शुक्रवार, 4 मार्च 2011

रक्तदान (...और अभिमन्यु का जन्म)


पहला रक्तदान
      जहाँ तक याद है, यह 92-93 की सर्दियों की बात है। ग्वालियर के सेना अस्पताल में हम लगभग दस वायुसैनिक पहुँचे थे रक्तदान के लिए।
मध्यरात्रि का समय था।
पोद्दार को दिल्ली ले जाने के लिए ए.एन.-32 विमान आनेवाला था और विमान में भी उसे रक्त चढ़ाना जारी रखना था। मात्र तीन बोतल बी-पॉजीटिव रक्त की जरूरत थी, जबकि देने वाले दस पहुँच गये थे। वायु सेना के सिक क्वार्टर्स में चूँकि रक्त निकालने की सुविधा नहीं थी, इसलिए हमें एम.एच. (आर्मी अस्पताल) लाया गया था।
      दो वायुसैनिक रक्त देकर लौटे, तब तक मैं चुप बैठा था। मुझे खून देखकर डर लगता था और इस डर को मिटाने के लिए ही मैं रक्तदान के लिए आया था। जब तीसरे वायुसैनिक रक्तदान के लिए जाने लगे, तब मैंने उन्हें रोका और अपनी बात बतायी।
      वे हँसने लगे। वे एक सीनियर कॉर्पोरल थे- लम्बे, गोरे और स्मार्ट। बोले, भाई, मैं नौ बार रक्तदान कर चुका हूँ और आज इस संख्या को दहाई में पहुँचाने का मेरा इरादा था। लेकिन अब तुम ही जाओ।
      अन्दर जाकर मैंने आर्मी के मेडिकल असिस्टैण्ट को भी अपनी बात बतायी। वे बोले, डर लगता है तो छोड़िये। यहाँ तो कई लोग मौजूद हैं।
      मैंने कहा, मुझे इस डर को ही तो मिटाना है।
      खैर, रक्तदान के दौरान तो कुछ नहीं हुआ, मगर रक्तदान के बाद क्षण भर के लिए मुझे चक्कर जरूर आ गया। हुआ यूँ कि सूई निकालने के बाद मुझे हाथ को केहुनी से मोड़कर दबाकर रखने के लिए कहा गया, मगर मैंने इस निर्देश को गम्भीरता से नहीं लिया। हाथ मोड़कर हल्के-से मैंने कुछ देर दबाये रखा और फिर हाथ को सीधा कर दिया।
      फिर क्या था- जहाँ से खून लिया गया था, वहाँ से रक्त की एक धारा निकल पड़ी और खून बहता देख मैं क्षणभर के लिए लड़खड़ा गया।
      मुझे तुरन्त लिटाया गया, बेल्ट ढीली की गयी, जूते उतार दिये गये, बाद में एक ग्लास ग्लूकोज भी दिया गया। हालाँकि यह सब गैर-जरूरी था। एक-दो सेकेण्ड के बाद ही मैं सामान्य हो गया था।

दूसरा रक्तदान
      दूसरा रक्तदान भी मैंने ग्वालियर के सेना अस्पताल में ही जाकर किया, मगर यह आपातकालीन परिस्थिति नहीं थी।
यह कोई रक्तदान शिविर था।
      सुबह का खुशनुमा माहौल था। हम चार-पाँच वायुसैनिक साइकिल चलाते हुए शिविर तक आये थे और बहुत ही खुशी-खुशी हमने रक्तदान किया।
एक आर्मी अधिकारी ने टिप्पणी भी की- क्या बात है, ये एयर फोर्स वाले तो बड़े हँस-हँस कर ब्लड डोनेट कर रहे हैं...।
रक्तदान के बाद मजे से साइकिल चलाते हुए हम वापस लौटे थे।

तीसरा रक्तदान
      तीसरे रक्तदान का मौका 96-97 में मिला।
      मैं हलवारा (लुधियाना के पास) में था। एक एक्स-सार्जेण्ट की पत्नी का लुधियाना के कैन्सर अस्पताल में ऑपरेशन हुआ था, दो बोतल खून चढ़ाया जा चुका था, अब अगले दिन बदले में दो बोतल खून जमा करना था।
      हम दो वायुसैनिक (दूसरे वरिष्ठ थे- जे.डब्ल्यू.ओ.) उन एक्स-सार्जेण्ट के साथ कैन्सर अस्पताल पहुँचे।
