बुधवार, 5 जनवरी 2011

“क्षैतन्जी”

बचपन में जैसे ही हम कभी छींकते थे, आस-पास कहीं खड़ी हमारी बुआ या चाची या माँ बोल पड़ती थीं- क्षैतन्जी!
हम बच्चे कुछ समझते नहीं थे.
कुछ बड़े होने पर हमने पूछना शुरु किया- यह क्षैतन्जीक्या है?
जवाब मिलता- कहना चाहिए.
कुछ और बड़े होने पर हमने बहस करना शुरु कर दिया- क्यों कहना चाहिए? नहीं कहने से क्या होगा?
हमारी चाची या बुआ या माँ के पास इनका कोई जवाब नहीं होता था.
***
वर्षों बीत जाते हैं.
हम कॉलेज में हैं.
हिन्दी के प्राध्यापक ‘अपभ्रंश’ के बारे में बता रहे हैं.
वे दो उदाहरण देते हैं- 1. आनामासिधन और 2. क्षैतन्जी
बच्चों का हाथ पकड़कर पहली बार स्लेट पर जो शब्द लिखवा जाता है, वह है- आनामासिधन. (हालाँकि हमारे इलाके में इसका प्रचलन नहीं है. वैसे, बँगला में इस अनुष्ठान को ‘हाते-खड़ी’ (हाथ में खड़िया) कहते हैं.)
हिन्दी के प्राध्यापक बताते हैं कि ऊँ नमः सिद्धम का अपभ्रंश है- आनामासिधन.
इसी प्रकार, शतम् जीवः का अपभ्रंश है- क्षैतन्जी.
हमें एक प्रश्न का उत्तर मिल जाता है कि क्षैतन्जीवास्तव में एक आशीर्वाद है- सौ साल जीओ.
मगर दूसरा प्रश्न अब भी अनुत्तरित है, कि छींकने के बाद ही यह आशीर्वाद क्यों?
***
फिर वर्षों बीत जाते हैं.
कुछ रोज पहले अखबार में एक ‘बॉक्स’ समाचार पर नजर पड़ती है, जिसका आशय है- छींकते वक्त क्षण भर (Fraction of Second) के लिए हमारे हृदय की धड़कन रुक जाती है!
दूसरे प्रश्न का भी उत्तर मिल गया.
जब भी कोई- खासकर एक बच्चा- छींकता है, तो वास्तव में वह मरकर जीता है! इसलिए घर के बड़ों के मुँह से अनायास ही निकल पड़ता था- सौ साल जीओ बच्चे, तुम अभी-अभी मृत्यु के मुँह से लौट कर आये हो.
*** *** ***  

1 टिप्पणी:

  1. आपने बहुत महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी। आपके द्वारा दी जानकारियाँ हिन्दी को और बेहतर से समझने के लिए आवश्यक होगीं। आपका धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं