रविवार, 12 नवंबर 2017

189. 'कोकी बूढ़ी'





       तस्वीर में जो वृद्ध महिला दिख रही हैं, उसे हमारे परिवार तथा आस-पास की रिश्तेदारी में "कोकी बूढ़ी" कहते हैं। इनका असली नाम हम नहीं जानते हैं।
बरहरवा जंक्श्न से जो रेल लाईन फरक्का की ओर जाती है, उधर ही कहीं 'करला' (बँगला उच्चारण- कोरला) नामक छोटा-सा गाँव है, वहीं की रहने वाली है।
       बीच-बीच में हमारे घर आती है, कभी-कभी दो-एक दिन ठहर भी जाती है। अनुमान है कि प्रखण्ड कार्यालय में जब वृद्धा पेन्शन सम्बन्धित कोई काम रहता होगा, तभी उसका यहाँ आना होता होगा। बीच-बीच में कोटालपोखर में जाती है, जहाँ मेरे चचेरे भाईयों का निवास है- दरअसल, यहाँ मेरे दादाजी के भाई बसे थे।
       यह वृद्धा गरीब है, इसमें कोई शक नहीं है, मगर हमेशा साफ-सुथरे कपड़े पहनती है, जो यह दर्शाता है कि यह एक सुसंस्कृत परिवार से है।
       अब तो खैर जमाना बदल गया है। एक जमाना था, जब ये कभी खाली हाथ हमारे घर नहीं आती थीं- बिस्कुट का पैकेट लेकर ही आती थीं। तब हम भी बच्चे ही हुआ करते थे।
       इनकी त्रासदी यह है कि इनके बेटे-बहू इन्हें परेशान करते हैं। इतने भले, इतने निश्छ्ल लोगों के साथ ऐसा क्यों होता है, यह आज तक हम समझ नहीं पाये हैं।
       इतना तो हम सब जानते थे कि इनका हमारे परिवार से रिश्ता है, मगर क्या रिश्ता है, इसे बचपन में हमने जानने की कोशिश नहीं की थी। बड़े होने के बाद पिताजी से इस बारे में पूछा था। पिताजी ने हँसते हुए बताया था कि ये उनकी (पिताजी की) फुफेरी बहन लगती हैं। और भी बहुत कुछ बताया था, जिन्हें हम फिर भूल गये हैं।
       कई साल पहले हमने इनकी तस्वीर खींची थी, कि कभी अपने ब्लॉग में इनका जिक्र करेंगे, पर कभी ऐसा नहीं हो पाया। आज अभी देखा- वे आयी हुई हैं। आज बिना टाल-मटोल किये उनपर लिख ही दिया।
       अन्त में, सबसे महत्वपूर्ण बात, जिसके लिए हम उन पर लिखना चाहते थे- इनको सबसे बातचीत करने का बहुत शौक है, मगर ऊपरवाले ने इन्हें आवाज नहीं दी है! ये गूँगी हैं। इनकी ज्यादातर बातों (आवाज) और ईशारों को कोई नहीं समझता, मगर उसकी परवाह किये बिना ये हमेशा सबके साथ कुछ बोलते रहती हैं। सुनने वाला भी मुस्कुराते हुए हाँ-हूँ करते रहता है। थोड़ी बहुत इनकी बातचीत मेरी माँ और मेरी चाचीजी समझ जाती हैं। कोटालपोखर वाली बड़ी माँ भी काफी कुछ समझती होंगी।
       ऐसे निश्छल लोगों को देख कर मन भर आता है, मगर साथ ही, ऊपर वाले के "निराले" खेल के बारे में भी सोचना पड़ता है कि जिसे बातें करने बहुत शौक दिया है उसने, उसे "आवाज' देना वह कैसे भूल गया?
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