मंगलवार, 20 मार्च 2018

197. पुरी यात्रा (संस्मरण)


जगन्नाथ मंदिर
           पुरी गये हुए तीन महीने से ज्यादा हो गये,पर अब तक इस यात्रा पर लिखना नहीं हो पाया था
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       हुआ यूँ कि कई साल पहले जब हम पुरी गये थे (शायद 2007 में), तब हमने पड़ोस के रेलवे स्टेशन पाकुड़ से गौहटी-पुरी एक्सप्रेस ट्रेन पकड़ी थी। यह एक साप्ताहिक ट्रेन है। करीब 18 घण्टों का सफर है।
       बीते साल के अन्त में जब हमारी साली साहिबा (मुरादाबाद वाली) का कार्यक्रम बन रहा था हमारे यहाँ आने का, तब श्रीमतीजी ने उसे कह दिया कि यहाँ से पुरी नजदीक है- पाकुड़ से ट्रेन चलती है। दोनों ने कार्यक्रम बना लिया- पुरी भ्रमण का और बाद में हमें बताया। हमने समझाने की कोशिश की कि पुरी नजदीक-वजदीक नहीं है, इतना है कि गौहाटी से पुरी जाने वाली साप्ताहिक ट्रेन यहाँ पाकुड़ से मिल जाती है। मगर अब कोई सुनने को तैयार नहीं था- कार्यक्रम बन गया है, तो जाना ही है।
       अब हम IRCTC की शरण में गये। वापसी यात्रा के लिए पुरी-गौहाटी एक्सप्रेस को ही चुना, ताकि पाकुड़ स्टेशन पर उतरकर आराम से घर (बरहरवा) आ सकें। जाने के लिए हावड़ा से कोई ट्रेन पकड़ना चाहते थे हम कि मेहमानों को कोलकाता भी घुमा दिया जाय और कोलकाता में (बेटे) अभिमन्यु से भेंट भी हो जाय। हावड़ा से पुरी के लिए खुलने वाली सारी ट्रेनें भरी हुई थीं। 'साँतरागाछी' (कोलकाता का एक उपनगरीय इलाका) से एक साप्ताहिक ट्रेन में जगह मिली।
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कालीघाट
पहली दिसम्बर की रात हम रवाना हुए और अगले दिन सुबह-सुबह हावड़ा पहुँचे। एक शानदार बस में बैठकर टॉलीगंज पहुँचे। वहाँ से अभिमन्यु के फ्लैट पर गये। कायदे से, कोलकाता में जब समय कम हो, तो विक्टोरिया मेमोरियल ही घूमने जाना चाहिए। मगर महिलाओं को कुछ बातें नहीं समझायी जा सकतीं। दोनों बहनें कालीघाट ही जाने की जिद पर अड़ी रहीं। मन मारकार हम कालीघाट के लिए ही रवाना हुए। इसबार टॉलीगंज (यह स्टेशन महानायक उत्तम कुमार को समर्पित है) से हमने मेट्रो पकड़ी, ताकि मेहमानों को मेट्रो में सफर का अनुभव करवाया जा सके- यही सुविधाजनक भी था।
कालीघाट का अनुभव इतना बुरा रहा कि क्या बताया जाय! खुली लूट-खसोट और अव्यवस्था का आलम था वहाँ। उस दिन शनिवार होने के चलते भीड़ ज्यादा थी शायद। हम खुद और मुकेश भाई साहब शॉर्टकट में दर्शन करने के बाद बाहर इन्तजार करते रहें और दोनों बहनें बढ़िया से काली माता के दर्शन के लिए घण्टों कतार में खड़ी रहीं। घूँस-घास देकर ही दोनों ने अच्छे-से दर्शन किया। अन्त में बाहर प्रसाद वाली दूकान के दूकानदार और पण्डे- दोनों से बहसबाजी भी करनी पड़ी। बहुत खरी-खोटी सुनायी हमने उन्हें कि बाहर से आने वालों को ऐसा ही घटिया अनुभव करवाना चाहते हैं आपलोग कोलकाता के बारे में! मुझे याद आया कि बचपन में जब कभी यहाँ आया था, तब भी यही आलम था- 1975-76 की बात होगी।
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अभि ने एक 'ओला' कैब बुक कर दिया था हावड़ा स्टेशन के लिए। तय हुआ था कि हावड़ा से कोई एक लोकल ट्रेन पकड़कर साँतरागाछी चला जायेगा- वहीं से रात में हमारी पुरी वाली ट्रेन खुलने वाली थी। अभि ने बताया कि साँतरागाछी तक जाने का ओला कैब ज्यादा किराया ले लेगी, क्योंकि वह महानगर क्षेत्र से बाहर है। हावड़ा से जब हमने लोकल ट्रेन पकड़ी, तब समझ में आया कि कैब वाले को ज्यादा किराया देकर सीधे साँतरागाछी पहुँचना उचित था। भयंकर भीड़ हो गयी थी ट्रेन में। रास्ता भले बीस-पच्चीस मिनट का रहा होगा, मगर भीड़ के कारण किसी स्टेशन पर उतर पाना तक मुश्किल था। जैसे-तैसे हम उतरे।
स्टेशन पर कुछ समय बिताया हमने, खाना पैक करवाया, ट्रेन आयी और अब हम पुरी की ओर रवाना हो गये।
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रात भर की यात्रा के बाद मुँह-अन्धेरे हम पुरी स्टेशन पर थे। जिस अर्द्धसरकारी संस्थान में मैं काम करता हूँ, ऑटो लेकर हम पहले उसके हॉलीडे होम गये- टिकट बनवाते ही हमने यहाँ के दो कमरों के लिए आवेदन दे दिया था। युनियन के पदाधिकारी से भी अनुरोध किया था। मगर पता चला- मेरा आवेदन वहाँ पहुँचा ही नहीं था। मुझे पता था- ऐसा ही होगा- यहाँ सिर्फ बड़े 'एप्रोच' वालों का ही कमरा बुक होता होगा। सरकारी-अर्द्धसरकारी विभागों में ऐसा होना ही स्वाभाविक है।
पुरी समुद्रतट पर सूर्योदय 
ऑटो वाला हमें एक होटल में लाया। नाम अभी याद नहीं आ रहा, पर नाम में 'Love' शब्द जुड़ा हुआ था। चूँकि सैलानियों की संख्या अभी ज्यादा नहीं थी, इसलिए सस्ते में ही एक कॉटेज मिला- दो कमरों का। अभी तक पौ नहीं फटा था। मैनेजर ने कहा- बीच पर जाकर सनराईज देख आईयेगा। हम तो पहले से ही तैयार थे इसके लिए, सो कुछ मिनटों में ही हम समुद्रतट की ओर निकल गये। बाकी तीनों तैयार-वैयार होकर जब तक तट पर पहुँचे, तब तक सूर्योदय हो चुका था।
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पिछली बार (2007 में) जब हमारा पुरी आना हुआ था, तब रिक्शेवाला हमें 'माँ तारिणी' नाम के एक छोटे-से लॉज में ले गया था। वहाँ जिस पण्डेजी ने हमसे सम्पर्क किया था, उन्होंने बहुत अच्छे तरीके से हमें जगन्नाथ जी के दर्शन करवाये थे। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी से जुड़ी कहानियों को उन्होंने इतने अच्छे से हमें सुनाया था कि हम भाव-विभोर हो गये थे। मन्दिर का चप्पा-चप्पा उन्होंने घुमाया था और अन्त में सड़क के दूसरी तरफ स्थित लाइब्रेरी की छत पर भी हमें वे ले गये थे, ताकि हम वहाँ से भी तस्वीरें खींच सकें।
लेकिन इस बार का अनुभव उल्टा हो गया। होटल में जिस पण्डेजी ने हमसे सम्पर्क किया, वे हमें अच्छे-से दर्शन नहीं करवा सके। पहले इधर-उधर घुमाकर बाद में मन्दिर के अन्दर ले गये, जब पट बन्द हुआ ही था। घण्टा-डेढ़ घण्टा हमें वहाँ बैठना पड़ गया। इस बार दर्शन भी दूर से हो रहा था। एक बूढ़े पण्डेजी से हमने इसका कारण पूछा, तो उन्होंने बताया कि गर्भगृह के पास मरम्मत का काम चल रहा है। पिछली बार तो हमने बाकायदे वेदी की परिक्रमा की थी और विग्रहों को बिलकुल नजदीक से देखा था।



इसबार ऑटो वाला भी बेवकूफ निकला, सो और बिना कहीं घूमे हम होटल लौट आये। समुद्रतट पर गये। खूब नहाये। मेरे अलावे, बाकी तीनों के लिए यह पहला अनुभव था समुद्र की लहरों से खेलते हुए नहाने का।
दोपहर बगल के मारवाड़ी बासा से खाना लाकर हमने खाया, थोड़ा आराम किया और दोपहर बाद 'स्वर्गद्वार' घूमने निकल गये। वहाँ के समुद्रतट को देखकर मेरिना बीच की याद आ गयी। खाने-पीने और खरीदारी करने के लिए ढेरों दूकानें थीं वहाँ। घूम-फिर कर रात हम लौट आये।




आने के बाद अकेला बाजार निकला- तीन-चार 'क्युरियो शॉप' का चक्कर लगाया। एक "नटराज" लेना था। दरअसल, उसी रात (3 दिसम्बर) मित्र जयचाँद की शादी थी, एक कलाकार होने के नाते उसे गिफ्ट में "नटराज" की मूर्ति देनी थी और यहाँ से वापस बरहरवा लौटकर हमें उसके रिसेप्शन में (6 दिसम्बर को) शामिल होना था।
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कोणार्क सूर्य मन्दिर 

धौलागिरि बौद्ध स्तुप 

भुवनेश्वर में सड़क के किनारे एक मन्दिर. मुख्य मन्दिर (लिंगराज) में भी फोटोग्राफी की अनुमति ही नहीं है. 

उदयगिरि 

खण्डगिरि 

अगले दिन कोणार्क, भुवनेश्वर, धौलागिरी और खण्डगिरि का टूर था। टूर अच्छा ही रहा। उस वक्त कोणार्क में Sand Festival भी चल रहा था। हाँ, चलने से पहले हमने उसी मारवाड़ी बासे से आलू के परांठे पैक करवा लिये थे। बासा के बुजुर्ग मालिक तो जैसे हमारे पुराने परिचित बन गये थे। बहुत अच्छा व्यवहार था उनका। किसी को भी तुरन्त अपना बना लेने की क्षमता थी उनमें।
मारवाड़ी बासा के मालिक 
रात खाना खाने हमलोग बासे में ही गये।
एक गड़बड़ हुई, पण्डेजी जगन्नाथ जी का प्रसाद हमारे लिए होटल मैनेजर को दे गये थे और मैनेजर हमें देना भूल गया। वर्ना रात में हमें एकसाथ बैठक्र वही प्रसाद खाना था। पिछली बार हमने इसी तरह से प्रसाद खाया था। हमारे साथ विजय था- सपत्नीक। तब अभिमन्यु भी साथ था- बच्चा था वह। विजय का साथ हमें संयोग से ही मिल गया था। वह पाकुड़ स्टेशन पर टहल रहा था। हमने पूछा तो बताया कि यहाँ उसका ससुराल है। फिर उसने पूछा, तो हमने बताया कि हम गौहाटी-पुरी का इन्तजार कर रहे हैं। वह हँसने लगा, बोला- हम भी तो उसी ट्रेन का पता लगाने आये हैं। यानि वे भी उसी दिन उसी ट्रेन से पुरी जा रहे थे।
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अगले दिन, यानि 5 दिसम्बर को हमारी ट्रेन दोपहर के बाद थी। सो, सुबह-सुबह हमलोग जगन्नाथ जी के दर्शन को पहुँच गये, ताकि इसबार अच्छे-से दर्शन कर सकें। अच्छे से दर्शन करके हम होटल लौट आये। फिर एकबार समुद्रतट पर गये- हालाँकि इसबार नहाने के मकसद से नहीं, बस घूमने गये थे। लौटकर एक दूसरा ऑटो किया, होटल छोड़कर अपना सारा सामान रख लिया और ऑटो वाले को कहा कि वह पुरी शहर के अन्दर के सारे दर्शनीय स्थलों को दिखलाने के बाद हमें स्टेशन पर उतार दे।
पुरी नगर के अन्दर एक बौद्ध-स्तुप...
...और वहाँ कार्यरत कुछ मूर्तिकार
(पता नहीं, हमारे मन्दिरों में मूर्तिकारों को स्थान क्यों नहीं दिया जाता?)
 ऐसा ही हुआ।
दोपहर बाद ट्रेन खुली, जिसने हमें अगली सुबह पाकुड़ स्टेशन पर उतार दिया। पाकुड़ से अगली सवारी ट्रेन पकड़कर हम बरहरवा लौट आये।
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कोणार्क मन्दिर में भी खजुराहो-जैसी मूर्तियाँ हैं- हालाँकि बहुत कम. 


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