रविवार, 14 जुलाई 2013

56. धान-रोपनी: कहीं कुछ खो-सा गया है



       धान-रोपनी का काम पूरे जोरों पर है।
       हमारे आस-पास के खेतों पर कालोनियाँ बस चुकी हैं।
       अल-सुबह हल के घिसटने की आवाज अब नहीं सुनायी पड़ती- पहले जब किसान खेतों की ओर जाते थे, तब जोड़ा बैलों की गर्दनों पर टँगा हल आवाज करते हुए घिसटता जाता था।
       इधर-उधर जाने पर दूर से ही धान-रोपनी देखने का मौका मिला।
       मगर लगता है- कहीं कुछ खो गया है...
       बाँस के छिलकों से बनी वह बड़ी-सी शानदार टोपी कहीं नहीं दीखी, जिसे किसान हल चलाते वक्त सर पर पहनते थे और जो उन्हें धूप-वर्षा से बचाती थी।
       बड़े-बड़े पत्तों को कायदे से गूँथकर बनाया गया वह प्राकृतिक "रेनकोट" तो खैर, बहुत पहले से विलुप्त हो गया है- इसका स्थान प्लास्टिक के रंग-बिरंगे रेनकोट ने ले लिया था। मगर कहाँ- वह रंग-बिरंगा रेनकोट भी तो गायब है। पहले धानरोपनी के इस समय पर प्रायः हर दर्जी इन रेनकोटों को सिलने में व्यस्त हो जाता था। अब शायद वर्षा ही ढंग से नहीं होती है।
       धान-रोपनी के लोकगीतों की स्वरलहरियाँ भी कहीं से नहीं उभरीं। ठीक से याद नहीं, पर शायद सन्थाल महिलायें ही धान रोपते वक्त गीत गुनगुनाती थीं।
अब शायद यह स्वरलहरी कभी किसी खेत से नहीं उठेगी...
       *****   

