गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

127. 'धूपची मेला'


       मेरे इस ब्लॉग में "टप्परगाड़ी" नाम का एक आलेख है, जिसमें कि "भूईंपाड़ा" मेले का जिक्र है- कि हम अपने बचपन में टप्परगाड़ी में बैठकर मेला जाया करते थे। असल में, उस गाँव का नाम भीमपाड़ा है और उस मेले का नाम "धूपची" मेला है। मेला लगता है माघ महीने के पहले रविवार को। यह सूर्य भगवान को समर्पित मेला है।
मेरा अनुमान कहता है कि माघ महीने के पहले रविवार से धूप में तेजी आती है और इस दिन के बाद से ही किसान धान को धूप दिखाना शुरु करते हैं। धूप में दो-चार दिन रखने के बाद उस धान से चावल बढ़िया बनता है- दाने टूटते नहीं हैं। तो इसलिए यह दिन सूर्य को अर्घ्य देने का एक पर्व बन गया। पर्व को मेला बनते देर नहीं लगा होगा, क्योंकि धान की फसल कटने के बाद किसानों के हाथ में थोड़े पैसे आ जाते हैं। यहाँ मेले में वे अपनी जरुरत की बहुत सारी चीजें खरीद सकते हैं।   
       इस साल 18 जनवरी को यह मेला लगा था। संयोगवश, मैं और जयचाँद वहाँ पहुँच गये। हम असल में चौलिया गाँव गये थे- लौटते वक्त मेला भी घूम लिये।
       आप भी कल्पना कीजिये एक सीधे-सादे ग्रामीण मेले में घूमने का।

       जो एक तस्वीर नहीं ले पाये, वह थी मिट्टी के अनगढ़ खिलौनों की। मैंने जयचाँद को बताया भी, पर उसने कहा कि लौटते वक्त लेंगे, फिर वह रह ही गयी। 

ये बन रहे हैं पत्थर के "सिल", जिनपर मसाला पीसा जाता है. 

मेले का केन्द्रीय हिस्सा. 

जहाँ पीपल के पेड़ पर शोले का एक मुकुट टाँगकर फलों का अर्घ्य चढ़ाया जाता है- भगवान सूर्य को. 



लकड़ी के घरेलू सामान. 

लोहे के सामान- खासकर कृषि औजार.

तफरी के लिए- चावल की शराब या ताड़ी- चखने के साथ. 

जुआ. 

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें