रविवार, 8 मार्च 2015

130. होली'2015: रपट

5 मार्च को सुबह 9 बजे फेसबुक पर लिखा:
एक वो भी दिन हुआ करते थे, जब हफ्ता भर पहले से ही होली के गीत- जोगीरा किस्म के- यहाँ-वहाँ बजने लगते थे! खासकर, पिचकारी-रंगों की दूकानों में, ट्रक-जीपों में...
...एक यह भी दिन है कि आज होलिका दहन है और अभी तक कानों में कहीं से भी जोगीरा-सा-रा-रा- की आवाज नहीं टकरायी।
मैं ढोल-मंजीरा के साथ होरी गाने की बात नहीं कर रहा हूँ- इस परम्परा के खत्म हुए दशकों हो गये... मैं तो कैसेट- अब सीडी- वाले गानों की बात कर रहा हूँ...
..क्या करुँ, खुद ही कम्प्यूटर पर गाना बजा रखा है- "रंग बरसेला हो... महीनवा आइल फागुन के..."
उसी दिन दोपहर 1 बजे लिखा:
इस पोस्ट को लिखने के बाद यही बात मैंने बिनय (बिनय भगत- वह मेरा लंगोटिया दोस्त है- फेसबुक वाला वर्चुअल दोस्त नहीं) से बतायी। उस वक्त वह अपनी माइन्स में था। बोला, थोड़ी देर में तुमसे मिलते हैं। घण्टेभर बाद पहाड़ से आकर वह "मुन्शी पोखर पटाल" (-इसे सिर्फ बरहरवा वाले ही समझेंगे, कोई और नहीं) पर मिला। राजन जी भी वहीं थे। बिनय ने बताया कि जोगीरा गाने वालों से बात हो गयी है- शाम को वे लोग गाते-बजाते निकलेंगे- हो सका तो एक "जानी" भी होगा साथ में (अगर आप बिहार-यूपी के हैं, तो "जानी" समझ ही रहे होंगे, वर्ना छोड़िये, क्या कीजियेगा जानकर) और वे लोग देर रात तक ढोल-मंजीरे के साथ होरी-फाग गायेंगे. थोड़ा खर्चा है, जुगाड़ करना पड़ेगा। और कुछ लोगों को खबर कर देना है ताकि हुजुम बना रहे। वे लोग बिनय के घर में तीन-चार बजे आ जायेंगे, 5 बजे उत्तम के घर से काफिला निकलेगा और रात स्टेशन चौक या सार्वजनिक मन्दिर पर बैठकर गाना-बजाना होगा। एक अरसे बाद यह पुरानी परम्परा फिर शुरु होगी... देखा जाय कैसा रहता है...
6 मार्च को सुबह 7 बजे फेसबुक पर:
एक जमाने में हमारे बरहरवा में होलिका की शाम "महामूर्ख सम्मेलन" हुआ करता था, जिसमें सारे बरहरवा के दिग्गज (गणमान्य) लोग शामिल होते थे, उपाधियाँ बाँटी जाती थीं, मानपत्र (बेशक, भोजपुरी में) पढ़ा एवं प्रदान किया जाता था और एक से बढ़कर एक चुटकुले लोग अपने-अपने अन्दाज में सुनाया करते थे. हँसते-ठहाका लगाते लगाते पेट में बल पड़ जाया करते थे।
एक और खास चीज होती थी- नामी गिरामी लोगों के नामों के सामने हास्य/व्यंग्य/कटाक्ष वाली पंक्तियाँ/मुहावरे/गाने के बोल लिखकर उन्हें पढ़कर सुनाना। कई बार इसकी प्रतियाँ बाकायदे दीवारों पर चिपकायी भी जाती थी- रातों-रात। होली की सुबह उठते ही लोगों की नजर इनपर पड़ती थी और वे इन्हें पढ़कर मजे लिया करते थे। सच पूछिये तो उन दिनों लोगों को इन्तजार रहता था इसका कि किसपर कैसी फब्ती कसी गयी है!
वास्तव में "होली" मनाने का उद्देश्य ही है- अपने अन्दर के कचरे को निकाल बाहर करना। किसी को गाली देने का मन सालभर से है, तो दे डालो- अब उसे समझना चाहिए कि आखिर किस बात के लिए यह गाली मुझे मिल रही है। समझदार होगा तो समझ ही जायेगा और खुद को सुधार लेगा। किसी को पसन्द करते हो, तो होली के बहाने जता ही दो- उम्र को मारो गोली- फागुन भर बुड्ढे भी देवर लगते हैं।
जैसे खजुराहो मन्दिरों की बाहरी दिवारों पर कामकला की एक से बढ़कर एक मूर्तियाँ बनी हैं, इन्हें जी भर के देख लेने के बाद ही लोग गर्भगृह में प्रवेश करते हैं- देवता के सामने. (यह और बात है कि अब एक को छोड़ बाकी मन्दिरों में पूजा नहीं होती)। आखिर सन्देश क्या है इस व्यवस्था के पीछे? यही न कि ईश्वर के सामने जाने से पहले हम अपनी जिज्ञासायें/लिप्सायें मिटा लें, ताकि ईश्वरभक्ति के समय मन न भटके।
तो होली का सन्देश भी कुछ ऐसा ही है कि मन की बुरी भावनाओं को निकाल फेंकने की पूरी आजादी है। जिनके पैर छूते हो, उसे भी आज बुरा-भला कह सकते हो- बशर्ते कि वाकई उस आदमी में कुछ कमी हो।
अगर राजनीति की बात करें, तो देश के सारे प्रधानमंत्रियों पर होली पर तंज कसे जा सकते हैं, व्यंग्यवाण चलाये जा सकते हैं, मगर "लाल बहादुर शास्त्री" पर नहीं- क्योंकि उनमें कोई कमी ही नहीं थी! इसी प्रकार, आप गाँधी पर चुभती हुई पंक्तियाँ रच सकते हैं, मगर "सुभाष" पर नहीं, क्योंकि सुभाष में कोई कमी थी ही नहीं।
खैर, अब भी व्यंग्य दोहे रचने की परम्परा बनी हुई है. अब गुलाम कुन्दनम साहब (रोहतास) ने ऐसे ही राजनीतिक दोहे फेसबुक पर डाले हैं- जो जोगीरा की शैली में है। उनका आनन्द आप भी लें- बुरा न मानो होली है:
राजनितिक जोगीरा