रविवार, 7 जुलाई 2013

55. पहाड़ और पत्थर




  
      बचपन में रेलगाड़ी में बैठकर साहेबगंज जाते वक्त हमलोग अक्सर बाईं तरफ पहाड़ियों को निहारा करते थे। छोटे-छोटे धान के खेत, खजूर के पेड़ों की बेतरतीब कतारें, छोटे-बड़े मैदान, ताल-तलैये, छोटे-छोटे स्टेशन, सब अच्छे लगते थे। साहेबगंज से ठीक पहले सकरीगली में पहाड़ की एक चोटी गर्व से सिर उठाये रेलयात्रियों का स्वागत किया करती थी।
ट्रेन से पहाड़ियों को निहारने की आदत मेरी अब भी बनी हुई है- खासकर, बरसात में।
मगर अब एक अन्तर आ गया है- एक टीस-सी उठती है मन में। ऐसा लगता है किसी ने विशाल उस्तरे से पहाड़ियों के सीने को छलनी-छलनी कर दिया है! हर जगह पत्थरों के खदान, हर जगह क्रशर, हर जगह पत्थर (बोल्डर, गिट्टी, डस्ट, इत्यादि के रुप में) से लदे ट्रकों की कतारें... चौबीसों घण्टे, सातों दिन, बारहों महीने...!
और सकरीगली की वह चोटी? उसका तो सर ही कट गया है! पत्थर खोदने वालों ने उस चोटी का ज्यादातर हिस्सा खा लिया है। अब वह चोटी रेलयात्रियों का स्वागत नहीं करती, बल्कि रोते-सिसकते हुए अपना दर्द बयां करती है कि देखो, मेरी क्या दुर्गति हो गयी है! वह सावधान भी करती है- चेत जाओ, वर्ना मिर्जाचौकी (जहाँ से झारखण्ड राज्य की सीमा तथा राजमहल की पहाड़ियों की शृंखला शुरु होती है) से लेकर पाकुड़ तक हर पहाड़ की यही दुर्गति होगी!
सकरीगली का यह 'गदवा पहाड़' अब 'मुड़कटवा' (सिरकटा) पहाड़ कहलाने लगा है- यह "लैण्डमार्क" बन गया है- इस इलाके में अन्धाधुन्ध पत्थर खनन का।
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मिर्जाचौकी से पाकुड़ तक का क्षेत्र करीब 100 किलोमीटर लम्बा है। मिर्जाचौकी से बाकुडीह तक, यानि करीब 70 किलोमीटर तक, रेलपथ व सड़क पहाड़ियों के साथ-साथ चलती हैं। इसलिए यहाँ ट्रेन या गाड़ी से गुजरते वक्त खनन व्यवसाय का थोड़ा-बहुत अन्दाज लग जाता है। मगर बाकुडीह के बाद पहाड़ियाँ रेलपथ व सड़क से दूर हो जाती हैं और खनन कितने बड़े पैमाने पर होता है- इसका अनुमान पहाड़ों की ओर गये बिना नहीं लगता। इन इलाकों में बड़े पैमाने पर अत्याधुनिक मशीनों से दिन-रात खनन होता है। पहाड़ों से जानवर तो कब के गायब हो चुके हैं अब खदानों के आस-पास नगर बसने लगे हैं और रातभर काम होने लगा है, इसलिए अब शायद पंछी भी न रहें इन पहाड़ों में।
पहाड़ों के अलावे जमीन के नीचे से भी पत्थर निकाले जाते हैं- तालाब-जैसी खुदाई करके- यह सिलसिला पश्चिम बंगाल के पड़ोसी जिले बीरभूम तक चलता है। कहा जा रहा है कि चूँकि इन तालाबों में काफी गहरी बोरिंग करके विस्फोट किये जाते हैं, इसलिए निकट भविष्य में इस इलाके का भूजल स्तर नीचे जाने वाला है!
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किसी के पास कोई आँकड़ा उपलब्ध नहीं होगा। बस यूँ समझ लीजिये कि करीब 1,000 खदानें और 10,000 क्रशर यहाँ होंगे! प्रतिदिन 10,000 ट्रक तो यहाँ से पत्थर लेकर निकलते ही होंगे। दिन में जितने ट्रक आपको दीखेंगे, उससे 10-20-30 गुना ज्यादा ट्रक रात में निकलते होंगे। ज्यादातर खदान गैर-कानूनी हैं। जो कानूनी हैं, वे अपने रकबे से कईगुना ज्यादा रकबे में खुदाई करते हैं। एक विस्फोट की अनुमति पर 50 विस्फोट यहाँ किये जाते होंगे! क्रशर की धूल आस-पास के लोगों के स्वास्थ्य के साथ-साथ आस-पास की जमीन को भी नुकसान पहुँचाती है। पर्यावरण के नियमों की हर कदम पर धज्जियाँ उड़ायी जाती है।
पहले 6 पहियों के ट्रक चलते थे- अब 10 से कम पहियों वाले ट्रक दीखते ही नहीं हैं। 100 किलोमीटर के इस इलाके के हर गाँव, हर कस्बे, हर शहर की सड़कों को कबाड़ बना देते हैं ये ट्रक। सड़कें बनती हैं 18 टन तक वजनी गाड़ियों के लिए और ये ट्रक 36 ट्न वजनी होते हैं! (बाद में पता चला, इन ट्रकों में 40 टन से ज्यादा लोड होता है!) कहने को ऐसा नियम है कि इन भारी वाहनों को दिन के वक्त बाजारों से नहीं गुजरना होता है- मगर सुबह से शाम तक हर बाजार की सड़कों को ये जाम करते रहते हैं। दिन के मुकाबले रात में इन ट्रकों की संख्या 20-30 गुना तो बढ़ ही जाती होगी।
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जहाँ तक मालगाड़ियों की बात है, हफ्ते में सैकड़ों 'रेक' इस इलाके से निकलती होंगी। शायद "पाकुड़ स्टोन" का नाम आपने भी सुना हो- यहाँ के पत्थर को बहुत ही उम्दा किस्म का पत्थर माना जाता है- बाँध, सड़क, मकान, इत्यादि के निर्माण के लिए सर्वथा उपयुक्त।
प्रसंगवश- अँग्रेजों ने तीसरी (या शायद दूसरी) रेल लाईन इसी साहेबगंज रेल खण्ड के रुप में बिछाई थी- 1863 में। उनका मकसद शायद इन पत्थरों का दोहन ही था। क्योंकि बहुत-सी ऐसी पुरानी पटरियाँ हैं, जो इन इलाकों में पहाड़ियों के अन्दर दूर तक जाती हैं। कुछेक पटरियों का पिछले कुछ वर्षों से फिर से उपयोग किया जाने लगा है, मगर ज्यादातर को उखाड़ डाला गया है- अब यह रेलवे ने उखड़वाया है या तस्करों ने, यह नहीं पता।
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बिहार में पत्थर खनन पर रोक लग गयी है और बंगाल में भी कुछ कड़ाई की जा रही है शायद। इसलिए खनन का पैमाना यहाँ झारखण्ड में दो-तीन गुना बढ़ गया है। झारखण्ड जब से बना है, यहाँ शासन, प्रशासन और पुलिस किस चिड़िया का नाम है- लोग भूल ही गये हैं- हर तरफ अराजकता... जिसका जहाँ मन कर रहा है, पहाड़ खोदो, पत्थर निकालो... बस जो माँगे, उसे हफ्ता पहुँचाते रहो....! लूट लो झारखण्ड को! फिर मौका मिले, न मिले।
अब प्रायः हर खदान "फुल्ली ऑटोमेटिक" हो गया है, हर जगह बड़े-बड़े जे.सी.बी. और जेनरेटर चलने लगे हैं।
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जिन रास्तों से ये पत्थर लदे ट्रक गुजरते हैं उन रास्तों में पड़ने वाली पुलिस चौकियों के थानेदार की पोस्ट कितने रुपये में "नीलाम" होती है, इसका हम और आप अनुमान भी नहीं लगा सकते! यकीनन, अनुमान नहीं लगा सकते!! कारण यह है कि ये ट्रक अपनी क्षमता से दो-ढाई गुना ज्यादा लोड लेकर चलते हैं और बहुत-सी गाड़ियों के  'कागज-पत्तर' ठीक नहीं होते हैं।
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ऐसा नहीं है कि इस समस्या का कोई इलाज नहीं है। इलाज सीधा-सादा है कि आज से 25-30 साल पहले जिस तरह से खनन होता था, उसी तरीके को फिर से अपना लिया जाय- न बड़े ट्रक चलें, न जेसीबी और पोर्कलेन, न क्रशर पूरी तरह से ऑटोमेटिक हों और न ही शाम ढलने के बाद काम हो!
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साथियों, एक अनुरोध है।
आगे से जब भी आपका ध्यान रेल-पटरियों के किनारे बिछे पत्थरों पर जाये, या जब भी आप किसी सुपर हाई-वे गुजरें, या कोई विशाल पुल या बाँध देखें, या अपने ही मकान की छत की ढलाई करवायें, तो एकबार कृपया याद जरूर कर लें कि ये पत्थर राजमहल की (या किन्हीं और) पहाड़ियों से निकलकर आये हैं और इन्हें निकालने के लिए इन पहाड़ियों को तिल-तिल कर मारा जा रहा है... इन पहाड़ियाँ का सीना क्षत-विक्षत, लहू-लुहान हो रहा है... ये मर रही हैं... विश्वास कीजिये- ये मर रही हैं...
यह भ्रम है कि पहाड़ नहीं मरेंगे और थोड़ा-सा पत्थर निकाल लेने से इनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। हमारे पूर्वज पहले ही कह गये हैं-
"शश्वदुपभोगे गिरिरपि नश्यति।"
अर्थात्, निरन्तर उपभोग करने से पर्वत भी समाप्त हो जाता है। (गद्यचिन्तामणि 1/3)।
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रविवार, 30 जून 2013

54. अभिमन्यु कॉलेज में





       हो सकता है, मेरा फैसला गलत हो। हो सकता है, आगे चलकर अभिमन्यु मुझे दोषी ठहराये। मगर मैंने उसे पढ़ने के लिए "बाहर" नहीं भेजा, जो कि यहाँ बरहरवा में एक ट्रेण्ड बन चुका है।
ज्यादा-से-ज्यादा मैं उसे जिला शहर स्थित साहेबगंज कॉलेज (साहेबगंज 55 किलोमीटर दूर है बरहरवा से और ट्रेनें बहुत हैं- भले वे लेट-लतीफ भी बहुत होती हैं) में पढ़ाना चाहता था। मगर दिक्कत यह हुई कि प्रथम श्रेणी वालों का सीधा नामांकन हो रहा था और इसके लिए एस.एल.सी. की जरुरत थी। अभिमन्यु की एस.एल.सी. अररिया से 'कूरियर' द्वारा भेज दी गयी थी, मगर वह हम तक पहुँची आठवें दिन! तब तक नामांकन की तिथि निकल गयी।
अपने बरहरवा के बी.एस.के. कॉलेज में अन्तिम तिथि 26 जून थी और यहाँ भी साहेबगंज कॉलेज वाला नियम लागू था। संयोग से 25 को एस.एल.सी. पहुँच गयी। 26 जून को एडमिशन हो गया।
इस कॉलेज की स्थापना 1977-78 में हुई थी। तब शिवबालक राय प्रिन्सिपल थे। उन्होंने मेरी बड़ी दीदी का नाम सबसे पहले कॉलेज में लिखा था- इस प्रकार मेरी बड़ी दीदी (जो अभी अररिया में है, जहाँ मैं रहा 5 साल) इस कॉलेज की "पहली" विद्यार्थी है।
पहले बैच के ही कुछ छात्र बाद के दिनों में कॉलेज में स्टाफ बने। ऐसे ही एक स्टाफ नाम लिखाने के समय आवेदन तथा संलग्नक जाँच रहे थे। उन्होंने शायद मुझे ठीक से पहचाना नहीं। अभिमन्यु से पूछा- "कहाँ घर हुआ?" पीछे से मैंने कहा- "मेरा बेटा है, डॉक्टर जे.सी. दास का पोता।"
"अरे बाप रे!" उनके मुँह से निकला और उन्होंने झट आवेदन पर हस्ताक्षर करके प्राचार्य की ओर जाने का इशारा कर दिया।   
बाद के दिनों में इस कॉलेज की प्रतिष्ठा कम हो गयी थी- यह एक सच्चाई है। अब जो नये प्रिन्सिपल आये हैं, उन्होंने इसकी प्रतिष्ठा फिर से कायम करने के लिए कुछ कदम उठाये तो हैं। अब देखा जाय। वे तो "ड्रेस कोड" की भी बात कर रहे थे और नामांकन के समय अभिभावक का साथ होना उन्होंने अनिवार्य कर रखा था।
चित्र में अभिमन्यु की पृष्भूमि में कॉलेज का एक नया भवन भी दीख रहा है। ये भवन विन्दुवासिनी पहाड़ के पीछे की तलहटी में बने हैं और नये भवन का उद्घाटन कुछ ही दिनों पहले कुलपति के हाथों हुआ। (तभी तो 26 तक नामांकन चला, वरना यहाँ भी 20 जून को ही नामांकन बन्द हो जाता!) पहले यह कॉलेज विन्दुवासिनी पहाड़ पर स्थित "वानप्रस्थ आश्रम" के भवन में चलता था- मैं भी उसी में पढ़ा हूँ।
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विषयान्तर।
अखबारों में कोचिंग इंस्टीच्यूट वालों के दो-दो पेज विज्ञापन छपते हैं। इनमें सैकड़ों तथाकथित मेधावी छात्रों की तस्वीरें छपी होती हैं। यह "कोचिंग" परम्परा 20-25 वर्षों से तो चल ही रही है। क्या कोई बता सकता है कि जब ये इंस्टीच्यूट इतनी बड़ी मात्रा में मेधावी छात्रों को तैयार करते हैं, तो पिछले कुछ वर्षों में विज्ञान, तकनीक, अभियांत्रिकी के क्षेत्र में भारत का विश्व में क्या योगदान रहा है?
अगर कोई योगदान नहीं है (शायद है भी नहीं), तो जाहिर है कि यहाँ 'थ्री इडियट्स' के "चतुर" पैदा किये जाते हैं- जिनके जीवन का सिर्फ एक ही उद्देश्य होता है- रट्टा मारकर परीक्षायें पास करके मलाईदार नौकरी हासिल करना! विज्ञान या तकनीक या इंजीनियरिंग के प्रति इनके मन में कोई "पैशन" नहीं होता।
मैं आशा कर सकता हूँ कि मेरा बेटा अभिमन्यु कभी भी इन कोचिंग इंस्टीच्यूटों में जाने की इच्छा व्यक्त नहीं करेगा- वैसे भी, घिसी-पिटी लीक पर चलना वह पसन्द नहीं करता।
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रविवार, 23 जून 2013

53. विदा अररिया...