      अब मैं विवाहित था और इस बार मुझे श्रीमतीजी का डर दूर करना था, सो उन्हें लेकर मैं गया था।
      दरवाजे में लगे शीशे से वे मुझे रक्तदान करते हुए देखती रहीं।
      बाहर आकर मैंने कहा, देखा, यह कुछ भी नहीं था।
***
      श्रीमतीजी ने अगली छुट्टियों में घर में इस बात का जिक्र कर दिया।
पता नहीं, माँ पर क्या असर हुआ, मगर पिताजी ने बुलाकर मुलामियत से कहा- ज्यादा रक्तदान मत करो।

चौथा रक्तदान और अभिमन्यु का जन्म
      मेरा चौथा (और अब तक का अन्तिम) रक्तदान सिर्फ आधे बोतल खून का था, मगर यही रक्तदान सबसे महत्वपूर्ण रहा।
      श्रीमतीजी हलवारा में ही वायु सेना अस्पताल में भर्ती थीं।
97 के नवम्बर की बात है।
अचानक टेलीफोन द्वारा मुझे खबर दी जाती है कि ‘सीजेरियन’ ऑपरेशन करना होगा, ए-पॉजीटिव खून की व्यवस्था करनी है।
मैं सेक्शन से श्री एस. सिंह को साथ लेकर अस्पताल पहुँचा, उनका ब्लड ग्रुप ए-पॉजीटिव था।
      श्री एस. सिंह के खून की जाँच के लिए हम लैब में गये, वहाँ देखा, मेडिकल असिस्टैण्ट एक महिला का रक्त लेने की व्यवस्था कर रहे हैं। मैंने उस महिला को पहचाना- वे वार्ड में मेरी पत्नी के बगल वाले बेड पर थीं। उनका सात दिन का नवजात शिशु था, जिसे ‘इंक्युबेटर’ (ट्यूब-लाईट की रोशनी में) में रखा गया था। जन्म से पीलिया होने पर ऐसा करते हैं शायद।
      वे आर्मी के एक जवान की पत्नी थीं। जवान को छुट्टी नहीं मिली थी, मगर जवान की माँ, अर्थात् नवजात की दादी माँ जरूर अस्पताल में मौजूद थीं।
      मैंने कहा, इनका तो छोटा-सा बच्चा है न?
      हाँ, मेडिकल असिस्टैण्ट ने बताया, इन्हीं के बच्चे के लिए आधा बोतल खून लेना है, ...कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
      मगर मुझे फर्क पड़ा। 
कौन-सा ग्रुप चाहिए? मैंने पूछा।
      बी-पॉजीटिव।उत्तर आया
      मेरी जान-में-जान आयी। मैंने कहा, मेरा खून ले लीजिये- बी-पॉजीटिव है, इन्हें जाने दीजिये।
      क्या बात करते हैं, आप खुद अपनी पत्नी के ऑपरेशन को लेकर परेशान हैंमेडिकल असिस्टैण्ट का कहना था
      आधे बोतल खून से क्या फर्क पड़ता है... इस बार मैंने कहा
      इसके बाद के घटनाक्रम तेजी से घटे और बिलकुल अप्रत्याशित रहे।
      मेरा आधा बोतल खून उस सात दिनों के नन्हें बच्चे को चढ़ाया गया... बच्चे की दादी माँ ने गुरू नानकदेव जी का नाम लेकर मुझे आशीर्वाद देना शुरू कर दिया... अस्पताल का जेनरेटर खराब हो गया... मेरी पत्नी को ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकाला गया... मेरी सासु माँ और मेरी मौसेरी बहन ने उन्हें जमकर मेथी के पराँठे खिला दिये... जेनरेटर ठीक हुआ... अंशु (मेरी पत्नी का नाम) को फिर बुलाया गया... लेडी डॉक्टर ने पूछा- कुछ खाया तो नहीं?... जाहिर है, उसदिन ऑपरेशन रद्द हो गया... ।
      ...अगले दिन अस्पताल की कोई और तकनीकी चीज खराब हो गयी... डॉक्टर (शायद श्रीमती झा नाम था) ने मुझे बुलाकर कहा- कुछ सामान थैले में डालो, हम जालन्धर एम.एच. जा रहे हैं... देर करना ठीक नहीं, तुरन्त ऑपरेशन होना चाहिए...
