप्परगाड़ी" (आलेख क्रमांक- 5), जिसमें साल 1998 में हमारे "टप्परगाड़ी" में बैठने का जिक्र है। उस आलेख में मैंने ऐसा लिखा है कि एक बाढ़ में मिट्टी की दीवार के नीचे दबकर वह "टप्पर" नष्ट हो गया।
       यह जानकारी गलत है। चौलिया गाँव में तीन चार दिनों के लिए आयी उस बाढ़ में भी वह "टप्पर" बच गया था। बाद के वर्षों में कई बार मैंने उस "टप्पर" को अपने उस दादाजी (पिताजी के मामाजी) के आँगन में इधर से उधर पड़े देखा। मगर तस्वीर खींचने या अपनी भूल सुधारने की सुध नहीं आयी।
       बीते 14 नवम्बर को जब हमारा चौलिया गाँव जाना हुआ, तो इस बार मैंने दादी से पूछ ही लिया- वह "टप्पर" कहाँ गया?
       उन्होंने ईशारा किया- एक छप्पर की तरफ, जहाँ ज्यादातर बेकार चीजें पड़ी थीं। वहीं वह "टप्पर"- जो कभी आन-बान-शान का प्रतीक, बहू-बेटियों का पर्दा हुआ करता था- आँसू बहा रहा था।
       मैंने उसकी एक तस्वीर ले ली। उसे ही यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। उस आलेख को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक किया जा सकता है।

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बुधवार, 11 नवंबर 2015

147. दीवाली (2015)

       अररिया (नेपाल की सीमा पर, बिहार) में रहते वक्त जब दीवाली पर घर लौटता था, तब कटिहार से मनिहारी के बीच पड़ने वाले गाँवों में देखता था- हर घर के बाहर एक लम्बे बाँस से एक "कन्दील" लटक रही है। गंगा के इस पार आने के बाद यह दृश्य नहीं दीखता था। शहरों में तो बस ग्रिटिंग कार्ड़्स पर ही कन्दील नजर आती हैं। हालाँकि अररिया में दीवाली की सुबह कन्दील बिकते हुए देखा था और खरीद कर घर में टाँगा था।
खुद कन्दील बनाने की हिम्मत अब नहीं रही। बचपन में एक ही बार कन्दील बनाया था- अपने से। दरअसल, हमारे बरहरवा में कन्दील टाँगने की परम्परा नहीं के बराबर है। जो इक्के-दुक्के टाँगते भी हैं, वे "मेड इन चायना" वाली कन्दील टाँग लेते हैं, जिनमें बिजली का बल्ब जलता है- दीपक के स्थान पर। 
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       एक और परम्परा बरहरवा में नहीं है- "घरौंदा" बनाने की। इक्के-दुक्के लोग ही इसका पालन करते हैं। अब यह परम्परा नहीं है, तो "चीनी के खिलौने" भी यहाँ नहीं बिकते। हालाँकि पड़ोसी शहर राजमहल में इनकी परम्परा कायम है।
       प्रसंगवश, इस साल हमारी "छोटी" का घरौंदा सुन्दर बना है- चित्र देखिये। घरौंदे के लिए "खील" तो मिल गयी, (चीनी के) "खिलौने" नहीं मिले। उसके स्थान पर बताशे की व्यवस्था है।


       एक और बात याद आयी। बचपन में स्कूली पाठ्य-पुस्तक की जो दीवाली वाली कविता थी ("दीप जलाओ दीप जलाओ आज दीवाली रे"), उसमें "मैं तो लूँगा खील-खिलौने तुम भी लेना भाई" को हम ठीक से नहीं समझते थे। सोचते थे, यहाँ "खेल-खिलौने" होना चाहिए। अब घरौंदा बनाने और उसे खील-खिलौने से भरने की जब परम्परा ही नहीं थी, तो हम भला इसे समझते कैसे?  
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       हाँ, एक परम्परा बरहरवा में काफी पुरानी है- वह है, दीवाली की रात "काली पूजा" की। बंगाल में इसे "श्यामा पूजा" कहते हैं। यहाँ के "सार्वजनिक मन्दिर" में दशकों से दीवाली की रात "काली पूजा" होती आ रही है।






