रविवार, 13 अक्टूबर 2013

शरतकाल का एक और फूल

 



       शरतकाल में जलाशयों के किनारे "कास" के सफेद फूल तो खिलते ही हैं (कहीं सचित्र जिक्र किया है मैंने), जलाशयों में कमल प्रजाति के भी एक फूल खिलते हैं, जिसे यहाँ "भेट" कहते हैं। इसके बीज से एक किस्म की "लाई" (लाड़ू- लड्डू) बनती है यहाँ, जिसे "कुन्ती" की लाई कहते हैं।
       ट्रेन से आते-जाते हुए कई स्थानों पर ये फूल दीखे, मगर छायाकारी का अवसर नहीं था। आज सुबह साइकिल लेकर निकला। मगर अफसोस कि जिस जगह मैं पहुँचा, वहाँ सारे फूल तोड़ लिये गये थे। दुर्गा माँ को इन्हें चढ़ाया जाता है। सिर्फ एक जोड़ा फूल नजर आया। उसी का फोटो लिया।
       फोटो खींचने के लिए मुझे कीचड़ तथा घुटनेभर पानी में घुसना पड़ा।
       ***
       लौटकर जब मुन्शी पोखर के किनारे चाय दूकान पर बैठा था, तब पता चला कि रतनपुर के तरफ कोई बड़गामा बस्ती है (जिसका नाम ही मैंने नहीं सुना था) वहाँ तालाब में कमल फूल मिलेंगे। इसके अलावे चण्डीपुर के तरफ कोई 'दुधिया' पोखर है, वहाँ भी मिलेंगे। इस तालाब का भी नाम मैंने नहीं सुना था। तालाब के जिक्र पर पता चला कि लब्दा के पास कोई "राजा दीघी" पोखर है, जिसकी गहराई का अब तक अनुमान नहीं लगाया जा सका है- यह एक रहस्यमयी तालाब है। हाँ, इसका जिक्र पहले भी एकबार मैंने सुना था, मगर अब तक देखने नहीं गया हूँ।
       ...सोच रहा हूँ अपने ही बरहरवा के आस-पास के बारे में मैं कितना कम जानता हूँ!
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रविवार, 6 अक्टूबर 2013

गाँधीजी के बहाने...


  


       बहुत दिनों पहले मैंने कहीं पढ़ा था कि एक अमेरिकी न्यायाधीश ने एक बिगड़ैल किशोर को सजा दी थी कि वह महात्मा गाँधी की "आत्मकथा" को पढ़े। बेशक, इस सजा का उद्देश्य था- उस किशोर को चरित्रवान, सत्यवान और अहिंसक बनाना। मेरा बेटा बिगड़ैल तो नहीं है, मगर "किशोर" है। मैं चाहूँगा कि वह भी गाँधीजी की आत्मकथा को पढ़े। सिर्फ गाँधीजी ही क्यों, अन्यान्य महापुरुषों की आत्मकथा को भी पढ़े। मैंने खुद अपनी किशोरावस्था में इस पुस्तक को पढ़ा था- वह भी चाव से, मन मारकर नहीं। इस बार शायद फर्क पड़े और अभिमन्यु मन मारकर इसे पढ़े- देखता हूँ... ।
       बचपन में गत्ते की जिल्द वाली एक रंगीन चित्रकथा- शायद "गाँधीकथा" नाम था- भी हमारे घर में हुआ करती थी, जिसे पता नहीं कितनी बार मैंने पढ़ा होगा!
       ***
       एक संयोग देखिये, 2008 में साक्षात्कार में मुझसे पूछा भी गया था कि क्या गाँधीजी ने कोई आत्मकथा लिखी है? चूँकि मैंने इसे पढ़ा था, इसलिए मेरा उत्तर था- जी हाँ। पूछे जाने पर मैंने नाम भी बता दिया- "सत्य के साथ मेरे प्रयोग"- "My Experiments with Truth" ('मेरे'/'My' पर मुझे सन्देह था, अब लग रहा है कि यह शब्द नहीं जुड़ेगा)। पूछे जाने पर मैंने यह भी बताया कि मैंने इसे पढ़ा है।
       ***  
       लगे हाथ एक और पुस्तक का जिक्र । "गिरमिटिया गाँधी" पढ़ने योग्य पुस्तक है। यह गाँधीजी की दक्षिण अफ्रिका प्रवास पर रोचक शैली में लिखी गयी रचना है। यह संक्षिप्त रुपान्तरण है; मूल वृहत् पुस्तक है- "पहला गिरमिटिया"; लेखक हैं- गिरिराज किशोर।  जिस प्रकार शोध करके उन्होंने इस पुस्तक को लिखा है, वैसी प्रवृति भारत में आम तौर पर नहीं पायी जाती।
मैंने "गिरमिटिया गाँधी" पढ़ी है- मगर अभी उसे 'गूगल' पर नहीं खोज पाया, सो "पहला गिरमिटिया" पुस्तक का लिंक दे रहा हूँ-
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       "हिन्द स्वराज" का जिक्र अक्सर सुनता हूँ, मगर कभी पढ़ने का मन नहीं किया। बीते दो अक्तूबर को गाँधीवादी विचारक राजीव वोरा का एक लेख 'प्रभात खबर' में पढ़ा- "आज के युग में हिन्द स्वराज क्यों", उसमें 'हिन्द स्वराज' की प्रशंसा की गयी थी। इस बार सोचा इसे पढ़ कर देख ही लिया जाय कि आखिर इसमें है क्या! कल रात भागलपुर से गुजरते वक्त स्टेशन पर इसे खरीदा। पढ़ना शुरु भी कर दिया है।
       एक दूसरी बात। राजीव वोरा जी के उक्त आलेख में पूँजीवाद व समाज/साम्यवाद की व्याख्या एक ही पंक्ति में इतने सुन्दर ढंग से की गयी है कि मुझे आश्चर्य हुआ। देखिये-  
"आधुनिक सभ्यता की एक संतान पूंजीवाद ने व्यक्ति की स्वाधीनता के नाम पर न्याय की हत्या की, तो दूसरे (यानि साम्य/समाजवाद) ने न्याय की स्थापना के नाम पर मनुष्य की स्वाधीनता को ही दमित कर दिया."   
        इससे पहले की पंक्ति है:
"एक ओर सरासर अनीति और कमजोर के शोषण पर आधारित भोगप्रधान जीवन दृष्टि देनेवाला पूंजीवादी विचार है, जो व्यक्ति-स्वातंत्र्य के सपने और वादे के जोर पर टिका हुआ है, तो उसी पूंजीवाद की ही माता की कोख से ही और उसी के विरोध में पैदा हुआ समाजवादी-साम्यवादी विचार है, जो जीवन में समता और न्याय के लिए खड़ा हुआ, किंतु न्याय-स्थापना द्वेष आधारित रही- साम्यवाद ने मनुष्य की स्वाधीनता का ही हरण कर लिया."
       इससे पहले वे लिखते हैं:
"जो केवल बुद्धिवाद से प्रेरित हैं, उनके लिए पूंजीवाद से लेकर साम्यवाद तक की बहुत सारी विचारधाराएं और जीवन दृष्टियां हैं, दूसरी ओर जो कोरी रूढ. आस्था और भावना से उन्माद में आकर चलते हैं उन्हें पकड.नेवाले विचारवाद और विभित्र प्रकार के आंदोलन भी हैं, लेकिन संपूर्ण जीवन अर्थात् जीवन के आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में न्याय और नैतिकता की स्थापना करने का न तो इनमें आंतरिक सार्मथ्य है, न सार्मथ्य का कोईप्रमाण.
...और इस प्रकार, वे 'हिन्द स्वराज' की उपयोगिता को आज के सन्दर्भ में स्थापित करते हैं।
       ***
       प्रसंगवश, इसी अखबार में "किसी को भी सन्त क्यों कहें" शीर्षक से गाँधीजी के विचार भी ('बोधि वृक्ष' स्तम्भ के अन्तर्गत) प्रकाशित हैं, जिसकी अन्तिम दो पंक्तियाँ हैं: "मैं अपने देश या अपने धर्म तक के उद्धार के लिए सत्य और अहिंसा की बलि नहीं दूँगा। वैसे, इनकी बलि देकर देश या धर्म का उद्धार किया भी नहीं जा सकता।"
       इसके मुकाबले नेताजी का विचार था- "देश को आजाद कराने के लिए अगर शैतान से भी हाथ मिलाना पड़े, तो वे मिलायेंगे!" हालाँकि उसवक्त नेताजी की स्थिति ही ऐसी हो गयी थी कि "नात्सीवाद" और "फासीवाद" को नापसन्द करने के बावजूद उन्हें हिटलर-मुसोलिनी से हाथ मिलाना पड़ा। स्तालिन ने उन्हें सैन्य सहयोग देने में असमर्थता जाहिर कर दी थी और हिटलर से मदद लेने का सलाह दिया था। नेताजी कहीं और जा नहीं सकते थे क्योंकि अँग्रेज जासूस उनकी हत्या की ताक में लगे हुए थे।
स्पष्ट है कि गाँधीजी अपने सिद्धान्तों को देश और धर्म से ऊपर मानते थे और इस "हिंसा" के कारण ही उन्होंने असहयोग आन्दोलन (1922) को वापस लिया- जबकि अँग्रेज घुटने टेकने वाले थे; तथा नेताजी के युद्ध (1944) के दौरान जनता को आन्दोलित होने के लिए प्रेरित नहीं किया।
हालाँकि इनका नतीजा बहुत ही बुरा हुआ- अँग्रेजी राज ही कायम रह गया- सिर्फ चेहरे बदल गये!
दूसरी तरफ नेताजी के लिए देश ही उनका सबकुछ था।
नेताजी की भावनाओं से कुछ हद तक मैं वाकिफ हो गया हूँ, अब सोच रहा हूँ, गाँधीजी के भी मनोभावों को समझा जाय।
क्योंकि देश की खुशहाली मेरा "साध्य" है और इसे हासिल करने के लिए "साधन" क्या चुना जाय, इसपर मुझे मन्थन करना है! 
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अन्त में, एक हल्की-फुल्की बात: साढ़े चार सौ पेज वाली "आत्मकथा" (नवजीवन) का मूल्य सिर्फ 40/- रुपये और मात्र 80 पेज वाली "हिन्द स्वराज" (शिक्षा भारती) का मूल्य 60/- रुपये! यह तो ना-इन्साफी है!  
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स्त्रिलिंग/पुल्लिंग



       बीते जुलाई के पहले हफ्ते में जब मेरा देवघर जाना हुआ था, तब मेरी नजर घण्टाघर पर टँगे उस साइनबोर्ड पर पड़ी थी, जिस पर लिखा था- "भारतीय स्टेट बैंक देवघर परिवार आपका स्वागत करती है।"
       मैं उन्हीं दिनों सोमी ("सोमी"- सोशल मीडिया) पर लिखना चाहता था कि देश की नामी-गिरामी संस्थायें जब स्त्रीलिंग-पुल्लिंग की ऐसी गलतियाँ करती हैं- वह भी सरे-आम- तो बड़ा खटकता है। मगर मैंने इसका उल्लेख नहीं किया।
       संयोग से, पिछले दिनों फिर देवघर जाना हुआ। स्वाभाविक रुप से मेरी नजर उसी बोर्ड पर गयी- मुझे सुखद आश्चर्य हुआ- "करती" शब्द की दीर्घ ई की मात्रा के ऊपरी हिस्से पर कागज चिपका कर (या फिर, पेण्ट करके) उसे "करता" बना दिया गया था। मैंने मन-ही-मन भारतीय स्टेट बैंक के देवघर परिवार को धन्यवाद दिया- उनकी संवेदनशीलता के लिए। हो सकता है- पिछले दिनों "हिन्दी दिवस" मनाने के क्रम में उनका ध्यान इस तरफ गया हो!
       अभी बात खत्म नहीं हुई है- एक और काम बाकी है। यह तो थी "घण्टाघर" की बात। बाकी जो मुख्य चौराहे हैं देवघर के, उनपर भी साइनबोर्ड टँगे हैं, जिनपर लिखा है- "भारतीय स्टेट बैंक देवघर शाखा आपका स्वागत करता है।"
       यानि अबकी बार नीले पेण्ट की एक छोटी-सी डिबिया और ब्रश एक पेण्टर के हाथ में थमाकर उसे लेकर देवघर के सारे मुख्य चौराहों पर घूमना होगा और "करता" को "करती" बनाना होगा....
       देखा जाय, स्टेट बैंक, देवघर शाखा का ध्यान कब तक इस तरफ जाता है...  

