मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

227. कजंगल


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       "कजंगल" एक त्रैमासिक पत्रिका का नाम था। बात 1981-83 की है। इसे हमारे बरहरवा का "अभियात्री" क्लब प्रकाशित करता था। "सॉरेश सर" यानि आनन्द मोहन घोष इस क्लब के एक तरह से सर्वेसर्वा हुआ करते थे। यह पत्रिका थी तो बँगला की, लेकिन इसमें हिन्दी विभाग भी हुआ करता था। दुर्भाग्य से, मेरे संग्रह में कजंगल का जो अंक है, उसमें हिन्दी विभाग नहीं है। सम्पादकीय विभाग की ओर से एक सूचना छपी हुई है (विषय सूची के नीचे) कि अपरिहार्य कारणों से इस बार हिन्दी विभाग नहीं छप रहा है।
       हम तब 8वीं-9वीं के छात्र थे। हमने पिताजी से पूछा कि पत्रिका का ऐसा विचित्र नाम क्यों रखा गया है? कोई बढ़िया-सा नाम क्यों नहीं रखा? पिताजी ने हँसते हुए बताया कि तुम्हारे सॉरेश सर (वे हमारे ही उच्च विद्यालय के शिक्षक थे, लेकिन 'बी' सेक्शन, यानि बँगला विभाग के- इसलिए मेरा सीधा परिचय उनसे नहीं था) बहुत ही विद्वान, बहुत ही प्रतिभाशाली युवक हैं। उन्होंने ही यह खोज निकाला है कि महाभारत काल में देश के जिस हिस्से को "कजंगल" कहा गया है, वह हमारा यही इलाका है। यह क्षेत्र गंगा और राजमहल की पहाड़ियों के बीच स्थित मैदानी इलाका है, जो एक तरफ तेलियागढ़ी किले और दूसरी तरफ गुमानी-गंगा के संगम तक फैला हुआ है। हमने पाया कि सॉरेश सर की टीम हर अंक में हमारे इलाके के किसी एक गाँव का इतिहास छापती थी। जो अंक मेरे पास है, उसमें "कांकजोल" गाँव के बारे में जानकारी है। कांकजोल एक तरह से कजंगल का ही अपभ्रंश है।
       सॉरेश सर ने एकबार हाई स्कूल के मैदान में खेल-कूद प्रतियोगिताओं का भी आयोजन करवाया था। आज की पीढ़ी शायद यकीन न करे, मगर यह प्रतियोगिता एक तरह से ओलिम्पिक-जैसे कायदे के साथ आयोजित हुआ था। बाकायदे मशाल जली थी और बाकी सभी कायदों का पालन हुआ था। हमने भी भाग लिया था। हमारी टीम का नाम "विन्दुधाम किशोर टीम" था। वैसे तो हमारे क्लब का नाम "आजाद हिन्द संघ" था, पर पिताजी ने बताया कि वे लोग अपने जमाने में विन्दुधाम किशोर टीम के नाम से प्रतियोगिताओं में भाग लेते थे, सो हमलोगों ने भी यही नाम अपनाया था।
"मिशन ग्राउण्ड" में हमने एकबार सॉरेश सर को क्रिकेट प्रतियोगिता में खेलते हुए भी देखा था।
एकबार हमने "मिड्ल स्कूल" में उन्हें एक छोटा-सा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करवाते हुए देखा देखा था- शायद यह "सुकान्तो भट्टाचार्य" से सम्बन्धित कोई कार्यक्रम था।
हमारे हाई स्कूल के हॉल में एक बड़ा कार्यक्रम उन्होंने आयोजित करवाया था, जो मुन्शी प्रेमचन्द को समर्पित था। यह बहुत ही ऊँचे दर्जे का कार्यक्रम था।
सॉरेश सर के नेतृत्व में अक्सर नाटकों का आयोजन होता था। बरहरवा की अन्य नाट्य-मण्डलियाँ जहाँ "लोकप्रिय" किस्म के नाटक खेलती थीं (हिन्दी, बँगला, भोजपुरी तीनों भाषाओं में बहुत नाटक आयोजित होते थे बरहरवा में), वहीं सॉरेश सर की मण्डली ऊँचे दर्जे के नाटक खेलती थी- क्लासिक नाटक, जैसे कि "मानुष नामे मानुष", "नील रक्त", इत्यादि।
सॉरेश सर अपनी युवावस्था में ही दुनिया छोड़ गये थे। बताया जाता है कि वे भूटान की यात्रा पर गये थे और वहीं से आकर उन्हें कोई बुखार हो गया था, जो जानलेवा साबित हुआ।
मेरे पास कजंगल का जो अंक है, उसमें (अन्दर) सॉरेश सर के देहावसान की सूचना छ्पी हुई है, यानि कि यह अंक उनकी मृत्यु के कुछ ही समय बाद प्रकाशित हुआ था। आवरण पर सम्पादक के रुप में अनिल कुमार बसु के साथ कृष्णगोपाल राय का नाम छपा है। के.जी. राय सर आज फेसबुक पर सक्रिय हैं। आशा है, वे इस आलेख पर अपनी कोई टिप्पणी देना पसन्द करेंगे।
खैर, मेरे पास कजंगल का जो अंक मौजूद है, उसकी PDF प्रति को हमने अपने एक ब्लॉग "जगप्रभा ई'बुक्स" पर डाल दिया है- वहाँ से कोई भी उसे डाउनलोड (बेशक, निश्शुल्क) कर सकता है। उम्मीद है, नीरज जैन और राजीव रंजन भी डाउनलोड कर सकेंगे, जिनके साथ आज सुबह इन विषयों पर चर्चा हुई थी। लिंक यहाँ है।