       काली पूजा पर एक दृश्य की याद आ रही है। पिछले साल दीवाली के बाद किसी एक दिन भागलपुर में था। उस रोज काली की प्रतिमाओं का विसर्जन होना था। ओह, ऐसा विसर्जन जुलूस मैंने कभी नहीं देखा था! भागलपुर की सारी प्रतिमायें एक साथ विसर्जन के लिए जा रही थीं। सम्भवतः एक सौ से ज्यादा प्रतिमायें होंगी! भारी भीड़। गाजे-बाजों की भरमार। इन सबके बीच पारम्परिक हथियारों की प्रदर्शनी! हर दो-एक प्रतिमा के बाद एक गाड़ी में खास ढंग से बना एक बड़ा-सा 'फ्रेम' था और उस फ्रेम में करीने से तलवार, भाले, कटार, बर्छी इत्यादि सजे हुए थे। माँ काली की प्रतिमायें तो देखने लायक थीं ही।


       भागलपुर से लौटते वक्त साहेबगंज में उतरा- रात ढल चुकी थी। यहाँ भी यही दृश्य- छोटे पैमाने पर। पता चला, शहर की सारी प्रतिमाओं का विसर्जन तो हो चुका है- आज "बम काली" का विसर्जन है। "बम काली" मैं ठीक से समझा नहीं- सम्भवतः शहर की सबसे विशाल और रौद्र रुप वाली काली प्रतिमा को "बम काली" कहा जाता होगा।
       खैर, अभी इतना ही, दीवाली की शुभकामनायें...
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रविवार, 8 नवंबर 2015

146. कल्याणचक का कायाकल्प

कल्याणचक स्टेशन की वह झोपड़ीनुमा चाय-दूकान... पता नहीं, अब यह है भी है या नहीं. 

       जब हरी दूब के स्थान पर कंक्रीट के फर्श बनने लगे, पेड़ों के स्थान पर टावर बनने लगे, पगडण्डियों के स्थान पर फ्लाइओवर या फुट ओवर ब्रिज बनने लगे, गुमटियों के स्थान पर मॉल बनने लगे, तो इसे "विकास" कहते हैं। मैं विकास का मजाक नहीं उड़ा रहा हूँ। विकास न होता, तो कम्प्यूटर पर यह ब्लॉग कैसे लिखता! बस, मैं अपने मनोभाव को व्यक्त कर रहा हूँ कि मुझे हरी दूब, पेड़ों के छाँव, कच्ची पगडण्डियाँ, गुमटी या झोपड़ीनुमा छोटी-छोटी दूकानें अच्छी लगती हैं। आडम्बर, बनावटीपन से दूर यहाँ अपनापन, सरलता का अहसास होता है। चकाचौंध, भागम-भाग और "फॉर्मलिटी" वाले माहौल में मुझे घुटन-सी महसूस होती है। इसमें मैं कुछ कर भी नहीं सकता, क्योंकि बनाने वाले ने मुझे स्वभाव ही ऐसा दिया है!
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       ट्रेन से बरहरवा से साहेबगंज जाते समय एक छोटा-सा स्टेशन आता है- कल्याणचक। दो-ढाई साल पहले यहाँ प्लेटफार्म के नाम पर हरी दूब से ढकी पटरी से हाथ भर ऊँची जमीन हुआ करती थी। 2012 में इस रूट पर तिनसुकिया मेल दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थी। तब अचानक रेलवे के मुख्यालयों में बैठे बड़े साहबों का ध्यान गया कि- अरे, यहाँ तो दस साल पहले पटरियों का "दोहरीकरण" हो जाना चाहिए था! इतनी देर कैसे हुई। (बता दूँ कि यह रेल-लाईन 1860 में बिछी थी और अभी तक "सिंगल" लाईन ही थी। सिर्फ बरहरवा से तीनपहाड़ तक दोहरीकरण हुआ था, उसके बाद काम रुक गया था।)
       खैर, युद्धस्तर पर "दोहरीकरण" का काम शुरु हुआ और मैं यह देखकर चकित रह गया कि सबसे ज्यादा कायाकल्प इस "कल्याणचक" स्टेशन का ही हो रहा था। कारण का मुझे अब तक पता नहीं। उन दिनों मैं "डेली-पैसेन्जरी" करता था- रोज सुबह ट्रेन से जाता था और रात को लौटता था। मेरी आँखों के सामने कल्याण्चक एक सीधे-सादे स्टेशन से लम्बा-चौड़ा स्टेशन बन गया!
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2013 में जिस जगह खड़े होकर मैंने बाँयी तरफ वाली तस्वीरें खींची थीं,
2015 में उसी जगह खड़े होकर उन्हीं कोणों से मैंने दाहिनी तरफ वाली तस्वीरें खींचने की कोशिश की है. 

       कल्याणचक का पुराना स्टेशन-भवन तो खैर, कायम रह गया- नयी पी.आई. बिल्डिंग बगल में बनी थी- काफी पहले। नयी पटरियाँ बिछाने के लिए विपरीत दिशा की जमीन ली गयी-दस-बारह झोपड़ियों वाली एक बस्ती को पीछे हटाकर, मगर सभी स्टेशनों का ऐसा सौभाग्य नहीं था। तालझारी, करणपुरातो, महाराजपुर, मिर्जाचौकी स्टेशनों के पुराने भवनों को तोड़ना पड़ा।  
       ये पुराने भवन सोचिये कि उन्नीसवीं सदी के बने हुए थे और इनकी एक खासियत यह भी होती थी कि हर स्टेशन के भवन की बनावट अलग-अलग थी। इलाके के अशिक्षित लोग रात के अन्धेरे में भी स्टेशन भवन की एक झलक देखकर समझ जाते थे कि ट्रेन किस स्टेशन पर है।
       अब जो रेलवे वाले "पी.आई. बिल्डिंग" बना रहे हैं, उनकी बनावट हर स्टेशन पर बिलकुल एक-जैसी होती है- खड़ूस किस्म की डिजाइन। "कला" और "रचना" से कोई वास्ता नहीं! उनकी अपनी कोई पहचान नहीं होती।  
       बचपन में मैं भी सोचता था कि स्टेशनों के भवन एक-जैसे क्यों नहीं होते, मगर बाद में समझा- इनका अलग-अलग होना बेहद जरूरी है। हर स्टेशन-भवन की अपनी एक पहचान होती है, जो उस शहर के साथ जुड़ जाती है।
       यहाँ तक ध्यान रखा जाता था कि उस शहर की संस्कृति की छाप स्टेशन भवन में झलके!
       लगता है रेलवे ने इस खूबसूरत नीति का परित्याग कर दिया है....
       अफसोस!

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145. जीवन के पाँच दशक...


शनिवार, 7 नवंबर 2015

144. 'चालीसा'



एक कहावत होती है- "चालीसा", यानि चालीस की उम्र के बाद आँखों की रोशनी कम होना 2006 में चालीस का होने के बाद अगले साल मैंने आँखों की जाँच करवायी थी- मेरठ में ये 6/6 थीं चार-पाँच साल के बाद महसूस होना शुरु हुआ कि कम रोशनी में छोटे अक्षर पढ़ने में परेशानी हो रही है इस सच्चाई को हजम करने में और एक-डेढ़ साल बीते अब एक चश्मा- मामूली-सा ही- ले ही लिया है- छोटे अक्षरों को पढ़ने के लिए- खासकर, जब प्राकृतिक रोशनी पर्याप्त न हो वैसे, इसका ज्यादातर इस्तेमाल अभी तक तो सिर्फ दफ्तर में ही हो रहा है
तरसों सुबह दफ्तर को निकलने से पहले वही चश्मा लगाये मैं...
(नोट- फोटो में थोड़ी कलाकारी की गयी है)