सोमवार, 30 सितंबर 2013

'नीर' जी की एक रचना


       आज सुबह मौसम सुहाना था- बदली छायी थी, ठण्डी हवायें चल रही थीं। मैंने साहेबगंज स्टेशन पर मालदा-जमालपुर इण्टरसिटी एक्सप्रेस छोड़ दी- सोचा, दो घण्टे बाद गया पैसेन्जर से आगे जाऊँगा। आज नरेन्द्र "नीर" जी से मिल ही लूँ। प्रायः पाँच वर्षों से उनसे सम्पर्क नहीं है- इस दौरान मैं नौकरी के सिलसिले में अररिया में रह रहा था। जून से बरहरवा में हूँ- प्रायः रोज ही साहेबगंज से गुजरता हूँ, मगर उतरकर कभी "नीर" साहब का पता लगाने की कोशिश नहीं करता हूँ कि वे कैसे हैं।
       आज उनका घर खोजते हुए पहुँच ही गया। उनके परिचय में फिर कभी- फिलहाल उनकी एक ताजा रचना:

"...न चाहते हुए भी आजादी के नाम तसलीम किया... साम्प्रदायिक बँटवारा... फिर दिनों-दिन बँटते ही चले गये... भाषा/समुदाय/क्षेत्रवार... पता नहीं, आगे इस अमल की वजह किस शर्मसार दीवार के नीचे आ जाना पड़े... और आज नेता/नौकरशाह/धनजन्तुओं की बारमूडा साजिश के दरम्याँ... तलाश रहा है अपने हिस्से का हिन्दुस्तान... शुक्र है न हुआ पुरुषार्थहीन/सम्भावनारहित... आम आदमी---
     
जद्दो-जहद से सीखा दुश्वारियों के हल
      मुनासिब हको-हकूक में लाजिम नहीं खलल
      ठोकरों पे रक्खा जरो-याकूत की पहल
                  वो है आम आदमी/है वो आम आदमी।
     
      गम नहीं न हुए तारीख-दर्ज ही कभी
      फख्र है न रहे गुरेजे-फर्ज ही कभी
      न खोया किसी मकाम तमीजो तर्ज ही कभी
                  वो है आम आदमी/है वो आम आदमी। 

      खाता भला खौफ क्यों तख्तो-ताज से
      तोड़ी खाना-ए-नक्कार तूती आवाज से
      मंजिलें सय्यार को बख्शी परवाज से
                  वो है आम आदमी/है वो आम आदमी।  

      सरे आम खुद को जब लामबन्द किये
      रहे अवाम संग रवाँ खुदी बुलन्द किये
      जमींदोज एक एक फसीलो फन्द किये
                  वो है आम आदमी/है वो आम आदमी।

      ये बाजी नहीं आसाँ जाहिर है मुसलसल
      न जीत राहतदेह न हार ही में कल
      गवांने को पास क्या न फर्श न महल
                  वो है आम आदमी/है वो आम आदमी।  

      आखिर जुल्मो-जबर कितने इजाद करोगे
      वक्त साजिश में नाहक बरबाद करोगे
      गिरोगे औंधे मुँह फिर याद करोगे
            वो है आम आदमी/है वो आम आदमी।"  

बुधवार, 25 सितंबर 2013

अभिमन्यु: मेरा बेटा (2)



