गुरुवार, 13 जुलाई 2017

177. इस बार सावन बहका हुआ है...



       मौनसून के बादलों के आने से एक दिन पहले हमारे बरहरवा के पश्चिमी क्षितिज पर राजमहल की पहाड़ियों के ऊपर सूर्यास्त के बाद रंगों का कुछ ऐसा मेला सजा था- मानो, मौनसून के आगमन की सूचना मिल गयी हो और उसी के स्वागत में यह रंगोली सजायी जा रही हो...



       अगले दिन मौनसून ने दस्तक दिया। 'दस्तक' शब्द छोटा पड़ रहा है। जैसी गर्जन और जैसी कड़कड़ाहट थी कि यही कहा जा सकता है कि धूम-धड़ाके के साथ मौनसून से ने हमारे "कजंगल" क्षेत्र में, हमारे 'दामिन-ए-कोह" में प्रवेश किया!



       इसके बाद आया आषाढ़ का महीना। वाकई वर्षा ऋतु का अहसास हो गया।



       और सावन?
       मत पूछिये। सावन के पहले दिन से ही जो झड़ी शुरु हुई, कि बस मन का मोर नाच उठा।
       सारे ताल-तलैये भर गये...



       खेतों में धान रोपने का काम जोर-शोर से शुरु हो गया...



       दूर जाने की क्या जरुरत? हमारे घर के आस-पास भी पानी जमा हो जाता है... (कंक्रीट की सड़कें ऊँची होती जाती हैं, रिहायशी इलाके डूबते जाते हैं... । हम तो उस महान आदमी का खुर-स्पर्श करना चाहेंगे, जिसने कंक्रीट की मोटी-मोटी सड़कें बनवाने का आइडिया सरकार को दे रखा है!)



       ***
       यह सही है कि बहुत-से नगरों में वर्षा ने तबाही मचा रखी है, मगर ध्यान से सोचिये तो इसमें दोष वर्षा ऋतु का नहीं, हम मानव जाति का है। जनसंख्या, नगरीकरण, औद्योकिकरण हमीं लोगों ने बढ़ाया है। नगरों में तालाबों, नालों का अस्तित्व समाप्त हो रहा, मिट्टी का क्षेत्रक़ल घट रहा और कंक्रीट का बढ़ रहा, तो ऐसी समस्यायें आयेंगी ही।
       सच तो यह है कि मानव द्वारा पर्यावरण पर किये जा रहे इतने अत्याचारों के बाद भी वर्षा ऋतु का समय पर आना प्रकृति की हम पर बड़ी कृपा है...
       ये अन्तिम दो तस्वीरें अभी कुछ देर पहले की-
 


       *****

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

176. "क्रॉस डि मिस्टिक"


      बचपन में हमने हस्तरेखा पर एक पुस्तक पढ़ी थी। वह दौर ही था पुस्तक, पत्रिका, कॉमिक्स पढ़ने का; जैसे कि आज की बाल-किशोर-युवा पीढ़ी फेसबुक, व्हाट्स-अप इत्यादि पढ़ती है। वह पुस्तक चाचाजी की थी और उस पर बाकायदे गत्ते की जिल्द चढ़ी हुई थी। उन दिनों अच्छी पुस्तकों पर लोग गत्ते की जिल्द चढ़वाकर रखते थे, ताकि कई हाथों में घूमने के बाद भी पुस्तक खराब न हो।
       खैर, तो पुस्तक की जो दो-एक बातें हमें याद रह गयीं, उनमें से एक थी- "रहस्य क्रॉस" का जिक्र! बताया गया था कि किसी-किसी व्यक्ति की हथेली पर मस्तिष्क एवं हृदय रेखाओं के बीच एक छोटा-सा "क्रॉस" बना होता है। ऐसे व्यक्ति भाग्यशाली होते हैं। पुस्तक के अनुसार, महान हस्तरेखाविद "कीरो" ने ही इस चिह्न को "रहस्य क्रॉस" (क्रॉस डि मिस्टिक) नाम दिया था।
       जब किसी बात के साथ 'रहस्य' शब्द जुड़ जाय, तो वह बात याद रह ही जाती है। इस प्रकार, यह जानकारी मेरे मस्तिष्क में हमेशा तरोताजा रही।
       ***
       अब एक जमाने के बाद कल अचानक एक वेब-पत्रिका में इस "क्रॉस" का उल्लेख पढ़ने को मिला। वेब-पत्रिका का नाम है- Hindi Town और आलेख का शीर्षक है- 'केवल 2 प्रतिशत लोगों के हाथों में होता है ये निशान, आपके हाथ में भी है तो जानें क्या है इसका मतलब!!' (उस आलेख का लिंक यहाँ है।)
       इस आलेख में हालाँकि "रहस्य क्रॉस" शब्द का जिक्र नहीं है, मगर हथेली पर "क्रॉस" का स्थान वही बताया जा रहा है- मस्तिष्क एवं हृदय रेखाओं के बीच। बताया जा रहा है कि यह चिह्न रखने वाले लोग भाग्यशाली होते हैं। जो रोचक बात इसमें कही जा रही है, वह यह है कि प्राचीन काल में सम्राट अशोक और सिकन्दर के हाथों में यह निशान था। (इतिहास में दोनों को "महान" का दर्जा प्राप्त है।) आधुनिक काल में महात्मा गाँधी और हिटलर के हाथों में इस निशान के होने की बात कही जा रही है।
       ***
       उपर्युक्त दोनों जानकारियों के बीच हमने एक अन्तर नोट किया। पुस्तक में हथेली का जो रेखाचित्र छपा था, उसमें "क्रॉस" को स्वतंत्र दिखाया गया था- भाग्य रेखा के बगल में; जबकि वेब-पत्रिका के आलेख में हथेली का जो छायाचित्र प्रकाशित हुआ है, उसमें दिखाया गया है कि एक छोटी-सी रेखा भाग्य रेखा को काटते हुए "क्रॉस" बना रही है- हालाँकि स्थान वही है- मस्तिष्क एवं हृदय रेखाओं के बीच।
       हो सकता है, सिर्फ "क्रॉस" और उसकी स्थिति मायने रखती हो- वह "स्वतंत्र" हो या "भाग्य रेखा के साथ संयुक्त"- इससे फर्क न पड़ता हो।
       ***
       अब सच्चाई चाहे जो हो, यहाँ हम अपनी बात बताना चाहते हैं।
       हस्तरेखा को मानना या न मानना एक अलग बात है, मगर यह एक रोचक विषय है और इसके प्रति मन में उत्सुकता बनी रहती है- इस बात से शायद ही कोई इन्कार करेगा। मेरे साथ भी यही बात है। हम इस पर विश्वास करें या न करें, इसके प्रति मन में उत्सुकता जरुर है।
       खैर, तो साहिबान, दिल थाम कर बैठिये कि हम यह बताने जा रहे हैं कि मेरी दाहिनी हथेली पर उपर्युक्त दोनों ही प्रकार के "क्रॉस" मौजूद हैं। मस्तिष्क एवं हृदय रेखाओं के बीच एक तरफ एक छोटी-सी रेखा भाग्य रेखा (इसे शनि रेखा भी कहते हैं) को काटते हुए "क्रॉस" बना रही है, वहीं दूसरी तरफ, एक छोटा-सा स्वतंत्र "क्रॉस" भी बगल में मौजूद है!
       सवाल यह है कि अब इसे क्या समझा जाय? 1 + 1 = 2, या 1 – 1 = 0?
       यानि या तो हम "डबल" भाग्यशाली हैं, या फिर एक "क्रॉस" ने दूसरे के महत्व को "शून्य" कर दिया है...
       हा:-हा:=हा:-हा:...
       ***** 
मेरी दाहिनी हथेली की तस्वीर... "रहस्य क्रॉस" को दर्शाती हुई- 

बुधवार, 28 जून 2017

175. कच्चू बोले तो घुईयाँ, और ये हैं उसके पत्तों की पकौड़ियाँ...

        कच्चू के पौधे यूँ तो हमारे घर के आस-पास साल भर उगे रहते हैं, मगर बरसात में इसकी बढ़त कुछ ज्यादा ही तेज हो जाती है। कच्चू को ही घुईयाँ कहते हैं- यह हमने जाना मेरठवासिनी श्रीमतीजी की बदौलत। जी, वही घुईयाँ, जिसका जिक्र 'भाभीजी घर पर हैं' में गाहे-बगाहे होते रहता है।
 

       खैर, बरसात में हमारे घर में इसके पत्तों की पकौड़ियाँ बनती हैं। पता चला, श्रीमतीजी के घर में भी इसकी पकौड़ियाँ बनती थीं। फर्क यह है कि हमारे यहाँ घर के पिछवाड़े से पत्ते तोड़ लिये जाते थे और मेरठ में ये पत्ते पैकेटों में बिकते थे। 

