सोमवार, 15 अप्रैल 2013

48. "पहला बैशाख"



मेरे बहुत-से साथियों को शायद पता न हो कि आज से "बँगला सम्वत्" की शुरुआत हो रही है आज से बँगला का 1420 साल शुरु हुआ आज का दिन "पहला बैशाख" ("पयला बैशाख") के नाम से एक उत्सव के रुप में बँगाल में मनाया जाता है
मेरे मेलबॉक्स में 'अपोलो हॉस्पिटल', कोलकाता वालों की तरफ से एक सुन्दर ग्रिटिंग कार्ड आया हुआ है इस मौके पर- उसे ही मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ
साथ ही, सितम्बर'2010 के एक ब्लॉग पोस्ट को भी साझा कर रहा हूँ, जो आज के दिन के खास ग्रामीण आयोजन "चरक मेला" से जुड़ा है इस पोस्ट में मैंने जिक्र कर रखा है कि मैं "चरक मेला" की तस्वीरें कभी-न-कभी जरूर साझा करूँगा मैंने इस साल अपने मित्र जयचाँद को इस मेले की फोटोग्राफी करने के लिए बोल दिया था; मगर आज चौलिया की एक दादी माँ को फोन करने पर पता चला कि गाँव में दो दल बन गये हैं, इस कारण इस साल चरक मेला का आयोजन नहीं होगा! शायद आपलोग अनुमान न लगा सकें- गाँव जितने छोटे होते हैं, गुटबाजी उतनी ही ज्यादा होती है!

 
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वह पोस्ट है तो इसी ब्लॉग में (2रा पोस्ट), मगर सुभीते के लिए पूरे आलेख को उद्धृत कर रहा हूँ- 

क्या आपलोगों ने कभी "चरक मेला" का नाम सुना है? नहीं, तो कोई बात नहीं, मुझसे सुनिये
मेरा गाँव बरहरवा (छोटा-मोटा शहर ही है- राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में बसा) बंगाल की सीमा के निकट है फरक्का यहाँ से 26 किलोमीटर दूर है यहाँ बंगला संस्कृति का पाया जाना आम है
बरहरवा से 7 किमी दूर एक छोटा-सा देहात है, जहाँ हमारे परदादा रहा करते थे- थोड़ी-सी जमीन, तालाब, आम के पेड़ हैं हमारे वहाँ देहात का नाम है- चौलिया बरहरवा से सवारी ट्रेन में बैठते हैं, ट्रेन खुलती है, और कुछ मिनटों में ही 'लिंक केबिन हॉल्ट' पहुँच जाती है ट्रेन से उतर कर खेतों के बीच से होते हुए गाँव पहुँच जाते हैं (सड़क भी है- साइकिल/मोटर साइकिल से भी जाया जा सकता है)
एक अच्छी-सी चाची है हमारी वहाँ- हमारी खूब खातिर होती है दो प्यारी-प्यारी बहनें हैं- एक की दो साल पहले शादी हो गयी है और दूसरी की इसी नवम्बर में शादी है और भी सारे लोगों से मिलना-जुलना होता है मेरा बेटा तो वहाँ मस्त हो जाता है- बकरी, बत्तख आदि देख-देख कर
खैर, तो बात 'चरक मेला' की हो रही थी
पहला बैशाख बंगालियों के लिए नया साल होता है खूब मनाते हैं लोग इसे उस छोटे-से देहात में भी काफी रौनक रहती है शाम के समय चरक मेला का आयोजन होता है गाँव के एक किनारे खुली जगह पर बड़ा-सा खम्भा गाड़कर उसपर एक लम्बे-से बाँस को इस प्रकार बाँधा जाता है कि बाँस को चारों तरफ घुमाया जा सके लोगों की भीड़ पहले-से जुटने लगती है फिर गाजे-बाजे के साथ गाँव के 'जोगी' एक व्यक्ति के कन्धे पर सवार होकर आते हैं बगल के छोटे-से मन्दिर में वे पूजा करते हैं और फिर बाँस के एक किनारे को नीचे झुकाकर जोगी महाराज को उससे बाँध दिया जाता है उनका एक पैर तथा हाथ मुक्त रहता है फिर बाँस के दूसरे सिरे पर बँधी रस्सी को लोग मिलकर नीचे खींचते हैं और जोगी हवा में ऊपर उठ जाते हैं खम्भे को धुरी बनाकर लोग बाँस की रस्सी को पकड़कर घुमते हैं और जोगी भी हवा में चारों ओर घूमने लगते हैं
घूमते हुए जोगी अपने थैले में से निकाल कर प्रसाद चारों तरफ खड़ी भीड़ की ओर फेंकते हैं- लोग उत्साह और श्रद्धा के साथ उसे चुनकर ग्रहण करते हैं मजा तो तब आता है, जब जोगी अपने थैले में से कबूतर निकाल कर भीड़ की ओर फेंकते हैं जी हाँ, कबूतर- फड़फड़ाते कबूतर जिनके हाथ यह कबूतर लगता है, वह तो जरूर खुद को भाग्यशाली समझता होगा
खैर, घण्टे भर यह आयोजन चलता है तब तक शाम भी गहराने लगती है जोगी जी को नीचे उतारा जाता है
अब तक अच्छा-खासा मेला सज चुका है गाँव के लड़के ही चाट-पकौड़ियाँ बना रहे हैं- बहुत हुआ, तो पड़ोसी गाँवों के दुकानदार हैं महिलाओं-बच्चों के लिए भी काफी कुछ है
मेले से निकलकर हमलोग जिस भी घर में जाते हैं- रसगुल्ले खाने को मिलते हैं गरीब-से-गरीब आदमी भी आज उत्सव मना रहा है
मई 2005 में भारतीय वायु सेना से रिटायर होने के बाद अगस्त 2008 तक मैं बरहरवा में "आजाद" आदमी के तरह रहा- चौलिया के इस छोटे-से चरक मेलेका आनन्द भी मैंने इसी दौरान उठाया मगर तब मेरे पास कैमरे वाला मोबाईलनहीं था आज मेरे पास कैमरे वाला मोबाईल है, मगर वह आजादी नहीं है कि पहले बैशाख के दिन चौलिया जा पाऊँ, चरक मेले का नैसर्गिक आनन्द उठा पाऊँ और वहाँ की तस्वीरों को आपलोगों के साथ साझा कर सकूँ
आजाद पंछी के बारे में राष्ट्रकवि ने भी क्या खूब कही है- कहीं भली है कटुक निबौरी, कनक कटोरी की मैदा से’!
वैसे, ऊपरवाले ने चाहा तो कभी-न-कभी मैं आपलोगों तक चौलिया के चरक मेले के छायाचित्र जरूर पहुचाऊँगा
बचपन में तो बरहरवा में ही बिदुवासिनी पहाड़ के नीचे हमलोग चरक मेला देखने जाते थे (तब बरहरवा का शहरीकरण नहीं हुआ था) यहाँ (चौलिया के मुकाबले) काफी बड़ा खम्भा गाड़ा जाता था, घूमने वाले काफी ऊँचाई पर घूमते थे और एक नहीं, बारी-बारी से बहुत सारे लोग हवा में घूमते हुए प्रसाद लुटाते थे
याद आ रही है... गर्मियों की उन दुपहरियों को हमउम्र दोस्तों के साथ कभी घर में बताकर, कभी बिना बताये चरक मेला देखने जाना...