       "रियाज़" की उम्र अभी बस डेढ़ साल है। वह एक नन्हा बच्चा है। हो सकता है हमें न देखने के बाद वह जल्दी ही हमें भूल जाय।
       मगर हम बच्चे नहीं हैं। हम उसे कैसे भूलें?
कैसे वह हमारे घर में आकर खुश हो जाता था... कैसे घण्टों वह हमारे साथ बिताता था... कितने शौक से 'मैगी' खाता था... कैरम की गोटियों से तथा दूसरी चीजों से खेलता रहता था... इन बातों को हम तो कभी भूलने से रहे।
उसे अब कब देख पायेंगे, पता नहीं। वह पहले की तरह हमारे पास आयेगा या नहीं, पता नहीं। 
       ***
       लगभग पाँच साल बिताकर हम अररिया छोड़ आये।
       किसी अनुभवी व्यक्ति ने बताया था कि बिहार में चार जिले ऐसे हैं, जहाँ वह "बिहारी" कल्चर नहीं पाया जाता, जिसके लिए सारा बिहार बदनाम है- और वे जिले हैं- अररिया, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज। मैंने भी यही अनुभव किया।
       यूँ तो अररिया में मेरी बड़ी दीदी की शादी 1984 में ही हुई थी, पर पिछ्ले लम्बे समय से मेरा अररिया आना-जाना बन्द था। तीन रास्ते हैं, तीनों अलग-अलग किस्म के सरदर्दों से भरे पड़े हैं- सो यहाँ आने से मैं बचने लगा था। बाद में ऐसा हुआ कि 2008 से मुझे एक तरह से यहाँ बसना पड़ा। इसी बहाने दीदी-जीजाजी तथा अन्य परिजनों से सम्बन्ध फिर से प्रगाढ़ हुए- क्योंकि मैं दीदी के घर के आस-पास ही किराये पर रहा।
       ***
       यहाँ मेरा समय अच्छा बीता- हर तरह से।
       जिनकी याद कभी-कभार आयेगी, उनमें हैं- कैसर और मण्टू (शमीम) भाई तथा उनका परिवार। वैसे, दोनों फेसबुक पर भी हैं, इसलिए उम्मीद करता हूँ कि सम्पर्क बना रहेगा। आजाद हुसैन भी फेसबुक पर है, पर लगता है, उसकी रुची इसमें नहीं है। जय कह रहा था- ठीक है, वह भी मुझे खोज निकालेगा फेसबुक पर। जेनिश, विपुल और जयराम से शायद फिर कभी सम्पर्क न हो।
       *** 

अररिया का लैण्डमार्क- काली मन्दिर, जिसके शिखर का अनावरण पिछले साल (2012) में ही हुआ. अन्यथा, यह बाँस बल्लियों से ढका रहता था- यानि काम चलता रहता था. 
मेरी दीदी ने बताया कि जबसे वह यहाँ आई है (1984 में), तभी से यह शिखर ढका है. 

सोमवार, 20 मई 2013

52. एक यादगार अनुष्ठान की याद


       यहाँ जो तस्वीरें प्रस्तुत की जा रही हैं, वे ठीक 7 साल पहले की हैं- यानि 20 मई 2006 की। उस दिन मेरी माँ-पिताजी के विवाह की 51वीं वर्षगाँठ थी।
यूँ तो 50वीं सालगिरह को लोग "स्वर्ण जयन्ती" या "गोल्डेन जुबली" के रुप में मनाते हैं, मगर 2005 में हम भूल गये थे और दूसरी बात, तब मैं वायु सेना में था। (31 मई 2005 को मैं रिटायर हुआ- 20 वर्षों की सेवा के बाद- और तब 2006 में हमने इस वर्षगाँठ को मनाने का फैसला लिया।)
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हमने "गायत्री परिवार" वालों से घर में सिर्फ एक हवन कराने का अनुरोध किया था। उन्होंने कारण पूछा, तो हमने वर्षगाँठ वाली बात बता दी। फिर क्या था, नियत तिथि को वे पूरी ताम-झाम के साथ और बहुत सारे भक्तों-भक्तिनों के साथ हमारे घर पहुँच गये। बताया गया- विवाह की सारी रस्मों को फिर से दुहराया जायेगा! यह तो हमने सोचा भी नहीं था- हाँ, सुना जरूर था। हमारे बरहरवा में ऐसी कोई परम्परा भी नहीं थी।
खैर, अनुष्ठान के दौरान पिताजी ने तो सामान्य होकर उन रिवाजों को दुहराया, मगर मेरी माँ का बुरा हाल था- लज्जा के मारे! बार-बार वह अपने तकिया कलाम "धत्त" का प्रयोग कर रहीं थीं। वहाँ उपस्थित अड़ोस-पड़ोस की महिलाओं, पिताजी के परिचितों तथा हमलोगों के चेहरों पर तैर रही थी- नैसर्गिक हँसी और मुस्कान।
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गायत्री परिवार की जो महिला सदस्यायें थीं, वे राजमहल से आयी थीं। तीनपहाड़ स्टेशन पर ट्रेन बदलनी पड़ती है- बरहरवा के लिए। वहाँ खाली समय में उनलोगों ने जानना चाहा कि बरहरवा में किसके घर में आयोजन है? जैसे ही उन्होंने नाम सुना- डॉक्टर जे.सी. दास के घर में- वे चकित रह गयीं! क्योंकि मेरी माँ राजमहल की ही हैं और बहुत-सी महिलायें अपनी "प्रभा-दी" (मेरी माँ का नाम- प्रभावती) को जानती थीं। मुख्य पण्डित जी स्थानीय नहीं थे (वे किसी सरकारी नौकरी में थे), इसलिए वे यह सब नहीं जानते थे। हमने भी सिर्फ बरहरवा के गायत्री परिवार वालों से सम्पर्क किया था- हमें नहीं पता था कि राजमहल से काफी लोग आयेंगे।
अब घर आकर उन महिलाओं ने अपनी "प्रभा-दी" से खूब ठिठोली की। यह भी ताना कसा कि मायके को ही खबर नहीं दी? अब हमें अपनी गलती का अहसास हुआ। हमने जल्दी से वीणा मौसी और शेखर मामा जी को फोन किया। मौसी तो नहीं आ सकीं, मामाजी आये- भले थोड़ी देर से।
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हमारी छोटी दीदी चूँकि फरक्का में रहती हैं, इसलिए उन्हें तो बुला लिया गया था, मगर अररिया में बड़ी दीदी को खबर नहीं दी गयी थी। इसी प्रकार, बुआओं को भी खबर नहीं थी। इसका अफसोस तो हमें हुआ, मगर क्या करें- हमें भी नहीं पता था कि यह अनुष्ठान इतना विशेष हो जायेगा।
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उनदिनों मेरे चाचाजी बीमार चल रहे थे। विवाह वाले अनुष्ठान सम्पन्न होने के बाद आँगन में सामूहिक हवन हुआ, जिसमें मेरे चाचाजी के स्वास्थ्य की कामना के साथ भी आहुतियाँ डाली गयीं।
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अंशु (मेरी पत्नी) ने घर में ही छोले-भटूरे, रायता और गुलाबजामुन का इन्तजाम कर रखा था। भाभी, आस-पास की कई महिलाओं एवं युवतियों ने हाथ बँटाया और अनुष्ठान के बाद सबने तृप्त होकर भोजन किया। आज हम सोचते हैं, तो आश्चर्य होता है कि उस दिन खाने का सामान घटा क्यों नहीं था? इतने सारे लोगों का भोजन कैसे हो गया था?
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भोजन होने के बाद जब ज्यादातर लोग विदा हो गये, घर तथा पड़ोस के सदस्य रह गये, तब दिगम्बर जेठू ने हमसबको आँगन में बैठाया और कहा- माँ को बुलाओ। माँ सकुचाती हुई आकर एक कोने में बैठ गयीं। उसके बाद जेठू बोले- जानते हो, तुम्हारे बाबा (बँगला में पिताजी) के साथ तुम्हारी माँ को देखने कौन गया था? हम निरुत्तर थे।
(पिताजी के बाल्यकाल के बन्धु थे- दिलीप काकू (काकू, बँगला में चाचा)। उन्हीं के बड़े भाई को हमलोग दिगम्बर जेठू (जेठू, यानि ताऊ, बँगला में) कहते हैं।) 
वे बोले- मैं ही गया था।
इसके बाद आधी सदी पहले के सारे घटनाक्रमों का उन्होंने इतना पुंखानुपुंख और रोचक वर्णन किया कि हमारे तो बस मुँह ही खुले रह गये थे। माँ के नैसर्गिक सौन्दर्य को देख उनका अभिभूत हो जाना..., पिताजी का सिर झुकाकर बैठना..., एकबार भी नजर उठाकर माँ को न देखना..., न 'हाँ' बोलना, न 'ना'..., सारे कच्चे चिट्ठे उन्होंने खोलकर रख दिये... और इस फ्लैशबैक कहानी के दौरन माँ की अवस्था.... !
***   


          1954 या 55 में जब पिताजी दिगम्बर जेठू के साथ माँ को देखने गये होंगे, तब माँ ऐसी दीखती थी-  




पुनश्च: 

10 साल बाद "हीरक जयन्ती" मनायी गयी थी, उसके पोस्ट का लिंक यहाँ है।

जिस साल (मई, 2016) हीरक जयन्ती मनी, उसी साल (छह महीने बाद) दिसम्बर में पिताजी का स्वर्गवास हुआ। उसपर भी मैंने कुछ लिखा था- यहाँ।
 




रविवार, 12 मई 2013

51. मेरी माँ (काफी पुरानी तस्वीर) (मदर्स डे पर)


मेरी माँ 
(काफी पुरानी तस्वीर) 

50. "काल-बैशाखी" तथा "टिकोला"



       बीती रात आँधी आयी- बारिश लेकर।
       यह कौन-सी आँधी थी, पता नहीं, क्योंकि यह शायद पश्चिम से आयी थी। (कल शाम ही समाचार में सुना था कि दिल्ली में आँधी चल रही है।)
       हमारे इलाके में इस बैशाख महीने में आने वाली आँधियों को "काल बैशाखी" कहते हैं। यह चक्रवातीय तूफान बंगाल की खाड़ी से उठता है, और तटीय इलाकों में तो अक्सर कहर ढा देता है। मगर हमलोग चूँकि समुद्र से काफी दूर हैं, इसलिए वहाँ सिर्फ तेज हवायें चलती हैं और बारिश होती है। पहले छप्पर, टिन वगैरह उड़ते थे, अब छप्पर कम ही होते हैं। हाँ, कुछ साल पहले रंजीत की दूकान से 'सीढ़ी घर' की छत से एसबेस्टस की एक शीट उड़कर हमारे घर के पास आकर गिरी थी।
       ***
       खैर, यह आँधी कुछ याद दिला गयी।
       रात में चलने वाली ऐसी आँधियों के बाद सुबह-सुबह हमलोग "टिकोला" चुनने जाया करते थे। इस तरह के सारे काम मुझे "प्रीतम" सिखाता था। भले उम्र में वह मुझसे छोटा था, मगर समझदार वह मुझसे ज्यादा था। वह कहीं से भागता हुआ आता था और धीमे स्वर में कहता था- मोनू, एगो जग्घुन जैबे? यानि एक जगह चलोगे? वह जगह को जग्घुन बोलता था। मेरे पिताजी अक्सर उसे "खुराफाती" कहते थे।
       "टिकोला" यानि कच्चे आम। बचपन में हमलोग इसके दीवाने हुआ करते थे। ब्लेड या चाकू से काटकर नमक के साथ चटखारे लेकर हमलोग इसे खाते थे और आँखें मिचमिचाते रहते थे।
       पेड़ से टिकोले तोड़ना मना होता था, मगर आँधी के बाद जमीन पर गिरे टिकोलों को चुनने में कोई मनाही नहीं होती थी और सभी बच्चों के पास काफी टिकोले जमा हो जाते थे।
       ***
       अभी भी सड़कों पर बहुत से टिकोले गिरे होंगे, मगर अब उन्हें उठाने का मन नहीं होता... खाने का भी मन नहीं करता।
       मेरा बेटा तो शायद टिकोले का स्वाद जानता ही नहीं होगा.... अब क्या कहा जाय- ?
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