सोमवार, 16 सितंबर 2013

74. अभागा सन्थाल परगना: कोयले के बदले अन्धेरा!


      एक पंजाब है, जहाँ दूर-दराज के गाँवों तक में 24सों घण्टे बिजली रहती है; दूसरा झारखण्ड है, जहाँ 2-4 घण्टे की बिजली को वरदान माना जाता है। पिछले कुछ दिनों से तो हम सन्थाल-परगना वाले 2 से 4 मिनट की बिजली पाकर ही खुश हो रहे हैं।
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 ऐसे में जब हम रोज देखते हैं कि पंजाब की एक प्राइवेट कम्पनी "पैनेम" हमारे सन्थाल-परगना से प्रतिदिन दर्जनों रेलगाड़ियाँ कोयला लेकर जा रही है, तो सोचिये कि हम पर क्या बीतती होगी।
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परसों खबर थी कि 'कोल इण्डिया' लिमिटेड ने 2002 के बाद से न तो लीज का नवीकरण किया है और न ही एक पैसा झारखण्ड सरकार को दिया है, जबकि हजारों एकड़ जमीन से वह अन्धाधुन्ध कोयला खोदकर निकालता है। देश के कई नगर इस कोयला के कारण रातभर जगमगाते हैं।
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शायद आपको यकीन न हो कि हम झारखण्डियों को अपने ही कोयला का इस्तेमाल करने से वंचित कर दिया गया है। जी हाँ, आजकल "कोयला डिपो" का लाइसेन्स झारखण्ड में नहीं मिलता! यानि हम अपनी ही धरती में दबे कोयले से अपने घर का चूल्हा नहीं जला सकते। सारा कोयला मानो कोल इण्डिया वालों के पिताजी का है, जो इसे खोदकर सिर्फ और सिर्फ NTPC को बेचते हैं!
हमारे मजदूर बेचारे साइकिलों पर मनों कोयला लादकर किलोमीटरों दूर-दूर तक ले जाकर बेचते हैं, तब जाकर आम लोगों के घरों/दूकानों में चूल्हे जलते हैं। वह भी क्या, पुलिस की निगाह में यह "तस्करी" है कोयलों की! बड़े-बड़े कोयला माफिया के तो बाल भी नहीं बांका कर सकते, मगर इन गरीब मजदूरों की साइकिलों के टायर जरूर काट डालते हैं वे! अरे पुलिस तो पुलिस, यहाँ के राजनेता- सांसद और विधायक भी- साइकिलों पर कोयला ढोने वाले इन मजदूरों से पैसे वसूलते हैं!  
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इधर झारखण्ड में पिछले 13 सालों में- जबसे यह राज्य बना है- एक भी नया NTPC नही स्थापित हुआ है। उधर इसी दौरान बिहार में 4-4 NTPC बनकर बिजली उत्पादन भी करने लगे हैं। बेशक, उनका कोयला भी सन्थाल-परगना से ही जाता है।
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जी तो करता है कि झारखण्ड के नेताओं और अफसरों को इस मंच से खुले-आम इतनी खरी-खोटी सुनाऊँ कि उनको मुझपर मुकदमा दायर करने के लिए मजबूर होना पड़े! पता नहीं, कितने बड़े-बड़े पेट हैं इनके! पता नहीं, और कितना लूटेंगे-खसोटेंगे अभी ये अपनी ही धरती को!
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आज के अखबार में बिजली विभाग के तरफ से खबर है कि फरक्का NTPC में खराब ट्रान्सफर के कारण बिजली की कमी है। ऐसे बयान तीन हफ्ते पहले भी आये थे! अरे, पब्लिक को निरा मूर्ख समझ रखा है? NTPC में कोई ट्रान्सफर महीने भर तक खराब रहेगा? और उसका असर सिर्फ झारखण्ड के सन्थाल-परगना पर ही पड़ेगा? 
सच क्यों नहीं बताते कि उधारी ज्यादा हो गयी है, आपलोग पैसा नहीं दे सकते, इसलिए फरक्का NTPC ने आपकी बिजली काट दी है? जिस कोयले वह NTPC चलता है, वह आपकी जमीन से निकलता है तो क्या हुआ- इसे खरीद तो वह कोल-इण्डिया से रहा है और कोल-इण्डिया पिछले 10 सालों से बिना रॉयल्टी दिये अन्धाधुन्ध कोयला खोद रहा है आपकी धरती पर- जो करना है कर लीजिये! 
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नहीं कुछ कर सकते तो "कोयले के बदले अन्धेरे" का सौदा मंजूर कीजिये! 





73. कास के फूल से सत्यजीत राय तक

 
       


पता नहीं क्यों, 'कास के सफेद फूल' मुझे बचपन से ही बहुत आकर्षित करते हैं। वर्षा ऋतु के बाद खेतों की मेड़ों पर, जलाशयों के किनारे, रेल-लाईन के ढलानों पर ये खिलते हैं। बचपन में एकबार 'गुनू काकू' से जिद करके इन फूलों को मँगवाया था। 'चौलिया' से आते वक्त वे इन्हें लाये भी थे।
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कास के ये सफेद फूल फिर खिलने लगे हैं। आकाश पर सफेद बादल भी जब-तब दीखने लगे हैं। ये दोनों वर्षा ऋतु के बीतने तथा शरद ऋतु के आगमन के संकेत हैं- हालाँकि अश्विन माह अभी आया नहीं है।
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कास के सफेद फूलों से जो बात याद आती है, वह सत्यजीत राय से जुड़ी है। उन्हें "पथेर पाँचाली" में एक दृश्य दिखाना था, जिसमें अपू और दुर्गा "पहली बार" रेलगाड़ी को देखते हैं। धुआँ उगलता हुआ काला इंजन सीटी बजाते तथा धड़धड़ाते हुए एक ट्रेन को लेकर दूर से गुजरता है और दोनों आश्चर्य से उसे देखते हैं। राय सोच रहे थे कि इस दृश्य को कैसे फिल्माया जाय कि यह यादगार बन जाये!
       फिर उनका ध्यान कास के फूलों पर गया। बेशक, फिल्म रंगीन नहीं थी उस जमाने में। ऐसे में, काले इंजन के दृश्य को यादगार बनाने के लिए उसे कास के सफेद फूलों की पृष्ठभूमि में फिल्माने से बेहतर विकल्प और क्या हो सकता था! उन्न्होंने यही किया भी।
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इसी फिल्म से जुड़ी एक और बात- लगे हाथों। फिल्म के अन्त में अपू को दुर्गा के सामान में वह हार मिलता है, जो चोरी का होता है। पटकथा के अनुसार अपू को उस हार को जंगल में फेंकना था। मगर राय इस दृश्य को भी यादगार बनाना चाहते थे। कैसे इस दृश्य को फिल्माया जाय- यह सोचते हुए वे एक तालाब में कंकड़ फेंक रहे थे। अचानक एक कंकड़ पानी की सतह पर जमी 'काई' पर गिरा और कंकड़ बहुत धीरे-धीरे पानी में समाया... बस, उन्हें आइडिया मिल गया!
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गुरुवार, 12 सितंबर 2013

72. फिर से अइयो / बदरा विदेशी


बहुत पहले हमलोग गुलजार के गीतों का एक कैसेट सुना करते थे।
हर गाने से पहले गुलजार साहब ने अपनी खास शैली तथा आवाज में गीत की भूमिका बाँध रखी थी।
कल सुबह एक पहाड़ी की चोटी पर ढले हुए साँवले बादलों को देखकर मुझे उनकी एक पंक्ति याद आ गयी: "...हाँ, वह पहाड़ का टीला जब बादलों से ढक जाता था, तब एक आवाज सुनायी देती थी.."
फिर गाना शुरु होता था:
"फिर से अइयो / बदरा विदेशी
तेरे पंखों में / मोती जड़ूँगी।
तुझे काली कमली वाले की सौं..."
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रविवार, 8 सितंबर 2013

71. "मोती झरना" का एक पुराना दृश्य



मैं बहुत दिनों से सोच रहा हूँ कि "कजंगल" नाम से एक ब्लॉग या/और फेसबुक पेज की शुरुआत करूँ- यह हमारे इलाके का प्राचीन नाम है, मगर दिमाग अब तक ठीक से "पटकथा" नहीं बना पाया है कि यह क्या होगा, कैसा होगा, इत्यादि.
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इधर-उधर 'सर्फ' करते हुए एक पुरानी पेण्टिंग दिखी- "मोती झरना" की. मोती-झरना की यात्रा की चित्रकथा को मैंने पिछले महीने ही प्रस्तुत किया था. चित्र का पीछा करते हुए मैं "कजंगला" नाम के ब्लॉग तक पहुँचा, जिसके रचयिता हैं- संजय पाण्डेय. उन्होंने 'राजमहल की पहाड़ियों' पर कविता भी लिखी है. कविता इस प्रकार है: 

राजमहल की पहाड़ी:भूगोल से इतिहास के पन्नो पर !

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कल इतिहास के पन्ने पलटते पलटते
किसी चिर-परिचित चेहरे पे नज़र ठिठकी,
कुछ देर निःस्तब्ध हम दोनों
एक दुसरे को देखते रहे लगाये टकटकी;
और फिर संकोच की सीमा लांघकर
उस धर-विहीन सर ने पूछ ही डाला 
'क्यों पहचाना नहीं क्या,
मैं वही हूँ राजमहल की पहाड़ी 
जिसका तुमलोगों ने गला घोंट डाला' 
मैं उत्कंठा में पूछ बैठा: पर
तुम तो भूगोल के किताबों में मिलती थी,
तुम्हे इतिहास की बेजान पड़े पन्नो में किया किसने दफ़न?
कभी उसके सर से निस्सृत झरना,
उसके आँखों से झरने लगा 
मुगलकाल से उसके गोद पे बैठे तेलियागढ़ी के किले ने 
अपने टूटे हांथों में तौलीया ले सुबकती सहेली का टेसू पोछा 
 और मुझपर बरस पड़ा: 'तुम उत्श्रींखल मानवों ने देखो कैसे इस 
विशाल पर्वत श्रंखला को सपरिवार इहलोक से परलोक पंहुचाया,
पहले पहाड़ की रानी की हरित केशराशियाँ 
तुमने कुछ स्वर्ण राशियों के लालच में मुढवाये,
और फिर पर्वत सुंदरी के संतानों से ही 
उसके सिने पे सावल, गड़ासी चलवाए,
संतति के हाथों जननी के प्राण लिवाये,
फिर भी जब न भरा तुम्हारा जी,
तो अधमरी, सरकटी प्रकृति प्रहरी पर 
तुमने अनवरत बम वर्षण करवाए 
अब तो उसकी संतति, हड़प्पा संस्कृति के आखरी स्मृति,
पहाड़िया प्रजाति भी काल के गाल में जाती नज़र आती है,
और देखो तुम्हारी वेह्शियत खुद पे कैसे इतराती है 
शुक्र है तुमसा नाशुक्रा प्रजाति शंकर ने एक ही बनाया 
पले-बढे खेल के जिस छाती पर,
उसपे मुंग डालते हिचके न  छटाक भर,
खनन खुमारी मे जने कब् तुमने
काट दी मेरी चोटी, कब् रेत दी मेरी नलेटी,
अभी भी वक़्त शेष है, उठो जागो ए पाषाण-हृदयी इंसानों
पर्वत और जीवन के चिरकालिक प्रणय को पहचानो,
सभ्यता हमेशा मेरी उँगलियाँ पकड़ 
समय की पगडंडियों पे चलती रही है,
पर तुम्हारी ये पीढ़ी सफलता की सीढ़ी
चढ़ने की होड मे विनाश के राह चल पडी है
बस करो! बन्द करो अब प्रकृति कर चिरहरन,
भागवन के वस्ते रहने दो  बाकी है
जितन भी ज़िस्म पे हरित वसन


http://kajangala.blogspot.in/2011/11/blog-post.html 
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बता दूँ कि ब्लॉग लेखक ने बाकायदे जिक्र कर रखा है कि इस चित्र का स्रोत कोलम्बिया विश्वविद्यालय है. 

70. बाढ़






       जैसा कि पहले मैंने कभी जिक्र किया था कि आषाढ़ का दूसरा पखवारा हमारे इलाके में सूखा बीता था- लोगों को सुखाड़ का डर सताने लगा था। मगर सावन अपने साथ काली घटायें लेकर आया, खेतों में पानी जमा और धान के पौधे रोपने का काम पूरा हुआ। भादों के पहले पखवारे में अच्छी-खासी बारिश हो गयी। उधर उत्तर-प्रदेश में कुछ ज्यादा ही बारिश हो गयी। गंगा का जलस्तर बहुत बढ़ गया।
हमारे इलाके के दो शहर गंगाजी के किनारे बसे हैं- साहेबगंज और राजमहल। ये दोनों प्रखण्ड तो बाढ़ की चपेट में आ ही गये हैं; साहेबगंज का पड़ोसी प्रखण्ड तालझारी तथा राजमहल का पड़ोसी प्रखण्ड उधवा भी चपेट में है। तीन हफ्ते गुजर गये- गंगाजी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर ही खड़ा है!
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अब चूँकि ऋतु-परिवर्तन की आहट मिलने लगी है, इसलिए उम्मीद है कि अब बारिश नहीं होगी और जलस्तर घटेगा। तीन दिनों पहले शाम 'पछुआ' चल रही थी। धूप में तेजी घट गयी है। शाम जल्दी घिरने लगी है। 'कास' के सफेद फूल खिलने लगे हैं। हालाँकि भादों का आधा समय बाकी है, मगर 'आसिन' का आहट मिलने लगी है, जब जमीन पर सफेद कास के फूल और आकाश में हिमालय-जैसे सफेद बादल दिखाई पड़ते हैं... यानि शरत काल की शुरुआत।
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बाढ़ की बात पर याद आयी- रक्षाबन्धन के ठीक बाद वाले दिन मेरी ट्रेन लेट थी- रात के अन्धेरे में यह महाराजपुर पार कर रही थी। पिछली रात ही पूर्णिमा थी, इसलिए आज भी चाँद पूरा दीख रहा था। ओह, क्या दृश्य था! गंगाजी की विशाल जलराशि के ऊपर चमकता पूरा चाँद! काश, मेरे पास अच्छे दर्जे का कैमरा होता! मैं जान रहा था- इस समय 'दियारे' (टापु) पर रहने वाले लोगों की जिन्दगी नर्क समान है, मगर इस दृश्य को देखकर अभिभूत हुए बिना मैं नहीं रह सका!
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शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

69. तीनपहाड़ जंक्शन की चाय-दूकान (तथा कुछ दूसरी बातें)


जब भी तीनपहाड़ जंक्शन की इस छोटी-सी चाय दूकान को देखता हूँ, मुझे एक बँगला उपन्यास की याद आ जाती है। उपन्यास का नाम था- "रिटायर्ड"। लेखक थे- निमाई भट्टाचार्य। बहुत समय पहले पढ़ा था। यह उपन्यास आत्मकथात्मक शैली में रची गयी रचना थी, जिसके नायक रिटायर होने के बाद जिन्दगी का सिंहावलोकन कर रहे हैं। नायक जब नौकरी वाले स्थान से घर लौटते थे, तब "अपर इण्डिया एक्सप्रेस" से लौटते थे और यह ट्रेन मुँह अन्धेरे तीनपहाड़ स्टेशन पर रुकती थी। यहाँ ट्रेन से बाहर आकर वे चाय जरूर पीते थे।
पता नहीं क्यों, मुझे हमेशा यही लगता है कि इस वर्णन के पीछे जरूर लेखक निमाई भट्टाचार्य का अपना खुद का अनुभव है। (बता दूँ कि बरहरवा से तीनपहाड़ की दूरी ट्रेन से 15 मिनट है.) ..साथ ही, इस दूकान को देखकर मुझे यही लगता है कि जरूर वे इसकी बनावट से आकर्षित हुए होंगे और यहीं वे चाय पीते होंगे। हो सकता है, इसके अलावे और कोई चाय कैण्टीन ही न हो- उस जमाने में। आज यहाँ कैसी चाय बनती है, पता नहीं; पर उस जमाने में जरुर कड़क चाय मिलती होगी यहाँ, जिसे मुँह-अन्धेरे भोर में पीकर मिजाज ताजा हो जाया करता होगा!
       टिप्पणी: निमाई भट्टाचार्य के कुछ उपन्यासों का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है:
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       बात निकलती है, तो दूर तलक ही नहीं जाती- इधर-उधर भी जाती है।
       सबसे पहले निमाई भट्टाचार्य के एक और उपन्यास की बात, जो मुझे बेहद पसन्द आयी थी उन दिनों। उन दिनों से मेरा मतलब- वे मेरे यौवन के दिन थे। उपन्यास का नाम था- "मेम साहेब"। उसमें लेखक ने एक गुमनाम शायर के एक शेर का जिक्र किया था, जो मुझे याद रह गया है:
       ज़िश्त पे इन्क़्लाब आने दे
       कमसिनी पे शबाब आने दे,
       ऐ ख़ुदा तेरी ख़ुदाई मिटा दूँगा
       जरा होंठों तक शराब आने दे!
       मरने और जीने का फैसला होगा,
       जरा उनका जवाब आने दे!!
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       अब "अपर इण्डिया एक्सप्रेस" की बात।
यह एक जमाने में हमारे इलाके की प्रतिष्ठित ट्रेन हुआ करती थी- दिल्ली से सियालदह (कोलकाता) के बीच चलती थी। बरहरवा जंक्शन- यानि हमारे स्टेशन पर- इसकी "अप" व "डाउन" दोनों ही ट्रेनों का समय भोर में तीन से साढ़े तीन बजे का था। पता नहीं किस चमत्कार से यह समय अब तक बना हुआ है और अक्सर भोर में दोनों ट्रेनें- अप व डाउन- एकसाथ बरहरवा स्टेशन पर खड़ी रहती हैं।
अब इस ट्रेन की इज्जत तार-तार हो चुकी है। 1987 में (ऑपरेशन 'ब्रासटैक्स' के दौरान) इसे दिल्ली के बजाय मुगलसराय तक चलाया जाने लगा- बताया गया कि ऑपरेशन के बाद इसे फिर से दिल्ली तक चलाया जायेगा। मगर बाद में इसे "सियालदह-मुगलसराय एक्सप्रेस" ही बना दिया गया। अब यह "सियालदह-वाराणसी एक्सप्रेस" है- इलाके की एक बदनाम ट्रेन, जो "पैसेन्जर ट्रेन" की तरह चलती है, जिसमें सिर्फ दो ही "आरक्षित" बोगी है, उसमें आरक्षण का कोई मतलब नहीं होता। बस पुराने लोग इसे "अपर इण्डिया एक्सप्रेस" पुकार लेते हैं- यही इसकी बची-खुची प्रतिष्ठा है।
       आश्चर्य की बात यह है कि तब से लेकर आज तक- साहेबगंज लूप लाईन होकर- दिल्ली-कोलकाता को जोड़ने वाली एक भी ट्रेन नहीं है! न तो रेलवे का इस तरफ ध्यान जाता है, न ही इलाके की जनता का।
मेरे हिसाब से, "अपर इण्डिया एक्सप्रेस" को ही उसकी खोयी प्रतिष्ठा लौटायी जानी चाहिए।
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       अब एक और ट्रेन की बात।
       किसी जमाने में कटिहार से बरहरवा के बीच ट्रेन चलती थी। उसी ट्रेन में सबसे पहले हमने "डीजल इंजन" को देखा था। उस जमाने में कटिहार से पूर्णिया, अररिया, जोगबनी जाने वाली रेल लाईन "मीटर गेज" हुआ करती थी। और भी दो-तीन दिशाओं में- मनिहारी के तरफ, मानसी के तरफ- जानेवाली पटरियाँ मीटर गेज ही हुआ करती थीं।
बाद में पता नहीं क्यों, इस ट्रेन को बन्द कर दिया गया। अब उधर की सारी मीटर गेज पटरियों को "ब्रॉड गेज" से बदल दिया गया है- मगर आज तक रेलवे वालों ने इन दोनों इलाकों को- मेरा मतलब गंगाजी के इस पार और उस पार वाले इलाकों को- ट्रेन से जोड़ने के बारे में नहीं सोचा। साहेबगंज से एक ट्रेन मालदा तक जाकर दिन भर वहीं पड़ी रहती है, फिर शाम को लौट आती है- पता नहीं, उसे ही कटिहार होते हुए जोगबनी तक क्यों नहीं चलाया जाता!
लोग आज भी साहेबगंज घाट से स्टीमर से ही गंगाजी पार करके मनिहारी जाते जाते हैं और फिर वहाँ से कटिहार, फिर कटिहार से पूर्णिया, अररिया, जोगबनी वगैरह। ठीक है कि मेरे-जैसे दो-चार सरफिरों को यह रूट पसन्द है, मगर बहुत-से लोग ऐसे होंगे, जिन्होंने इस रूट की परेशानियों को एक बार झेलने के बाद दुबारा इधर मुँह नहीं किया होगा।
फरक्का के बाद जो दूसरा पुल बना गंगाजी पर, वह भागलपुर के पास और उस पुल पर पता नहीं क्यों, रेल की पटरियाँ नहीं बिछायी गयीं!
साहेबगंज-मनिहारी के बीच गंगा पुल का ख्याली पुलाव जनता वर्षों से खा रही है, मगर स्थानीय नेताओं से बात की जाय, तो वे चौंक जायेंगे- ऐं! साहेबगंज-मनिहारी के बीच गंगा-पुल? ऐसा तो हमने कभी नहीं सुना!
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बुधवार, 4 सितंबर 2013

ताड़ का गुलगुला

ताड़ का पका हुआ फल


उसे छीलकर एक छिद्रयुक्त बर्तन पर घिसा गया... (चलनी पर भी घिसा जा सकता है. किसी जमाने में टोकरी को धो-धाकर उसे उलट कर उसी पर घिसा जाता था.)

इस तरह का द्र्व जमा होगा... इसकी खुशबू दूर तक फैल जायेगी. 
इसमें आटा, चीनी, घिसा नारियल वगैरह मिलाकर इसके गोले बनाकर उन्हें तल लिया जाय...

ताड़ का गुलगुला तैयार है...