रविवार, 25 अक्टूबर 2015

143. दुर्गा पूजा और मुहर्रम


       महालया के दिन माँ दुर्गा सपरिवार अपने मायके आती है और विजयादशमी के दिन लौट जाती है। इसी अवसर पर दुर्गा-पूजा मनाया जाता है। देश के पूर्वी प्रान्तों में माँ दुर्गा की प्रतिमा महिषासुर का वध करती हुई स्थापित होती है। उनके अगल-बगल गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती और कार्तिक की प्रतिमायें होती हैं। छठी पूजा के दिन माँ दर्शन देती है; सप्तमी, अष्टमी, नवमी के रोज लोग खूब घूमते हैं और दशमी के दिन इन प्रतिमाओं का जल में विसर्जन करते हुए माँ को सपरिवार विदा कर दिया जाता है। बंगाल में तरह-तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि की धूम रहती है।
देश के पश्चिमी प्रान्तों के लोग, जिन्होंने ऐसी पूजा नहीं देखी है, वे आश्चर्य करेंगे कि इतनी सुन्दर प्रतिमाओं का जल में विसर्जन कर दिया जाता है! (ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मेरी श्रीमतीजी, जो को देश के पश्चिमी हिस्से की है, वह शुरु-शुरु में बहुत अफसोस किया करती थी कि इन प्रतिमाओं को विसर्जित क्यों करते हैं? सजाकर रखते क्यों नहीं?)
दरअसल, पश्चिमी प्रान्तों में दुर्गा पूजा को नवरात्र के रुप में मनाया जाता है, जहाँ घरों में महिलायें आठ या नौ दिनों के लिए कलश की स्थापना करती हैं। ग्वालियर में रहते हुए मैंने माँ दुर्गा की प्रतिमायें देखी जरुर थीं, मगर वे सिंहवाहिनी दुर्गा की एक ही प्रतिमा होती थीं, जो पूरे नौ या दस दिनों तक स्थापित रहती थीं। वैसे, अगर सुन्दरता की बात की जाय, तो पूर्वी प्रान्तों की प्रतिमायें ही ज्यादा सुन्दर होती हैं। सबसे बड़ी बात, इधर चूँकि माँ दुर्गा के साथ गणेश, कार्तिक, लक्ष्मी, सरस्वती की भी प्रतिमायें होती हैं, इसलिए पूरा दृश्य और भी सुन्दर हो जाता है।
यह भी एक तथ्य है कि देश के किसी भी शहर में अगर बंगवासियों की संख्या पर्याप्त है, तो लोगों को वहाँ माँ दुर्गा की "सपरिवार" प्रतिमायें देखने मिल जायेंगी।
(बात यहाँ आस्तिकता-नास्तिकता की नहीं है; मूर्ति पूजा के औचित्य की बात भी नहीं है; और सुर-असुर के रुप को सवर्ण-दलित के रुप में देखने की बात तो बिलकुल नहीं है। सीधी-सी बात है, यह ऋतु का सन्धि काल है, मौसम सुहाना होता है, लोगों को ऐसे मौसम में त्यौहार मनाना और इसी बहाने जीवन में आमोद-प्रमोद को शामिल करना अच्छा लगता है। ऐसा होना चाहिए, होते आया है, होते रहेगा। ज्यादा दिमाग खपाना उचित नहीं- मेरी समझ से।)
खैर, हमारे बरहरवा में कुल सात दुर्गा-पूजा मण्डप हैं। हर साल की भांति इस साल भी पूजा धूम-धाम से मनी। मैं तस्वीरें नहीं खींच पाया, यह और बात है।
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इस बार जो विशेष बात रही, वह यह कि दुर्गा पूजा के साथ ही मुहर्रम भी चल रहा था। बरहरवा में मुहर्रम पर गीत गाते और खून बहाते हुए मातमी जुलूस तथा ताशे की धुन पर लाठियाँ खेलते हुए ताजिया जुलूस दोनों निकलते हैं। दोनों जुलूसों का समय अलग-अलग होता है। इस बार मुहर्रम में कुछ बातें मैंने नोट की और इसीलिए इस पोस्ट को मैं लिख रहा हूँ।
विजयदशमी के दिन बरहरवा में सिर्फ एक ही प्रतिमा का विसर्जन हुआ, बाकी प्रतिमाओं का विसर्जन अगले दिन यानि बीते शुक्रवार को हो रहा था। (आम तौर पर वृहस्पतिवार को बेटी को विदा नहीं किया जाता।) इधर हम नवरात्र/दुर्गा-पूजा के कारण एक दिन भी "मज़लिस" में नहीं जा पाये थे, जहाँ इमाम हुसैन तथा उनके परिजनों की शहादत की कहानियों दस दिनों तक चलती है। (इस पर मेरा एक विस्तृत आलेख क्रमांक 42 पर है- 'सक़ीना' नाम से)।
शुक्रवार को हम जाने के लिए तैयार थे, मगर रात के साढ़े नौ बजे के बाद भी मज़लिस शुरु होने की आवाज नहीं आयी (लाउडस्पीकर पर)- जबकि नौ बजते-बजते आवाज आ जाया करती थी। दस बजे करीब मैं सरबर ईरानी साहब के घर गया- पता लगाने कि आज मज़लिस होगी या नहीं। सरबर साहब ने बताया कि चूँकि आज आखिरी रात है और आज हमलोग रातभर जागते हैं, इसलिए देर से शुरुआत करेंगे। आपलोग साढ़े दस बजे रात तक आ जाईये। मुझे लगा, वे सही कह रहे होंगे। बाहर निकलते वक्त मौलाना साहब मिल गये, जो हर साल लखनऊ से आते हैं। असली बात उन्होंने मुझे बतायी- आपलोगों की पूजा जो घूम रही है न, इसलिए हमलोग देर कर रहे हैं।
तब मेरा ध्यान गया कि विसर्जन के लिए माँ दुर्गा की प्रतिमाओं के साथ हमारे जुलूस भी तो घूम रहे हैं- पूरे बाजे-गाजे के साथ। अभी कुछ ही देर पहले ऐसा एक जुलूस हमारे मुहल्ले से होकर गुजरा था। ऐसे में, अगर इनका लाउड स्पीकर भी उस वक्त ऑन रहता, तो क्या अटपटा नहीं लगता? एक तरफ खुशी के बाजे-गाजे और दूसरी तरफ मातमी स्वर... ।
जो भी हो, मुझे उनका यह निर्णय बहुत अच्छा लगा।
कल मुहर्रम के दोनों जुलूस निकले- एक दोपहर से पहले, दूसरा दोपहर के बाद।
आज शाम ताजिया के साथ एक और जुलूस निकला। ताशा बज रहा था, नौजवान लाठियाँ खेल रहे थे... अचानक मेरा ध्यान गया- एक तिरंगे पर। तिरंगा! यह तो पहली बार मैं देख रहा था- विशाल धार्मिक झण्डों के साथ-साथ एक "राष्ट्रध्वज" भी।
एक और बात पर ध्यान गया- ईरानियों के जुलूस के साथ तो खैर महिलायें और लड़कियाँ रहती ही थीं; इस बार देखा, ताजिया वाले जुलूस के साथ भी महिलायें और लड़कियाँ घूम रही थीं।
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मुझे लग रहा है, कोई कुछ भी समझे, मुझे अपने ब्लॉग पर इन शुभ लक्षणों वाली बातों का जिक्र कर देना चाहिए, जिन्हें मैंने अपने बरहरवा में दुर्गा-पूजा और मुहर्रम के दौरान नोट किया- इस साल।

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