       तो आज शाम वही लजीज पकौड़ियाँ घर में बनी हैं। श्रीमतीजी चाहती हैं कि इसकी 'रेसिपी' लिखकर 'प्रतिलिपी' नामक वेब-पत्रिका में भेज दी जाय। मैं उस रेसिपी को अभी-अभी इस ब्लॉग पर भी लिखता, मगर वो नाराज होकर चली गयी हैं। दरअसल, मैं कम्प्यूटर खुला छोड़कर मिल (आटा-चक्की) चला गया था और कहकर गया था कि तब तक मोबाइल से फोटो को कॉपी करके कम्प्यूटर में एक फोल्डर बनाकर रख देना। लौटा, तो बताया गया कि कम्यूटर अपने-आप बन्द हो गया था और फिर से चालू हुआ है। हमने थोड़ा मजाक उड़ा दिया और वो हट गयीं यहाँ से। 

       ...तो 'रेसिपी' डालना फिलहाल नहीं हो पा रहा है। बाद में इसमें जोड़ दिया जायेगा।  
       ...तब तक पकौड़ियों के फोटो से ही स्वाद का अन्दाजा लगाईये...







       ***
       लगे हाथ, इसी ब्लॉग पर आप चाहें, तो मेरे और भी दो आलेख पढ़ सकते हैं-

गुरुवार, 25 मई 2017

174. फेलू'दा और प्रो. शंकु



 दो साल पहले जब मैंने श्रीमान सन्दीप राय (बँगला फिल्म-निर्देशक, सत्यजीत राय के सुपुत्र) जी से अनुमति माँगी थी कि मुझे जासूस फेलू'दा के कारनामों का हिन्दी अनुवाद करने की अनुमति प्रदान की जाय, तो उनका साफ कहना था कि इनका हिन्दी अनुवाद हो चुका है, मुझे पहले पता कर लेना चाहिए। मैंने बताना चाहा कि मैंने इण्टरनेट पर कई तरीकों से खोज-बीन करके देख लिया है- सारे 35 कारनामों का हिन्दी अनुवाद कहीं उपलब्ध नहीं है। हाँ, मराठी में उपलब्ध है। हिन्दी में सिर्फ दो-चार प्रसिद्ध कारनामों का ही अनुवाद हुआ है। मगर वे सुनने के लिए राजी नहीं थे। मन मारकर मैंने अनुवाद का काम बन्द कर दिया था। तब तीन कारनामों के हिन्दी अनुवाद को मैं eBook का रुप दे चुका था।
       मगर अन्त में मन नहीं ही माना और मैंने फिर अनुवाद का काम शुरु कर दिया। चौथे कारनामे को हाल ही में eBook का रुप दिया। पहले की तरह इसकी भी एक प्रति "आनन्द पब्लिकेशन" को भेज देना है- इस अनुरोध के साथ कि इसे श्री सन्दीप राय जी को उपलब्ध करा दिया जाय। पाँचवे का अनुवाद तैयार है- टाईप करना बाकी है और यही तो मुख्य काम है और साथ ही, यही बहुत मुश्किल है। यह कारनामा- "गैंगटोक में गड़बड़झाला" है भी काफी लम्बा। देखें कब शुरु कर पाते हैं इसकी टायपिंग।
       *** 

       मैं यह बताना चाहता हूँ कि सत्यजीत राय साहब ने रहस्य-रोमांच और वैज्ञानिक कपोल-कल्पनाओं से भरपूर 39 कहानियाँ और लिखी हैं। इस शृँखला के मुख्य किरदार हैं- प्रोफेसर शंकु! इनका तो हिन्दी अनुवाद नहीं हुआ है- यह तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ। फेलू'दा शृँखला को पूरा करने के बाद ही मैं इस काम को हाथ में लूँगा। यानि अभी बहुत लम्बा समय लगेगा।
       तब तक मैं प्रो. शंकु शृँखला के रेखाचित्रों को एक धारावाहिक के रुप में प्रस्तुत करना चाहता हूँ। कहने की आवश्यकता नहीं, फेलू'दा की तरह इसके भी रेखाचित्र स्वयं सत्यजीत राय साहब ने बनाये हैं। मुझे लगता है, एक "फेसबुक पेज" बनाकर इसके चित्रों को धारावाहिक रुप से प्रस्तुत करना अच्छा रहेगा।

       ...एक पेज बना लिया मैंने, उस पर जाने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें।
        फेलू'दा पर तो पेज पहले से ही है- उसका लिंक यहाँ है।   
 
***