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

47. ऐसी किताबें अपने यहाँ कब छपेंगी?



       परसों सन्दीप कुमार रावत नाम के एक नौजवान घर में आये थे उनका व्यक्तित्व देखते हुए उन्हें "सेल्समैन" कहने में अच्छा नहीं लग रहाखुद को बनारस का बताया उन्होंने- कहा एम.बी.ए. कर रहे हैं। हालाँकि मेरे अनुमान को भी उन्होंने सही बताया- कि मूलतः वे उत्तराखण्ड के हैं।
       2,000 रुपये में 3+2 किताबें वे दे गये।
       मेरे बेटे अभिमन्यु ने बीते मार्च में 10वीं की परीक्षा दी। मैं सोच ही रहा था कि 'फ्लिपकार्ट' से कोई भारी-भरकम किताब उसे मँगा दूँ, ताकि वह मोबाइल, टीवी, कम्यूटर से कभी-कभार दूर भी रहे। पिछले साल सत्यजीत राय के अमर चरित्र "फेलू'दा" के सारे (शायद 26) लघु उपन्यास वह बिना रुके पढ़ गया था- ये उपन्यास दो खण्डों में हैं। चूँकि "बँगला" उसने अभी ठीक से नहीं सीखा है, इसलिए अँग्रेजी अनुवाद उसे मँगाकर देना पड़ा था। मैंने सोच रखा है- अपने लिए मैं मूल बँगला संस्करण ही मँगवाऊँगा- और हो सका, तो हिन्दी में अनुवाद भी करूँगा!
       खैर, तो सन्दीप जी ने 2,000/- रुपये में जो किताबें हमें थमायीं, वे हैं-
1.       Visual Dictionary (Page- 672, Rs. 1,999/-)
2.       Knowledge Encyclopaedia (Page- 352, Rs. 1,999/-)
3.       Top 10 of Everything  (Page- 256, Rs. 1,675/-)
4.       Compact Oxford Dictionary (South Asia Edition)
5.       Compact Oxford Thesaurus (South Asia Edition)
आखिरी दोनों किताबें एक 'सेट' है और इस सेट की कीमत 1,995/- अंकित है ऊपर की तीनों किताबें- कहने की जरुरत नहीं- रंगीन चित्रों से भरी हुई, अच्छे कागज पर छपी हुई और अच्छे से बँधी हुई हैं। जानकारियों की भरमार हैं इनमें। इन्हें आदर्श 'रेफेरेन्स बुक' के तौर पर घर में सदा रखा जा सकता है।
      मैं सोच रहा हूँ- अपने भारत में, अपनी भारतीय भाषाओं में ऐसी किताबें आखिर कब उपलब्ध होंगी?
       यह विचार मेरे मन में इसलिए भी उठ रहा है कि भारतीय स्थापत्य, भारतीय संगीत इत्यादि पर नाममात्र की जानकारी है इनमें। जाहिर है, मैं भारतीय पृष्ठभूमि पर ऐसी मौलिक किताबें रचे जाने की बात कर रहा हूँ, न कि अमेरिकी या यूरोपीय रचनाओं के अनुवाद की!  

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

46. नववर्ष- विक्रम सम्वत् 2070- मंगलमय हो...

आज सुबह-सुबह बदली छायी हुई थी- लगा, आज के सूर्योदय की तस्वीर नहीं खींच पाऊँगा- मगर कुछ क्षणों के लिए सूर्यदेव दीख ही गये... 
नये साल की शुभकामनायें...


गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

45. नन्हा "रियाज़"


ये हैं नन्हें "रियाज़". 
इनका बहुत सारा वक्त हमारे घर में बीतता है, और हम भी (खासकर, मेरी श्रीमतीजी) इसे देखे बिना ज्यादा देर तक नहीं रह सकते. 
यह तस्वीर होली की शाम की है- इसलिए जनाब के गालों पर थोड़ा-सा अबीर लगा हुआ है. 
*** 


उसी शाम हमारी भी एक तस्वीर. 

*** 
पुनश्च: 26 अप्रैल 2013 
शिवम मिश्रा जी, जैसा कि मैंने (टिप्पणी में) कहा था- आज एक ग्रुप फोटो पोस्ट कर रहा हूँ- 






सोमवार, 25 मार्च 2013

44. होली में भांग: दो पुरानी यादें



       बचपन की बात है। हम बच्चों की टोली अपने ढंग से होली खेलने में मस्त थी।
       श्रीकिशुन चाचा (गाँव में वे "मोछू" नाम से जाने जाते हैं। आज सत्तर से ऊपर उम्र है, मगर मूँछें आज भी कड़क हैं।) हमें बुलाकर सभी बच्चों की हथेली पर एक-एक गोली रख देते हैं। दोस्तों ने बताया, यह भांग है। मैंने सोचा, सभी तो नहीं, मगर दो-तीन दोस्त तो इसे खायेंगे ही, खासकर- उत्तम और रंजीत, और मैंने खा लिया।
       बच्चों की होली काफी सुबह शुरु होती है, जबकि बड़ों की होली देर से। अपनी होली खत्म कर हमलोग बड़ों की एक टोली के साथ पिछलग्गू बनकर घूम रहे थे। रेल लाईन हमारे बरहरवा को दो हिस्सों में बाँटती है। उस पार जाने के लिए जब टोली रेलवे क्रॉसिंग से गुजर रही थी, तब मुझे अहसास हुआ कि मेरे पैरों में पाईप डालकर उसमें कोई हल्की गैस भर दी गयी है- अगर मैं जरा भी उचका, तो हवा में उड़ने लगूँगा। मैं सम्भल कर जमीन पर पैर जमाते हुए चलने लगा। मैं नहीं चाहता था कि किसी को पता चले कि मैंने भांग खा ली है।
       अपने को नियंत्रित रखते हुए मैं सही-सलामत घर लौट आया। इसके बाद हम सभी दोस्त उत्तम के घर के पीछे वाले तालाब में नहाने गये।
       नहाने की बात पर याद आया- होली में अक्सर हमलोग अलग-अलग तालाबों में नहाने जाते थे। एकबार 'साहेब पोखर' में नहाते वक्त मजेदार वाकया हुआ था। बिनय जैसे ही नहाकर बाहर आया, किसी ने लाल रंग चुपके से उसके माथे पर डाल दिया। बाद में सभी गम्भीरता से कहने लगे- अरे, जब तुम तैर रहे थे, तब 'पनडुब्बी' (पानी में रहने वाली काले रंग की एक चिड़िया) ने कहीं चोंच तो नहीं मार दिया? खून निकल रहा है! वह दुबारा डुबकी लगाकर निकला- फिर किसी ने चुपके से रंग डाल दिया! बहुत देर के बाद उसे मामला समझ में आया था।
       खैर, नहाते वक्त जब मेरे दोस्तों ने देखा कि मैं बालों में साबुन घुमाये जा रहा हूँ- घुमाये जा रहा हूँ, तब वे समझ गये कि मुझपर भांग का असर हो गया है। तब मुझे पता चला कि मेरे अलावे किसी ने वह गोली नहीं खायी थी- कुछ ने नाटक किया था खाने का। खैर, अब उपाय पर चर्चा हुई। पता चला, नीम्बू का अचार खाना पड़ेगा। मैंने सोचा, अगर मैंने माँ से नीम्बू का अचार माँगा, तो सबको पता चल जायेगा। तब प्रीतम ने कहा, हम अपने घर ले आयेंगे।
       प्रसंगवश, प्रीतम मेरा गहरा दोस्त रहा है। 18-20 की उम्र में ही वह हमें छोड़कर चला गया। उसके बारे में जब भी सोचता हूँ, मुझे शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित एक चरित्र "लालू" की याद आ जाती है।
       घर आकर जब मैंने देखा कि प्रीतम आने में देर कर रहा है और मेरी हालत खराब होती जा रही है, तब मैंने चाची को जाकर भांग वाली बात बता दी। चाची बोली, कोई बात नहीं, हम पानी गर्म कर देते हैं, एक कप गुनगुना पानी पी लो। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि इससे उल्टी होगी। वर्ना मैं पिछवाड़े में जाकर वह पानी पीता।
मैंने आँगन में ही पानी पी लिया। प्रीतम भी नीम्बू का अचार ले आया। अचार का एक या दो टुकड़ा ही काटा था कि जोर से उल्टी आने लगी। मैं भागकर पिछवाड़े में गया, मगर तब तक सबको पता चल गया कि मैंने भांग खायी है।
खैर, उल्टी करके आराम मिला।
पिताजी ने चेतावनी दी- भूलकर भी भांग नहीं खाओगे।
***
वर्षों बाद।
वायुसेना स्थल, महाराजपुर, ग्वालियर में 'जी-3' बिल्लेट। 'बिल्लेट' यानि बैचेलर वायुसैनिकों का डोरमिट्रीनुमा आवास- इसे 'लिविंग-इन' कहा जाता है। जी-3 में हम करीब 28 बन्दे थे। होली से पहले बातचीत के क्रम में भांग का जिक्र आ गया और मैंने अपना अनुभव बता दिया कि इसका नशा होने पर आदमी जो काम करता है, वह करता रह जाता है। आम तौर पर हँसी नहीं रुकती। बहुतों को "उड़ने" का अहसास होने लगता है।
पता चला, उनमें से किसी को भी इसका अनुभव नहीं था। आनन-फानन में फैसला हो गया- रम-व्हिस्की को मारो गोली, इसबार होली में ठण्डई बनेगी- वह भी भांग वाली!   
        बिल्लेट में कई लड़के अलग से दूध लिया करते थे। होली की पूर्व सन्ध्या पर सबका दूध जमा कर लिया गया। सूखी भांग का किसी ने जुगाड़ किया था, उसे रातभर भींगने के लिए रख दिया गया। सुबह 'गुड्डे' के बिल्लेट से भांग पीसने के लिए 'सिल-बट्टा' लाया गया। अभिजीत को हमलोग 'गुड्डा' कहते थे- वह आम तौर पर हमलोगों के साथ ही रहता था। हम तीन दोस्त- राजीव देवगण, अभिजीत दत्ता और जयदीप दास- अक्सर साथ रहते थे और हमें 'थ्री-डी' (देवगण-दत्ता-दास) कहा जाता था। रात हमारे बिल्लेट में मेस की दाल को प्यांज, टमाटर से तड़का लगाया जाता था, या फिर दाल में अण्डा डालकर उसे फ्राय किया जाता था; मगर गुड्डे के बिल्लेट में बाकायदे अलग से सब्जी, मांस-मछली वगैरह बनती थी, इसलिए उनके पास मसाला पीसने के लिए सिल-बट्टा था।
       खैर, दूध में पिसी हुई भांग मिलायी गयी। 'किच्चू' (कृष्णा कुमार) बाहर लॉन से गुलाब की पंखुड़ियाँ तोड़ लाया- उसे भी पीसकर मिला दिया गया। चीनी वगैरह भी मिलाया गया।
       अब सबने गिलास भर-भर के पीना शुरु किया। सबके मुँह से यही एक बात- कहाँ कुछ हो रहा है? मैंने कहा- दो-तीन घण्टे बाद जब गर्मी बढ़ेगी, तब इसका असर शुरु होगा, इसलिए ज्यादा मत पीओ। कौन सुनने वाला था? पी-पीकर भगोने को खाली कर दिया गया- राउल ने तो हद कर दी- तलछट में बची भांग भी वह खा गया!
       कुछ देर बाद हम बाहर निकले। 'लिविंग-आउट' यानि फैमिली क्वार्टर्स होते हुए पटेल मार्केट जाकर वापस आना तय हुआ। जाते वक्त तो सभी सामान्य थे। परिचितों से मिलते-जुलते, रंग खेलते, पकवान खाते हुए हमसब पटेल मार्केट तक गये।
वापसी के समय गर्मी बढ़ गयी। कुछ लड़कों की चाल लड़खड़ाने लगी। राउल को सबसे ज्यादा प्यास लगने लगी। वह रास्ते में मिलने-जुलने वालों से मस्ती भी ज्यादा करने लगा। लोग भी उसपर बाल्टी भर-भर कर रंग डाल रहे थे। मैंने किच्चू तथा कुछ अन्य लड़कों से, जो पूरे होशो-हवास में थे, कहा- जितनी जल्दी हो सके, सबको लेकर बिल्लेट पहुँचने की कोशिश करो, नहीं तो तमाशा हो जायेगा।
सौभाग्य से, तमाशा नहीं हुआ। बिन गिरे-पड़े, बस हँसते-खिलखिलाते सभी लिविंग-इन इलाके में पहुँच गये।
तय हुआ, मेस में खाना खाते हुए चलते हैं। पहले मेस ही पड़ता था। डायनिंग टेबल पर खूब ठहाके लगाते हुए सभी खाना खा रहे थे। अचानक किसी को उल्टी आ गयी- पिचकारी की तरह उसकी उल्टी की धार सारे टेबल पर फैल गयी। डायनिंग हॉल में बैठे अन्य लड़कों को कोई ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ। हम 'जी-3' वाले मौज-मस्ती के लिए पहले से ही बदनाम थे। जिस रात अपने लॉन में हम पार्टी की तैयारियाँ करते थे, उस रात अगल-बगल के बिल्लेट वाले समझ जाते थे कि आज देर रात तक सोना मुश्किल हो जायेगा!
खाना अधूरा छोड़कर हम बिल्लेट में आये। अपनी-अपनी चारपाई पर बैठकर सभी एक-दूसरे की ओर ईशारा करके कह रहे थे- अरे देखो उसे, भांग चढ़ गयी.... और फिर ठहाके-ही-ठहाके।
अब ठीक से याद नहीं कि शाम कब तक और कैसे सबकी हालत सुधरी थी!
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मेरे कुछ जी-3 दोस्तों की एक झलक मेरे ब्लॉग 'आमि यायावर' में 'शिवपुरी' के तहत मिलेगी. 

गुरुवार, 14 मार्च 2013

43. "कलरव" के बहाने...



       स्कूली दिनों में हम जो कवितायें पढ़ते थे, उनमें से एक कविता की पंक्तियाँ थीं-
       "नहीं हुआ है अभी सवेरा
       पूरब की लाली पहचान
       चिड़ियों के जगने से पहले
       खाट छोड़ उठ गया किसान"
       अब जबकि जाड़ा चला गया है और गर्मी पूरी तरह से आयी नहीं है- स्थिति यह है कि पूरब में लाली छाने के साथ जब पंछीगण चहचहाना शुरु करते हैं, उसी समय आँखें खुल जाती हैं। (प्रसंगवश यह बता दूँ कि रात हमलोग देर तक नहीं जागते हैं- साढ़े नौ बजते-बजते हमारा "दीप-निर्वाण" हो जाता है। यह भी एक कारण है, मुँह अन्धेरे चिड़ियों की चहचहाहट के साथ आँखें खुल जाने का।)
       सबसे पहले तो पपीहे की "पीऊ-कहाँ" से शुरुआत होती है। मैंने सुना है, और एक जमाने में अनुभव भी किया है कि पपीहा कभी-कभी रात भर बोलता है। हो सकता है, वे चाँदनी रातें हों- ठीक से याद नहीं। पर खुले में सोते वक्त रात भर उसकी आवाज सुनने का अनुभव मुझे है।
       पपीहे के बाद शुरु होती है अलग-अलग स्वरों में कोयल की "कुहू-कुहू"। इस कुहू-कुहू में वाकई अलग-अलग तरह के स्वर और भाव होते हैं- कभी लगता है, कोई मनुहार कर रहा है, तो कभी लगता है कोई आवेश में आ गया है।
       तीसरे स्थान पर बटेर का "घूघू-घू" शुरु हो जाता है।
       इसके बाद तो अन्यान्य पंछियों की आवाजें ऐसे घुल-मिल जाती हैं कि समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर कितने तरह के पंछियों का वास इस इलाके में है! यह भी सही है कि ज्यादातर पंछियों की आवाजों को मैं पहचानता ही नहीं। हाँ, घरेलू मैनों, गौरैयों और कौओं की आवाज को पहचाना जा सकता है। मगर "टी-ट्वीट" करने वाली और "टटर-टटर" करने वाली चिड़िया का नाम मैं नहीं जानता। और भी कई आवाजों को मैं नहीं पहचानता।
       कुछ देर तक यह कलरव सुनने के बाद मस्जिदों से "अजान" सुनायी पड़ने लगती है।
       जहाँ तक मुर्गे की बाँग की बात है- मैं देख रहा हूँ कि उनकी मुँह-अन्धेरे वाली "पहली" बाँग यहाँ सुनायी नहीं देती। काफी उजाला फैल जाने के बाद जाकर उनकी "कूँकड़ू-कूँ" सुनायी पड़ती है। हो सकता है, शहरी मुर्गों की आदत कुछ अलग हो, या फिर मुझे ही धोखा हो रहा है। मगर मैं देहात में भी रहा हूँ और मुझे ध्यान है कि मुर्गे की "पहली" बाँग मुँह-अन्धेरे ही होनी चाहिए।   
       ***
       पिछले साल इस कलरव से जागने के बाद मैं टहलने चले जाया करता था। यह अर्द्धशहरी इलाका है- (जहाँ मैं फिलहाल नौकरी के सिलसिले में रह रहा हूँ। मेरा अपना घर तो "राजमहल की पहाड़ियों" की तलहटी में बसा है, जहाँ टहलने के लिए "प्राकृतिक" स्थानों की कमी नहीं है।) एन.एच.-57 शहर के बीच से गुजरता है- बहुत-से लोग इसके फोर-लेन फ्लाइ-ओवर पर टहलने आते हैं। मैं भी जाता था। मगर जल्दी ही महसूस किया कि ट्रकों की आवाजाही के कारण हवा में ताजगी नहीं है वहाँ। इससे ताजी हवा तो मेरी अपनी छत पर मिल जाती है। सो, टहलना बन्द कर मैंने अपनी छत पर "गहरी साँस" लेने की दिनचर्या शुरु कर दी थी। अभी भी मैं यही करता हूँ- हालाँकि किसी भी अभ्यास में मैं "नियमित" नहीं रहता हूँ। मन किया, तो किया, नहीं तो छोड़ दिया।
       प्रसंगवश, अब मैं अपने ढंग से "प्राणायाम" करता हूँ। 6 की गिनती तक साँस अन्दर भरना, 6 की गिनती तक साँस को अन्दर रोकना (कुम्भक), 6 की गिनती तक साँस को बाहर निकालना और 6 की गिनती तक साँस को बाहर ही रोके रखना (रेचक)। इन चारों क्रियाओं के चक्र को मैं कुल 12 बार दुहराता हूँ। इसके बाद हर चक्र के साथ एक-एक कर गिनती बढ़ाना शुरु करता हूँ। अभी तक मैं 17 की गिनती तक पहुँच पाया हूँ। शायद इससे आगे बढ़ना मुश्किल है। फिर भी, देखा जाय- मेरा लक्ष्य 24 की गिनती तक पहुँचना है!
       फेफड़ों में ताजी हवा भरने का काम तो इससे हो जाता है, मगर इससे शरीर की मांसपेशियों की कसरत तो नहीं होती। अतः, अगर कोई मेरी इस दिनचर्या को अपनाना चाहे, तो उन्हें बता दूँ कि इसके लिए आपको रात में खाना खाने से कुछ पहले "रनिंग ऑन द स्पॉट" करना चाहिए। रबर का फुटमैट बिछा लीजिये, उसपर पुरानी दरी भी डाल सकते हैं और फिर एक ही स्थान पर दौड़ना शुरु कर दीजिये। 1000, 2000 से लेकर 5,000 स्टेप्स तक की रनिंग की जा सकती है।
       किसी प्रदूषित इलाके में "मॉर्निंग/इवनिंग वाक" करने से तो यही बेहतर रहेगा।
       ***
       हालाँकि जिनका जीवन महानगरों में बीता है, उन्हें शायद अनुभव ही न हो कि हवा में "ताजगी" किस तरह की होती है। (सम्भव है, "मुँह-अन्धेरे" वाली "कलरव" का भी उन्हें अनुभव न हो।) अन्य स्थानों पर कई बार रात जागने के क्रम में मैंने अनुभव किया है कि भोर के साढ़े तीन बजते-बजते हवा में एक अद्भुत किस्म की ताजगी आ जाती है, जो यातायात शुरु होने के साथ-साथ खत्म होने लगती है। इसका महानगरों में पूर्णतः अभाव होता है। महानगरों में रहते हुए मैंने अनुभव किया है कि "ब्रह्म-मुहुर्त" के वक्त भी वहाँ हवा में "ताजगी" नहीं होती। बल्कि मुझे एक खास किस्म की "महानगरीय-बदबू" (जिसमें फैक्ट्रियों, मोटर गाड़ियों के धुयें तथा गन्दे नालों की बदबू का मिला-जुला असर होता है) का अहसास सुबह-सुबह होता है।
...और मैंने देखा है कि इसी बदबूदार हवा में लोग-बाग "मॉर्निंग वाक" कर के प्रसन्न हो रहे हैं...  
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सोमवार, 26 नवंबर 2012

"सक़ीना"



     

बरहरवा में हमारे मुहल्ले में एक ईरानी परिवार रहता है, जिसके मुखिया सैय्यद सरबर हुसैन हैं। हर साल मुहर्रम पर इनका पूरा परिवार, जो लगभग पचास सदस्यों का है, यहाँ जुटता है।
पहले- 1971 से- सरबर साहब की सरपस्ती में जब यह कुनबा मुहर्रम मनाने आता था, तब ये लोग खेतों में तम्बू गाड़कर यहाँ रहते थे। तब हम बच्चे हुआ करते थे। इनकी ईरानी भाषा में बातचीत को सुनकर हम आश्चर्य किया करते थे। ज्यादातर स्त्री-पुरूष गोरे-चिट्टे हुआ करते थे। महिलायें पारम्परिक ईरानी पोशाक पहनती थीं। उन दिनों ये अटैचियों में चश्मे लेकर घूम-घूम कर बेचा करते थे। 1972 से भी पहले सरबर साहब के पिता और दादा की सरपरस्ती में यह कुनबा बरहरवा आया करता था। इस प्रकार, बरहरवा से इनका लगाव काफी पुराना और गहरा है। यहाँ का प्रायः हर व्यक्ति सरबर ईरानी से परिचित है।
आजकल इनकी नयी पीढ़ी के युवक रत्नों का व्यवसाय करते हैं। गौहाटी तथा पूर्वोत्तर के कुछ अन्य शहरों में इनका फला-फूला व्यवसाय है। खुद सरबर साहब के पास भी रत्नों का जखीरा रहता है।  
बचपन में हम मुहर्रम के दिनों में अक्सर इनके तम्बूओं में जाया करते थे, जहाँ रात एक विशाल तम्बू के अन्दर इनके धर्मगुरू मैदाने-करबला में इमाम हुसैन तथा यज़ीद के बीच हुई हक़-ओ-बातिल की लड़ाई की कहानी सुनाया करते थे। एक हजार चार सौ साल पहले हुई इस लड़ाई में इमाम हुसैन, उनके परिजन तथा अनुयायी सहित कुल बहत्तर स्त्री-पुरूष-बच्चे शहीद हुए थे, जिसमें छह महीने का अली असग़र भी शामिल था धर्मगुरू नौ रातों तक किस्तों में पूरी कहानी को दुहराते थे। कहानी के बाद गीत गाये जाते थे, जिसके साथ-साथ आबाल-वृद्ध, स्त्री-पुरूष सभी छाती पीटते हुए मातम मनाया करते थे। सातवें और दसवें दिन बाकायदे जुलूस निकला करता था। दसवें दिन, यानि मुहर्रम वाले दिन के जुलूस में शामिल प्रायः सभी पुरूष अपना खून बहाया करते थे। उस रोज सीना पीटते वक्त उनकी उँगलियाँ में ब्लेड फँसा होता था, जिस कारण इनके सीने से खून बहता था। इसके अलावे जंजीरों में बँधे चाकूओं से ये अपनी पीठ पर वार करके पीठ से और चाकू को सर से रगड़कर सर से खून बहाया करते थे। महिलाओं के हाथों में गुलाबजल की शीशीयाँ तथा रूई के फाहे हुआ करते थे, जिनसे पुरूषों के शरीर से बहते खून को पोंछा जात था।
बाद में मैं (1985 में) वायु सेना में भर्ती हो गया, तब से बरहरवा का मुहर्रम मैं नहीं देख पाया। बीच में पता चला कि सरबर चाचा हमारे मुहल्ले में ही पक्का मकान बनवाकर बरहरवा के बाशिन्दे बन गये हैं। 2005 में वायु सेना से अवकाश लेकर आने के बाद मैंने तीन वर्षों तक मुहर्रम देखा; उसके बाद बैंक की नौकरी के सिलसिले में मैं यहाँ अररिया में आ गया।  
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इस साल (2012 में) छठ के साथ ही मुहर्रम की शुरुआत हुई। मेरी छोटी दीदी छठ करने बरहरवा आती है। मैं भी पहुँचा हुआ था। सोम-मंगलवार (19-20 नवम्बर) को छठ सम्पन्न हुआ। बुध (21 नवम्बर) को मैं छोटी दीदी तथा अंशु के साथ उनकी मज़लिस में गया।
गुरूवार (22 नवम्बर) को उनका सातवें रोज वाला मातमी जुलूस निकला। उस रात किसी कारण से मैं मज़लिस में नहीं जा पाया।
शुक्रवार (23 नवम्बर) की सुबह गोपाल चाचा की चाय दूकान (मेरे घर के सामने) सरबर चाचा से थोड़ी बातचीत हुई। यहाँ वे अक्सर बैठते हैं- खासकर, सुबह। पता चला, उनके मौलाना साहब लखनऊ से आते हैं। सो, ग्यारह बजे मैं मौलाना साहब से मिलने पहुँचा। उनका नाम सैय्यद हुसैन अब्बास सिरसवी है। मैंने उनसे मोहर्रम मनाये जाने के बारे में संक्षिप्त जानकारी ली। उन्होंने बताया कि वे पिछले सात-आठ वर्षों से लगातार मुहर्रम में यहाँ आते हैं- लखनऊ से।
उसी रात मैं अंशु के साथ मज़लिस में शामिल होने गया, तो पाया कि आठ बजकर दस मिनट हो रहे हैं, मगर अभी तक आवाज नहीं आ रही है। हमारे साथ हमारा बेटा, भतीजा और भतीजी थी। वहाँ पहुँचकर पता चला- मौलाना साहब की बच्ची की तबियत बिगड़ गयी है- उसे ‘स्लाईन’ चढ़ाया जा रहा था। मैं अन्दर जाकर मौलाना साहब से मिला। उन्होंने कहा- अन्दर बैठिये, मज़लिस बस शुरु होने वाली है।
मैंने कहा- पहले बच्ची की तबियत पूरी तरह ठीक हो जाय...
उन्होंने तुरन्त कहा- बच्ची की तबियत अब बिलकुल ठीक है।
खैर। कुछ देर से ही, मज़लिस शुरु हुई। मौलाना साहब ने इब्राहिम द्वारा अपने बेटे इसमाइल को कुर्बान करने के लिए राजी होने के वाकये से शुरुआत की। फिर ध्यान दिलाया कि अल्लाह ने इसमाइल को तो जीवनदान दे दिया- क्योंकि उनके वंश से हज़रत पैगम्बर को जन्म लेना था; मगर उसके बदले उसने हज़रत के नवासे (नाती) इमाम हुसैन की कुर्बानी ली। मौलाना साहब ने दोनों घटनाओं की तारीख मिलाकर इसे साबित किया।
आगे मौलाना साहब ने यह बताया कि इमाम हुसैन ने यज़ीद के पास यह सन्देश भेजवाया था कि उन्हें (इमाम को) उनके परिजनों/साथियों सहित हिन्द (भारत) जाने दिया जाय। इमाम हुसैन को भरोसा कि हिन्द के लोग (भारतीय) उन्हें पसन्द करेंगे। इसका जिक्र करके मौलाना साहब ने जोर देकर कहा कि हमें फख्र है कि हम हिन्दुस्तानी हैं, हिन्दुस्तान के वासी हैं, जहाँ आने की ख़्वाहिश इमाम हुसैन साहब रखते थे।
इसके बाद मैदाने-करबला की कहानी शुरु हुई। आज इमाम हुसैन के भाई हज़रत अब्बास की शहादत का ज़िक्र हुआ। अब्बास प्यास से तड़पते बच्चों के लिए पानी लाने चश्मे पर गये थे। उन्होंने अपनी भतीजी सक़ीना का मश्क़ साथ लिया था। सक़ीना तीन-साढ़े तीन साल की नन्हीं बेटी थी इमाम हुसैन की, जिसे इमाम बहुत प्यार करते थे। वे सक़ीना को अपने सीने पर सुलाया करते थे। मगर लगता है कि अब्बास अपनी भतीजी को कहीं ज्यादा प्यार करते थे। जब वे पानी नहीं ला पाये, तब दम तोड़ने से पहले उन्होंने इमाम हुसैन से अनुरोध किया कि उनकी लाश को शिविर में न ले जाया जाय... क्योंकि वे सक़ीना के लिए पानी नहीं ला पाये और इस तरह वे सक़ीना को मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहे... ।
अब्बास पानी लाते भी तो कैसे? छुपे हुए दुश्मनों ने एक-एक कर उनके दोनों बाजु काट दिये थे। जब उन्होंने मशक को अपने दाँतों से दबाया, तो एक तीर ने आकर मशक को भेद दिया और पानी बह गया। फिर एक तीर उनकी एक आँख में आकर लगा और वे घोड़े से गिर पड़े। गिरते वक्त उन्होंने इमाम हुसैन को आवाज दी थी।
कहानी सुनाये जाते वक्त हॉल में मौजूद महिलायें रोने लगीं, जबकि पुरुषों की आँखें नम हो गयीं।
इसके बाद मौलाना साहब ने सबके भले के लिए दुआ माँगी। फिर शुरु हुआ गीत, जिसकी दो पंक्तियाँ इस प्रकार है-
इस अस्र की गर्मी में, मिल जाये अगर पानी,
मज़लूम सक़ीना पे, हो जाये मेहरबानी।
इन पंक्तियों को (जुलूस में गाये जाते वक्त) सुनकर ऐसे भी मेरी आँखें नम हो जाया करती हैं।
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अगली सुबह।
शनिवार, 24 नवम्बर’ 2012। मुहर्रम की नौवीं तारीख।
मेरा भाई आकर खबर देता है- मौलाना साहब की बच्ची चल बसी! मैं सन्न रह गया। फिर माँ ने बताया कि उन्होंने भी गोपाल चाचा की चाय दूकान पर अभी सरबर को रोते हुए देखा था। मुझे मज़लिस में नज़्म भैया की बात याद आयी। मज़लिस में मौलाना साहब के आने से ठीक पहले नज़्म भैया ने धीरे-से मुझे बताया था- बच्ची की हालत नाज़ुक है- कुछ देर के लिए तो नब्ज़ गायब हो गयी थी। मुझे यकीन नहीं हुआ था, क्योंकि मौलाना साहब ने खुद कहा था कि अब बच्ची की तबियत बिलकुल ठीक है। और फिर, बरहरवा के एक नामी चिकित्सक की देख-रेख में इलाज चल रहा था- डॉक्टर की ओर से कोई चिन्ता जाहिर नहीं की गयी थी। अब मैं समझा कि मौलाना साहब अपना कर्तव्य पूरा करना चाहते थे- वे मज़लिस को रद्द नहीं करना चाहते थे। मज़लिस समाप्त होने के बाद वे लोग बच्ची को लेकर मालदह रवाना हुए थे, जहाँ डॉक्टरों ने बच्ची को मृत घोषित कर दिया।
(प्रसंगवश, बरहरवा में न तो ढंग की चिकित्सा उपलब्ध है, और न ही चिकित्सक। यहाँ चिकित्सा का व्यापार होता है और चिकित्सक मरीज को ग्राहकसमझते हैं। इसलिए आम तौर पर लोग इलाज कराने बंगाल के पड़ोसी शहरों- मालदह या रामपुरहाट का रुख करते हैं- वहाँ इलाज के नाम पर लूट-खसोट नहीं होती, सभी चिकित्सीय सुविधायें उपलब्ध हैं और डॉक्टर मरीज के प्रति संवेदनशील होते हैं। इस मामले में भी चिकित्सक की लापरवाही नजर आती है- कम-से-कम मुझे।)
मैंने उस बच्ची की सूरत नहीं देखी थी। भाई ने बताया- बहुत प्यारी थी। तीन साल सात महीने उम्र थी उसकी। मैं उस बच्ची का नाम भी नहीं जानता, मगर मेरे लिए वह सक़ीना है- दूसरी सक़ीना, जिसे उसके पिता लखनऊ के शिया धर्मगुरू सैय्यद हुसैन अब्बास सिरसवी से कहीं ज्यादा अल्लाह प्यार करते थे। उसने ही इस सक़ीना को लखनऊ से बरहरवा बुलाया था- बरहरवा को उसका करबला बनना था- उसे यहीं की मिट्टी में दफ़्न होना था। वर्ना अब तक मौलाना साहब लखनऊ से अकेले ही यहाँ आते थे। यह पहला मौका था, जब वे परिवार लेकर आये थे।
हमारे पास कोई चारा नहीं है- सिवाय ऊपरवाले की मर्जी के सामने सर झुकाने के। अब ऊपरवाला ही इस दूसरी सक़ीना के परिजनों को ग़मे-हुसैन के इस मौके पर ग़मे-सक़ीना को सहने की ताकत दे......
.......आमीन!
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पुनश्च: 
कुछ दिनों पहले सरबर साहब हमारे घर आये थे. संयोग से, कुष्माकर और कैलाश भी थे. मेरा बेटा कम्प्यूटर पर गेम खेल रहा था. बातों-बातों में मैंने कम्प्यूटर पर उन्हें ब्लॉग में इस पोस्ट को, तथा 'कृष्ण-सुदामा' वाले पोस्ट को दिखाया. 
सरबर साहब ने दो गलतियाँ ठीक करवाई और बताया कि वे लोग उस रोज शाम को ही बच्ची को मालदा लेकर गये थे- वहाँ बच्ची को मृत घोषित किया जा चुका था. मौलाना साहब से मजलिस स्थगित करने का अनुरोध किया जा चुका था. मगर उन्होंने कहा कि मजलिस जारी रहेगी. इस प्रकार, बच्ची मृत अवस्था में ही कमरे में थी- हमें बताया गया कि वह ठीक है और मजलिस जारी रही. जबकि मैं सोच रहा था कि मजलिश खत्म होने के बाद वे लोग बच्ची को लेकर मालदा गये थे. 
इतना त्याग... आज के जमाने में... सोचकर आश्चर्य होता है!
सितम्बर'13