मंगलवार, 6 जुलाई 2021

254. 'तगि'

 


'मेरी जीवनयात्रा' अनुवाद के समय एक बँगला शब्द आया था- 'तगि।' तगि से मछली पकड़ने का जिक्र था। हम पहली बार यह जिक्र सुन (पढ़) रहे थे। हमने सोचा, शायद बन्शी का जिक्र हो। बाद में पाया कि बन्शी के लिए अलग से 'छिप' शब्द का इस्तेमाल हुआ था। यानि 'तगि' कुछ और होनी चाहिए।

हमने जयचाँद के भैया को फोन करके पूछा कि तगि क्या है? उन्होंने बताया कि जैसे पतंग के धागे को लपेटने के लिए एक 'लटाई' होती है ('होती है' क्या, 'होती थी', क्योंकि हमारे इलाके में अब न पतंगबाजी रही और न ही कहीं लटाई वगैरह मिलती है। एक जमाने में क्या क्रेज हुआ करता था इसका! एक-से-एक तरह की लटाई मिलती थी। किसी के हाथों में बढ़िया लटाई देखकर पतंगबाजों को लालच और ईर्ष्या हुआ करती थी।) वैसे ही मछली पकड़ने के धागे को लपेटने के लिए भी लकड़ी का एक उपकरण होता है। इसका धागा मोटा होता है, इसमें काँटों का एक गुच्छा होता है। आटे का बड़ा-सा गोला काँटों पर लपेटा जाता है और इसे तालाब या नदी में दूर फेंका जाता है। यह बड़ी मछलियों को पकड़ने के काम आता है।

हमने कहा कि अब शायद यह नहीं मिलती होगी। उन्होंने बताया कि बुधवार हटिये में अभी भी एक बुजुर्ग मछली पकड़ने के सरंजाम बेचते हैं, उनके पास तगि भी रहती है।

कुछ दिनों बाद संयोग से बुधवार के दिन मेरा उस तरफ जाना हुआ। वे दूकान पर बैठे थे। मुझे देखते ही बोले- आज तो हटिया का दिन है, तगि देखने चलना है?

हम उन बुजुर्ग की दूकान पर गये। उन्हें अपने ससुर से यह व्यवसाय विरासत में मिला है। उनके लड़के दूसरे व्यवसायों में हैं। यानि इन बुजुर्ग के बाद यह साप्ताहिक दूकान बन्द हो जायेगी और मछली पकड़ने के अन्यान्य उपकरणों के साथ "तगि" मिलनी/दिखनी भी बन्द हो जायेगी!

हमने एक विडियो बनाया था वहाँ-   


 

मंगलवार, 29 जून 2021

253. बात गानों की...



जनवरी में हमारी सिल्वर जुबली में उत्सव भवन के हॉल में रंगारंग कार्यक्रम चल रहे थे और छ्त पर खाने की व्यवस्था थी। छ्त पर ही मेरे घरेलू स्पीकर पर कुछ गाने बज रहे थे। बाद के दिनों में मेरे कान तरस गये यह सुनने के लिए कि कोई एक तो कहे कि यार, प्रोग्राम में छत पर जो गाने बज रहे थे, वे लाजवाब थे! यानि किसी का ध्यान इन गानों की तरफ नहीं गया (लगता है, रसोईए "नन्दकिशोर" ने कुछ ज्यादा ही स्वादिष्ट व्यंजन बना दिये थे- हालाँकि व्यंजनों की तारीफ बाद में सुनने मिली भी थी), जबकि हमने बड़े पापड़ बेल कर किसी तरह से नेट से इन गानों को डाउनलोड किया था। उसके पहले बाकायदे सूची बनायी थी कि वे कौन-से रोमाण्टिक गाने हो सकते हैं, जो हम-जैसे पचास+ वालों को अपनी सिल्वर जुबली में बजाने चाहिए।

 

कल गानों पर कुछ बातचीत के दौरान हमने दो दोस्तों के बीच यह सवाल उठा ही दिया कि तुमलोगों ने उस शाम गाने सुने थे या नहीं। पता चला, उनका ध्यान ही नहीं गया था। खैर, अब हम सोच रहे हैं कि वैसे नहीं, तो ऐसे ही लोग इन गानों को सुने। ...तो 25 सुरीले रोमाण्टिक गानों के संग्रह "मेलोडी 25" का लिंक है- यहाँ। बेशक, इन्हें डाउनलोड भी किया जा सकता है।

 

(जिसे 'डिस्क्लेमर' कहा जाता है, वह: ये गाने सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए हैं, जिनकी उम्र पचास साल से अधिक है- नौजवानों के पल्ले शायद न ही पड़े।)

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गाने कुछ ज्यादा डाउनलोड हो गये थे, तो तेज रफ्तार धुन वाले 25 गानों का हमने अलग संग्रह बनाया था- "बीट 25"। उसका लिंक है- यहाँ।


ये गाने वहाँ नहीं बजे थे। दरअसल गोलगप्पे और टिक्की चाट वाले "मोछू" अपने युवा बेटे के साथ छत पर ही चले गये स्टॉल लेकर। अगर वे नीचे वाली जगह पर रहते, तो वहाँ ये गाने बजते- ऐसा हमने सोच रखा था।