1) अड़ही देखलीं गड़ही देखलीं , देखलीं सब रंगरूट
बड़ नसीब साहेब के देखलीं , बेचत आपन सूट ..... जोगीरा सा रा रा रा

जल जमीन जंगल के खातिर , अध्यादेशी रूट
संसद बइठि बात पगुरावे , साहब बेचें सूट ......जोगीरा सा रा रा रा

2) भइंस बिआइल पाड़ी पड़रू ,गाय बिआइल बाछा
भयल विकसवा पैदा पल्टू , खोल पछोटा नाचा ........जोगीरा सा रा रा रा

3) कौन दुल्हनिया डोली जाए, कौन दुल्हनिया कार
कौन दुल्हनिया झोंटा नोचे, नाम केकर सरकार .... जोगीरा सा रा रा रा

संघ दुल्हनिया डोली जाए , कारपोरेट भरि कार
धरम दुल्हनिया झोंटा नोचे , बउरहिया सरकार ....जोगीरा सा रा रा रा

4) चिन्नी चाउर महंग भइल , महंग भइल पिसान
मनरेगा क कारड ले के , चाटा साँझ बिहान .....जोगीरा सा रा रा रा

का करबा अमरीका जाके , का करबा जापान
एम डी एम क खिचड़ी खाके , हो जा पहलवान .....जोगीरा सा रा रा रा

5) इक रुपया में चार चवन्नी , चारो काटें कान
बुलेट ट्रेन में देश चढ़ल बा , परिधानी परधान ....जोगीरा सा रा रा रा

6) कौन देस के लोहा जाई , कौन देस अलमुनिया
आ कौन देस में डंडा बाजी , कौन देस हरमुनिया ..... जोगीरा सा रा रा रा

चीन देस के लोहा जाई , अमरीका अलमुनिया
आ नियामतगिरि में डंडा बाजी , संसद में हरमुनिया ....जोगीरा सा रा रा रा

7) केकरे खातिर पान बनल बा , केकरे खातिर बांस
केकरे खातिर पूड़ी पूआ , केकर सत्यानास...... जोगीरा सा रा रा रा

नेतवन खातिर पान बनल बा , पब्लिक खातिर बांस
अफ़सर काटें पूड़ी पूआ , सिस्टम सत्यानास .... जोगीरा सा रा रा रा
8 मार्च को, यानि आज:
       झूमर
होलिका (5 मार्च) की शाम जोगीरा गाने वालों का काफिला निकला तो था, मगर "जानी" का इन्तजाम नहीं हो सका- कहा गया कि इसके लिए दो दिनों पहले बात करनी चाहिए थी। मामला वैसा जमा तो नहीं, फिर भी, बरहरवा के बाजार में वर्षों बाद होलिका की शाम मृदंग ("नाल") पर थाप पड़ी। बहुत सारे रसिया जुटे। "सम्मत" (होलिका दहन) पर कुछ गानों के साथ यह कार्यक्रम रात साढ़े दस बजे खत्म हुआ। जैसा कि रामेश्वर जी ने बताया, ये लोग झूमर गा रहे हैं। बाकी रसिया लोग बीच-बीच में जोगीरा के दोहे भी जोड़ रहे थे। तय हुआ है, अगले साल ठीक से इन्तजाम किया जायेगा।

होली
होली (6 मार्च) तो वैसी ही रही, जैसी हर साल होती है। अशोक ने अपने घर के बाहर भारी-भरकम म्युजिक सिस्टम के साथ खाने-पीने का इन्तजाम कर रखा था। नया बस यही रहा कि इस बार हमारा एक पुराना दोस्त सतनाम आया हुआ था दिल्ली से।
इमली बड़ा
जैसे उत्तर-प्रदेश में होली पर घरों में "गुझिया" जरुर बनता है, वैसे, हमार्व इलाके में पूआ-पूरी के साथ "दही-बड़ा" जरुर बनता है। हमारे घर में दही-बड़े के साथ-साथ "इमली-बड़ा" जरुर बनता है। जो भी खाता है, वह इसकी तारीफ किये बिना नहीं रह सकता।
दु:खद घटना
होली की दुपहर एक दु:खद घटना घटी- एक आपराधिक छवि वाले युवक ने मेन रोड पर एक अन्य युवक को घायल कर दिया- बोतल सिर पर मारकर। बताया जा रहा है कि घायल की स्थिति गम्भीर है- उसे पहले चन्द्रगौड़ा फिर रात में कोलकाता ले जाया गया है।
ऐसी ही बातों से होली बदनाम होती है... और बहुत-से लोग होली खेलना छोड़ देते हैं...

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शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

129. "चन्द्रगौड़ा"

  
    चन्द्रगौड़ा एक छोटी-सी सन्थाली बस्ती का नाम है, मगर आजकल हमारे बरहरवा तथा आस-पास के क्षेत्रों में यह प्रसिद्ध हो गया है। कारण है- यहाँ इसाई मिशनरियों द्वारा संचालित एक अस्पताल, जो 2007 में यहाँ स्थापित हुआ था और अभी यह और भी बड़ा बनेगा।
बाकी बीमारियों के ईलाज के बारे में पता नहीं, मगर प्रसव के लिए जरुरी सारी सुविधायें यहाँ उपलब्ध हैं। डॉक्टर एवं नर्सों की संख्या भी पर्याप्त है। पूर्वोत्तर एवं दक्षिण भारत की नर्सों को यहाँ देखकर थोड़ा आश्चर्य भी हुआ- दूर-दराज के एक छोटे-से अस्पताल में रहते और काम करते हुए पता नहीं वे कैसा महसूस करती होंगी। देखने में तो सब खुश नजर आ रही थीं। जरुर इनके मन में बेबसों की "सेवा की भावना" भी होगी- सिर्फ "नौकरी" के लिए शहर/बाजार का कोई बासिन्दा शायद ऐसे पिछड़े स्थानों में रहना न चाहे।
बरहरवा से बरहेट जाते वक्त पहले "राजमहल की पहाड़ियों" की दो श्रेणियों को पार करना पड़ता है- दोनों आपस में जुड़ी हुई हैं। एक साँप-जैसी सड़क इन पहाड़ियों पर चढ़ती-उतरती है। उतरने के बाद यह सड़क चार-पाँच और भी श्रेणियों को पार करती हैं- मगर अगल-बगल से- पहाड़ियों पर बिना चढ़े। बीच में रांगा नामक एक कस्बा आता है, उसके बाद एक छोटी-सी बस्ती (नाम अभी ध्यान नहीं) के बाद एक अलग सड़क अस्पताल के लिए घूम जाती है- पहाड़ी की तलहटी से होती हुई।
पिछले दिनों कई बार वहाँ जाना हुआ। रास्ते में बहुत तस्वीरें खींची जा सकती थी, मगर मुझे लगा, इसके लिए बरसात का मौसम सही रहेगा। फिर भी, चन्द्रगौड़ा बस्ती के आस-पास में दो-चार तस्वीरें उतार ली थीं- वे ही यहाँ प्रस्तुत हैं। तस्वीर में "झोपड़ियों" की स्थिति को देखकर आप सहज ही अनुमान लगा सकेंगे हमारे देश के अन्दर दूर-दराज के इलाकों में लोग कैसा जीवन बिताते हैं... देश आजाद होने के प्रायः सात दशक बाद भी...
प्रसंगवश दो बातों का जिक्र जरुरी है।
पहली, बरहरवा भले छोटा-मोटा शहर है, मगर यहाँ चिकित्सा की कोई खास सुविधा उपलब्ध नहीं है- न सरकारी, न निजी। लोग आम तौर पर बंगाल के शहरों (मालदा, रामपुरहाट, बर्द्धमान इत्यादि) या बिहार के भागलपुर का रुख करते हैं- ईलाज के लिए। कहने को दो लेडी डॉक्टर हैं यहाँ, मगर उनकी 'ख्याति' के सामने 'सु' शब्द लगाने से लोग हिचकेंगे... । समझता हूँ, देश के ज्यादातर कस्बों-छोटे शहरों की यही कहानी होगी।

दूसरी, अक्सर सोचता हूँ, हमारे जो बड़े-बड़े तीर्थ हैं- तिरुपति, जगन्नाथपुरी, वैष्णों देवी, इत्यादि, जिनके पास अरबों-खरबों रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट पड़ी-पड़ी सड़ रही हैं, वे आखिर कब इस देश में इसाई-मिशनरियों को टक्कर देते हुए शिक्षण-संस्थानों एवं अस्पतालों की शृँखला कायम करेंगे? कभी करेंगे भी या नहीं? (ध्यान रहे- मैं दो-चार संस्थानों की बात नहीं कर रहा हूँ, एक शृँखला कायम करने की बात कर रहा हूँ।)
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पुनश्च:
मुझे अपने स्कूटर के प्रति यहाँ आभार व्यक्त करना चाहिए- वह 'निर्जीव' है तो क्या?
यह बजाज का 4स्ट्रोक स्कूटर है- "लीजेण्ड"। नम्बर- PB56-8499। पंजाब के रायकोट में रजिस्टर्ड। 1999 का स्कूटर है। उन दिनों मैं लुधियाना-रायकोट के बीच 'हलवारा' में था। (इसका नम्बर मैंने बताया न- 8499, इसे तारीख में बदलने पर बनेगा- 8-4-99 और इसे मैंने खरीदा था 5-4-1999 के दिन!) खैर। मैं इसे चलाता नहीं हूँ- पहले भी कम ही चलाता था। मगर चन्द्रगौड़ा जाते वक्त इसने आराम से पहाड़ियों को पार किया। जब मैं पीछे श्रीमतीजी और सामने अपनी भतीजी को लेकर गया था, तब भी इसने पहाड़ियों को आराम से पार किया। भले यह तेज न चलता हो, मगर वक्त पर इसने मेरा बहुत साथ निभाया। इसलिए यहाँ मैं उसके प्रति आभार व्यक्त करता हूँ... 







128. बसन्त: आस-पास




       मेरे घर के आस-पास तीन चीजें बहुत दिनों से "बसन्त" के आगमन की घोषणा कर रही थीं, मैं उन्हें देख रहा था, महसूस कर रहा रहा था, मगर कुछ कारणों से लिख नहीं पा रहा था। वे चीजें हैं- आम के मंजर, सहजन के फूल और शीशम के पत्ते।
       इस साल मंजर ज्यादा आये हैं। कहते हैं कि हर दूसरे साल ऐसा होता है। कुछ बड़े पेड़ों पर मैंने इतने मंजर देखे कि लगा पत्तियों से ज्यादा मंजर ही हैं! अभी तक दो-तीन बार बूँदा-बांदी जरुर हुई है, मगर आँधियाँ नहीं चली हैं, सो मंजर भी सारे टिके हुए हैं। अब देखा जाय, आम की पैदावार कैसी होती है।
       शाम के वक्त आम के पेड़ों के नीचे से गुजरते समर मंजर की खुशबू जब नथुनों में घुसती है, तब मैं अक्सर एक बात सोचता हूँ- कितने भाग्यशाली होंगे, जिनके नथुनों में यह खुशबू घुसती होगी? कितने ऐसे होंगे, जो घुसती हुई इस खुशबू को महसूस भी करते होंगे?
       अभी जबकि मैं यह लिख रहा हूँ, मंजरों का कैशोर्य एवं यौवन ढलान पर है, और वे परिपक्व हो रहे हैं- फल बनने के लिए...
       ***
       बहुत-से लोग शायद 'सहजन' से परिचित न हों। अँग्रेजी में जिस सब्जी का नाम Drumstick है, वही सहजन कहलाता है। अभी कुछ दिनों पहले तक सहजन के पेड़ सफेद फूलों से लदे हुए थे, अब वे भी कम हो रहे हैं- वहाँ भी फूल से फल बनने का सिलसिला शुरु हो गया है।
       एक नीम्बू का पेड़ भी है, हमारे घर के पिछवाड़े में- उसके फूल तो सारे झड़ हैं अब नन्हें-नन्हें फल दिख रहे हैं- ध्यान से देखने पर।
       ***

       शीशम के पेड़ों पर नये पत्ते आ रहे हैं.. पुराने झड़ रहे हैं...  
       इन सबके अलावे, कोयल की कूक और पपीहा की पीऊ-कहाँ भी सुनायी पड़ने लगी है... 

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

127. 'धूपची मेला'


       मेरे इस ब्लॉग में "टप्परगाड़ी" नाम का एक आलेख है, जिसमें कि "भूईंपाड़ा" मेले का जिक्र है- कि हम अपने बचपन में टप्परगाड़ी में बैठकर मेला जाया करते थे। असल में, उस गाँव का नाम भीमपाड़ा है और उस मेले का नाम "धूपची" मेला है। मेला लगता है माघ महीने के पहले रविवार को। यह सूर्य भगवान को समर्पित मेला है।
मेरा अनुमान कहता है कि माघ महीने के पहले रविवार से धूप में तेजी आती है और इस दिन के बाद से ही किसान धान को धूप दिखाना शुरु करते हैं। धूप में दो-चार दिन रखने के बाद उस धान से चावल बढ़िया बनता है- दाने टूटते नहीं हैं। तो इसलिए यह दिन सूर्य को अर्घ्य देने का एक पर्व बन गया। पर्व को मेला बनते देर नहीं लगा होगा, क्योंकि धान की फसल कटने के बाद किसानों के हाथ में थोड़े पैसे आ जाते हैं। यहाँ मेले में वे अपनी जरुरत की बहुत सारी चीजें खरीद सकते हैं।   
       इस साल 18 जनवरी को यह मेला लगा था। संयोगवश, मैं और जयचाँद वहाँ पहुँच गये। हम असल में चौलिया गाँव गये थे- लौटते वक्त मेला भी घूम लिये।
       आप भी कल्पना कीजिये एक सीधे-सादे ग्रामीण मेले में घूमने का।

       जो एक तस्वीर नहीं ले पाये, वह थी मिट्टी के अनगढ़ खिलौनों की। मैंने जयचाँद को बताया भी, पर उसने कहा कि लौटते वक्त लेंगे, फिर वह रह ही गयी। 

ये बन रहे हैं पत्थर के "सिल", जिनपर मसाला पीसा जाता है. 

मेले का केन्द्रीय हिस्सा. 

जहाँ पीपल के पेड़ पर शोले का एक मुकुट टाँगकर फलों का अर्घ्य चढ़ाया जाता है- भगवान सूर्य को. 



लकड़ी के घरेलू सामान. 

लोहे के सामान- खासकर कृषि औजार.

तफरी के लिए- चावल की शराब या ताड़ी- चखने के साथ. 

जुआ. 