      जालन्धर मिलिटरी हॉस्पिटल काफी दूर था... एम्बुलैन्स में हम वहाँ पहुँचे... डॉ. झा ने अंशु को भर्ती करवाया... शाम तीन बज गये थे शायद... मैं एम्बुलैन्स में ही हलवारा लौट आया... अगले दिन वहाँ पहुँच कर पाया- सुबह ग्यारह बजे मेरे बेटे अभिमन्यु का जन्म हो चुका था!... नॉर्मल डिलिवरी... सीजेरियन ऑपरेशन की जरूरत नहीं पड़ी; सम्भवतः एम्बुलैन्स की लम्बी यात्रा ने ‘लेबर पेन’ शुरू करने में मदद की।
      (बेटे का नाम पहले से तय था। अगर बेटी होती, तो उसका भी नाम तय था- उत्तरा।)
      यह नवम्बर की तेरह तारीख थी।
     वार्ड से बाहर आते वक्त देखा- एक स्थान पर श्रद्धाभाव के साथ कौव्वाली चल रही है- मिलीटरी हॉस्पिटल के अन्दर!
मैंने आश्चर्य से पूछा, यहाँ क्या है?
      उत्तर मिला, यह पीर बाबा का मजार है, और आज वृहस्पतिवार है न!...
      ***
      बिजली की तरह पिछले दिनों की कुछ बातें मेरे दिमाग में कौंध गयी-
...विवाह के बाद से ही अंशु का कहना कि उसने सपने में पीर बाबा के मजार को देखा है और उसे किसी मजार पर जाना है...
...विवाह के बाद हम डेढ़-पौने-दो साल तेजपुर (आसाम) में रहे, वहाँ किसी पीर बाबा के मजार का न होना...
...हलवारा में वायुसेना स्थल जाने के रास्ते में ही एक पीर बाबा के मजार का होना, मगर हमारा वहाँ न जा पाना...
...अंशु को साँस लेने में तकलीफ... कई घण्टों तक उसे कृत्रिम ऑक्सीजन पर रखना... और उस दिन का वृहस्पतिवार होना... (हम किराये के एक रोशनदान-विहीन कमरे में रहते थे... हमारा सामान तेजपुर से पहुँचा नहीं था... भीषण गर्मी थी... कुल-मिलाकर हम बहुत कष्ट में थे...)
...अंशु को रक्तस्राव की शिकायत... हफ्ते भर का बेडरेस्ट... और उस दिन का भी वृहस्पतिवार होना...
...फिर एक वृहस्पतिवार को हमारा पीर बाबा के मजार पर जाना और उस दिन के बाद से तकलीफों का अन्त हो जाना...
...और आज मेरे बेटे का जन्म जालन्धर के मिलीटरी हॉस्पिटल में हुआ, जहाँ कि पीर बाबा का मजार है... और आज वृहस्पतिवार है... जमकर भक्ति से ओत-प्रोत कौव्वालियाँ चल रही हैं...
मैंने जाकर मत्था टेका।
बाहर से लड्डू लाकर मजार पर चढ़ाया। वार्ड में भी बाँटा।
जालन्धर से लौटते समय मेरी बस जाम में फँसी। कोई धार्मिक जुलूस था। मैंने पूछा- आज क्या है?
गुरू नानकदेव जी का जन्मदिन! उत्तर मिला।
***
हलवारा आने पर वृहस्पतिवार को हम अभिमन्यु को लेकर पीर बाबा के मजार पर गये। लोगों ने कहा- सात दिन के बच्चे को वहाँ मत ले जाओ, वह कब्रिस्तान है!
मगर हम लेकर गये... ठण्ड थी, अभिमन्यु को गर्म कपड़ों में हमने लपेट रखा था... उसे मजार के पायताने पर लिटाकर हमने प्रार्थना की- इसकी रक्षा तुम्हारे हाथों में है...