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सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

226. एक पुरानी तस्वीर: बरहरवा वालों के लिए एक क्विज



बहुत पहले पिताजी ने हमें एक तस्वीर दी थी और कहा था इससे कुछ और तस्वीरें बनवा दो। तस्वीर के पीछे बाकायदे सभी लोगों के नाम लिखे थे। जहाँ तक हमें याद है, पड़ोस के रुपश्री स्टुडियो की मदद से हमने उस छोटी तस्वीर से तीन या चार बड़ी तस्वीरें बनवा दी थीं। तस्वीरें बँट गयी- यानि जिन्होंने कॉपी माँगी थी, उन्हें दे दी गयीं। अब हमें याद नहीं है कि मूल तस्वीर कहाँ है। शायद पिताजी के बक्से में हो। खैर, हमने उस तस्वीर की एक 'फोटोस्टेट' प्रति अपने पास रख ली थी।
       अभी कुछ दिनों पहले कुछ और खोजते समय हमें वह फोटोस्टेट प्रति मिली। यह मेरी बेवकूफी थी कि हमने पीछे तस्वीर में शामिल लोगों के नाम नहीं लिख रखे थे।
अभी मोबाइल से उस तस्वीर की तस्वीर खींचकर हमने इसमें शामिल लोगों के चेहरे के चारों तरफ सर्कल बनाया और नम्बर दिया। हम चाहेंगे कि बरहरवा के लोग इन्हें पहचानने की कोशिश करें।
जहाँ तक हमने पहचाना है- 1 नम्बर पर मेरे पिताजी हैं, यानि स्व. डॉ. जे.सी. दास; 5 नम्बर पर स्व. महावीर बोहरा हैं और 8 नम्बर पर श्री दिगम्बर साव। अब वे ही बाकियों की पहचान बता सकते हैं।
एक और चेहरे को हम शायद पहचान रहे हैं। 2 नम्बर पर जो हैं, उनका असली नाम हममें से कोई नहीं जानता। वे "बिरनी" नाम से इलाके में प्रसिद्ध थे। फुटबॉल के नामी खिलाड़ी। तेज रफ्तार के साथ गेन्द लेकर भागने की क्षमता के कारण उन्हें "बिरनी" कहा जाता था। (बिरनी के पंख बहुत तेज रफ्तार से ऊपर-नीचे होते हैं।) उनके पुत्र देवानन्द जी कन्फर्म कर सकते हैं।
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शनिवार, 25 जनवरी 2020

225. 25 जनवरी



       ऊपर जो तस्वीर आप देख रहे हैं, वह 25 जनवरी के दिन की तस्वीर है। साल- 1996; स्थान- मेरठ। जहाँ तक फोटोग्राफर की बात है, किसी पत्र-पत्रिका के प्रोफेशनल फोटोग्राफर थे वे। हिन्दी पंचांग के हिसाब से, उस दिन बसन्त-पञ्चमी थी।
       तस्वीर में जो मुस्कान है, उसका यह अर्थ निकाला जा सकता है कि कोई उत्सर्ग/बलिदान करने जा रहा है। बेशक, प्राणों को नहीं, बल्कि अपने bachelorhood (उपयुक्त हिन्दी पर्यायवाची नहीं सूझ रहा) को, विवाह की वेदी पर।
       आज 24 साल हो गये। विवाह हमारा नाम-मात्र के ताम-झाम के साथ हुआ था। मुहुर्त निकलवाने की भी जरुरत नहीं पड़ी थी। सीधे बसन्त-पञ्चमी का दिन तय कर दिया गया था- बेशक, मेरी ओर से ही। विवाह-समारोह दिन की रोशनी में आयोजित हुआ था, सम्भवतः आर्य-समाजी विधि द्वारा। अल्बम का एक पन्ना उस समारोह का प्रस्तुत है।

       अब जो तस्वीर प्रस्तुत है अल्बम से, वह मेरी और अंशु की है। दोनों तस्वीरें 1987 की हैं। हालाँकि तब हम एक दूसरे को जानते नहीं थे। उसने यह तस्वीर शायद करनाल में खिंचवायी थी- इण्टर की परीक्षा के लिए फॉर्म भरते वक्त और मैंने यह तस्वीर आवडी के एक स्टुडियो में खिंचवायी थी। दो महीनों की छुट्टी बिताकर लौटा था और ड्युटी पर जाने से पहले हेयर-कट लेने गया था। सोचा, बढ़े बालों के साथ एक तस्वीर खिंचवा ली जाय! 

       उसी साल (1987) के अगस्त महीने में अंशु पर तेजाब से हमला हुआ और इसके कुछ ही महीनों बाद मैंने 'मनोहर कहानियाँ' में इस लोमहर्षक काण्ड के बारे में पढ़ा। नौ साल बाद 1996 में हमदोनों जीवनसाथी बने। 2012 (14 फरवरी) में इसी ब्लॉग पर मैंने 'सोलहवाँ बसन्त' नाम से एक आलेख भी लिखा था- अपने इस विवाह के बारे में।
       कुल-मिलाकर, आज हमारे विवाह की 24वीं वर्षगाँठ है। इस अवसर पर आज की एक तस्वीर- 

शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

224. शहीद राजमिस्त्री

शायद 2003 की बात होगी। हम छुट्टी लेकर घर आये थे कि अपने घर के पीछे की तरफ परती जगह पर अपने लिए अलग से एक बसेरा बनवा लें, क्योंकि दो साल बाद ही हमें सेवा से अवकाश लेना था।
जो राजमिस्त्री आया, वह काम के लिए राजी तो हुआ, लेकिन उसका कहना था कि वह अगले महीने से काम शुरु करेगा। हमने जानना चाहा क्यों, तो पता चला कि यह चैत का महीना है और इस महीने नये घर के निर्माण का काम शुरु नहीं होता। काम शुरु होगा बैशाख में।
हमने कहा- हम तो छुट्टी लेकर आये हैं, तो हमें तो काम शुरु करवाना ही होगा। वह नहीं माना। तब माँ ने कहा कि पड़ोस के मुहल्ले में "शहीद" नाम का एक राजमिस्त्री है, उसको कहो। हम गये उस मुहल्ले में। पता चला, वह अब दूर के एक मुहल्ले में रहता है। वहाँ जाकर बताये। वह आया। जगह देखी उसने। राजी हुआ। हमने पूछा- कब से काम शुरु होगा। उसका कहना था- कल से। ...और अगले दिन से काम शुरु हो गया। 
हमारा यह छोटा-सा बसेरा उसी के हाथों से बना हुआ है।
धीरे-धीरे हमें पता चला कि वह बहुत-बहुत-बहुत काबिल राजमिस्त्री है। शरीर में ताकत बहुत, मजदूरों पर नियंत्रण बहुत बढ़िया, बहुत तेज दिमाग, कभी मालिक का नुकसान न होने दे, और भी बहुत सारे गुण थे उसमें। जल्दी ही हमारे घर से उसका पारिवारिक रिश्ता बन गया। स्वभाव हँसमुख होने के कारण जैसे ही वह घर में प्रवेश करता, एक रौनक-सी आ जाती थी। घर में सबसे- माँ-पिताजी, चाची से भी वह बातचीत करता था। भैया का तो वह करीबी दोस्त था।
बाद में पता चला कि वह टाईल्स का काम करता है, प्लम्बिंग का भी काम करता है और भी बहुत कुछ। ऐसा हो गया था कि किसी भी तरह का काम हो घर में- उसको एकबार फोन किया जाता था और ज्यादातर मामलों में वह काम कर देता था या करवा देता था। हमारी बातचीत बँगला में होती थी- हम उसे "आप" सम्बोधित करते थे और उसे "शहीद-दा" कहते थे। बदले में वह भी हमें "मोनू-दा" ही कहता था और श्रीमतीजी को "भौजाई" (भाभी)।
2017 में जब हमारा 'रतनपुर प्रोजेक्ट' (व्यवसायिक भवन) शुरु हुआ, तो उसी ने शुरु किया। बाद में बेशक, उसके भाँजे अनीस और एक दूसरे सहयोगी रहीम ने काम सम्भाला, पर शुरुआत उसी ने की थी। ईद-बकरीद में उसके घर से हमारे यहाँ कुछ न कुछ आता था। हमारी भी कोशिश होती थी कि होली-दिवाली में उसका मुँह मीठा करवाया जा सके।

इस बीच उसे कई बीमारियों ने घेर लिया। काफी ईलाज चला। करीब महीने भर पहले हमने उसे पूरी तरह फिट देखा। हमें अच्छा लगा। कुछ कारणों से हमारा रतनपुर प्रोजेक्ट रुका हुआ है। हमने सोचा, जब दुबारा काम शुरु होगा, तो उसी से कुछ खास काम करवाया जायेगा। कुछ नया और खास काम करने में उसे महारत हासिल थी। हाँ, हमारे यहाँ एक बाथ-टब बनाने से वह पीछे हट गया, लेकिन चाहता, तो तस्वीर देखकर बना सकता था। खैर, रतनपुर प्रोजेक्ट में उससे हमें फौव्वारा बनवाना था।

मगर सब खत्म हो गया। कल- 23 जनवरी की सुबह यह अशुभ खबर आयी कि शहीद मिस्त्री नहीं रहा... । यकीन करना मुश्किल था, मगर यह हुआ। हमदोनों उसके घर गये अन्तिम दर्शन के लिए।
उसके परिजनों और उसके शागिर्दों को ईश्वर यह आघात सहने लायक ताकत दे और उसकी आत्मा को शान्ति मिले।    
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पुनश्च: 
अल्बम से शहीद की एक तस्वीर मिली- 
शहीद बीच में है (उसके दाहिने 4 और बाँये 2 मजदूर हैं) तस्वीर में- घर के लिए पहले खम्भे की नींव खोदी जा रही है.

इसमें शहीद की जगह पर हम खड़े हैं, मतलब तस्वीर शहीद ने खींची होगी.


निर्माणाधीन मकान. स्कूल ड्रेस में अभिमन्यु है और छत पर शहीद किसी के साथ बैठा है.


यह दीवार पर कंक्रीट की आलमारी शहीद ने एक तस्वीर देखकर बनायी थी.