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लगे हाथ, "Fitness@उत्सव" की धुनों के संग्रह को भी साझा कर ही दें। इसमें शुरू में 15 मिनट की जो धुन है, उस पर ऐरोबिक्स किया जा सकता है। इसके बाद 6-6 मिनट की दो धुनें हैं, जिनपर कुल बारह मिनट फ्रीहैण्ड एक्सरसाईज की जा सकती है। इसके बाद 4 मिनट की जो धुन है, वह रिलैक्सेशन एक्सरसाईज के लिए उपयुक्त है। अन्त में, योगासन, प्राणायाम और ध्यान के लिए उपयुक्त कुछ धुनें हैं, जिनका कुल समय 15 मिनट से ज्यादा है- शायद 20 मिनट हो। उसका लिंक- यहाँ।

आजकल इन्हीं धुनों पर हमलोग सुबह ऐरोबिक्स, एक्सरसाईज और योगासन करते हैं।

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बुधवार, 9 जून 2021

252. दृष्टिकोण

 


       एक तस्वीर ऊपर है और एक तस्वीर नीचे। ऊपरवाली तस्वीर में खूबसूरती है और नीचे वाली तस्वीर में बदसूरती।

       अब आप ध्यान दीजिए कि दाहिने-बाँये "आक" (एकवन या अकवन) की दो झाड़ियाँ और दूर में खजूर के पेड़ों की पंक्ती के बीच खड़ा मोबाइल टावर दोनों तस्वीरों में मौजूद है। इसका मतलब क्या है?

       जी हाँ, सही समझे। दोनों तस्वीरें बिलकुल एक स्थान पर खड़े होकर ली गयी हैं- बिना एक कदम खिसकाये।

       फिर यह अन्तर क्यों?

       जाहिर है- ऊपर वाली तस्वीर लेते समय मोबाइल के कोण को (धरती से) 90 डिग्री से ज्यादा रखा गया था और नीचे वाली तस्वीर लेते वक्त कोण को 90 डिग्री से कम रखा गया था। एक में आकाश और बादल तो आये ही, प्रकाश का ऐसा असर पड़ा कि वनस्पति की पंक्ती क्षितिज का आभास देने लगी। दूसरी तस्वीर में जमीन का ज्यादा हिस्सा आया और प्रकाश का असर दूसरे ढंग से पड़ा- वनस्पतियाँ स्पष्ट हो गयीं। कचरे का ढेर तो कुछ ज्यादा ही स्पष्ट हो गया।

       यह सब क्या है?

       "दृष्टिकोण" का अन्तर?

       क्या ऊपर वाली तस्वीर "उदार" एवं "उच्च" दृष्टिकोण को और नीचे वाली तस्वीर "संकीर्ण" एवं "निम्न" दृष्टिकोण को दर्शाती है?

    


(पिछले साल अक्तूबर की तस्वीरें हैं।)

 

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सोमवार, 31 मई 2021

251. बुलबुल और बिल्ली

 


       ऐसे तो घर के आस-पास चील, कौआ, मैना, गौरैया, कबूतर, फाख्ता से लेकर शकरखोरा (फूलचुही), दहियर, बुलबुल, नाचन (चकदिल), सतभैयों और जलमुर्गियों तक का बसेरा है, मगर बुलबुल और नाचन के जोड़े ने पिछले कुछ समय से हमारा ध्यान आकर्षित कर रखा है। इन दोनों का बसेरा घर के नैऋत्य कोण वाले झुरमुट (दो-तीन बड़े पेड़ भी हैं) में है।

       बुलबुल और नाचन दोनों दरवाजे के ग्रिल पर आकर शोर मचाती हैं और हमारी बिल्ली 'भूरी' गुस्से में गुर्राते हुए उन्हें लपकने की व्यर्थ कोशिश करती है। शुरू-शुरू में हमने सोचा कि उन लोगों ने घोंसले में अण्डे दे रखे होंगे, इसलिए सतर्कता के तहत बिल्ली को देखकर वे शोर मचाती हैं। बाद में पाया कि उनके बच्चे बड़े भी हो गये, उड़ भी गये, मगर चिड़ियों ने अपनी आदत नहीं छोड़ी।

       कुछ दिन ध्यान देने पर पता चल रहा है कि वे असल में बिल्ली को छेड़ रही हैं। बिल्ली कहीं किसी कोने में चुपचाप सोयी रहती है और बुलबुल और नाचन- खास तौर पर बुलबुल का जोड़ा- ग्रिलवाले दरवाजे पर बैठकर शोर मचाने लगती हैं। मानो, बिल्ली को बुला रही हों- आओ, कुछ देर खेल हो जाय! 


 

       'भूरी' को उठकर आना पड़ता है और सिर उठाकर बहुत-बहुत देर तक दरवाजे के पास बैठे रहना पड़ता है। बेशक, बीच-बीच में वह लपकती भी है, पर स्वाभाविक रूप से यह प्रयास व्यर्थ जाता है। श्रीमतीजी को 'भूरी' पर दया आती है कि बेचारी का गर्दन दुख जाता होगा और दूसरे दरवाजे को भी बन्द कर दिया जाता है (ग्रिल वाले दरवाजे के साथ एक दूसरा दरवाजा भी है)। 


 

...तब देखा जाता है कि चिड़ियाँ खिड़की के ग्रिल पर आकर शोर मचाने लगती हैं। बेचारी 'भूरी' को अब खिड़की के पास आना पड़ता है।

       यह खेल अक्सर चलता है- दिन भर में कई बार।

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