***
जालन्धर से अंशु और अभिमन्यु को लाते समय मैं प्रसिद्ध लवली स्वीट्स से ढेर सारे लड्डू ले आया था।
वायु सेना अस्पताल में जब लड्डू देने गया, तो एम.एन.एस. की चीफ (मलयाली थीं) मुस्कुरा कर बोलीं, स्वीट्स तो हम नहीं ले सकते, और फिर, डिलीवरी भी तो यहाँ नहीं हुई।
मैंने कहा, मैडम, ये लवली स्वीट्स के लड्डू हैं।
लवली स्वीट्स? वे फिर मुस्कुराकर बोलीं, फिर तो हम 'ना' भी नहीं कर सकते
***   ***   ***   

बुधवार, 2 मार्च 2011

'अथ मोबाइल काण्ड'


रविकान्त और शशीकान्त दोनों भाई हैं रविकान्त बरहरवा में ही रहकर अपना व्यवसाय करता है, जबकि शशीकान्त बैंक ऑव इण्डिया में है
जब हम अरविन्द पाठशाला में पढ़ते थे, तब बिहार सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किये गये कुछ नवीण प्रयोगों तथा उन्हें वापस लिये जाने के कारण दो कक्षायें मिलकर एक हो गयीं थीं, जिसके कारण रविकान्त और शशीकान्त एक ही कक्षा में आ गये और दोनों हमारे दोस्त बन गये
2005 से 08 के बीच जब मैं बरहरवा में आजाद पंछी की तरह रह रहा था (वायु सेना से अवकाश लेने तथा स्टेट बैंक में शामिल होने के बीच का समय), तब मुन्शी पोखर की नुक्कड़ पर राजेश की चाय-दूकान और बिहारी की पान-दूकान के बीच जो बेंच पड़ी रहती है, वहाँ मैं सुबह-शाम कुछ देर के लिए जरूर पाया जाता था वहीं रविकान्त (दोस्तों की जुबान में बोले तो- ‘रबिया’) से अक्सर मुलाकात होती थी
आपबीती सुनाने का उसका अन्दाज इतना दिलचस्प है कि सुननेवाला घण्टों मंत्रमुग्ध होकर सुनता रह जाय कई किस्से मैंने उसके मुँह से सुने एक किस्से को मैंने लिख डाला मैंने ‘उत्तम पुरूष’ में लिखा था- खुद को रविकान्त मानते हुए उसे पढ़ाया उसने सहमति दी और मैंने उसे मन मयूर के एक अंक में उसी के नाम से छाप दिया
(उन दिनों डी.टी.पी. मेरा पेशा और त्रैमासिक पत्रिका (मन मयूर) निकालना मेरा नेशा (नशा का बँगला उच्चारण) हुआ करता था)
तो उसी रचना को आज मैं आप के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ:-



 
बात कोई डेढ़ साल पहले की है। सोते समय मैं अपना मोबाइल दो तकियों के बीच में रखता था। ऑफनहीं करता था- कि क्या पता कब किसका इमर्जेंसी फोन आ जाय। की-पैडभी मैं लॉक नहीं रखता था- इस तरफ मैंने कभी ध्यान ही नहीं दिया था।
      उस रात कोई डेढ़-दो बजे किसी प्रकार से मेरे मोबाइल का एक नम्बर बटन दब गया और इस नम्बर बटन ने फास्ट डायलिंगके तहत मेरे छोटे भाई शशीकान्त के फोन में घण्टी बजा दी। मेरा भाई भागलपुर में रहता है। डेढ़-दो बजे रात मोबाइल की घण्टी से उसकी आँखें खुलीं। फोन उठाकर देखा तो पाया- घर से भैया (यानि मेरा) का फोन आ रहा है। इतनी रात गये घर से फोन आने का मतलब है जरुर कोई गम्भीर बात है- सोचकर उसने फोन रिसीव किया। वह ‘‘हैलो भैया, हैलो-हैलो-’’ करता रहा। इधर मैं तो गहरी नीन्द में था। मैं कहाँ से जवाब देता!