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

126. बचपन




       आज का बचपन मोबाइल की भेंट चढ़ गया है। ऐसे में, जब घर के सामने कुछ बच्चे आकर खेलते और शोर मचाते हैं, तो बहुत अच्छा लगता है- कम-से-कम मुझे।
       हमारे बचपन में खेलने-कूदने का स्थान बहुत ज्यादा होता था। कभी-कभी तो चोर-सिपाही खेलने के लिए एकाध किलोमीटर खेत-खलिहान-बगान की जरुरत पड़ जाती थी। जाड़े में धान कटने के बाद खुद कुदाल उठाकर "गद्दी" के लिए मैदान बनाना हमलोगों का हर साल का काम होता था। (गद्दी चुस्ती-फुर्ती और दम-खम का जबर्दस्त खेल हुआ करता था- टीम वाला।)
       हमलोग एक तरफ क्रिकेट, वॉलीबॉल, बैडमिण्टन खेलते थे, तो दूसरी तरफ डेंगा-पानी, सतमी ताली, लुका-छिपी, बुढ़िया-कबड्डी-जैसे देशी खेल भी बहुत खेलते थे। इसके अलावे, कभी पतंग का दौर चलता था, तो कभी लट्टू का। तब न टीवी हुआ करता था, न कम्प्यूटर न मोबाइल। सो, शाम को- और छुट्टी के दिन दिन में भी- घ्रर से बाहर निकल कर खेलने के अलावे और कोई उपाय ही नहीं था समय बिताने का। हाँ, पत्र-पत्रिकायें और पुस्तकें बहुत मिला करती थीं हमें पढ़ने के लिए- नन्दन, चम्पक, बालक, बाल-भारती, पराग, मेला, चन्दामामा, गुड़िया, कुटकुट, लोटपोट, मधु मुस्कान, अमर चित्र कथायें, इन्द्रजाल कॉमिक्स, राजन-इकबाल के कारनामे वगैरह-वगैरह...
       खैर। ज्यादातर देशी खेल तो खो गये हैं। उनके बारे में लिखना भी चाहूँ, तो शायद न लिख पाऊँ। जैसे कि "ओक्का-बोक्का" ही पूरा याद नहीं आ रहा- 'ओक्का-बोक्का तीन-तिरोक्का, लोहा-लाठी चन्दन काठी, बाग में बगवन डोले, सावन में करैला फूटे..... " बाकी याद ही नहीं रहा...
       देखता हूँ कि कुछ नये खेल बच्चे खेलते हैं। यानि अगर पुराने खेल अगर खत्म हो रहे हैं, तो कुछ नये खेलों का जन्म भी हो रहा है...

       ... यानि दुनिया अभी कायम रहेगी, क्यों? जब तक इस पृथ्वी पर बच्चे खेलते-कूदते, हँसते-चहकते रहेंगे, तब तक भला कौन दुनिया को मिटा सकता है-? 
 

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

125. हिन्दी हमारी- 4



       अपने ब्लॉग के शुरुआती दिनों में मैंने "हिन्दी हमारी" शीर्षक से तीन पोस्ट लिखे थे (पोस्ट क्रमांक 8, 9 और 10)।
       आज उसी में एक और कड़ी जोड़ने जा रहा हूँ। 'प्रभात खबर' के साप्ताहिक परिशिष्ट "अवसर" में आज "सुधारें हिन्दी" स्तम्भ के अन्तर्गत रवीन्द्र कुमार जी ने इसे लिखा है।
       दो उपसर्ग हैं- "अन्तर्" और "अन्तर"। अब तक मैं जानता ही नहीं था कि दोनों अलग-अलग अर्थ देते हैं! अन्तर् उपसर्ग का समानार्थी है "Intra" (इण्ट्रा), जबकि अन्तर का समानार्थी है- "Inter" (इण्टर)।  
       जब हम "अन्तर्राष्ट्रीय" लिखते हैं, तो इसका मतलब होता है- Intra-national, यानि अन्तर्देशीय, यानि देश के अन्दर! मुझे लगता है, ज्यादातर हिन्दीभाषी यह नहीं जानते हैं और इस शब्द का प्रयोग Inter-national के रुप में करते हैं।
       ...जबकि International के लिए हमें लिखना है- "अन्तरराष्ट्रीय", यानि देश के बाहर।
       इस प्रकार, दो अलग-अलग शब्द हैं: "अन्तर्राष्ट्रीय" और "अन्तरराष्ट्रीय"। पहले शब्द के बदले में हम चूँकि "अन्तर्देशीय" शब्द का प्रयोग कर लेते हैं, इसलिए कोई बात नहीं, मगर देश के बाहर के मामलों के लिए हमें "अन्तरराष्ट्रीय" शब्द का प्रयोग करना चाहिए, न कि "अन्तर्राष्ट्रीय" शब्द का।
       आज तक मैं भी यही गलती करता आ रहा था।

       रवीन्द्र कुमार जी तथा "प्रभात खबर" के प्रति मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।