       पिछले साल 13 नवम्बर- अभिमन्यु के जन्मदिन पर- एक पोस्ट लिखते हुए मैंने जिक्र किया था कि उसने 'कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो' और 'दास कैपिटल' पुस्तकें मँगवाई है। मैंने यह भी लिखा था कि मेरे द्वारा मँगवाई गयी "फेलु दा" सीरिज (सत्यजीत राय साहब की) के उपन्यासों को भी उसने शौक से पढ़ा है। मेरी सलाह पर उसने अगाथा क्रिस्टी का जासूसी उपन्यास "मर्डर इन मेसोपोटामिया" (क्रिस्टी के तो खैर 50 से ज्यादा उपन्यास हैं) और खलील जिब्रान का की दार्शनिक रचना "द प्रोफेट" भी मँगवाकर पढ़ी। पहले से भी उसके संग्रह में ढेरों किताबें हैं- बेताल पच्चीसी से लेकर अराउण्ड द वर्ल्ड इन ऐटी डेज तक।
       इसी कड़ी में संयोग से कुछ "रेफरेन्स" पुस्तकें घर पर ही एक सेल्समैन द्वारा मिल गयी। उनका जिक्र भी एक पोस्ट में है।
       वर्तमान में जो पुस्तक मँगवाकर वह पढ़ने में लगा है, वह है- "द फैब्रिक ऑव द कॉस्मॉस"।
       जाहिर है, उसकी रुचि परिष्कृत है और विविधता लिए हुए है।
       ***
       लगे हाथ एक और बात का जिक्र कर दूँ।
       मेरे एक परिचित बड़े गर्व से बताते हैं कि उन्होंने घर के बच्चे को पढ़ाई के बाहर भेज रखा है- वहाँ वह हर वक्त पढ़ाई करता है! माहौल ही पढ़ाई का है- पढ़ाई के अलावे वहाँ और कुछ करने को है ही नहीं। क्या रात क्या दिन- हर वक्त पढ़ाई और पढ़ाई!
       जबकि मैंने अभिमन्यु को पढ़ाई के लिए "बाहर" नहीं भेजा। मैंने चाहा कि वह दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-ताऊ, भाई-बहन के बीच रहे, पुराने दोस्तों का उसे साथ मिले, कॉलेज 10 मिनट में ही पहुँच जाये- साइकिल से- इससे समय बचे और इस बचे का उपयोग वह दूसरे कामों में करे, कम्प्यूटर चलाये, गेम खेले, टीवी देखे, मोबाइल चलाये, पुस्तकें पढ़े, रविवार को ड्राइंग क्लास जाये.... और इतना सब करके समय बच जाये, तो दो-एक घण्टे कोर्स की पढ़ाई भी कर ले!
       वैसे, पढ़ाई में भी वह ठीक है।
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"सद्भावना दर्पण" में "बनफूल"





   
      कुछ दिनों पहले एक छोटी-सी पत्रिका डाक द्वारा मुझे मिली- "सद्भावना दर्पण"। टैग लाईन है: भारतीय एवं विदेशी साहित्य के अनुवाद और अनुसन्धान की मासिक पत्रिका।
सम्पादक हैं: गिरीश पंकज।
       जुलाई का जो अंक मुझे मिला, उसमें "बनफूल" की दो कहानियाँ प्रकाशित की गयी हैं और "बनफूल" का परिचय भी दिया गया है। बेशक, अनुवादक तथा परिचय लेखक के रुप में मेरा नाम दिया गया है।
बाद में मुझे ध्यान आया कि 'फेसबुक' पर मैं अक्सर गिरीश पंकज साहब का नाम देखता हूँ। चूँकि जुलाई में "बनफूल" का जन्मदिन पड़ता है, इसलिए उन्होंने इस अंक में उनसे जुड़ी सामग्री प्रस्तुत की।
इसे मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ कि उन्होंने मेरे एक ब्लॉग से उक्त सामग्री लेकर प्रकाशित की।
हिन्दी में शरतचन्द्र से लेकर बिमल मित्र तक की रचनायें अनुदित हो चुकी हैं; मगर पता नहीं क्यों, विलक्षण प्रतिभा के धनी लेखक "बनफूल" को नेपथ्य में धकेल दिया गया है। मेरी पूरी कोशिश है कि हिन्दी के साहित्यरसिक इस महान लेखक से परिचित हों।
"सद्भावना दर्पण" में "बनफूल" का जिक्र आने से बेशक काफी लोग इस लेखक से परिचित हुए होंगे- इसके लिए मैं इस पत्रिका तथा इसके परिवार के प्रति, खासकर, गिरीश पंकज साहब के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ।
"बनफूल" की 20 अनुदित कहानियों का संग्रह हाल में प्रकाशित भी हुआ है:

रविवार, 22 सितंबर 2013

बाला लखिन्दर और बेहुला के कथा: नाटक के रुप में



      भागलपुर से लेकर बंगाल तक जहाँ-जहाँ से गंगाजी गुजरी है, उसके आस-पास के ग्रामीण इलाकों में बाला लखिन्दर और बेहुला की कथा को नाटक के रुप में प्रस्तुत किया जाता है। यह आयोजन भादों के महीने में होता है। कहीं 5-7 रातों तक, कहीं 2-3 रातों तक इसकी कहानी प्रस्तुत की जाती है। यह सामाजिक के साथ-साथ धार्मिक आयोजन भी है।
यह आयोजन बँगला भाषा में होता है। मुझे यह एक रहस्य ही लगता है कि जब यह कहानी भागलपुर की है, तो इसकी कथा बँगला में क्यों प्रस्तुत की जाती है और इसकी कथा का जो "पुराण" है- "पद्म पुराण"- वह बँगला में क्यों है? भागलपुर की भाषा "अंगिका" में यह क्यों नहीं है? हालाँकि मैंने एक अनुमान लगाया है, जिसका जिक्र आगे आयेगा।  
       खैर, हमारे मुहल्ले में "बड़ी माँ" ने कुछ वर्षों पहले इसका आयोजन शुरु करवाया। बड़ी माँ को मुहल्ले के बँगलाभाषी "सोन्ध्या माँ" और भोजपुरीभाषी "संझिया माई" कहते हैं। दर-असल उनकी बेटी का नाम सन्ध्या है- वह मेरी छोटी दीदी की सहेली रही है। मुहल्ले के मेरे कुछ मित्र इस आयोजन का खर्च उठाते हैं; वैसे थोड़ा-बहुत सहयोग सबका होता है।
       अभी वही कार्यक्रम चल रहा है। इस साल कहानी को संक्षेप में प्रस्तुत किया जा रहा है- यानि तीन रातों में ही कहानी को खत्म किया जा रहा है- आज अन्तिम रात है। कल रात बाला लखिन्दर और बेहुला का विवाह और बाला की मृत्यु की कथा दिखायी गयी। थोड़ी देर तक मैं भी जाकर बैठा था, मगर बाद में उठकर आ गया। आते समय एक भाभी ने टोका भी- शादी छोड़कर नहीं जाना चाहिए। उस समय नाटक में बाला की शादी का जिक्र चल रहा था। आज बेहुला बाला को जीवित करेगी।
       मैं खुद पूरी कहानी नहीं जानता, न ही रात-रात जागकर मैंने कभी इस कार्यक्रम को देखा है। फिर भी, संक्षेप में मैं आपको बताने की कोशिश करूँगा।
       चम्पा नगरी, यानि भागलपुर में एक चाँद सौदागर हुआ करते थे। उन्होंने भगवान शिव के साथ मनसा देवी की पूजा करने से मना कर दिया था। मनसा साँपों की देवी है, उसे "विषहरी" भी कहा जाता है। आगे चलकर चाँद सौदागर के बेटे बाला लखिन्दर को एक साँप डँस लेता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। सर्पदंश से जिसकी मृत्यु होती है, उसके शव का "दाह-संस्कार" नहीं किया जाता, बल्कि उस शव को नदी में बहा दिया जाता है- ऐसी परम्परा है।
जब बाला के शव को अर्थी सहित गंगाजी में बहाया गया, तो उसकी पत्नी बेहुला भी उसी अर्थी पर बैठ गयी। यह कुछ वैसी ही कहानी है, जैसी कि सावित्री-सत्यवान की। मेरा अनुमान है कि बाला की वह अर्थी भागलपुर से बहते-बहते बंगाल में काफी दूर तक चली गयी होगी और बंगाल में ही कहीं बाला फिर से जीवित हो गये थे। स्पष्ट है कि मनसा माँ बेहुला के सतीत्व से द्रवित हो गयी होगी और उसने बाला के प्राण लौटा दिये होंगे। ऐतिहासिक रुप से, हो सकता है कि बंगाल में किसी सिद्ध पुरुष या तांत्रिक ने बाला को जीवित कर दिया होगा। जो भी हो, चमत्कार की यह घटना जरूर बंगाल में ही घटी होगी, इस कारण बेहुला की कथा बँगला में ही सुनायी जाती है, अंगिका में नहीं।
जब सती बेहुला अपने पति बाला लखिन्दर को सही-सलामत घर ले आती है, तब चाँद सौदागर भगवान शिव के बगल में बाकायदे मनसा देवी की प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा शुरु कर देते हैं।
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अभी-अभी, जब मैं यह टाईप कर रहा हूँ, वहाँ भजन-कीर्तन चल रहा है। थोड़ी देर तक हल्के-फुल्के, हास्य वाले कार्यक्रम भी चलते हैं, ताकि लोग जुटते रहें। फिर जाकर असली कथा शुरु होगी।