      उधर फोन पर कोई जवाब न पाकर शशी चिन्तित हो गया। एक तो भैया फोन काट नहीं रहा है, ऊपर से जवाब नहीं दे रहा है- बात क्या है? इसी बीच फोन पर उसे कुछ ऐसी आवाज सुनाई पड़ी कि मानों कोई किसी का गला दबा रहा हो। दरअसल सोते समय मेरी थोड़ी नाक बजती है। तो नाक बजने की और साँस चलने की आवाजों को मेरे मोबाइल ने तकिये के नीचे से कुछ इस प्रकार ग्रहण किया कि मेरे भाई को मेरे दम घुटने का आभास हो गया।
      शशी के दिमाग ने तुरन्त अनुमान लगाया- हो-न-हो, जरुर किसी बदमाश ने घर में घुसकर भैया का गला दबा रखा है और भैया ने मुझे खतरे की सूचना देने के लिए बस किसी तरह फास्ट-डायलिंगसे फोन कर दिया है! हो सकता है- कई बदमाश हों। घर में लूट-पाट चल रही हो। भैया ने विरोध किया होगा तो एक उनका गला दबाकर सीने पर बैठ गया होगा! ...ऐसे मौकों पर इस तरह के ख्याल आते ही हैं।
      शशी ने अपनी पत्नी को जगाया। अपने अनुमानित खतरे के बारे में उसे बताकर उसने दूसरे फोन से घर के बेसिक टेलीफोन पर फोन करने के लिए कहा। खुद उसने मोबाइल नहीं छोड़ा- क्या पता भैया कब कुछ बोले!
      उसकी पत्नी ने हमारे घर के बेसिक टेलीफोन पर फोन किया। डेढ़-दो बजे रात में फोन की घण्टी बजे तो कभी-कभी फोन उठाने में आलस होता ही है। मेरी मम्मी ने भी एक-दो बार फोन नहीं उठाया। इससे मेरे भाई की चिन्ता और बढ़ गयी कि नीचे भी घर में कोई फोन क्यों नहीं उठा रहा है?
      खैर, वे लोग फोन करते रहे और अन्त में मेरी मम्मी ने फोन उठाया। शशी ने तुरन्त उनसे पूछा, ‘‘ऊपर कमरे में क्या चल रहा है?’’
      ‘‘क्यों क्या हुआ?’’ मम्मी ने पूछा।
      ‘‘भैया ने यहाँ मेरे मोबाइल पर फोन किया है, मगर कुछ बोल नहीं रहे हैं। सिर्फ गला घोंटने की-सी आवाज आ रही है। फोन काट भी नहीं रहे हैं। एक बार जाकर देखो- ऊपर सब ठीक तो है?’’ शशी ने बताया।
      ऐसी परिस्थिति का वर्णन सुनकर किसी को भी डर लग सकता है। मेरी मम्मी ने नीचे से ही मुझे आवाज देना शुरु किया। मेरी नीन्द है गहरी। वो तो मेरी पत्नी ने मुझे जगाया कि नीचे से मेरी मम्मी आवाज दे रही है। मैंने बिस्तर से ही पूछा, ‘‘क्या बात है मम्मी?’’
      ‘‘एकबार नीचे आओ तुम।’’ मम्मी का कहना था।
      ‘‘मैं इस वक्त नीचे नहीं आ सकता।’’ मैंने नीन्द की खुमारी में ही जवाब दिया।
      मेरे इस जवाब का कुछ और ही असर हुआ। सबने समझ लिया कि जरुर कुछ गड़बड़ है। मम्मी घबराहट में आवाज देकर बार-बार यह कहने लगी कि बस एक बार नीचे आओ।
      आखिर मैं नीचे आया।
      ‘‘क्या बात है- इतनी रात गये-?’’ मैंने पूछा।
      जवाब में मेरी मम्मी ने मुझे मेरे भाई का फोन मुझे पकड़ा दिया।
      ‘‘सब ठीक तो है- इतनी रात में फोन कर रहे हो?’’ मैंने भाई से पूछा।
      ‘‘फोन तो तुमने मुझे कर रखा है।’’ कहकर मेरे भाई ने सारी बात बताई। ऊपर से अपना मोबाइल लाकर मैंने देखा, सचमुच मेरे मोबाइल का मीटर ऑन था।
      अब मैंने समझाया कि भाई गलती से कोई बटन दब गया होगा, जिससे तुम्हें फोन लग गया। रही-सही कसर मेरी नाक बजने की आवाज ने पूरी कर दी होगी। ऐसी-वैसी कोई बात नहीं है।
      सबको समझा-बुझा कर कि सब ठीक है- मैं फिर सोने आ गया। भोर का उजाला होते ही भाई का फिर फोन आया। उसका कहना था, ‘‘रात में मुझे परेशानी से बचाने के लिए तो तुमने बोल दिया होगा कि कोई बात नहीं। अब तो सच-सच बता दो...’’
      वो दिन था और आज का दिन है- मैं अपने मोबाइल का की-पैडहमेशा लॉकरखता हूँ, ताकि फिर कभी गलती से कोई नम्बर न दब जाए.....



आज शशीकान्त (दोस्तों का ‘शशिया’) हाँग-काँग में पदस्थापित है पिछले साल हाँग-काँग जाने से पहले उसकी इच्छा हुई कि वह पुराने साथियों के साथ जमकर होली मनाये क्योंकि वह तीन वर्षों के लिए सपरिवार विदेश जा रहा था
फिर क्या था- हम बीस-पच्चीस दोस्त जुट गये होली के दिन- प्रमोद (चीकू, उर्फ ‘चिकुआ’) की दूकान पर इतने दोस्तों के पहुँचने का अनुमान प्रमोद को नहीं था मैंने ही बहुतों को फोन कर दिया था सॉफ्ट-ड्रिंक कम पड़ गया मिल-बाँट कर हमने खाया-पीया
हाटपाड़ा से दिलीप (सपन) तो कोलकाता से आये हुए मनोजीत को ले आया था, जिससे हम ’84 के बाद  पहली बार मिल रहे थे! (1984 में हमने मैट्रिक दिया था और बरहरवा में हमारा बहुत बड़ा सर्कल है- याद कीजिये, दो कक्षायें मिलकर एक हो गयी थीं)
एक जुगाड़ गाड़ी किराये पर ली गयी. उसी पर हो-हल्ला करते हुए हमने बरहरवा का चक्कर लगाया पता चला- बी.डी.ओ. साहब के यहाँ जबर्दस्त तैयारियाँ हैं होली की मस्ती थी ही, हम वहाँ भी पहुँच गये बहाना- सर, आपने भी ’84 में मैट्रिक दी है और हम सब भी वही हैं बरहरवा के इस धाकड़ समूह से मिलकर मिलकर बी.डी.ओ. साहब को अच्छा ही लगा 
अन्त में मेरे घर डेरा डला पकवानों के दौर के साथ गाना-बजाना और हँसी-ठिठोली हुई दोपहर बाद वहाँ से स्टेशन चौक आकर हम एक-दूसरे से विदा हुए
शाम को हम सबको बड़ा पछतावा हुआ कि जुगाड़ लेकर हम बी.डी.ओ. के पास तो गये, मगर अपने पुराने शिक्षकों- हजारी बाबू, गोपाल बाबू, इत्यादि के पास जाने की याद नहीं रही! यहाँ तक कि नन्दकिशोर सर (जो फिलहाल दुमका में रहते हैं और इस बार होली-मिलन समारोह में भाग लेने खास तौर पर आये हुए थे) से भी मिलने का ध्यान नहीं रहा, जिनका कि घर मेरे घर के बगल में ही है! अगर हम कुछ किलोमीटर दूर तीनपहाड़ जाकर अपने प्रधानाध्यापक कुमुद बाबू से मिल आते, तो यह सोने पे सुहागा हो जाता! खैर, फिर कभी। ईश्वर हमारे शिक्षकों को अच्छा स्वास्थ्य तथा लम्बी आयु प्रदान करे।
अभी फरवरी में घर गया था, तो घनश्याम (लिलिपुट) ने बताया कि वह इस बार होली में बरहरवा में नहीं रहेगा। मेरे ऊपर भी करनाल जाने का दवाब है। (पिछली दुर्गापूजा में ट्रेन रद्द होने के कारण जाना नहीं हो पाया था। इस बार अपना छोड़कर परिवार का मैंने रिजर्वेशन करा रखा है। मेरे जाने- न जाने का फैसला अन्तिम घड़ी में ही होगा।) बैंक से छुट्टी मिलेगी या नहीं, पता नहीं। उधर कोलकाता से कैलाश का फोन आ गया चुका है कि इस साल वह खास तौर पर होली मनाने बरहरवा आ रहा है- और मुझे हर हाल में होली वाले दिन बरहरवा में ही रहना है।
अब देखिये, क्या होता है...
ईति। 

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

ऐलोपैथ व होम्योपैथ बनाम सरसों का तेल



16 फरवरी, वृहस्पतिवार को अररिया (जहाँ वर्तमान में मैं रह रहा हूँ) और आसपास के जिलों में भयानक ओलावृष्टि हुई। अगले दिन अखबार में था कि लगभग तीस करोड़ की फसल बर्बाद हो गयी। यह दुःखदायी बात है।
मगर मेरे इस आलेख का विषय व्यक्तिगत है। उस शाम घर आकर पैर धोते वक्त मेरा शरीर काँप गया- जाहिर है, मुझे ठण्ड लग गयी थी। ध्यान गया- मैं उस रोज हाफ स्वेटर पहनकर दफ्तर नहीं गया था। अगले दिन (शुक्रवार को) भी यह महसूस होता रहा कि मुझे ठण्ड लगी हुई है।
रात सोने से पहले मन में आया कि ऊनी टोपी माँग लूँ; मगर यह सोचकर कि श्रीमतीजी ने इसे धो-धाकर बक्से में डाल दिया होगा, मैंने टोपी नहीं माँगी। उनके (श्रीमतीजी के) बार-बार कहने पर भी मैंने ‘बेलाडोना-30’ लेने की जरूरत नहीं समझी। जबकि पहले रोज ही मुझे ‘एकोनाईट’ ले लेना चाहिए था। (घर में कुछ जरूरी होम्योपैथ दवाईयाँ मैं हमेशा रखता हूँ।)
 नतीजा दिखायी पड़ा शनिवार को- सिर में दर्द के रूप में। दर्द की स्थिति में ही दिन भर काम कर मैं घर लौटा। बेलाडोना की दो-चार खुराक ली, मगर अब तक देर हो चुकी थी।
रात भर मैं सिरदर्द के कारण ठीक से सो नहीं पाया।
सुबह तंग आकर मैंने सिरदर्द की एक ऐलोपैथ टेबलेट ले ली। कुछ देर में मन दुरुस्त हुआ, तो एक रिश्तेदार के कहने पर मैं पैंतालीस किलोमीटर दूर पूर्णिया जाने के लिए भी तैयार हो गया। वहाँ एक वैवाहिक समारोह में शामिल होना था।
दोपहर तक सिरदर्द फिर शुरु हो गया- यानि ऐलोपैथ दवा का असर (‘दर्दनिवारक’ असर) समाप्त हो गया था। चार बजते-बजते दर्द इतना तेज हुआ कि मुझे घर लौटना पड़ा। बाजार में एक और दर्दनिवारक गोली खाकर मैं रात घर लौटा।
इस बार की दवा शायद ज्यादा ताकतवर थी- इसने अगली सुबह तक सिरदर्द के अहसास को दबाये रखा; मगर तबीयत खराब है- यह तो लग ही रहा था।
यह रविवार का दिन था।
***
सोमवार को बैंक में काम करते वक्त सिरदर्द इतना बढ़ा कि घर से होम्योपैथ दवायें मँगवानी ही पड़ी। दस-पन्द्रह मिनट के अन्तराल पर दो दवाओं की खुराक मैं बारी-बारी से लेता रहा। मगर कोई राहत नहीं मिली।
ढाई बजे ही मुझे बैंक से घर लौटना पड़ा। मुझे घर जाकर ‘एण्टिबायोटिक’ दवा लेने की सलाह दी गयी।
मैं नहीं जानता एण्टिबायोटिक दवाएँ किस सिद्धान्त पर काम करती हैं; मेरा सिर्फ इतना अनुमान है कि ये दवायें शरीर के अन्दर हानिकारक विषाणुओं के साथ-साथ लाभदायक जीवाणुओं को भी मार डालती हैं। मैं और मेरी पत्नी- हम दोनों इस दवा को कभी-कभार अन्तिम उपाय के रूप में ही अपनाते हैं। अन्यथा, हम दोनों या तो तकलीफ को दो-चार रोज सह लेते हैं; या फिर होम्योपैथ दवा ले लेते हैं। जहाँ तक मेरे तेरह साल के बेटे की बात है, जब वह चार महीने का था, तब हमें एकबार उसे ऐलोपैथ दवा देनी पड़ी थी, उसके बाद अब तक ऊपरवाले की दया से उसे ऐलोपैथ की जरूरत नहीं पड़ी है। कभी-कभार कुछ तकलीफ होने पर होम्योपैथ दवाओं की कुछ खुराक से ही वह स्वस्थ हो जाता है। 
खैर, घर आकर निढाल होकर मैं बिस्तर पर लेट गया और बेटे से बोला- दवा दूकान जाकर ‘तेज सिरदर्द’ बोलकर कोई दवा ले आओ।
वह भागकर दवा ले आया।
तब तक माँ से बात करने के लिए मैंने घर (बरहरवा) फोन लगा लिया था। बरहरवा में होता, तो मैं अभी माँ की गोद में सिर रखकर लेटा होता।
पिताजी ने होम्योपैथ तथा बायोकिमिक दवाओं के जिक्र के बाद माँ को फोन दिया। माँ बोलीं- सरसों तेल गर्म करके माथे पर मालिश करो।
मैंने कहा- तेल में लहसून भी पका लूँ?
बोलीं- हाँ।
फिर वो बोलीं- देखो, बबलू क्या बता रहा है।
मेरे भाई ने फोन लेकर कहा- सरसों तेल उँगली में लेकर नाक से सूँघो न!
मैंने कहा- अभी सूँघता हूँ।
आप यकीन नहीं कीजियेगा- जैसे ही मैंने उँगली में सरसों तेल लगाकर उँगली को नाक में डालकर सूँघा- सिरदर्द की तीव्रता में मैंने कमी महसूस की!
मैंने दवा और बाम को दूर हटाया। फिर से दो-तीन बूँद तेल नाक में डालकर सूँघा। काफी राहत महसूस हुई।
इस बीच लहसून के साथ गर्म किया गया सरसों तेल भी मेरी श्रीमतीजी ले आईं और उस तेल से मेरे सिर की मालिश शुरू हो गयी।
संयोग से श्रीमतीजी की माँ भी अभी हमारे साथ हैं। उन्होंने तुलसी पत्ते, अदरख, गोलमिर्च (कालीमिर्च) इत्यादि का काढ़ा बनाकर दिया- मैं पी गया। अब रजाई ओढ़कर मैं लेट गया। 
कुछ देर बाद मेरे मन में क्या आया, मैंने श्रीमतीजी से कहा- स्वर्ग जाना चाहती हो? ऐसा करो, फिर से थोड़ा सरसों तेल लहसून के साथ गर्म करो, और इस बार मेरे पैर के तलवों की मालिश कर दो।
उन्होंने इस बार मेरे हथेलियों तथा तलवों की मालिश कर दी।
घण्टे भर बाद रजाई के अन्दर से मैंने महसूस किया- मेरा शरीर पसीना-पसीना हो रहा था। अर्थात् शरीर में घुसी ठण्ड अब निकल रही थी। सिरदर्द से तो लगभग छुटकारा मिल गया था। फिर भी मैं तीन घण्टों तक रजाई में ही रहा- जब तक कि शरीर पसीने से नहा नहीं गया।
हाँ एक बात और, इस तरह की तकलीफ होने पर हमलोग उबाला हुआ पानी ही ठण्डा करके पीते हैं, वह भी अच्छी-खासी मात्रा में। यह नुस्खा बचपन से ही हम देखते आये हैं। पिताजी का कहना है- यह शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मददगार होता है।  
***
यह घटनाक्रम मामूली लग सकता है। मगर मेरे लिए यह महत्वपूर्ण रहा।
याद आया, बचपन में हमलोग जब रेलवे के तालाब (बरहरवा का विशाल ‘कल पोखर’) में नहाने जाया करते थे, तब जाड़ों में पिताजी न केवल सरसों तेल से मालिश करने को कहा करते थे, बल्कि इसे नाभि में लगाने और सूँघने भी कहते थे। ...तब सूँघने से हम अक्सर बचते थे।
अब इतने वर्षों बाद, जब मैं खुद पिता हूँ, जाड़ों में नहाने से पहले मैं सरसों का तेल बाँयी हथेली पर लेकर दाहिने हाथ की तर्जनी उँगली से उसे सूँघूँगा और अपने बेटे को भी ऐसा करने को कहूँगा। ...अब शायद वह भी ऐसा करने से बचे...!  
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पुनश्च:
सभी चिकित्सा-प्रणालियाँ अपनी जगह कामयाब हैं और हम आवश्यकतानुसार इनकी शरण में जा सकते हैं। दुर्घटना हो जाने के बाद ऐलोपैथ ही व्यक्ति की जान बचाता है। लम्बी बीमारियों में होम्योपैथ ही कारगर साबित होता है। हल्की-फुल्की तकलीफों के लिए घरेलू ईलाज अपनाकर देखा जा सकता है।
स्वस्थ रहने के लिए तो खैर, योग-प्राणायाम, कसरत-जॉगिंग एक प्रकार से रामबाण हैं।
ईति।
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